स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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'जिसने मन जीता, उसने जग जीता'

Rajesh Kumawat | 8:41 AM | | | | | | | | Best Blogger Tips

                 जब तक मन नहीं मरा, तब तक वेदान्त का ज्ञान अच्छा नहीं लगता। विद्यारण्य स्वामी अपनी पुस्तक 'जीवन्मुक्त विवेक' में कहते हैं कि 'सहस्र अंकुरों, टहनियों और पत्तोंवाले संसाररूपी वृक्ष की जड़ मन ही है। यह आवश्यक है कि संकल्प को दबाने के लिए मन का रक्त बलपूर्वक सुखा देना चाहिए, उसका नाश कर देना चाहिए। ऐसा करने से यह संसाररूपी वृक्ष सूख जायेगा।'

                   वसिष्ठजी कहते हैं- 'मन का स्वच्छंद होना ही पतन का कारण है एवं उसका निग्रह होना ही उन्नति का कारण है। अतः अनेक प्रकार की अशांति के फलदाता संसाररूपी वृक्ष को जड़ से उखाड़ने का तथा अपने मन को वश करने का उपाय केवल मनोनिग्रह ही है।
 
                   हृदयरूपी वन में फन उठाकर बैठा साँप मन है। इसमें संकल्प-विकल्परूपी घातक विष भरे होते हैं। ऐसा मनरूपी साँप जिसने मारा है, उस पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा की तरह पूर्ण हुए निर्विकार पुरूष को मैं नमस्कार करता हूँ।
 
                    ज्ञानी का मन नाश को प्राप्त होता है परंतु अज्ञानी का मन उसे बाँधने वाली एक जंजीर है। जब तक परम तत्त्व के दृढ़ अभ्यास से अपने मन को जीता नहीं जाता, तब तक वह आधी रात में नृत्य करने वाले प्रेत, पिशाच आदि की तरह नाचता रहता है।
 
                   वर्तमान परिवर्तनशील जीवन में मनुष्य को सत्ता एवं प्रभुता से प्रीति हो गयी है। इसका मूल कारण है, अपने में अपूर्णता का अनुभव करना। 'मैं शरीर हूँ' यह भावना मिट जाने से देह की आसक्ति हट जाती है। देह में आसक्ति हट जाने से देह तथा उससे सम्बन्धित पदार्थों और सम्बन्धों में किंचित् भी ममता नहीं रहती।
 
                   जिसके चित्त से अभिमान नष्ट हो गया, जो संसार की वस्तुओं में मैं-मेरा का भाव नहीं रखता उसके मन में वासनाएँ कैसे ठहर सकती हैं ? उसकी भोग-वासनाएँ शरद ऋतु के कमल के फूल की तरह नष्ट हो जाती हैं। जिसकी वासनाएँ नष्ट हो गयीं वह मुक्त ही तो है।
 
                    जो हाथ से दबाकर, दाँतों से दाँतों को भींचकर, कमर कसकर अपने मन-इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं, वे ही इस संसार में बुद्धिमान एवं भाग्यवान है। उनकी ही गिनती देवपुरूषों में होती है।
                    इस संसाररूपी वन का बीज चित्त है। जिसने इस बीज को नष्ट कर लिया, उसे फिर कोई भी भय-बाधा नहीं रहती। जैसे, केसरी सिंह जंगल के विभिन्न प्रकार के खूँखार प्राणियों के बीच भी निर्भय होकर विचरता है, उसी प्रकार वह पुरूष भी संसार की विघ्न-बाधाओं, दुःख-सुख तथा मान-अपमान के बीच भी निर्भय एवं निर्द्वन्द्व होकर आनंदपूर्वक विचरण करता है।
 
                   सभी लोग सदा सुखी, आनंदित एवं शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं परंतु अपने मन को वश में नहीं करते। मन को वश करने से ये सभी वस्तुएँ सहज में ही प्राप्त हो जाती हैं परंतु लोग मन को वश न करके मन के वश हो जाते हैं। जो मन में आया वही खाया, मन में आया वही किया। संत एवं शास्त्र सच्चा मार्ग बताते हैं परंतु उनके वचनों आदर-आचरण नहीं करते और मन के गुलाम हो जाते है। परंतु जो संत एवं शास्त्र के ज्ञान को पूरी तरह से पचा लेता है वह मुक्त हो जाता है। वह सिर्फ मन का ही नहीं अपितु त्रिलोकी का स्वामी हो जाता है।
 
                   अतः महापुरूषों द्वारा बतायी हुई युक्तियों से मन को वश में करो। 'जिसने मन जीता, उसने जग जीता'। क्योंकि जगत का मूल मन ही है। जब मन अमनीभाव को प्राप्त होगा तब तुम्हारा जीवन सुखमय, आनंदमय, परोपकारमय हो जायगा।