बुधवार, जून 13, 2018

दृश्यों को गुजर जाने दो

आप संसारी वस्तुएँ पाने की इच्छा करें तो इच्छामात्र से संसार की चीजें आपको नहीं मिल सकतीं। उनकी प्राप्ति के लिए आपका प्रारब्ध और पुरुषार्थ चाहिए। किन्तु आप ईश्वर को पाना चाहते हैं तो केवल ईश्वर को पाने की तीव्र इच्छा रखें। इससे अंतर्यामी ईश्वर आपके भाव को समझ जाता है कि आप उनसे मिलना चाहते हो।

जैसे-चींटी गरुड़ से मिलने की इच्छा रखे और गरुड़ को भी पता चल जाये तो चींटी अपनी चाल से गरुड़ की ओर चलेगी लेकिन गरुड़ चींटी से मिलने के लिए अपनी गति से भागेगा। ऐसे ही जीवात्मा अपनी गति से ईश्वर को पाने का प्रयत्न करेगा तो ईश्वर भी अपनी उदारता से उसे उपयुक्त वातावरण दे देगा, जल्दी साधना के जहाज में बिठा देगा। यही कारण है कि आप अभी यहाँ बैठे हैं।

आपकी केवल तीव्र इच्छा थी ईश्वर के रास्ते जाने की… मंडप बनाने वालों ने मंडप बनाया, माईक लगाने वालों ने माईक लगाया, सजावट करने वालों ने सजावट की, कथा करने  वालों ने कथा की, आपकी तो केवल इच्छा थी कि सत्संग मिल जाय और आपको सब कुछ तैयार मिल रहा है….

परन्तु शादी की इच्छामात्र से सब तैयार नहीं मिलेगा…. सब तैयार करना पड़ेगा और बारातियों के आगे नाक रगड़ने पड़ेगी। उसके बाद भी कोई राज़ी तो कोई नाराज तथा शादी के बाद भी लांछन सहने के लिए तैयार रहना पड़ेगा और कभी कुछ तो कभी कुछ, खटपट चलती ही रहेगी… कभी साला बीमार तो कभी साली बीमार, कभी साले का साला बीमार तो वहाँ भी सलामी भरने जाना पड़ेगा। यहाँ तो ईश्वरप्राप्ति की इच्छामात्र से सब तैयार मिल रहा है !

ईश्वर को पाने की इच्छामात्र से हृदय में पवित्र भाव आने लगते हैं तथा संसार के भोग पाने की इच्छामात्र से हृदय में खटपट चालू हो जाती है। ईश्वर प्राप्ति के लिए चलते हो और जब ईश्वर मिलता है तब पूरे-का-पूरा मिलता है किन्तु संसार आज तक किसी को पूरे-का-पूरा नहीं मिला। संसार का एक छोटा सा टुकड़ा भारत है, वह भी किसी को पूरे का पूरा नहीं मिला। उसमें भी लगभग एक अरब लोग हैं।

संसार मिलेगा भी तो आंशिक ही मिलेगा और कब छूट जाय इसका कोई पता नहीं लेकिन परमात्मा मिलेगा तो पूरे-का-पूरा मिलेगा और उसे छीनने की ताकत किसी में नहीं है !

परमात्मा मिलता कैसे है ? साधना से…. पंचसकारी साधना से जन्म-मरण का, भवरोग का मूल दूर हो जाता है। ईश्वरत्व का अनुभव करने में, अंतर्यामी राम का दीदार करने में यह पंचसकारी साधना सहयोग करती है। कोई किसी भी जाति, संप्रदाय अथवा मजहब का क्यों न हो, सबके जीवन में यह साधना चार चाँद लगा देती है।

इस साधना के पाँच अंग हैं तथा पाँचों अंगों के नाम ‘स’ कार से आरम्भ होते हैं, इसलिए इसे पंचसकारी संज्ञा दी गयी है।

सहिष्णुताः अपने जीवन में सहिष्णुता (सहनशीलता) लायें। जरा-जरा सी बात में डरें नहीं, जरा-जरा सी बात में उद्विग्न न हों, जरा-जरा सी बात में बहक न जायें, जरा-जरा सी बात में सिकुड़ न जायें। थोड़ी सहनशक्ति रखें। तटस्थ रहें। विचार करें कि यह भी बीत जायेगा।

यह विश्व जो है दीखता, आभास अपना जान रे।

आभास कुछ देता नहीं, सब विश्व मिथ्या मान रे।।

होता वहाँ ही दुःख है, कुछ मानना होता जहाँ।

कुछ मानकर हो न दुःखी, कुछ भी नहीं तेरा यहाँ।।

चाहे कितना भी कठिन वक्त हो चाहे कितना भी बढ़िया वक्त हो – दोनों बीतने वाले हैं और आपका चैतन्य रहने वाला है। ये परिस्थितियाँ आपके साथ नहीं रहेंगी किन्तु आपका परमेश्वर तो मौत के बाद भी आपके साथ रहेगा। इस प्रकार की समझ बनाये रखें।

पिछले जन्म के प्रमाणपत्र आपके साथ नहीं हैं, पिछले जन्म के दोस्त आपके साथ नहीं हैं, पिछले जन्म के माता-पिता भी आपके साथ नहीं हैं और इस जन्म के भी बचपन के मित्र अभी नहीं हैं, बचपन की तोतली भाषा अभी नहीं है लेकिन बचपन में जो दिलबर आपके दिल की धड़कन चला रहा था, वह अभी भी है और बाद में भी रहेगा। इसीलिए सिख धर्म के आदिगुरु नानकदेव ने कहाः

आद सत् जुगाद सत् है भी सत् नानक होसे भी सत्।।

आप सत्य का, ईश्वर का आश्रय लीजिए और परिस्थितियों के प्रभाव से बचिये। जो लोग परिस्थितियों को सत्य मानते हैं वे इनसे घबराकर कभी आत्महत्या की बात भी बोल देते हैं – यह बहुत बड़ा अपराध है। अन्वेषणकर्त्ताओं के आँकड़े बताते हैं कि विश्व में हर रोज 12000 मनुष्य आत्महत्या का संकल्प करते हैं, प्रयास करते हैं तथा उनमें से कुछ सफल हो जाते हैं। 9 में से 8 मनुष्य आत्महत्या करते-करते चिल्ला पड़ते हैं और बच जाते हैं, नौवां सफल हो जाता है। सफल तो क्या होता है, आत्महत्या करके प्रेत हो जाता है। आत्महत्या जैसा घोर पातक दूसरा नहीं है।

एक मनोविज्ञान के प्रोफेसर कुछ विद्यार्थियों को ऊँची छत पर ले गये और उनसे कहाः “नीचे झाँकों।’ फिर पूछाः “नीचे झाँकने से डर क्यों लगता है ?”

अंत में प्रोफेसर ने कहाः “ऊँची छत से नीचे झाँकते हैं तो डर लगता है। इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कभी-न-कभी एकाध बार मर जाने का सोच लेता है। मर जाने का जो विचार है वही उसे ऊँची छत पर से नीचे देखने पर डराता है कि कहीं मर न जाऊँ।”

किसी भी परिस्थिति में मरने का विचार नहीं करना चाहिए तथा अपने चित्त को दुःखी होने से बचाना चाहिए। अगर जीवन में सहिष्णुता का गुण होगा तभी आप बच पायेंगे।

टी.वी. में विज्ञापन देखो तो जरा सह लो। पेप्सी देखी, लाये और पी ली आप बिखर जाओगे। उन दृश्यों को गुजर जाने दो। आप किस-किस  विज्ञापन का कौन-कौन सा माल खरीदोगे ? विज्ञापन देने वाले लाखों रुपये विज्ञापन में खर्च करते हैं उससे कई गुना आपसे नोचते हैं, इसीलिए जरा सावधान रहो।

इसी प्रकार दूसरे की उन्नति के तेज को भी सह लीजिये और अपने अपमान को भी सह लीजिए। पड़ोसी के सुख को भी पचा लीजिये और अपने दुःख को भी सह लीजिये। अपने दुःखों में परेशान मत होइये। आज वहाँ फूल खिला है तो कल यहाँ भी खिलेगा। आज
उस पेड़ ने फल दिये हैं तो कल इस पेड़ में भी फल लगेंगे। ऐसा करने से ईर्ष्या के दुर्गुण से भी बचने में मदद मिलेगी और सहिष्णुता का गुण हमारे चित्त को पावन करने में भी मदद करेगा।

सेवाः आपके जीवन में सेवा का सदगुण हो। ईश्वर की सृष्टि को सँवारने के भाव से आप पुत्र-पौत्र, पति-पत्नी आदि की सेवा कर लो। ‘पत्नी मुझे सुख दे।’ अगर इस भाव से सेवा की तो  पति पत्नी में झगड़ा रहेगा। ‘पति मुझे सुख दें।’ इस भाव से की तो स्वार्थ हो जायेगा और स्वार्थ लंबे समय तक शांति नहीं दे सकता। ‘पति की गति पति जानें मैं तो सेवा करके अपना फर्ज निभा लूँ….. पत्नी की गति पत्नी जाने मैं तो अपना उत्तरदियत्व निभा लूँ…..।’ ऐसे विचारों से सेवा कर लें।

पत्नी लाली-लिपस्टिक लगाये कोई जरूरी नहीं है, डिस्को करे कोई जरूरी नहीं है। जो लोग अपनी पत्नी को कठपुतली बनाकर, डिस्को करवाकर दूसरे के हवाले करते हैं और पत्नियाँ बदलते हैं वे नारी जाति का घोर अपमान करते हैं। वे नारी को भोग्या बना देते हैं। भारत की नारी भोग्या, कठपुतली नहीं है, वह तो भगवान की सुपुत्री है। नारी तो नारायणी है।

सम्मानदानः तीसरा सदगुण है सम्मानदान। छोटे-से-छोटा प्राणी और बड़े-से-बड़ा व्यक्ति भी सम्मान चाहता है। सम्मान देने में रुपया-पैसा नहीं लगता है और सम्मान देते समय आपका हृदय भी पवित्र होता है। अगर आप किसी से निर्दोष प्यार करते हैं तो खुशामद से हजारगुना ज्यादा प्रभाव उस पर पड़ता है। अतः स्वयं मान पाने की इच्छा न रखें वरन् औरों को सम्मान दें।

स्वार्थ-त्यागः चौथा सदगुण है स्वार्थ-त्याग। कर्म निःस्वार्थ होकर करें, स्वार्थ-भाव से नहीं। स्वार्थत्याग की भावना अन्य गुणों को भी विकसित करती है।

समताः पाँचवीं बात है कि आपमें समता का सदगुण आ जाय। चित्त सम रहेगा तो आपकी आत्मिक शक्ति बढ़ेगी, आपका योग सिद्ध होगा और आप आत्मज्ञान पाने में सफल हो जायेंगे।

यह ‘पंचसकारी साधना’ ज्ञानयोग की साधना है। इसका आश्रय लेने से आप भी ज्ञानयोग में स्थिति पा सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2002, पृष्ठ संख्या 11-13 अंक 113

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तनाव क्यों हैं ? तनाव से मुक्ति कैसे पायें? तनाव इसलिये है कि जीवन में सत्संग नहीं है !

जीवन में सत्संग नहीं है तो तनाव तो होगा ही

संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

सारा संसार तीन तनावों में तना जा रहा हैः शारीरिक तनाव, मानसिक तनाव और भावनात्मक तनाव।

इन तीनों तनावों की भीषण चक्की में देश विदेश के सभी मनुष्य पिसे जा रहे हैं। आत्महत्या के कारणों की जाँच करने वाले एक अध्ययन के अनुसार 98 प्रतिशत आत्महत्याएँ मानसिक एवं भावनात्मक तनावों के कारण ही होती हैं। लाख आत्महत्याओं में 98000 का कारण मानसिक एवं भावनात्मक तनाव है। सारे सुख-सुविधाएँ होते हुए भी इन तनावों के कारण बेचारे लोग आत्महत्या करके मर जाते हैं।

इसी प्रकार 95 % हृदयघात भी मानसिक तनाव के शिकार लोगों को ही होता है। कई लोगों को खानपान का उचित विवेक नहीं होता है इस कारण भी वे हृदयघात का शिकार बन जाते हैं।

‘सुख-दुःख में सम रहना, सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है।’ गीता का यह ज्ञान, इस प्रकार का सत्संग जिन्होंने पाया है ऐसे लोग इन तनावों से नहीं तनते। उन्होंने ही जीवन जीने का सही ढंग सीखा है।

ऐसा ज्ञान पाने वाला साधक इन तनावों का शिकार होने से काफी तक बच जाता है, क्योंकि वह न तो अति परिश्रम करेगा और न ही अति आराम करेगा। साधक परिश्रम भी करेगा तो उसे कठिन नहीं लगेगा, क्योंकि वह ऐसा नहीं मानेगा, ‘मैं परिश्रम कर रहा हूँ’ वरन् वह तो मानेगा, ‘परिश्रम शरीर कर रहा है।’ ऐसा समझकर वह शारीरिक तनाव से बचता चला जायेगा और मानसिक तथा भावनात्मक तनाव से बचने की विधि भी वह सत्संग के द्वारा जान लेता है।

मेरो चिंत्यो होत नाहीं हरि को चिंत्यो होय।

हरि को चिंत्यो हरि करे मैं रहूँ निश्चिंत।।

तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत होई सोय।

अनहोनी होती नहीं होनी होय सो होय।।

सब अपना-अपना प्रारब्ध लेकर आते हैं। फिर भी मनुष्य को अपना पुरुषार्थ करना चाहिए और पुरुषार्थ तो करे लेकिन उसका फल पाने की इच्छा न रखे बल्कि ‘भगवान ! तेरी मर्जी पूरण हो… मेरी इच्छा, वासना, कामना जल जाय और तेरी इच्छा पूरी ही जाय।’ इस भाव से प्रयत्न करे, सदगुरु के इस प्रकार के वचन सुनकर एवं उसका अभ्यास करके  विवेक, वैराग्यसम्पन्न सुदृढ़ सत्संगी मानसिक तनावों से इतने नहीं पीड़ित होते हैं जितने कि निगुरे पीड़ित हो जाते हैं।

क्योंकि निगुरे आदमी को तो गुरु के वचन सुनने को नहीं मिलते। कभी पुण्यवश संत-महापुरुष के वचन सुनने को मिल भी जायें तो वह उन्हें सुनता तो है लेकिन उस प विचार नहीं कर पाता है, उन वचनों को स्वीकार नहीं कर पाता है। उसे लगता है ‘यह तो करना चाहिए, वह तो करना चाहिए….’ तो करो और मरो, कर्त्ता हो कर पचते रहो तनावों में।

‘मैं कुछ बनकर दिखाऊँ, कुछ करके दिखाऊँ….’ का जो भूत है वह निगुरे लोगों को मानसिक और भावनात्मक तनाव में ताने रखता है। अरे, बनकर क्या देखना है ? तू मिट जा भैया ! बनेगा तो अहंकारी हो जायेगा। तू बनने की कोशिश न कर, मिटने का यत्न कर।

जो तिद् भावे सो भलिकार…..

फिर भी कुछ बनने का शौक है तो भगवान का बनकर देख, सदगुरु का बनकर देख।

संसार में थोड़े-बहुत सफल हो गये तो अहंकार मार गिराता है और विफल हो गये तो विषाद दबोच लेता है। इसलिए ‘मैं कुछ होकर दिखाऊँ, कुछ बनकर दिखाऊँ, कुछ प्रसिद्ध होकर दिखाऊँ….’ ऐसी कामना सत्शिष्य को नहीं होती।

कुछ बनकर नहीं दिखाना है वरन् यह जो कुछ बनकर दिखाने का भूत है उसको हटाओ। फिर देखो, वह घड़वैया तुम्हें कैसा घड़ता है ! हमने कभी नहीं सोचा, ‘मैं आसुमल हूँ, आसाराम बनकर दिखाऊँ… प्रसिद्ध होकर दिखाऊँ….’ नहीं नहीं।

मेरी हो सो जल जाय तेरी हो सो रह जाय….

कुम्हार के हाथ में मिट्टी को जाने दो फिर वह घड़ा बनाये, सुराही बनाये, कुल्हड़ बनाये उसकी मर्जी…. संसार का कुम्हार तो बनता है अपने स्वार्थ के लिए लेकिन परमात्मा और सदगुरुरूपी कुम्हार अपने स्वार्थ के लिए नहीं बनायेंगे वरन् तुम्हें ही परमेश्वरमय बना देंगे।

यदि तू अपनी अकड़-पकड़ छोड़ दे, अपनी वासना छोड़ दे और अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए चिंतन करना छोड़ दे तो बहुतों की भलाई के लिए ईश्वर तेरे द्वारा बहुत कुछ करवाने को तैयार है। अगर तू कुछ बनने की कोशिश करेगा तो मानसिक तनाव में, भावनात्मक तनाव में और अहंकार में ही तनता रहेगा। इसी प्रकार भावनात्मक तनाव भी लोगों को पीड़ित कर रहा है।

एक आदमी बीच सड़क से जा रहा था। उससे पूछ गयाः “भाई ! तू बीच सड़क पर क्यों रहे हो ?”

आदमी बोलाः “एक बार कोई आदमी सड़क के किनारे से जा रहा था और किनारे के किसी मकान की दीवार गिर गयी तो उससे वह आदमी दब गया था। अब मुझे भी डर लगता है कि कहीं किनारे वाली दीवार गिर जायेगी तो मैं भी दबकर मर जाऊँगा। इसीलिए बीच सड़क पर चलता हूँ।”

ऐसे ही किसी को आठ साल की एक बेटी है और दूसरी संतति भी बेटी ही हुई तो माँ को चिंता लग गयी कि इसके लिए दहेज देना पड़ेगा….। दहेज तो देना पड़ेगा 18-20 साल के बाद लेकिन तनाव अभी से घुस गया… और 18-20 साल के बाद परिस्थितियाँ बदल जायेंगी। अभी कन्याएँ कम हो रही हैं और लड़के ज्यादा। इन आँकड़ों के हिसाब से आने वाला समय इससे कुछ दूसरा ही होगा। अभी बेचारे कन्या वाले गिड़गिड़ाते हैं, तब लड़के वाले आजी-निजारी, मन्नतें करते, कन्या माँगते रहेंगे जो कि सन् 1947 के पूर्व की स्थिति थी। लड़कों की इतनी कीमत नहीं रहेगी, लड़की मिले तो कृपा हो गयी ऐसा होने वाला है।

लड़की दस साल की हो गयी… तब भी चिंता हो रही है कि इसकी शादी करनी पड़ेगी। लड़की 18 वर्ष की हो गयी…. 20 की हो गयी… सगाई नहीं हो रही है तब भी चिंता हो रही है, भावनात्मक तनाव की लकीरें दिन-प्रतिदिन खिंचती चली जाती हैं। अरे ! जो होना होगा सो होगा। तुम प्रयत्न करो, कार्य में ध्यान रखो लेकिन चिंता मत करो।

शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए खूब आविष्कार हो रहे हैं परन्तु व्यक्ति अगर तीन-चार घंटे भी नींद कर ले तो आराम से स्वस्थ रह सकता है, परन्तु खानपान और आहार-विहार की गड़बड़ी करता है तो 7-8 घंटे सोने पर भी अपने को थका हुआ महसूस करता है। फिर थोड़ा काम करता है तो ‘मैंने बहुत काम कर लिया और मैं बहुत थक गया हूँ… मैं बीमार हूँ और मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ….’ ऐसे बेकार के चिंतनों में पड़कर शारीरिक तनाव से पीड़ित हो जाता है।

शारीरिक और मानसिक तनाव बढ़ने से फिर उस आदमी को सिगरेट की, दारू की जरूरत पड़ने लगती है। पति अथवा पत्नी के साथ अपना सत्यानाश करने की इच्छा – यह शारीरिक और मानसिक तनाव का फल है। बिनजरूरी काम विकार, बिन जरूरी खाना, बिनजरूरी बोलना – ये भी शारीरिक और मानसिक तनाव के लक्षण हैं।

मनुष्य अगर इसी ढंग से जीवन जीता रहे तो उसके पास मौत की चार चिट्ठियाँ आ जाती हैं- शरीर पर झुर्रियाँ, बालों की सफेदी, आँखों की रोशनी में कमी और नसों की कमजोरी।

अगर कोई इन मुसीबतों से बचना चाहता है तो उसे चाहिए कि आसन प्राणायाम के द्वारा शरीर को स्वस्थ रखे, श्वासोच्छ्वास की गिनती करे और ‘मैं शरीर नहीं हूँ तो रोग मुझे कैसे छू सकता है ?’ ऐसा सोचे, संतों के सत्संग का लाभ ले तो वह शारीरिक और मानसिक तनाव से मुक्ति पा लेगा।

अपनी जीवन में तीन बातों का ध्यान रखोः

शरीर को अति थकाओ मत।

मैं थक गया हूँ – ऐसा सोचकर मन से भी मत थको। मन को तनाव में न डालो। जो होगा देखा जायेगा।

भावनाओं एवं कल्पनाओं में मत उलझो।

सारा संसार इन्हीं तीन तनावों से तप रहा है – शारीरिक तनाव, मानसिक तनाव और भावनात्मक तनाव। कोई भगत है, मंदिर में भी जाता है फिर भी यदि उसके जीवन में सत्संग नहीं है, संत पुरुषों का मार्गदर्शन नहीं है तो वह भी भावनात्मक तनाव से तन जाता है। कुछ अच्छा हो गया तो खुश हो जायेगा कि ‘भगवान की बड़ी कृपा है’ और कुछ बुरा हो गया तो कहेगाः “भगवान ने ऐसा नहीं किया, वैसा नहीं किया।’ लेकिन उसे क्या पता कि भगवान उसका कितना हित चाहते हैं ? इसलिए कभी भी अपने को दुःखद चिंतन में नहीं गिराना चाहिए, निराशा की खाई में नहीं गिराना चाहिए और न ही अहंकार के दलदल में फँसना चाहिए वरन् यह विचार करें कि संसार सपना है इसमें ऐसा तो होता रहता है।….

इन तीनों तनावों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, बाकी के सब उपाय तो तनावरूपी वृक्ष के पत्ते और टहनियों के तोड़ने  के समान हैं। तनावरूपी वृक्ष की जड़ में कुल्हाड़ी मारना हो तो एक ही कुल्हाड़ी है – वह है आत्मयोग की।

आत्मयोग क्या है ?

जो दिख रहा है वह सब स्वप्न है, स्फुरणमात्र है और जिससे दिख रहा है वह आत्मा ही सत्य है। उस सत्य में विश्रांति पाने का नाम ही है – आत्मयोग। इससे तीनों तनाव अपने आप दूर हो जाते हैं।

सब लोग इन तीन तनावों में से किसी न किसी तनाव से कम या अधिक अंशों में पीड़ित हैं। कोई एक से तो कोई दो से अथवा कोई-कोई तो तीनों तनावों से पीड़ित हैं। इन तीनों तनावों से पार हुआ अपने परमेश्वर स्वभाव में, अपने आत्मस्वभाव में जगा हुआ तो कोई विरला महापुरुष ही मिलता है।

ऐसे आत्मवेत्ता महापुरुष इन तीन तनावों से पार होने की कुंजी बताते हैं, प्रयोग बताते हैं और परमात्म-प्रसन्नता की प्राप्ति भी करा देते है। धनभागी है वे लोग जो उनके पदचिन्हों पर सच्चाई एवं श्रद्धापूर्वक चलाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2002, पृष्ठ संख्या 10-12, अंक 111

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शनिवार, जून 02, 2018

भक्तिमती गवरीबाई


संवत् १८१५ में डूँगरपुर (प्राचीन गिरिपुर) गाँव (राज.) में एक कन्या का जन्म हुआ,नाम रखा गया गवरी। ५-६ साल की उम्र में ही उसका विवाह कर दिया गया। विवाह के एक वर्ष बाद ही उसके पति का देहांत हो गया। थोड़े समय बाद माँ और फिर पिता भी चल बसे।

  संसार के संबंधों की नश्वरता को गवरीबाई ने प्रत्यक्ष
देखा,उनको संसार फीका लगने लगा । उन्होंने  भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना सब कुछ मान लिया। वे गीता, भागवत, रामायण, उपनिषद् आदि ग्रंथ पढ़तीं। भगवान के प्रति भजन के रूप में निकले उनके भाव लोगों को ईश्वर की याद से भर देते । गवरीबाई के श्रीकृष्णभक्ति परक पदों में संत मीराबाई के समान माधुर्यभाव व विरह की परिपूर्णता रहती।

गवरीबाई के परम सौभाग्य का उदय तो तब हुआ जब उन्हें एक आत्मज्ञानी ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की शरण मिली। उनके गुरुदेव ने उन्हें ब्रह्मज्ञान व योगदर्शन का उपदेश दिया।
      संसार से उपराम और सुख-भोगों की अनासक्ति से युक्त गवरीबाई के परिपक्व हृदय में गुरु के वचन गहरे उतर जाते । सुनते-सुनते वे अहोभाव से भर जातीं और घंटों उसी भाव में खोयी रहतीं । वे कहती थीं :
हरि नाम बिन और बोलना क्या,
हरि कथा बिना और सुनना क्या।
सुखसागर समालिओ त्यागी,
कूप डाब में डालना क्या।
घट गिरधर गिरधर पाया,
बाहेर द्रांग अब खोलना क्या।
आत्मा अखंड आवे न जावे,
जन्म नहीं तो फिर मरना क्या।
न गवरी ब्रह्म सकल में जाना,
जाना तो जद खोलना क्या।

गवरी बाई गुरु-महिमा का वर्णन करते हुए कहती हैं

ज्ञानघटा घेरानी अब देखो,
    सतगुरु की कृपा भई मुझ पर
शब्द ब्रह्म पहचानी ।

गवरी बाई पर गुरुकृपा ऐसी बरसी कि उनके लिए अब भगवान केवल श्री कृष्ण की मूर्ति तक ही सीमित न रहे, गुरु ज्ञान ने उनके अज्ञान-आवरण को चीर डाला और उन्हें घट-घट में परमात्मा के दीदार होने लगे। वे कहती हैं:
'पूरे ब्रह्मांड का स्वामी सर्वव्यापक हरि ही है। चौदह भुवनों में बाहर, भीतर सर्वत्र वही समाया हुआ है। चाँद में चैतन्य भी वही है। सूरज में तेज भी वही है। ऐसे हरि को भजे बिना दसों दिशाएँ सूनी लगती हैं। हे प्रभु ! तुम्हारा न कोई निश्चित रूप है,न रंग,न वर्ण है। तुम ॐकारस्वरूप हो,तुम निराकार रूप हो । न तुम माया हो न कर्म । उस प्रकार गवरीबाई लिखती हैं कि उनके गुरु के उपदेशों से उन्हें ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हुआ है। उस प्रकाश
से अज्ञान का अंधकार समाप्त हो गया है।
       गवरीबाई ने अपने गुरुदेव से जो ज्ञान पाया था उसकी झलक उनके पदों में छलक रही है

आत्मज्ञान विना प्राणीने सुख न थाऊ रे,
आत्मज्ञान विना मन विश्राम न पाऊ रे,
आत्मज्ञान विचार विना न पावे मुक्ति रे,
आत्मज्ञान विना कोई अड़सठ तिर्थ नाहे रे,

  ऋषि प्रसाद अप्रैल २०१८

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