स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

Ashram Livestream TV

Ashram Internet TV

Ashram Internet TV

सदगुरु के अनुभव का ध्यान-प्रसाद

Rajesh Kumawat | 10:40 AM | | | | | | | | Best Blogger Tips
सदगुरू सत्पात्र शिष्य को अपना हृदय खोलकर आत्मिक अनुभूति का प्रसाद दे रहे हैं-

समता जीवन है। ईश्वरार्पणबुद्धि जीवन है। ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान ही सच्चा ज्ञान और सच्चे जीवन का प्रागट्य है। ब्रह्मात्मैक्य का ज्ञान ही वास्तविक जीवन का द्वार खोलता है। यह आत्मा परमात्मा है। यह आत्मा ब्रह्म है। यह आत्मा शुद्ध बुद्ध चिदघन चैतन्य है। यह आत्मा ही सब देवों का देव है, सर्व कालों का काल है। यह हमारा आत्मा ही परब्रह्म परमात्मा है। यह आत्मा ही जननियंता है। यही हमारे अन्तःकरण का नियमन कर रहा है। यही हमारी आँखों को देखने की शक्ति देता है। यही परमेश्वर हमारे साथ था, हमें पता न था। यही आनन्दकन्द हमारा आत्मा था हमें मालूम न था।

'मरने के बाद कहीं जाएँगे और परमेश्वर मिलेंगे' यह तो शुरूआत में बच्चों को थोड़ा-सा मोटा मोटा ज्ञान देने की व्यवस्था थी। जब बुद्धि सूक्ष्म होती है तो पता चलता हैः

जो बिछड़े हैं प्यारे से

दर बदर भटकते फिरते हैं।

हमारा यार है हममें

हमन को बेकरारी क्या ?

हमारा राम हमारा आत्मा है। हमारा श्याम हमारा आत्मा ही है। हमारा विट्ठल हमारा आत्मा ही है। वही आत्मा परमात्मा है। घड़े का आकाश ही महाकाश है। तरंग का जल ही सागर का जल है।

ऐसे ही चित्त में जो चेतना है, व्यापक ब्रह्माण्ड में वही की वही चेतना है।

ॐ.....आनन्द..... खूब आनन्द...

जो श्रीकृष्ण हैं वह तुम हो। जो श्रीराम हैं वह तुम हो। जो शिव हैं वह तुम हो। जो जगदम्बा हैं वह तुम हो। वे अपने चैतन्य स्वभाव को जानते हैं और हम नहीं जानते थे। अब जान लिया तो बन गया काम।

लाख चोर्यासी के चक्कर से थका, खोली कमर।

अब रहा आराम पाना, काम क्या बाकी रहा ?

खूब आनन्द.... मधुर आनन्द..... मधुर शान्ति.... आत्म शांति.....

परमात्म-प्रसाद में हम परितृप्त हो रहे है। अब हमें यह वासना नहीं रही कि हम मरकर भगवान के लोक में जाएँगे। यह बेवकूफी भी हमने छोड़ दी। मरने के बाद भगवान मिलेगा यह तो बालकों को सिखाया गया था और बालकों ने सिखाया था। ब्रह्मवेत्ता कभी ऐसा नहीं सिखाते कि मरने के बाद भगवान मिलेगा। अभी तू वह चैतन्य हैः तत्त्वमसि। तेरा ही स्वभाव है 'ॐ'कार गुंजाना। 'ॐ'कार तेरे आत्म-स्वभाव से निकलता है। इसलिए तू अभी चैतन्य है।

दुराचारी मन ने, पापाचारी इच्छाओं ने, भयभीत विचारों ने राग-द्वेष के तरंगों ने तुम्हें अपनी महिमा से वंचित रखा था। अब गुरू का ज्ञान पचाने का अधिकार हो रहा है इसलिए भय के विचार, राग-द्वेष की आग, विषमता की चेष्टाएँ आदि को विदा देकर देहाध्यास को छोड़। गुरू अपने परमात्म-भाव में स्थित होकर तुम्हें आत्मा में जगा रहे हैं जो वास्तव में सत्य है। यही सर्व सफलताओं की कुंजी है। 'मैं आत्मा हूँ' यह बिल्कुल हकीकत है। 'मैं चैतन्य हूँ' यह बिल्कुल सच्ची बात है। 'मेरा आत्मा ही परमात्मा है' बिल्कुल निःसन्देह है।

मैं अपने अनुभूत आत्मस्वभाव में जग रहा हूँ। देह की मान्यताओं से मैं मर रहा था और जन्म हो रहा था। अब आत्मा के स्वभाव से मैं अपने अमर स्वभाव में आ रहा हूँ।

शिष्य के ये अनुभवयुक्त वचन सुनकर गुरूवाणी भीतर से प्रकट हुईः

'हे पुत्र ! इस देहाध्यास ने तुझे चिर काल से बाँध रखा था। अब ॐकार का गुँजन करके देहाभिमान को भगाकर आत्म-अभिमान को जगा दे। काँटे से काँटा निकलता है। जीवभाव को हटाने के लिए अपने चैतन्य स्वभाव को, अपने आत्मस्वभाव को जगाओ। विकार और विषयों के आकर्षण को हटाने के लिए अपने आत्मानन्द को जगाओ। अपने आत्मा के सुख में सुखी हो जाओ तो बाहर का सुख तुम्हें क्यों बाँधेगा ? उसकी कहाँ ताकत है तुम्हें बाँधने की ? तुम्हीं बँध जाते थे वत्स ! अब तुम मुझ मुक्त आत्मा की शरण में आये हो तो तुम भी मुक्त हो जाओ। ले लो यह ॐकार की गुँजन और ज्ञान की कैंची। काट दो मोह-ममता के जाल को। तुम्हें बाँध सके या नर्कों में ले जा सके अथवा स्वर्ग में फँसा सके ऐसी ताकत किसी में भी नहीं। तुम ही नर्क और स्वर्ग के रास्ते बनाकर उसमें पचने और फँसने जाते थे, अज्ञान के कारण। अब ज्ञान के प्रसाद से तुम्हारा अज्ञान भाग गया। अगर थोड़ा रहा हो तो मार दो 'ॐ' की गदा फिर से। प्रकट कर दो अपना आनन्द। प्रकट कर दो अपनी मस्ती। प्रकट कर दो अपनी निर्वासनिकता। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए, क्योंकि सर्व मैं ही बना बैठा हूँ। मुझे नर्क का भय नहीं, स्वर्ग की लालसा नहींष मृत्यु मेरी होती नहीं। जन्म मेरा कभी था नहीं। मैं वह आत्मा हूँ।

तुम सब आत्मा ही हो। सब परमेश्वर हो। मैं भी वही हूँ। तुम भी वही हो। जो मैं हूँ वही तुम भी हो। जो तुम हो वह मैं हूँ।

हे किल्लोल करते पक्षी ! तुम भी चैतन्य देव हो। हे गगनगामी योगी ! तुम अपने चैतन्य स्वभाव को जानो। देह से जुड़कर तुम कब तक आकाशगमन करते रहोगे ? तुम तो चिदाकाश स्वरूप में विश्रान्ति पा लो।

हे आकाशचारी सिद्धों ! आकाश में विचरण करने वाले उत्तम कोटि के साधकों ! तुम अपने साध्य स्वभाव को जान लो। तुम तो धन्य हो ही जाओगे, तुम्हारी धन्यता का होना प्राकृतिक जीवों के लिए बहुत कुछ आशीर्वाद हो जाएगा।

हे सिद्धों ! तुम परम सिद्धता को पा लो। हे साधकों ! तुम परम साध्य को पा लो। परम साध्य तुम्हारा परमात्मा है न ! खूब मधुर अलौकिक अनुभूति में तुम गोता मारते जाओ। तुम अगर आनन्दस्वरूप न होते, सुखस्वरूप न होते तो अभी अपने आत्मस्वभाव की बात सुनते तुम इतने पवित्र, शांत और सुखस्वरूप नहीं हो सकते थे। तुम पहले से ही ऐसे थे। ज्यों-ज्यों भूल मिटती है त्यों-त्यों तुम्हें अपने स्वभाव की शांति और मस्ती आती है।

जय हो....! प्रभु तेरी जय हो....! हे गुरूदेव तुम्हारी जय हो....!