स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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उस यार से तू कब मिलेगा ?

Rajesh Kumawat | 8:47 AM | Best Blogger Tips

हृषिकेश से आगे किसी गुफा में तेजानन्द नाम के 90 वर्षीय एक वृद्ध संत रहते थे। उनके पास कोई जाता किः "महाराज ! मुझे दीक्षा दीजिए।" तो दीक्षा लेने आने वालों से वे कहा करते थेः
"पहले साधु, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर सबके यहाँ घूमकर आओ। अगर मुझसे दीक्षा ली और खिसके तो फिर बड़ा खतरनाक काम होगा। न इधर के रहोगे, न उधर के रहोगे।"

वे चुन-चुन कर दीक्षा देते थे। इसका कारण यह था कि अपनी अनुभूतियों से वे जान चुके थे कि कई लोग दीक्षा लेने के बाद उसका मूल्य नहीं समझते और उनकी दीक्षा कृपा को इधर-उधर बिखेर देते थे, इसलिए वे कसौटी पर खरे उतरने वाले को ही प्रायः दीक्षा देते थे।

यदा-कदा वे अपने भक्तों के देहातों में भी जाया करते थे। एक बार अपने कुछ शिष्यों को साथ लेकर वे कहीं जा रहे थे। रास्तें में उन्होंने एक किसान के खेत में चार-पाँच कुएँ खुदे हुए देखे। उन्होंने खेत का भ्रमण किया फिर किसान से पूछाः "क्यों भाई ! ये इतने सारे कुएँ तूने क्यों खोद रखे हैं?"
किसान बोलाः "महाराज ! यहाँ दस हाथ खोदा फिर भी पानी नहीं आया तो वहाँ पर बारह हाथ गहरा किया, लेकिन वहाँ भी पानी न मिला तो फिर यहाँ नौ हाथ, और यहाँ भी नहीं मिला तो वहाँ, वहाँ से वहाँ....।"

उन महात्मा ने आगे बढ़कर अपने शिष्यों को बताया किः "अगर इस किसान जैसे बेवकूफ बन गये और यहाँ नहीं तो वहाँ के चक्कर में पड़ गये तो जिन्दगी खत्म हो जाएगी खुदाई करते-करते, लेकिन पानी नहीं मिलेगा।"
मार्गदर्शन मिल गया है, अब तुम चल पड़ो ईश्वर के मार्ग पर। इधर-उधर झाँको मत।

कई लोग उपासना करते-करते इधर-उधर निहारते हुए आगे बढ़ते हैं लेकिन कइयों को तो मार्गदर्शन मिलता है और साधना करते हैं फिर साधना छोड़कर 'इसको राजी रखूँ, उसको राजी रखूँ, इससे मिलूँ....' के चक्कर में रह जाते हैं।
अरे ! इससे उससे मिलने में ही समय गँवाएगा तो अपने आप से कब मिलेगा ? भीतर मिलने वाले उस यार से तू कब मिलेगा ? जिन्दगी क्यों बरबाद करता है....? वक्त बहुत कम है और काम बहुत जरूरी है। अगर नहीं किया तो फिर बहुत तकलीफ होगी भैया !

कबीर जी ने चकवा चकवी की कल्पना करके एक बात समझाई हैः
साँझ पड़ी दिन आथमा दिना चकवी रोय।
चलो चकवा वहाँ जाइये जहाँ दिवस रैन न होय।।


सन्ध्या के समय जब दिन अस्त होता है, चकवी रोने लगती है और अपने प्रियतम चकवे से कहती हैं कि चलो चलें जहाँ कभी रात आवे ही नहीं। तब चकवा उसे समझाता हैः "पगली ! साँझ पड़ती है तो हम अपने-अपने घोंसले में चले जाते हैं, स्थायी जुदा नहीं हो रहे हैं, जो तू रोती है। चिन्ता मत कर.... प्रातः की मधुर बेला में हर रोज हमारा मिलन होता है।

कबीर जी कहते हैं- "जो मनुष्य जन्म पाकर भी अपने प्रियतम से, परमात्मा से, परमात्मा के प्यारे संतों, गुरूतत्त्व से नहीं मिला तो फिर न दिवस को मिलेगा, न रात्रि को न सुबह मिलेगा, न शाम को मिलेगा।"

चकवा कहता हैः
रैन की बिछड़ी चाकवी आन मिले प्रभात।
सत्य का बिछड़ा मानखा दिवस मिले नहीं रात।।


तू अपने सत्य स्वरूप में अनन्य भाव कर..... अपने सत्य स्वरूप को पाने के लिए जप, तप, सुमिरन कर। उठते-बैठते श्रद्धा-भक्ति से सदगुरू के मार्गदर्शन के अनुरूप दृष्टि बना, खानपान और वाहवाही का गुलाम मत बन। यह शरीर अग्नि की लपटों से जलकर भस्म हो जाये उसके पहले तू अपनी इच्छा-वासना को जलाकर अविनाशी पद को प्राप्त कर ले। अगर ऐसा कर दिखाया तो तेरा तो काम बन ही गया, जो तुझे याद करेंगे उनका भी काम बनता जायेगा।