स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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धन, यश और भोग इतने भी आवश्यक नहीं......

Rajesh Kumawat | 9:37 AM | Best Blogger Tips

यश, धन और भोग ये तीन प्रकार से प्राप्त होते हैं। किसी आदमी को कब धन मिल जाए वह नहीं जानता, कब यश मिल जाय वह नहीं जानता, यश कब अपयश में बदल जाए वह नहीं जानता।
यश, धन और भोग एक तो मिलते हैं पूर्व संचित सुकृत के बल से, पहले किये हुए पुण्यों के बल से। परिश्रम तो सब लोग करते हैं। ऐसा नहीं कि निर्धन परिश्रम नहीं करता। कुछ धनवान ऐसे हैं जो थोड़ा-सा परिश्रम करते हैं और बहुत सारा धन कमा लेते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो जीवनभर परिश्रम करते हैं और मुश्किल से आजीविका चला सकते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो जीवनभर परिश्रम करते हुए भी गरीबी की रेखा से नीचे ही रहते हैं। हालाँकि उनको किसी दाता के द्वारा या सरकार की ओर से कुछ भी सुविधा मिल जाय फिर भी उनको दूषित इच्छाएँ, हल्की इच्छाएँ उनको बरबाद कर देती हैं। शराब, कबाब में या सत्ते-पंजे में अपनी पूँजी नष्ट कर देते हैं। फिर वहीं के वहीं।
कई झोंपड़ी वालों को पक्के मकान मिले। वे लोग दो-दो हजार में मकान बेचकर फिर झोंपड़े में बैठ गये। उन मकानों की अभी साठ-साठ हजार गुडविल चलती है। अपनी बेवकूफी के कारण कई लोग वहीं के वहीं पड़े रहते हैं। पुण्य के अभाव के कारण भी ऐसी बेवकूफी आ जाती है। ज्ञान के अभाव के कारण भी बेवकूफी आ जाती है। कुल मिलाकर कहा जाय तो बेवकूफी का फल ही दुःख है।
जिसको हम चतुराई समझते हैं वह चतुराई अगर शास्त्र, सदगुरू और भगवान से सम्मत नहीं है तो वह चतुराई भी बेवकूफी है। वकालत में चतुर हो गये, इधर का उधर, उधर का इधर... दो वकील पार्टनर बन गये। एक मुवक्किल इसका एक मुवक्किल उसका। जो मुवक्किल ज्यादा पैसा दे उसके पक्ष में केस करा दिया। न्यायाधीश को अपने पक्ष में ला दिया। बड़ी चतुराई दिखती है। लेकिन ऐसी चतुराई से कमाया हराम का पैसा बेटी और बेटे की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। बेटा-बेटी अनैतिक मार्ग पर चले जाते हैं।
पूर्वसंचित सुकृत से यश, धन और भोग मिलते हैं। दूसरा, वर्त्तमान के उद्योग से, पुरूषार्थ से यश, धन और भोग मिलते हैं। वर्त्तमान में एक होता है मनमाना पुरूषार्थ। इससे अल्पकालीन यश, धन और भोग मिलता है। दूसरा होता है धर्ममर्यादा को ख्याल में रखते हुए किया गया उद्योग। इससे लम्बे समय तक रहने वाला यश, धन और भोग मिलते हैं। तीसरा, किसी की कृपा से, अनुग्रह से यश, धन और भोग मिलते हैं। धनवानों का, धर्मात्माओं का, देवताओं का और भगवान का अनुग्रह यश, धन और भोग की प्राप्ति कराता है। अनुग्रह होने पर विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता।
आदमी जब ईमानदारी का सहारा लेता है, सच्चाई का सहारा लेता है तो धन, यश और भोग लम्बे समय तक टिकते हैं, सुखद बनते हैं। बेईमानी से पाया हुआ धन, यश और भोग अल्पकालीन होगा और उतना सुखद नहीं बनेगा। हृदय में शान्ति नहीं होगी। बुद्धि अच्छे मार्ग में नहीं जाने देगी।
अगर थोड़ी बहुत भक्ति की जाय सेवा की जाय, ईमानदारी से धन, यश, भोग प्राप्त किय जायें तो वे भगवान के मार्ग पर ले जाएँगे।
धनवान बहुत लोग होते है। जिनका धन पाप और शोषण से इकट्ठा हुआ है उनको भगवान और संत में श्रद्धा नहीं होगी। जिनको थोड़ा-बहुत सत्कर्म करते हुए धन मिला है उनको भगवान और संत में श्रद्धा होगी। भगवान और संत में श्रद्धा होने से वे धनवान स्थायी धन, स्थायी यश और स्थायी भोग के अधिकारी बनने लगते है। धीरे-धीरे वे आत्म-प्रसाद भी पा लेते हैं। कितना बड़ा अधिकार है। भगवान, संत और शास्त्रों में श्रद्धा नहीं हो रही तो ऐसे धनवान की मति जैसे-तैसे भोग में अपने को खत्म कर देती है।
पैसा है लेकिन भीतर में खुशी नहीं है तो वह धनवान नहीं है, निर्धन है। तन्दुरूस्ती नहीं है तो वह निर्धन है। पति-पत्नी के बीच, पुत्र परिवार के बीच स्नेह नहीं है तो वह धन किस काम का ?
धर्म से वासनाएँ नियंत्रित होती हैं। वासनाएँ नियंत्रित होने से अंतःकरण में बल आता है और मन की आधियाँ क्षीण होती हैं। मन की आधियाँ क्षीण होने से तन की व्याधियाँ कम हो जाती हैं।
अधर्म की वासनाएँ भड़कती हैं, मन में आधियाँ बढ़ती हैं और शरीर की व्याधियाँ भी बढ़ती हैं।
विद्यार्थी बच्चों का धर्म है ब्रह्मचर्य पालना, नासाग्र दृष्टि रखना। पहले के जमाने में बालक पाँच साल का होते ही गुरूकुल में भेज दिया जाता था। पच्चीस साल का होने तक वहीं रहता था, ब्रह्मचर्य पालता था, विद्याध्ययन एवं योगाभ्यास करता था। गुरूकुल से वापस आता तब देखो तो शरीर सुडौल, मजबूत। कमर में मुँज की रस्सी बँधी हुई और उस रस्सी से लंगोट खींची हुई होती थी। वे जवान बड़े वीर, बड़े तन्दुरूस्त, बड़े स्वस्थ होते थे। उस समय समरांगण में योद्धा के बल की तुलना हाथियों के बल से की जाती थी। कोई योद्धा दो हजार हाथियों का बल रखता था, कोई पाँच हजार और कोई दस हजार। अभी का आदमी तो उसे गप्प ही समझता है। उसकी बुद्धि ऐसी छोटी हो गई है। उस काल में तो बड़े-बड़े अदभुत वीर हो गये हैं।
वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स और राजा रघु की कथा है।
कौत्स विद्याध्ययन करके गुरूकुल से विदा ले रहा था। वह गुरू जी से बोलाः
"गुरूजी ! मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ, गुरूदक्षिणा देना चाहता हूँ। आज्ञा करो, मैं आपकी सेवा करूँ ?"
गुरूजी बोलेः "बेटा ! तू गरीब ब्राह्मण है। क्या सेवा करेगा तू ? आश्रम में इतने साल तक तुमने शरीर से सेवा की। अब दक्षिणा से सेवा नहीं करोगे तो भी चलेगा बेटा ! कोई जरूरत नहीं है। जाओ, आनन्द करो। धर्म का प्रचार-प्रसार करो, दूसरों को एवं अपने को उन्नत करो।"
गुरूजी ! बिना दक्षिणा के विद्या स्थिर नहीं रहती। इसलिए कृपा करो, आज्ञा दो, आप जो माँगेंगे वह दक्षिणा ला दूँगा।"
गुरू ने देखा कि है तो कंगाल और फिर भी कहता है जो माँगोगे वह दूँगा ! वे बोलेः
"अच्छा बेटा ! तू आश्रम में चौदह साल रहा है तो चौदह सहस्र सुवर्ण मुद्राएँ ले आ। हालाँकि मैंने जो दिया है उसका पूरा बदला नहीं है फिर भी इतने से चल जाएगा।"
उस जमाने में जो आदमी बोल देता था उसका मूल्य रखता था। बोला हुआ वचन पालता था। कौत्स प्रणाम करके विदा हुआ। सोचने लगाः चौदह सहस्र सुवर्ण मुद्राएँ मुझ ब्राह्मण को कौन दे सकता है ? और कोई नहीं, केवल दाता शिरोमणि राजा रघु ही दे सकते हैं। कौत्स घूमता-घामता राजा रघु के राज्य में गया। उन्ही राजा रघु के कुल में भगवान श्रीराम अवतरित हुए। धर्मात्मा लोग होते हैं वहीं भगवान और संत अवतरित होते हैं। उन्हीं लोगों को स्थायी यश मिलता है। राम जी के साथ राजा रघु का नाम जुड़ गया।
रघुकुल रीत सदा चली आई।
प्राण जाय पर बचन न जाई।।
रामचन्द्रजी आदर से सिर झुकाते हैं, मैं रघुकुल का हूँ ऐसा कहकर रघुकुल का गौरव व्यक्त करते हैं।
ऐसे राजा रघु के राज्य में कौत्स पहुँचा। लेकिन राजा रघु तो अपना पूरा राज्य अपने शत्रु को दे बैठे थे। स्वयं जंगल में जाकर झोंपड़ी में रहते थे, मिट्टी के बर्तन में भोजन करते थे।
हुआ ऐसा था कि राजा रघु के राज्य का वैभव देखकर उनके शत्रु ने राज्य पर चढ़ाई कर दी। मंत्रियों ने राजा रघु से कहा किः
"पड़ोसी राजा ने हमारे राज्य पर आक्रमण किया है। वे हमसे युद्ध करना चाहते हैं।"
"वे युद्ध क्यों करना चाहते हैं ?"
"उनको यह राज्य चाहिए ?"
"अच्छा ! उनको राज्य करने की वासना है। ठीक है। अब बताओ, वे प्रजा का पालन कैसा करते हैं ? वात्सल्य भाव से करते है कि शोषण भाव से ?"
"अपनी प्रजा का पालन तो खूब वात्सल्य भाव से करते हैं।"
राजा रघु बोलेः
"प्रजा का अच्छी तरह पालन ही करना है तो इस शरीर से हो या उस शरीर से हो, क्या फर्क पड़ता है ? नाहक लोगों की मार-काट हो स्त्रियाँ विधवा बनें, माताएँ पुत्रहीन बनें, बहनें अपने दुलारे भाई को खो बैठें, मासूम बच्चे पिता की छत्रछाया खोकर अनाथ बन जाएँ यह तो अच्छा नहीं है। युद्ध करने से तो यह सब होगा।
मंत्रीगण ! जाओ, उनको बुलाओ। उनसे कहो कि राजा रघु तुम्हें ऐसे ही राज्य दे देना चाहते हैं।"
शत्रु राजा आये। उनके हृदय में पूरा यकीन था कि राजा रघु वास्तव में धर्मात्मा हैं और जैसा बोलेंगे वैसा ही करेंगे। उनके आते ही राजा रघु ने राजतिलक कर दिया। अपना सारा राज्य सौंप दिया।
राजा रघु ने तो स्वेच्छा से अपना राज्य दे दिया लेकिन प्रजा का हृदय तो रघु से जुड़ा था। शत्रु राजा ने घोषणा करवाई कि राजा रघु को जो कोई स्थान देगा, सहारा देगा, उसे मृत्युदण्ड दिया जाएगा। मृत्युदण्ड के भय से लोग खामोश रह गये। राजा रघु के लिए हृदय पिघल रहा था फिर भी कुछ नहीं कर पाये।
राजा रघु जंगल में चले गये। ठीकरे में भिक्षा माँगकर खा लेते, कंदमूल से गुजारा कर लेते, एक झोंपड़ी में रह लेते। आत्मा-परमात्मा की साधना के मार्ग में लग गये।
राज्य छोड़ना उनके तरतीव्र प्रारब्ध में होगा। उन्होंने राज्य छोड़ा तो धर्मानुकूल रहकर राज्य छोड़ा, अपनी खुशी से, स्वेच्छा से छोड़ा। राज्य से चिपके रहते, मरते-मरते छोड़ते तो इतिहास में ऐसे चमकते नहीं।
वह ब्राह्मण कुमार कौत्स राजा रघु के राज्य में आया। उसे पता चला कि उनके स्थान पर तो दूसरा राजा है। राजा रघु कहीं जंगल में वनवासी भिक्षुक होकर रहते हैं। कौत्स को राजा रघु की महिमा का पता था, उन पर श्रद्धा थी कि राजा न होने पर भी वे सहायरूप बनेंगे ही। वे सदा श्रीसम्पन्न राजवी हैं।
घूमते-घामते आखिर कौत्स राजा रघु की पर्णकुटि खोज ही ली।
सुबह का समय था। पूर्वाकाश में प्रातः के सुनहरे सूर्य का उदय हो रहा था। राजा रघु सूर्य के सामने प्रातः सन्ध्या करने बैठे थे। कौत्स ने देखा कि राजा रघु के सन्ध्या वन्दन करने के पात्र सुवर्ण के तो नहीं हैं, अन्य धातु के भी नहीं हैं। मिट्टी के पात्र से सन्ध्या कर रहे हैं, सूर्य को अर्घ्य दे रहे हैं।
कौत्स निराश हो गया। जिनके पास बर्तन भी मिट्टी के बचे हैं ऐसे राजा रघु से चौदह सहस्र सुवर्ण मुद्राएँ क्या माँगना ? वह बिना कुछ कहे वापस लौट पड़ा।
राजा रघु का ध्यान उधर गया। एक ब्राह्मण कुमार कुछ कहे बिना वापस जा रहा है, क्या बात है ? उन्होंने कौत्स को बुलाया। उनके आग्रह करने पर कौत्स ने अपनी बात बताई, वहाँ आने का प्रयोजन बताया और आखिर कहाः
"महाराज ! विधाता ने क्या कर दिया ?"
"क्यों निराश होता है विप्र ! प्रारब्ध में जो होना होता है, होता है। रो-रोकर भोगें या हँसकर भोगें, हमारी मर्जी की बात है। विपत्ति आने से हमको क्या फर्क पड़ता है ?"
"महाराज ! आपको तो कुछ फर्क नहीं पड़ता लेकिन हम जैसे याचकों का तो सब कुछ चला गया। आप जैसे दाता भिखारी हो गये तो हमको मुँह माँगा दान कौन देगा ? हे विधाता ! तूने क्या कर दिया ?"
"अरे ब्राह्मण ! तू अपने को कोस मत, विधाता को दोष मत दे। बोल तेरा अभीष्ट क्या है ?"
"अब आप क्या देंगे ? आपके पास मिट्टी के बर्तनों के अलावा बचा ही क्या है ? अब मुझे गुरूदक्षिणा देने के लिए चौदह सहस्र सुवर्ण मुद्राएँ कौन देगा ?"
राजा रघु ने कहाः "पागल ! निराश मत हो। ठहर में अभी सुवर्ण मुद्राएँ दे देता हूँ।"
राजा रघु ने गहरी साँस ली। प्राणायाम किया।
प्राणशक्ति जितनी सूक्ष्म होती है उतना संकल्प बलवान होता है। इस विषय में आप लोग नहीं जानते। मैं भी पूरा नहीं जानता। थोड़ा बहुत जानता हूँ उससे बहुत लाभ मिलता है।
तुम जो श्वास लेते हो वह स्थूल प्राण है। तुम नियम से प्राणायाम और योगासन का विधिपूर्वक अभ्यास करो तो तुम्हारा प्राण सूक्ष्म होगा। सूक्ष्म प्राण होने पर संकल्प शक्ति का विकास होता है। उसके द्वारा बहुत बड़े कार्य हो सकते हैं। योगी पुरूषों का तो यहाँ तक कहना है कि तुम्हारे प्राण सूक्ष्मतम हो जाएँ तो तुम आकाश में स्थित सूर्य और चन्द्र को गोलों की तरह अपने संकल्प से चला सकते हो और ठहरा सकते हो। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र ये सब प्राणशक्ति से संचालित होते हैं। प्राण जितना सूक्ष्म होता है उतना आदमी का बल बढ़ता है।
जैसे, अभी मैं सत्संग कर रहा हूँ। मैं आसन करके आया हूँ। मेरे प्राणों का तालमेल सही है। मैं बोलूँगा तो लोग मेरे प्रवचन से ज्यादा तत्पर हो जाएँगे। अगर मेरे प्राणों की रिधम (ताल) ठीक नहीं है, मेरे प्राण सूक्ष्म नहीं बने हैं, मेरे मन में पवित्रता नहीं है तो इससे भी बढ़िया बढ़िया कथाएँ या बातें रटकर सुना दूँ तो तुम्हें ऐसा आनन्द नहीं आयेगा। हरिद्वार में हर की पेड़ी पर ऐसे लेक्चर करने वाले लोग बहुत होते हैं। उनको सुनने के लिए दो लोग बैठते हैं तो दो लोग उठते हैं, आते जाते रहते हैं। उनमें और संतों में यही फर्क है कि संतों का जीवन धर्मानुकूल है। मन में विकारों को क्षीण करने की शक्ति आयी है। जैसे हीरे से हीरा कटता है ऐसे मन से ही मन के विकार काटे जाते हैं।
शुभ संकल्प, प्राण की रिधम को, गुरू के मार्गदर्शन को उन्होंने अपने जीवन में उतारा है, संकल्प उन्नत किया है इसलिए उनके प्राण की गति ऊँची हो गई, सूक्ष्म हो गई। तभी उनकी वाणी का प्रभाव पड़ता है।
जिस दिन मैं अधिक प्रसन्न होता हूँ, मेरे प्राण की रिधम सही होती है उस दिन सत्संग प्रवचन में जो भी विषय हो, जो भी मैं बोलूँगा तो आनन्द ही आनन्द आयेगा। जिस दिन मेरे प्राणी की स्थिति ठीक नहीं होती, प्राण किसी रोग निवृत्त करने में लगे हैं उस दिन मेरे बोलने का उतना प्रभाव नहीं पड़ता। यह मेरा अनुभव है।
इन्द्रियों का स्वामी मन है और मन का स्वामी प्राण है। धर्म का अनुष्ठान करने से मन और प्राण को नियंत्रित करने में सहयोग मिलता है।
धर्मात्मा राजा रघु ने कौत्स से कहाः
"पागल ! निराश क्यों होता है ? ठहर। मैं क्षत्रिय हूँ। तुम ब्राह्मण हो। माँगना तुम्हारा अधिकार है और देना मेरा कर्त्तव्य है। देने के लिए मेरे पास द्रव्य नहीं है तो मैं युद्ध करके भी ला सकता हूँ। इस धरती के लोगों से क्या युद्ध करना ! वह युद्ध कब निपटे ? मैं तो अपने बाण का निशाना बनाता हूँ कुबेर भण्डारी को।"
राजा रघु ने उठाया धनुष। सरसंधान किया। कुबेर को ललकारा किः "या तो चौदह सहस्र सुवर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दो या युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।"
देवताओं के खजानची के साथ युद्ध करने का सामर्थ्य धर्मात्माओं में होता है। दुरात्मा बेचारे क्या कर सकते हैं !
जिनके संकल्प हल्के हैं वे बच्चे बच्चों को जन्म देने लग गये। अभी वे मर्द हुए ही नहीं और बच्चे पैदा करने लग गये। ऐसे लोगों के मन और प्राण दुर्बल होते हैं। वे लोग यह बात समझने के भी काबिल नहीं होते। सत्शास्त्र की बात मति माने तो भी सत्य होती है और मति न माने तो भी सत्य होती है।
वैशम्पायन परीक्षित के पुत्र जन्मेजय को कथा सुना रहे थे। जन्मेजय बात में सन्देह कर कहने लगाः
"गुरूजी ! आप कहते हैं कि महाभारत के युद्ध में भीम ने हाथियों को ऐसे जोर से घुमाकर आकाश में फेंका कि वे अभी तक आकाश में घूम रहे हैं। यह कैसे हो सकता है ? इतनी गप्प ! गुरूजी ! कुछ तो मर्यादा रखो। मैं जन्मेजय हूँ। सारा राज्य सँभालता हूँ। मेरे आगे आप ऐसी बात कर रहे हैं ?"
वैशम्पायन ने कहाः "हे मूर्ख ! तेरी मति समझने के काबिल नहीं है तो शास्त्र और संत की बात में अविश्वास करता है ?"
वैशम्पायन जी ने सूक्ष्म प्राण का उपयोग किया, संकल्प शक्ति का उपयोग किया, हाथ ऊँचा किया और झटका मारा तो आकाश से एक हाथी आकर वहाँ गिरा। वैशम्पायन ने कहाः
"भीम ने जो हाथी फेंके थे और अभी आकाश में गुरूत्वाकर्षण से बाहर जाकर घूम रहे हैं उनमें से यह एक हाथी है, देख ले मूर्ख ! अब तो विश्वास करेगा ?"
हमारे देश में ऐसे योगी हो गये हैं। ऐसी क्षमता सबके अंतःकरण में बीज रूप में पड़ी है। लेकिन हम धर्म का महत्त्व नहीं जानते, संयम का महत्त्व नहीं जानते इसलिए वे शक्तियाँ विकसित नहीं होती। इधर देखते हैं, उधर देखते हैं, विकारी केन्द्रों में चले जाते हैं। इससे कितना पुण्यनाश होता है, बाद में कितनी बेइज्जती होती है, कितना दुःख उठाना पड़ता है इसका गणित हम नहीं जानते। छोटे-छोटे आकर्षणों में अपना सर्वनाश कर देते हैं।
सती अनसूया ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों को बालक बना दिया। सती शांडिली ने सूर्य की गति को रोक दिया। हम यह शास्त्रों में पढ़ते हैं लेकिन इन सबको कल्पनाएँ समझ लेते हैं।
कथा कहती है कि राजा रघु ने धनुष पर बाण चढ़ाया। कुबेर को पता चला कि अरे ! ये तो राजा रघु हैं ! राजा रघु से युद्ध ! ना.... ना.... ना.... असम्भव। कुबेर भण्डारी ने सुवर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी। राजा रघु ने कौत्स से कहा कि ले ले ये सुवर्ण मुद्राएँ। कौत्स ने गिनकर चौदह सहस्र सुवर्ण मुद्राएँ ले ली। फिर भी काफी बच गई। राजा रघु ने कहाः
"मैंने तेरे लिए ही ये सुवर्ण मुद्राएँ मँगवाई हैं, मेरे लिए नहीं। अतः हे विप्र कुमार ! ये सारी सुवर्ण मुद्राएँ तू ही ले जा।"
कौत्स कहता हैः "मुझे गुरूदक्षिणा में चौदह सहस्र देनी हैं, उतनी मैंने ले ली। इससे एक भी ज्यादा मुझे नहीं चाहिए।"
राजा रघु बोलेः "ये मुद्राएँ तेरे निमित्त आयी हैं। उन्हें लेना मेरा हक नहीं है।"
कितना धर्म का अनुशासन स्वीकार किया है ! अपने मन पर कितना संयम है ! लोग घोड़े पर जीन रखकर, रकाब बाँधकर उसमें पैर रखकर सवारी करते हैं। ऐसे ही मन पर यदि धर्म और संयम का जीन और रकाब रखकर सवारी की जाय तो.... घोड़ा तो एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाता है परन्तु मनरूपी घोड़ा जीवात्मा को परमात्मामय बना देता है।
कौत्स बोलता हैः "राजन् ! मुझे जितनी आवश्यक हैं उतनी ही मुद्राएँ लूँगा। ज्यादा लेकर मैं परिग्रह क्यों करूँ ? अपना हृदय क्यों खराब करूँ ?"
दाता तो देकर छूट जाता है। आजकल लेने वाला इतना कंगाल है कि उसका पेट नहीं भरता। देने वाला इतना दरिद्र है कि उसके दिल से छूटता नहीं। उदार आत्मा तो कोई कोई होते हैं।
लेने वाले को थोड़े से तृप्ति हो जानी चाहिए। वह आवश्यकताएँ बढ़ाए नहीं। दान के माल से ऐश न करें, मौज न उड़ाये, पर व्यवहार चलाये।
धर्म का अनुष्ठान करने से अंतःकरण निर्भार होता है ,हृदय में खुशी होती है और अधर्माचरण करने से हृदय बोझीला होता है, दिल की खुशी मारी जाती है।
हमें जो धन, यश और भोग मिलता है वह जितना प्रारब्ध में होता है उतना ही मिलता है। अथवा यहाँ जैसा उद्योग होता है उसी प्रकार का मिलता है। उद्योग अगर अधर्म से करें तो दुःख, चिन्ता और मुसीबत आती है। धर्म के अनुकूल उद्योग करें तो सुख, शान्ति और स्थिरता आती है।
अनुग्रह से भी धन, यश और भोग मिल सकता है। लेकिन देखना यह है कि अनुग्रह किसका है। सज्जन सेठ का, धर्मात्मा साहूकार का अनुग्रह है कि दुरात्मा का है ? साधु का अनुग्रह है कि असाधु का ?
सज्जनों का अनुग्रह, देवताओं का अनुग्रह, सदगुरू और भगवान का अनुग्रह तो वांछनीय है, अच्छा है, स्वीकार्य है। लेकिन दुर्जन का अनुग्रह ठीक नहीं होता। जैसे पक्षियों को फँसाने के लिए शिकारी दाने डालता है। पक्षी दाने चुगने उतर आते हैं और जाल में फँस जाते हैं। फिर छटपटाने लगते हैं। स्वार्थी आदमी कोई अनुग्रह करे तो खतरा है। कोई बदचलन स्त्री, कोई नटी बहुत प्यारे करने लगे, नखरे करने लगे तो खतरा है। वह आदमी की जेब भी खाली कर देगी और नसों की शक्ति भी खाली कर देगी। घड़ीभर का सुख देगी लेकिन जिन्दगी भर फिर रोते रहो, तुच्छ विकारी आकर्षणों में मरते रहो।
तुमको जो धन, यश, भोग और सुख देने वाले हैं वे कैसे हैं यह देखो। वे सज्जन हैं, संत हैं, देव हैं, भगवान हैं कि विकारी आदमी हैं ? विकारी और दुर्जन लोगों के द्वारा मिला हुआ धन, सुख, भोग, भोक्ता को बरबाद कर देता है।
आजकल दोस्त भी ऐसे मिलते हैं। कहते हैं- "चल यार ! सिनेमा देखने चलते हैं। मैं खर्च करता हूँ... चल ब्ल्यू रूम में... ब्ल्यू फिल्म देखते हैं...।"
दस-बारह साल के लड़के ब्ल्यू फिल्म देखने लग जाते हैं। उनकी मानसिक अवदशा ऐसी हो जाती है, वे ऐसी कुचेष्टाओं में ग्रस्त हो जाते हैं कि हम व्यासपीठ पर बोल नहीं सकते। वे बच्चे बेचारे अपना इतना सर्वनाश कर देते हैं कि बाप धन भी दे जाता है, मकान भी दे जाता है, धन्धा भी दे जाता है फिर भी वह बच्चा चारित्र्यभ्रष्ट होने के कारण न धन सँभाल पाता है, न मकान सँभाल पाता है, न धन्धा चला सकता है, न स्वास्थ्य सँभाल पाता है, न माता की सेवा कर पाता है, न माता का आदर कर पाता है, न पिता का श्राद्ध कर्म ठीक से कर पाता है, न माता का भविष्य सोच पाता है न पिता का कल्याण सोच पाता है। वह लड़का अपने ही विकारी सुख में इतना खप जाता है कि उसके जीवन में कुछ सत्त्व नहीं बचता। जरा-सा बोलो तो नाराज हो जाता है, जरा सा समझाओ तो चिढ़ जाता है, घर छोड़कर भाग जाता है। उसको जरा-सा डाँटो तो आत्महत्या के विचार आयेंगे।
आत्महत्या के विचार आते हैं तो मन की दुर्बलता की पराकाष्ठा है। बचपन में वीर्यनाश खूब होता है तो बार-बार आत्महत्या के विचार आते हैं। वीर्यवान पुरूष को आत्महत्या के विचार नहीं आते। संयमी पुरूष को आत्महत्या के विचार नहीं आते। आत्महत्या के विचार वे ही लोग करते हैं जिनका सेक्स्युअल केन्द्र मजबूत होने से पहले ही द्रवित हो गई, क्षीण हो गई। यही कारण है कि हमारे देश की अपेक्षा परदेश में आत्महत्याएँ अधिक होती हैं। हमारे देश में भी पहले की अपेक्षा आजकल आत्महत्याएँ ज्यादा होने लगी हैं क्योंकि फिल्मों के कुप्रभाव से बच्चे सेक्स्युअल केन्द्र के शिकार हो गये हैं।
आखिर निष्कर्ष क्या निकालना है ?
निष्कर्ष यह निकालना है कि हमें धन, यश और भोग आवश्यक हैं लेकिन इतने नहीं जितने हम मानते हैं। भोग अगर नियंत्रित होगा, वासना अगर नियंत्रित होगी तो मन के संकल्प-विकल्प कम होंगे, मन बलवान होगा।
अपना उद्देश्य ऊँचा बनाओ। आत्म-धन पाने का, आत्म-सुख जगाने का उद्देश्य बनाओ। आत्म-धन और आत्म-सुख शाश्वत है। वह धन पाओगे तो यहाँ का धन दास की तरह सेवा में रहेगा। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को धनंजय कहते है। लोग बोलते हैं कि मैं धनवान हूँ लेकिन उन बेचारों को पता नहीं कि वे धन के मात्र चौकीदार हैं। धन सँभालते सँभालते चले जाते हैं। धन का सदुपयोग नहीं कर पाते तो वे धन के स्वामी कैसे हुए ? स्वामी तो उसको कहा जाता है जो स्वतन्त्र हो। धनवान तो धन से बँधे हुए हैं, धन के दास हैं, गुलाम हैं, धन के चौकीदार हैं। बैंक के द्वार पर चौकीदार बंदूक लेकर खड़ा रहता है। वह धन का चौकीदार है, स्वामी थोड़े ही है !
कई लोग तन के, मन के, धन के दास होते हैं। तन से बीमार रहते हैं, मन से उद्विग्न रहते हैं और धन को सँभालते सँभालते सारा जीवन खपा देते हैं।
कुछ लोग तन के, मन के, धन के स्वामी होते हैं। तन को यथायोग्य आहार-विहार से तन्दुरूस्त रखते हैं, मन को विकारी आकर्षणों से हटाकर आत्म-सुख में डुबाते हैं और धन का बहुजन हिताय सदुपयोग करते हैं।
तन, मन, धन का स्वामी बनना ही मनुष्य जन्म का उद्देश्य है।
तन का स्वामी कैसे बनें ? स्वास्थ्य के नियम जानकर तन को क्या खिलाना, कितना खिलाना, क्या न खिलाना, कितना समय सोना, कितना समय जागना, कहाँ जाना, कहाँ न जाना इनका विवेक करो। इन नियमों को चुस्तता से आचरण में लाओ तो तन के स्वामी हो जाओगे। साथ-ही-साथ मन के भी स्वामी हो जाओगे।
मन के स्वामी बनोगो तो तन के भी स्वामी बन जाओगे। तन का स्वामी बनने का संकल्प करोगे तो मन का स्वामी बनने में सहाय मिलेगी. दास बनकर जिये तो क्या जिये ?
मत पुजारी बन तू खुद भगवान होकर जी.....।
चार दिन जी लेकिन शरीर का भगवान होकर जी। दास और गुलाम मत बन। तू शहनशाह होकर जी।
धर्म से इच्छाएँ मर्यादित होती हैं। उपासना से इच्छाएँ शुद्ध होती हैं। ध्यान से इच्छाएँ खत्म होती हैं। इच्छाएँ खत्म होने से सामर्थ्य बढ़ता है। इच्छाएँ नियंत्रित होने से सामर्थ्य पनपता है। इच्छाएँ शुद्ध होने से कर्म की शुद्धि और लक्ष्य की शुद्धि होती है। योग से इच्छाएँ निवृत्त होती हैं और तत्त्वज्ञान से सारी इच्छाएँ भुनी जाती हैं।
अब मर्जी तुम्हारी है। हमने तो शास्त्र, संतों के वचन और अपने अनुभव को आपके समक्ष रख दिया है। तुम्हें जो अच्छा लगे, आत्मसात् कर लो।
नारायण.... नारायण.... नारायण..... नारायण..... नारायण.....