स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

Ashram Livestream TV

Ashram Internet TV

Ashram Internet TV

संत पीपाजी

Rajesh Kumawat | 9:25 AM | | Best Blogger Tips
राजस्थान के गंग्नौरगढ़ का सम्राट राजा  पीपा विकारी सुखो में डूबा था.. 12 पत्नियां थी… पट्ट -रानी सीता दुर्गा की पूजा करती…राजा  रानी को  सत्संग मंडली से सत्संग मिल गया… गंग्नौर गढ़ के राजा  पीपा संत पीपाजी बन गए! दुर्गा की पूजा करने वाले राजा  की चित्त शक्ति आत्म देवी दुर्गा की पूजा करने लगी….

सत्संग से पीपा को समझ बढ़ी कि इतना वैभव पाने के बाद भी आत्म सुख का धन नहीं पाया तो कुछ नहीं पाया ये समझ आ गयी..धन का विकार, लोभ विकार, काम विकार आने जानेवाले है..मरने के बाद नीच योनियों में जाना पडेगा और जीते जी भी दुःख बिमारी की खायी में गिर कर रोते रोते मरना पडेगा ….

सत्संग में संत मंडली ने कहा की , रामानंद स्वामी के शरण जाओ…
काशी में श्री रामानंद स्वामी जी के आश्रम में पहुंचा …. महान संत रामानंद स्वामी ने देखा की पीपा हाथी  घोड़ो पर सवार हो कर आ रहे… राजा  की संत से मुलाक़ात नहीं होती… सेवको ने बोला कि हाथी  घोड़ो  पर सवार हो कर आये ऐसों की यहाँ दीक्षा नहीं होगी… हमारे यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं… स्वामीजी ने कहा है कि हमारा राजाधिराज आत्म राज है… कोई भी परिस्थिति आये, ऐसे राजाओं के लिए यहाँ प्रवेश वर्जित है…

पीपा ने सुन रखा था कि संतो के चरणों में जीव के कल्मष दूर होते…ह्रदय आनंद और प्रभु रस से खिल जाता है… प्राणी मात्र आनंद सुख और रस चाहता है, सुबह से शाम तक इसी सुख रस के लिए तो भटकता फिर भी सरप्लस  दुःख ही रहता… सुख सदा प्रगट करना है और दुःख को सदा के लिए मिटाना है तो ब्रम्हज्ञानी संत के सत्संग से ही होता है ..ये सम्राट पीपा ने सुन रखा था..

पीपा ने कहा, मैं  तो गुरुद्वार पे ही पडा रहूंगा…मुझे दीक्षा लेनी तो इस गुरू  से ही लेनी है… 2 दिन हो गए…सम्राट संत के आश्रम के द्वार पर बैठा है…भूखा है… प्यासा है… 
आश्रम-वासी बोले , ‘क्यों यहाँ बैठे हो?’

राजा पीपा बोले, ‘मुझे भगवत दर्शन की,भगवत प्राप्ति की बहुत जल्दी है…’

स्वामीजी ने कहा, ‘उसको बोलो कि कुएं में जम्प  मार दो…डूब मरो..’

तो राजा  पीपा सचमुच चल दिया… ‘कुआं कहाँ  है?’ पूछता काशी में… रामानंद स्वामी के संकल्प से पीपा को कुआं मिले नहीं, काशी में ऐसी जगह पहुँच गया कि जहां  बस्ती नहीं तो कुआं कहाँ  से होगा…भटक भटक के थक गया तो देवी दुर्गा माँ का सुमिरन किया…बोला,  ‘हे माँ तेरी मूर्ति का सच्चे दिल से पूजन किया हो, मेरे हाथ से कुछ भी अच्छा हुआ हो तो ये  गुरू मुझे स्वीकार करे…’

मोबाइल से फ़ोन लगाओ तो कनेक्शन मिलेगा , रिंग बजेगी फिर बात होगी…मोबाइल में 2-4 सेकण्ड  लगते किसी से बात सुनने को …लेकिन सच्ची प्रार्थना को भगवान तक पहुंचने में उतनी भी देर की जरुरत नहीं..उसी क्षण आप की प्रार्थना  सुन लेते भगवान !….
पीपा ने ह्रदय पूर्वक प्रार्थना की तो उसी क्षण उस के सामने सेवक खड़ा था और बोला, “गुरू जी बुला रहे हैं”


पीपा उठा और भागा … दूर से ही गुरू के चरणों में दंडवत  प्रणाम कर के जमीन  पर पड़  गया …..


गुरूजी रामानंद स्वामी जी ने देखा की पीपा की तड़प सच्ची है… गुरू चरणों में बैठ कर सत्संग सुना.. गुरू जी ने देखा कि राजा  की समझ बढ़ी है..संसारी मजा ये मजा नहीं सजा है… नीच  योनियों में जाने की तैयारी है, ये समझ आ गयी है….. हरि  नाम का अधिकारी है…आत्मा परमात्मा को पाने का अधिकारी है…
गुरूजी ने ज़रा सी नूरानी निगाह डाली…. पीपा गुरू की तरफ ‘हे प्रभु, हे हरि….’ करके एकटक  देख रहा है…. पीपा की साधना  ऐसी हुई कि ध्यान मूलं गुरु मूर्ति पूजा मूलं गुरू पदम्… मन्त्र मूलं गुरूर्वाक्‍यं, मोक्ष मूलं गुरूकृपा …

नजरो से वे निहाल हो जाते, जो संत की नजरो में आ जाते!
गुरूजी ने देखा कि ये सुपात्र है… विलासी भोगी राजा  पात्र तो है, लेकिन ऐश-आराम और खूब सुन्दर रानी का थोडा पिठ्ठू  भी है …इसकी और परीक्षा लेनी चाहिए..

गुरूजी बोले,  ‘राजा  अब तुम अपने राज्य वापस लौट जाओ’

पीपा बोला, ‘गुरूजी मैं  आप की चरण-धूलि बनना चाहता हूँ…’
गुरूजी बोले, ‘तुम राजा  हो, भोग विलास के आदी  हो’


राजा पीपा सत्संग से ऐसा ऊँची मति का धनि बना कि  महाराजा पद  को तुरंत त्याग दिया, जो गुरू चरण  से दूर रखे ऐसा कुछ नहीं चाहिए ….आश्रम के बाहर गया…सभी मंत्री अधिकारियों को बोल दिया कि जो भी ये राज वैभव ले जाना चाहते है, ले जाएं….राज-वस्त्र, जो भी सामान है सब गरीबो में बांट दिया..रानी सीता को कहा कि आप भी वापस राज महल चली जाएं….रानी सीता ने कहा , ‘मैं  तो आप के चरणों की दासी हूं’ …राजा  रानी ने सादे कपडे पहने..आश्रम वासी जैसा वेश धारण किया…

गुरूजी ने देखा कि राजा  इस परीक्षा में तो पास हो गया… सारा राज्य छोड़ने के लिया तैयार  है…जिस को पाने के लिए मनुष्य जन्म मिला है  उस को पा लेना कितनी बड़ी बहादुरी है ! … जो छूटने वाला है, वो ही छोड़ा है…


महाराज पीपा की ईश्वर प्राप्ति की प्यास देख कर गुरूजी मन ही मन प्रसन्न हुए …. 
पीपा बोले , ‘अब तो दीक्षा दीजिये गुरूजी…’

गुरूजी बोले, दीक्षा  की क्या बात करता है…आत्म साक्षात्कार करा दूँ ….लेकिन अभी तू ये बात छोड़ और अपने राज्य में जा कर अपना राजपाट संभाल… लेकिन पहेले जैसे भोग विलास के लिए नहीं..प्रजा को सुखी करने के लिए, दूसरों के दुःख हरने के लिए राज पाट संभाल, सुख की वासना और दुःख का भय मिटा..ऐसा राज्य कर… जब तुम   ऐसा राज-पाट  चलाने में सफल हो जाओगे तो हम स्वयं तुम्हारे राजस्थान में आयेंगे…और तुम को दीक्षा देंगे..’
राजा पीपा गदगद हो गया! ‘गुरू महाराज आप मेरे राजस्थान में आयेंगे!! मेरा राज्य पवित्र होगा….’
राजा पीपा  गदगद हो गए…गुरू महाराज को दंडवत प्रणाम करके अपने राज्य में वापस आये…लेकिन अब राजा  पीपा का तन, मन, खयालात बदला है…गुरू महाराज की आज्ञानुसार राज पाट चलाया, अपने को गुरूमुखी बनाया तो गुरू महाराज ने भी पीपा को ह्रदय पूर्वक स्वीकार कर लिया..भोगी विलासी राजा  पीपा संत पीपाजी बनकर महान हो गए!


ऐसे शक्कर बेचनेवाला एक लड़का था, उसको गुरू ने ह्रदय पूर्वक स्वीकार किया तो तुम्हारे सामने खड़ा है बापूजी बन के !..
ब्रम्हज्ञानी की गत-मत ब्रम्हज्ञानी जाने..

लीलाशाह भगवान की कृपा से आसुमल को वो  पद मिल गया…सारे  कहते …बापू क्या जादू है तेरे प्यार में… 


सत्संग की कैसी महिमा है…ईश्वर प्राप्ति का रास्ता सत्संग में सहज में सुलभ हो जाता है  बाकि साधन से कर्ता  मौजूद रहेता है…पूजा, यग्य -याग से नश्वर रिध्दी सिध्दी  मिल जाएगी , लेकिन उस का अहम् नहीं छूटेगा…भगवान कहेते जो मुझ में अहंकार का विसर्जन  कर के  मद-रूप हो जाता है, वो मुझे पा लेता है.. …सत्संग मेरे मिलने का सहज सुन्दर साधन है… वे लोग बहोत भाग्यशाली है जिन को हयात  महापुरुष का सत्संग मिल जाता है …

चान्द्रायण व्रत किया तो भी  कर्ता मौजूद रहता  है । सत्संग ज्ञान से कर्ता अपने को भगवान का जान लेता  है, आत्मा-परमात्मा  की प्रीति  हो जाती तो ईश्वर प्राप्ति सहज सुलभ हो जाती है । महाराज पीपा की चिंतन धारा  बदल गयी  । हाड़ मांस  के शरीर में, कमर तोड़ में शक्ति का ह्रास नहीं किया । ऐश आराम में मन नहीं रुका, इन्द्रियों की बेवकूफी से बुद्धि ऊपर उठती गयी । 

गुरू के बिना विद्वान् भी अनाथ है… गुरू मिल गये, दीक्षा मिल गयी तो मनुष्य जीवन सफलता  की ओर चल पडा समझो । जिन को दीक्षा नहीं मिली वो ‘राम राम’ जपना..  ‘राम राम रटते रहना… नियम पालना…
''संत मिलन को जाईये'' ये पाठ  करना रोज ।  

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय


सत्संग की ऐसी महानता है कि विलासी भोगी राजा  पीपा को महान गुरू  भक्त संत पीपाजी बना देता है ।  गुरूजी की प्रसन्नता पा कर राज्य में  लौटता है तो उसके पुण्य प्रताप से राज्य के बाग़ बगीचे, खेती, वृक्ष लहराने लगते है.. सुमति का दान करना भारी  पुण्य है..
हरिभक्त पीपा के स्वप्न में देवी दुर्गा आती है, बोलती कि ठीक रास्ता पकड़ा है । ऐसे ये विलासी पीपा गंगनौर गढ़ के सम्राट गुरूकृपा से भक्ति सम्राट हो गए ! अब राज्य के लोगों का जीवन बदलने की घडियां  आई ।रामानंद स्वामी ने जाहिर किया कि हम पीपा के राज्य में जायेंगे , संदेशा भेजो । गुरू महाराज ने आज्ञा की । पीपा के साथ सीता और अन्य  पत्नियां जो पहले काम की कीडि़यां थी, अब उन में भी राम के प्रेमा भक्ति के सखा बनेंगे ऐसा भाव आया । 

गुरू जी  शिष्यों के साथ पधार रहे, सन्देश मिला तो राजा  पीपा चल दिए पैदल जहां  गुरूजी पधारेंगे । भक्त मंडलियां  तैयारी में लग गयी । यथा राजा  तथा प्रजा… सारी  प्रजा भी भक्तिमय हो गयी  थी । खबर मिली तो पीपा नंगे पैर चलते चलते महाराजजी जहां  विश्राम करने वाले थे वहाँ  5 माईल  (8 कि. मी. ) दूर गुरू के चरणों में जा पहुंचे । वहाँ  गुरू महाराज का स्वागत करके उन के साथ पैदल यात्रा करते करते अपने राजमहल की तरफ आये । उत्सव हुआ…. दंडवत  प्रणाम करता, आरती करता, पूजन करता… गुरू महाराज के  सत्संग से लाभान्वित होते यथा राजा  तथा प्रजा, गंगनौर की प्रजा धनभागी हुई । 
‘वैष्णव  सम्प्रदाय की वैष्णवी प्रीति  का सदभाव  रखो.. किसी में बुराई नहीं है, दिखती है तो वो  आगंतुक  है… वास्तविक में जीवात्मा अमर है ..भगवान का शाश्वत सखा है’  । आत्मा परमात्मा का धीरे धीरे ज्ञान होने लगा । प्रजा का मधुमय ईश्वर से भक्तिभाव बढ़ा । प्रजा का हर्ष-शोक ईश्वर की भक्ति-प्रीति-पूजा में बदलता गया । 

वृक्षो में फल आये, खेती सुन्दरता से लहराने लगी । 
राज्य में संत की उपस्थिति से धन, सुख, संपत्ति, संपदा समृध्दी  बढ़ी । 
विदाई का अवसर हुआ । पीपाजी बोले, ‘अब नश्वर शरीर को मैं  मानने की गलती से ऊपर उठा हूँ, ‘राज्य मेरा’ ये भरम से पार हुआ हूँ, पहले मैं-मेरा में उलझा था, महाराज अब अपने चरणों में स्वीकार कर लो, संन्यास की दीक्षा दे दो, मैंने आपके चरणों में सुन्दर शिक्षा पायी है लेकिन ये संसार तो काजल की कोठरी है, घर में कितनी भी कोशिश करो तो भी क्रोध, मोह, आकर्षण, विकर्षण में गिरता-फिसलता रहता है । हाड-मांस के शरीर में फिसले गिरे तो मेरा भी सत्यानाश हुआ । गुरू जी आप हम को  अपना नहीं मानते, आप अपना मानते तो जैसा आपका हाथ, आपके  चरण आपके  साथ रखते, ऐसा ये सेवक भी शुद्ध रखने के लिए अपने चरणों में रखिये ।’
गुरू महाराज ने समझाया कि सन्यासी का जीवन आसान  नहीं, भिक्षा मांगकर खानी पड़ेगी, फरियाद छोड़ देनी पड़ेगी, मान-अपमान होगा उस वक्‍त सम रहना है, कठिन मार्ग है, तुम्हारी पत्नी को साथ नहीं रख सकते । 

वैष्णव  पतिव्रता वृत्ति की रानी सीता बोली, महाराज मैं  आपकी शरण हूँ । उसने भी रानी का अलंकार  उतार दिया और संन्यासी  के वस्र पहन  लिए । पीपा और सीता संन्यासी  बन कर काशी को चल पड़े सदा के लिए ।  राजलक्ष्मी को राम राम  कर दिया । एक दिन मरने पर तो छोड़ना ही था, त्याग से जीते जी राज लक्ष्मी  को राम राम कर डाला । गंगनौर का सम्राट पीपा महान संत पीपाजी बन गए । सत्संग की पुस्तकें लिखी । एक भोगी विलासी सत्संग से महान  संत बन गया..!!

ऐसे पीपाजी और सीता देवी गुरूजी का ज्ञान का प्रचार प्रसार करने निकले । सीता देवी इतनी सुन्दर थी की किसी की बुरी नजर पड़ गयी । 4 बदमाश इकठ्ठे हो गए कि बाबा को ऐसी रानी की क्या जरुरत है । बाबा के झूठ-मुठ के चेले बन गए, सेवादार बन गए, यात्रा करते करते कहीं रात हो गयी तो रुके, दूसरे दिन सुबह पीपाजी प्रभात में जल्दी स्नानादि करके चल दिए और सोचे कि  सीताजी भगतों  के साथ आएगी । पीपाजी आगे चले गए तो ये 4 बदमाश  कुकर्म करने के लिए सीतादेवी को जबरदस्ती जंगल में ले गए । सीतादेवी तो राम राम करे, इतने में कहीं से एक शेर आया । बदमाशों को चीरफाड़ के भगा दिय और शेर अंतर्धान हो गया ।  साधू के रूप में आया, सीतादेवी को बोले,  ‘पीपा जी आगे निकल गए बेटी अब तुम कैसे जाओगी?’

सीता को लगा की कोई है जो मदद करेंगे ।  शेरो के शेर! मेरे इश्वर! साधू महाराज को बोली, ‘मैं यहाँ जंगल में भूली पड़ी हूँ, बदमाशो ने ऐसा किया ।’ साधू महाराज बोले चल अब जल्दी जल्दी । साधू ने सीता देवी को पीपाजी से मिलवा दिया ! ऐसे ईश्वर कब  शेर बनकर प्रगट हो, साधू बन कर प्रगट हो और कब अंतर्धान होंगे .. भक्तो की रक्षा करते…  ईश्वर सर्व समर्थ है ..