शुक्रवार, अगस्त 28, 2026

जिसका विवेक प्रखर है वो निरावरण बन जाएगा!


दो प्रकार के लोग होते हैं, एक होते हैं सावरण, दूसरे होते हैं निरावरण।
सावरण वे होते हैं जिनको अपने आत्म विषय का प्रकाश, ज्ञान, सामर्थ्य नहीं होता। खाना, पीना, ये, वो संसार के इसमें तो आवरण मतलब उनकी योग्यता और उनका प्रभाव, उनका बल ढका हुआ है। दूसरे होते हैं निरावरण। उनको अपनी योग्यता, अपने प्रभाव स्वरूप में डटे होते हैं। तो वो निरावरण जो होते हैं उनका संकल्प में बल होता है। और सावरण होते हैं उनके संकल्पों में दम नहीं होता। तो सावरण वाले क्षीण संकल्प होते हैं और निरावरण वाले दृढ़ संकल्प होते हैं।
तो निरावरण कैसे बनता है आदमी?
जिसका विवेक प्रखर है। वो निरावरण बन जाएगा। विवेक प्रखर क्या? कि सत् क्या है, असत् क्या है ठीक से जो जाने। नश्वर क्या है, शाश्वत क्या है ठीक से जो जाने। जैसे बच्चे का विवेक प्रखर नहीं है, तो लॉलीपॉप, चॉकलेट, बिस्किट, खिलौने पकड़ लेगा, हीरे, मोती, जवाहरात छोड़ देगा। विवेक कच्चा है। ऐसे जिनका कच्चा विवेक है वो जगत के दृश्यमान परिस्थितियों को सच्चा समझेंगे, उन्हीं को पाएंगे, उन्हीं को भोगेंगे और उन्हीं में खप जाएंगे। यह कच्चा विवेक है।
और सच्चा विवेक यह है कि आखिर तो यह नश्वर है, तो उनका उपयोग करेंगे लेकिन उसमें खपेंगे नहीं। खपेंगे नहीं तो मन को संकल्प विकल्प उधर कम होंगे। तो ऐहिक जगत की प्राप्ति की उनको भीतर से तीव्र लालसा नहीं होगी, तो चित्त में शांति होगी। शांत चित्त में आत्म विषयिणी बुद्धि हो जाती है। आत्म विषयिणी बुद्धि होती है तो बुद्धि बलवान होती है, तो मन उसको घसीटता नहीं है। बलवान के पक्ष में ही सब होते हैं। तो चित्त में विश्रांति होती है तो बुद्धि बलवान होती है। बुद्धि बलवान होती है तो मन उसके पक्ष में रहता है, इंद्रियों के पक्ष में नहीं जाता। तो संयम, सदाचार, शांति, सामर्थ्य उसका बढ़ता जाता है। कितना भी खर्च करता जाता है लेकिन उसके पास वो टेक्निक आ गई विश्रांति पाने की। क्योंकि विवेक तीव्र है।
विवेक तीव्र होने से दूसरा फायदा होगा कि वैराग्य आएगा। किस चीज में राग करें? कब तक राग करें? इनकी शाश्वतता कब तक? आखिर कुछ नहीं। ये मिल गया, वो हो गया, वो हो गया लेकिन आखिर तो देखो तो स्वप्न। ऐसे ऐसे राजा आए, मानधाता जैसे आए, अश्वपति आए, कैसे कैसे राजा रामचंद्र जी आए। कृष्णचंद्र जी आए, कंस भी आए, ऐसे ऐसे राजा आए, सब छोड़ छोड़ के गए तो अपना कब तक रहेगा ये? तो तीव्र विवेक है। 

वशिष्ठ जी बोले हे राम जी! एक सावरण होता है, दूसरा निरावरण। जिसका शुद्ध अंतःकरण है, वह निर् आवरण है और जिसका मलिन अन्तःकरण है, वह सावरण है। शुद्ध अंतःकरण में जैसा भी निश्चय होता है, वैसा ही तत्काल आगे सिद्ध हो जाता है। और मलिन अंतःकरण का निश्चय सिद्ध नहीं होता।
हे राम जी! जिनमें शुद्ध अंतःकरण उदय हुआ है, वो जैसी इच्छा करे वैसी ही सिद्धि होती है।
हे राम जी! ऐसे ज्ञानवान परस्पर ज्ञान मात्र का निर्णय और चर्चा करते हैं। और ज्ञान की ही कथा कीर्तन करते और उसी से प्रसन्न होते हैं। ऐसे नित्य जाग्रत पुरुष जो निरंतर प्रीतिपूर्वक आत्मा को भजते हैं, उनमें आत्म विषयिणी बुद्धि उदय होती है और उससे वे शांति को प्राप्त होते हैं।
जिनको सदा अध्यात्म का अभ्यास है और उस अभ्यास में जो तत्पर हुए हैं, उनको आत्मपद प्राप्त होता है।
हे राम जी! शुभ-अशुभ गुणों के समूह जिनके नष्ट हुए हैं और अकस्मात फल जिनको प्राप्त हुआ है, उनका निर्मल क्रम सुनो।
एक समय राजा जनक लीला करके अपने बाग में, जिसमें मीठे फल लगे थे और नाना प्रकार के सुंदर बेलों पर कोकिला शब्द करती थी, इस भांति गया जैसे नंदन वन में इंद्र प्रवेश करे। उस सुंदर वन में पुष्पों से सुगंध फैल रही थी। राजा अपने संग के अनुचरों को दूर त्याग कर आप अकेला कुंजों में विचरने लगा।
कभी-कभी एकांत में अकेले में विश्रांति लेने से मनोबल बढ़ता है, विश्रांति मिलती है, बुद्धि बल बढ़ता है, संकल्प बल बढ़ता है। दो प्रकार के लोग होते हैं, एक होते हैं सावरण, दूसरे होते हैं निरावरण।
सावरण वे होते हैं जिनको अपने आत्म विषय का प्रकाश, ज्ञान, सामर्थ्य नहीं होता। खाना, पीना, ये, वो संसार के इसमें तो आवरण मतलब उनकी योग्यता और उनका प्रभाव, उनका बल ढका हुआ है। दूसरे होते हैं निरावरण। उनको अपनी योग्यता, अपने प्रभाव स्वरूप में डटे होते हैं। तो वो निरावरण जो होते हैं उनका संकल्प में बल होता है। और सावरण होते हैं उनके संकल्पों में दम नहीं होता। तो सावरण वाले क्षीण संकल्प होते हैं और निरावरण वाले दृढ़ संकल्प होते हैं।
तो निरावरण कैसे बनता है आदमी?
जिसका विवेक प्रखर है। वो निरावरण बन जाएगा। विवेक प्रखर क्या? कि सत् क्या है, असत् क्या है ठीक से जो जाने। नश्वर क्या है, शाश्वत क्या है ठीक से जो जाने। जैसे बच्चे का विवेक प्रखर नहीं है, तो लॉलीपॉप, चॉकलेट, बिस्किट, खिलौने पकड़ लेगा, हीरे, मोती, जवाहरात छोड़ देगा। विवेक कच्चा है। ऐसे जिनका कच्चा विवेक है वो जगत के दृश्यमान परिस्थितियों को सच्चा समझेंगे, उन्हीं को पाएंगे, उन्हीं को भोगेंगे और उन्हीं में खप जाएंगे। यह कच्चा विवेक है।
और सच्चा विवेक यह है कि आखिर तो यह नश्वर है, तो उनका उपयोग करेंगे लेकिन उसमें खपेंगे नहीं। खपेंगे नहीं तो मन को संकल्प विकल्प उधर कम होंगे। तो ऐहिक जगत की प्राप्ति की उनको भीतर से तीव्र लालसा नहीं होगी, तो चित्त में शांति होगी। शांत चित्त में आत्म विषयिणी बुद्धि हो जाती है। आत्म विषयिणी बुद्धि होती है तो बुद्धि बलवान होती है, तो मन उसको घसीटता नहीं है। बलवान के पक्ष में ही सब होते हैं। तो चित्त में विश्रांति होती है तो बुद्धि बलवान होती है। बुद्धि बलवान होती है तो मन उसके पक्ष में रहता है, इंद्रियों के पक्ष में नहीं जाता। तो संयम, सदाचार, शांति, सामर्थ्य उसका बढ़ता जाता है। कितना भी खर्च करता जाता है लेकिन उसके पास वो टेक्निक आ गई विश्रांति पाने की। क्योंकि विवेक तीव्र है।
विवेक तीव्र होने से दूसरा फायदा होगा कि वैराग्य आएगा। किस चीज में राग करें? कब तक राग करें? इनकी शाश्वतता कब तक? आखिर कुछ नहीं। ये मिल गया, वो हो गया, वो हो गया लेकिन आखिर तो देखो तो स्वप्न। ऐसे ऐसे राजा आए, मानधाता जैसे आए, अश्वपति आए, कैसे कैसे राजा रामचंद्र जी आए। कृष्णचंद्र जी आए, कंस भी आए, ऐसे ऐसे राजा आए, सब छोड़ छोड़ के गए तो अपना कब तक रहेगा ये? तो तीव्र विवेक है। तो नश्वर है, तो नश्वर में प्रीति और आकर्षण नहीं होगा तो फिर शाश्वत में विश्रांति होगी, बुद्धि बलवान होगी।
विश्रांति से जो सुख और सामर्थ्य आएगा, दोषों का उन्मूलन होगा और सद्गुणों की वृद्धि होगी। और विश्रांति और सामर्थ्य से जुड़े नहीं, विश्रांति में भी रमण न करें। तो फिर तत्वज्ञान। विश्रांति में रमण करा तो वहीं रुक जाएगा। विश्रांति मिलेगी तो अंतःकरण में ही मिलेगी। लेकिन उससे भी आगे जाए तो अंतःकरण से भी पार नित्य नवीन रस परमात्मा का उसके चित्त में उभरेगा। उसको बोलते हैं जीवनमुक्त। जीते जी मुक्त।
वैसे तो कोई विरले-विरले होते हैं। लाखों करोड़ों में कोई-कोई होते हैं। रिद्धि-सिद्धि वाले होते हैं। अष्ट सिद्धि वाले होते हैं। जल सिद्धि वाले होते हैं, थल सिद्धि वाले होते हैं। भूत-प्रेत की सिद्धि वाले होते हैं। ये सब होते हैं लेकिन सर्वोपरि है निरावरण पुरुष की बात। जैसे कृष्ण है, निरावरण। राम जी हैं, निरावरण हैं, नानक जी निरावरण हैं।
तो शास्त्रों में भी बहुत सारे अच्छे पुरुषों की बात आती है। भक्ति सिद्ध, योग सिद्ध, ज्ञान सिद्ध इन ज्ञान के द्वारा, भक्ति के द्वारा, योग के द्वारा निरावरण पद में टिके परमात्मा को पाए, ऐसे सिद्धों की बातें शास्त्रों में आती हैं। लेकिन भभूत सिद्ध की कोई बात नहीं आती। कि भभूत निकाल दी वो सिद्ध पुरुष है, नहीं। वो अपनी उपासना है, अपनी साधना है।
तो अब निरावरण होने के लिए तीव्र विवेक चाहिए। तीव्र विवेक होने से वैराग्य आएगा, वैराग्य से षट् संपत्ति और मोक्ष की इच्छा एक दूसरे से जुड़ी हुई है। कि मुक्ति हो जाए। तो जो मुक्त स्वरूप है, उसमें जिज्ञासा होगी। मैं कौन हूँ? दुख-सुख किसको होता है? मान-अपमान किसको होता है? तो मैं कौन हूँ इसको जानने की इच्छा होगी। आखरी जगत क्या? सुकरात की नाईं तड़प पैदा होगी। अपने आत्मा को, ईश्वर को जानने की इच्छा होगी।
तो इसमें भी दो होते हैं, एक भक्त मानकर फिर जानता है। और विवेकी जानकर फिर मानता है। भक्त पहले मान्यता करता है, ठाकुर जी को स्नान करा दिया, सुला दिया, जगा दिया, भगवान को मानता है फिर धीरे धीरे भगवान को जानता है, भक्त। और जिज्ञासु पहले जानता है बाद में मानता है भगवान को। तो जिनकी बुद्धि की प्रधानता है, वो पहले जानते हैं ईश्वर क्या है, फिर मानते हैं कि ये ईश्वर है। और भक्त भावना की प्रधानता है तो पहले मानते हैं और फिर वो यात्रा करते-करते जानते हैं।)
हाँ जी।
हे राम जी! शालमली नामक एक वृक्ष था, उसके नीचे राजा ने शब्द सुना कि अदृष्ट सिद्ध...
(तो शालमली वृक्ष के नीचे राजा जनक जा के बैठे। विश्रांति पाए। तो सिद्ध आपस में चर्चा कर रहे थे। एक सिद्ध ने कहा कि हम उस परमेश्वर की उपासना करते हैं कि जो सदा अपना आपा है, बुद्धि के अनुरूप होता है और तब जो आनंद आता है जिस पर, जो आनंद स्वरूप है उस ईश्वर की हम उपासना करते हैं। जो चीज आप चाहते हैं, जो घटना घटती है और आप चाहते हैं ऐसी घटना और फिर जो सुख मिलता है, तो बुद्धि में जिसका सुख प्रतिबिंबित होता है उस परमेश्वर की हम उपासना करते हैं। हाँ। नौ योगेश्वरों की कथा है। नौ योगेश्वर की कथा सुनकर जनक राजा को विवेक वैराग्य हुआ और भगवान का साक्षात्कार हो गया। ये वो प्रसंग है। हाँ जी।)
दूसरा सिद्ध बोला यह द्रष्टा जो पुरुष है और दृश्य जो जगत है, उस द्रष्टा और दृश्य के मिलाप में जो बुद्धि में निश्चित आनंद होता है और इष्ट के संयोग और अनिष्ट के वियोग का जो आनंद चित्त में दृढ़ होता है, वह आनंद आत्म तत्व से उदय होता है। उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
दूसरा सिद्ध बोला कि द्रष्टा, दर्शन और दृश्य को वासना सहित त्याग करो। जो दर्शन से प्रथम प्रकाश रूप है और जिसके प्रकाश से यह तीनों प्रकाशते हैं, उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
(पहले सिद्ध ने कहा कि द्रष्टा (मतलब देखने वाला), दर्शन (माना देखना) और दृश्य (माना दिखने की चीज), तीन चीज होता है। दृश्य, देखना और देखने वाला। ये तीनों की एकांतता होती है, अनुकूलता तब जो आनंद भासता है... पिक्चर देखने की इच्छा हुई और वही पिक्चर मेरी आंखें देखने में सक्षम हैं, कोई रोग नहीं, तकलीफ नहीं है। जो इच्छा हुई वही पिक्चर है और वही मैं देख रहा हूँ। तो मेरी इच्छा पूर्ति हुई। इच्छा पूर्ति हुई तो बुद्धि में, अंतःकरण में सुख मिला। जिस व्यक्ति को हम चाहते हैं, वो व्यक्ति आ गए और हम उनको देख रहे हैं। तो हमको सुख मिला। जो चीज हम चाहते हैं, वो चीज कोई ले आया या बन गई, हमने खाई, भोगी, सुख मिला। तो द्रष्टा, दर्शन और दृश्य के मेल से जो बुद्धि वृत्ति में सुख मिलता है, वो सुख स्वरूप वास्तविक में आत्मा का है। हम उस आत्मा की उपासना करते हैं, ये मिले तो सुखी हो जाऊं, ये खाऊं तो सुखी हो जाऊं, इधर जाऊं तो सुखी हो जाऊं, ये बेवकूफी हमने छोड़ दी। लेकिन तीनों के मेल से जिस बुद्धि में जिसका सुख मिलता है, हम उस सुख स्वरूप का उपासना, ध्यान करते हैं।
तो दूसरे सिद्ध ने कहा कि द्रष्टा, दर्शन और दृश्य ये त्रिपुटी के मेल की इच्छा ही छोड़ दो, और उनमें जो सुख मिलता है उसको ही छोड़ दो। हम तो उस सुख स्वरूप में ही एकाकार होते हैं।)
तीसरे सिद्ध ने कहा...
(तीसरा सिद्ध बोला जो निराभास और निर्मल है, जिसमें मन का भी अभाव है, अर्थात अद्वैत रूप है, उसकी हम उपासना करते हैं।
चौथा सिद्ध बोला कि जो निर्मल है, जिसमें मन नहीं है, द्रष्टा, दर्शन, दृश्य ये सब अंतःकरण में है, वो जो शांत परमेश्वर है ज्यों का त्यों, हम उसकी उपासना करते, तीसरे ने कहा।
चौथे ने कहा...)
जो द्रष्टा दृश्य दोनों के मध्य में है और अस्ति-नास्ति दोनों पक्षों से रहित प्रकाश रूप सत्ता है और सूर्य आदि को भी प्रकाशता है, उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
(वो कोई साधारण नहीं है। सूर्य को भी प्रकाशता है। सूर्य तो दुनिया को प्रकाशता है, लेकिन वो चैतन्य परमेश्वर सूर्य को भी प्रकाशित करता है। आंखें तो सारी चीजों को प्रकाशित करती हैं, लेकिन आंखों को मन प्रकाशित करता है कि आंखें देख रही हैं कि नहीं देख रही हैं। और मन को जीव प्रकाशित करता है, लेकिन जीव को भी जो प्रकाशित करता है वो परमेश्वर की हम उपासना करते हैं। कितना सरल है। आंखें सबको प्रकाशित करती हैं। लेकिन मन को आंखें नहीं देखती, सबको देखती हैं, मन को नहीं देखती, मन आंखों को भी देखता है। और बुद्धि को मन नहीं देखता, बुद्धि मन को भी देखती है। और बुद्धि आत्मा को नहीं देखती, आत्मा बुद्धि को भी देखता है कि मेरी बुद्धि बिगड़ गई कि सही है? मेरी बुद्धि पहले ऐसी थी, अभी ऐसी है। उसको जो देखता है... तो जैसे आंखों को, मन को, बुद्धि को जो प्रकाशित करता है, वही सूर्य को, चंद्रमा को भी वही प्रकाशित करता है। जैसे तुम्हारी सूर्य और चंद्र, दायीं सूर्य है नाड़ी और बायीं चंद्र है, ऐसे ही आसमान में सूरज चंद्र... तो जैसे इस सूर्य चंद्र को तुम्हारा द्रष्टा प्रकाशित करता है, ऐसे उस सूर्य चंद्र को भी वही परमेश्वर प्रकाशित करता है। हम उसी परमेश्वर की उपासना करते हैं। बहुत ऊंची बात है, ये तो सुनने से ही करोड़ों गौओं का दान करने का फल मिले, ऐसी बात है। खाली सुनने मात्र से। इसकी उपासना करो तो कहना ही क्या है। ये तो बहुत बड़ा भारी, इसमें ऊंचा सत्संग है। ऐसा कहीं मिला था सुनने को? क्या बात है, ऐसा एकदम टॉप माल देते हैं इधर। हम्म।)
पंचम सिद्ध बोला कि जो ईश्वर सकार और हकार है, अर्थात सकार जिसके आदि में है और हकार...
(ये तो सब के काम का है। सब आसानी से कर सकते हैं। पंचम सिद्ध पुरुष बोला कि जो ईश्वर सकार और हकार आदि और अंत में है, हम उसकी उपासना करते हैं। हम श्वास लेते हैं तो 'सो' ध्वनि होता है। छोड़ते हैं तो 'हं' होता है। लेकिन सुनाई नहीं पड़ता। जैसे वो घड़ियाल, लोलक चल रहा है, एकाएक आवाज सुनाई बंद हो गया, सेठ ने बोला मुनीम को कि क्या वो घड़ियाल का लोलक बंद हो गया क्या? बोले लोलक तो चल रहा है। बोले आवाज नहीं आता है, बोले ये बाराती आए हैं ना बैंड बाजे, इसीलिए लोलक का आवाज दब गया। ऐसे ही अपने अंदर जो डॉक्टर बोलते हैं ना हार्ट, हार्ट, हार्ट, हृदय, वो डॉक्टरों को खाली हृदय रहने की जगह को हृदय बोलते हैं। हृदय तो शुद्ध मन होता है। उसमें जो चैतन्य सत्ता होती है उसी से श्वास आता-जाता है। तो श्वास लेते हैं तो गरम होता है। और छोड़ते हैं तो ठंडा होता है। तो श्वास लिया और फिर छोड़ा तो उसकी जो बीच की अवस्था है, हम उसमें टिकते हैं। बहुत सूक्ष्म होता है। वही चैतन्य है, वही सारे ब्रह्मांड का स्वामी है। उसी में भगवान शंकर, विष्णु, महेश रस लेते हैं। बहुत सूक्ष्म बुद्धि चाहिए। तो श्वास लेने के जो आदि में सो और अंत में हम् रूप है, उस सोऽहं स्वरूप की हम उपासना करते हैं। ये सब लोग कर सकते हैं, सोऽहं स्वरूप की उपासना। जैसे वो सिद्ध करते थे वो। ये गुरु मंत्र जो लेते हैं ना उनको मैं पहले यही... है तो बहुत ऊंचा। सब आदमी को देना नहीं चाहिए, लेकिन अब फिर कब पात्र बने और कब मिले, तो पात्र को पात्रा भी तो दो। जितना होगा श्रद्धा, जितना होगा भाग्य उतना आगे चलेगा।
हाँ जी, पढ़ो।)
सातवां सिद्ध बोला कि जो सब आशा त्यागता है, उसको फल प्राप्त होता है और आशारूपी विष की बेल...
(आप भी सब आशा छोड़ दो, पूरे बेटे-बेटी की, अपने आप फल प्राप्त होता है। निश्चिंत हो जाओ, जो मंत्र दिया है जपा करो, जाओ। खामखा सुकड़-सुकड़ के मर रहे हैं, पचास उपाय बताओ। डॉक्टर ऐसा बोलता है, फलाना ऐसा बोलता है, ढिकना ऐसा बोलता है। छोड़ो, होता है तो होता है, नहीं होता है तो जा। निश्चिंत होके भगवान में लग जाओ, अपने आप अच्छा होता है। अब ये मानेंगे नहीं ना, अब उसने तो मान लिया, आंकड़े के पत्ते का दूध डाल दिया। ऐसा तो नहीं बोलता हूँ जा, आंकड़े के पत्ते का दूध डाल लूं, ऐसा तो नहीं बोलता हूँ। इतनी बात मान लो फिर भी। अच्छा है, जो मंत्र दिया है वो जपा करो।
हाँ जी।)
हे राम जी! नाना प्रकार के दुःख, संकट, स्नेह आदिक विकार रूप जो...
(एक महात्मा थे, उनका दर्शन करने जाते थे अखंडानंद सरस्वती। तो महात्मा ऐसे ही मस्ती में बैठे रहते थे, अपने सोऽहं स्वरूप का तो ज्ञान हो गया था। तो कोई बोले बाबाजी मैं बहुत दुखी हूँ, मेरे को ये तकलीफ है, ये तकलीफ है। बोले जा, तिनका सिर का पत्ता। ले क्या है, बोले पेट में ऐसा-ऐसा। बोले घोट के पी लीजियो। कोई आया बोले मेरे को सिर में है, वो घास में बैठे रहते, घास का तिनका उठा के दे देते। किसी को बेटा नहीं होता, तो तिनका उठा के दे दिया। किसी को धंधा नहीं, तिनका... जो भी सब दुखों की एक दवाई, तिनका घोट के ले लो भाई।
गजब के महात्मा हैं भाई!
आखिर अखंडानंद सरस्वती ने एक दिन पूछ ही लिया, कि बाबा, आप तो इधर घास पे, लॉन में बैठे रहते, लेटे रहते, बैठे रहते। और कोई भी आता है तो घास का टुकड़ा उठा के दे देते हैं, और फिर हमने जांच किया तो कईयों को फायदा भी हुआ है। तो ये क्या होता है महाराज?
बोले क्या होता है, ये तो सीधी बात है। इसमें शंका क्यों करते हो?
बोले महाराज सब कोई भी रोग हो और तिनका तोड़ के आप दे देते हो और फायदा होता है, ये कैसे होता है?
बोले देखो भाई। शरीर में पांच भूत हैं? बोले हैं। और ये तिनके में भी पांच भूत हैं? जल तत्व है, सूर्य के किरण, पृथ्वी के कण, पांच भूत हैं तिनके में भी। वो भी पांच भूत, ये भी पांच भूत, हम उठाते हैं तो संकल्प करते हैं कि इसका जो भूत कम ज्यादा है वो सेट हो जाए। तो भूत तो है, और क्या! अब तो जड़ भूत है, तो चेतन की तो आज्ञा मानेंगे कि नहीं मानेंगे? तो ठीक हो जाते हैं और क्या, इसमें क्या बड़ी बात है।
अब उनको तो बड़ी बात नहीं लगती और साइंटिस्ट का तो मुंह पौड़ा हो जाए। वो तो मर जाए ये मानने में तो। ऐसा, वो तो मानेगा ही नहीं।
अब बोले मानेगा तो ऐसा है, ऐसा है, उनके श्रद्धा का कारण हो गया, फलाना हो गया, ढिकना हो गया। उसके खोपड़ी में तो बैक्टीरिया ही घुसा हुआ है बस। डॉक्टर बोलेगा इसको ये बैक्टीरिया नहीं है, अंडे नहीं है, फलाना नहीं है, ढिकना नहीं है। बैक्टीरियावादी को बैक्टीरिया दिखता है, पित्त, कफ और वात वादी को वात, पित्त, कफ दिखता है। शरीर के कण वालों को कण दिखता है, तत्व वालों को तत्व दिखता है। लेकिन ओ ब्रह्मवेत्ताओं को तो सब ब्रह्म परमात्मा की लीला दिखती है।
वो सिद्ध क्या बोला?)
हे राम जी! तृणवत् जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्म तत्व में स्थित है...
(जगत को त्याग दिया मतलब कोई ऐसा नहीं कि लंगोटी पहन के भाग गया। जगत तो त्याग दिया माना ये तू-मैं की सत्यता त्याग कर सब की गहराई में उस परमेश्वर तत्व को जानता है, उसने जग को त्यागा। जगत को त्याग देने का मतलब है, जैसा जगत आपको दिखता है, ज्ञानी को भी आंखों से तो ऐसा ही दिखता है। लेकिन अंदर से वो ठीक से जानते हैं।
एक तेल का व्यापारी था, जरा तेजी में थोड़ा पैसा कमाया और गया राम जी की मूर्ति ले आया, 250 रुपये की, दो तोले की। फिर तेजी आई, तो हनुमान जी की मूर्ति ले आया, ज्यादा पैसा कमाया, 700 रुपये की। फिर मंदी आई, तो लगा लपड़क, तो थैली में डाल के माणिक चौक चला गया बेचने को। तो सोनी ने कहा कि तुम्हारे हनुमान जी के तो साढ़े पांच सौ मिलेंगे। और राम जी के 255, भाव सोने का बढ़ गया था थोड़ा।
बोले राम स्वामी हैं, और सेवक के तुम 550 देते हो, तो बेवकूफ कहीं के, स्वामी का तो भाव ज्यादा होना चाहिए।
उसने बोला, भाई स्वामी राम जी हैं, सेवक हनुमान जी हैं हम मानते हैं। तो राम जी भी तुम ले जाओ, हनुमान जी भी तुम ले जाओ, मेरे को तो ढाई तोला और पांच तोला सोना निकाल के दे दो बस।
अब ढाई तोला राम जी में से सोना निकाल दे, तो राम जी की मूर्ति कैसे रहेगी? और पांच तोला सोना हनुमान जी की मूर्ति से निकाल दे, तो फिर हनुमान जी... पहले सोना है, बाद में हनुमान की आकृति है। तो सुनार को तो सोना दिखता है, और भक्त को हनुमान जी दिखते हैं। सुनार बोलता है हनुमान जी तुम ले जाओ, मेरे को तो पांच तोला माल दे दो बस।
तो ऐसे ही, ज्ञानी को तो ब्रह्म दिखता है, और संसारियों को जगत दिखता है। जैसे सोनी को सोना दिखता है, ग्राहक को आकृति दिखती है। ऐसे संसारी को संसार दिखता है, और ज्ञानी को रॉ मटेरियल दिखता है, ब्रह्म। कैसी निगाह है देख लो। सो तो है।
पढ़ो जल्दी।)
हे राम जी! तृणवत् जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्म तत्व में स्थित है, उस महापुरुष को किसकी उपमा दीजिए। उस पुरुष के उदय, अस्त, अहं, त्वं आदिक सारी कल्पनाएं नष्ट हो गई हैं और केवल आत्म स्वभाव को प्राप्त हुआ है। उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है? जब दूसरा...
(उस सोऽहं स्वरूप को पाया, उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है? उसका आदि, अंत, ये वो सब आगम अपाय सब पूरा हो गया। उस ईश्वर स्वरूप को कौन सी उपमा दो? कोई गुरु बोलो, कोई साधु बोलो, कोई बापजी बोलो, कोई बुद्धू जी बोलो, कोई कुछ बोलो, कोई दिखाड़ो बोलो, बोलते रहो। उसको क्या उपाधि दोगे, क्या उपमा दोगे? एक शरीर में दिखते हुए भी करोड़ों-करोड़ शरीरों में व्याप रहा है। एक जगह दिखते हुए भी अखिल ब्रह्मांड में व्याप रहा है। सूर्य, नक्षत्र और चंद्रमा भी उसने घेर रखा है अपने स्वरूप में। उसको क्या उपाधि दोगे? ये तो तुम्हारे बीच है तो तुम नहीं जानो, तो तुम्हारी महिमा, तुम जानो। बाकी वो तो जो है, वही जान सकते हैं।
ज्ञानी को जानने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। ऊंधे माथे नहीं, ऊंधे माथे तो बहुत करते हैं। सीधे माथे तपस्या करें।
इसलिए गुरु गीता में लिखा है... वैसे भी शास्त्र कहते हैं माता, पिता और गुरु। जो कहते हैं, वो शास्त्र अनुकूल हो चाहे शास्त्र विरुद्ध हो, उनकी बात माननी हितकारी... हितकारी कहेंगे।
ऐसा भी आता है, जैसे 10 शिक्षक, एक आचार्य। 10 आचार्य, एक प्रधानाचार्य। 10 प्रधानाचार्य, एक पिता। 10 पिता बराबर एक माता।
हे माता रेणुका पानी भरने गई। सारस-सारसिका आपस में विहार देखा, उसके मन में आ गया हमारे पति जमदग्नि खाली ध्यान, भजन, सत्संग। मेरे तरफ तो देखते ही नहीं, हमें तो संसार का सुख ही नहीं। परशुराम का जन्म हुआ, बाद में ऋषी समझ गए। ऐ परशुराम, इधर आओ। पहले तो दूसरे लड़के को बुलाया कि तुम्हारी मां के मन में व्यभिचार आया, इसका गला काट दो। उसने नहीं काटा। परशुराम को बुलाया कि तेरी मां के मन में बुरे विचार आए, गला काट दे। परशुराम ने तो उठाया फरसा... अब माता, 10 पिता बराबर माता है, लेकिन अब पिता की आज्ञा है तो... जमदग्नि प्रसन्न हुए, बोलो बेटा क्या चाहते हो? मैं प्रसन्न हूँ। बोले पिताजी बस आप प्रसन्न हैं तो इतना ही वरदान दीजिए कि मेरी मां जीवित हो जाए और उसको पता नहीं चले कि मैंने गला काटा था।
आज्ञा पालने वाले की बुद्धि भी बड़ा काम कर देती है।
माता-पिता की आज्ञा, गुरु की आज्ञा पालने वाले की बुद्धि उसका बड़ा साथ देती है।
तो 10 आचार्य, एक प्रधानाचार्य। 10 प्रधानाचार्य, एक पिता। 10 पिता बराबर माता का दर्जा। ऐसी 84 लाख माताएं बराबर एक ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु होता है।)