स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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और इटावा का डिप्टी कलेक्टर खटखटा बाबा बन गया !

Rajesh Kumawat | 9:18 AM | | Best Blogger Tips
ब्रिटिश शासन के जमाने की बात है।
इटावा में सप्रू साहब डिप्टी कलेक्टर थे। उनका चाकर था मनहर नायी। एक रात भोजन करके सप्रू साहब पलंग पर आराम कर रहे थे। मनहर पैर दबा रहा था। साहब बोलेः
"अरे मनहर ! कोई कहानी सुना।"
"साहब ! आपने तो बहुत किताबें पढ़ी हैं और कहानियाँ सुनी हैं। आप ही सुनाओ।"
"नहीं.....। तू कहानी सुना। मैं सोते सोते सुनुँगा।"
"वाह जी....! मैं कहानी सुनाऊँ और आप सोते रहें। मैं क्या ऐसे ही बकता रहूँ ?"
"नहीं... नहीं....। मैं चाव से सुनुँगा।"
"अच्छा, तो सुनो। लेकिन 'हूँ.... हूँ...'. करते रहना। मुझे पता रहे कि आप सुन रहे हैं। नहीं तो आप सो जायें और मैं सुनाता रहूँ तो मेरी शक्ति ऐसे ही व्यर्थ चली जायगी।"
वाणी का जो संयम करता है उसकी वाणी का प्रभाव भी होता है। बिन जरूरी बोलना नहीं, बिन जरूरी सुनना नहीं, बिन जरूरी देखना नहीं। ऐसे मनुष्य की वाणी का, मन का, बुद्धि का, जीवन का विशेष प्रभाव होता है।
मनहर नायी ने कहानी प्रारंभ करते हुए कहाः "साहब जी ! तैयार हो जाइये। कहानी सुनिये।
गर्मियों के दिन थे। अरब का सम्राट अपने महल की छत पर शाही पलंग लगवाकर आराम किया करता था। केवड़े का छिड़काव किया जाता था। शय्या पर सुगन्धित सुकोमल पुष्प बिछाये जाते थे।
पूनम की रात थी। सोने का पलंग था, रेशम की निवाड़ से भरा गया था, कालीन बिछा था, उस पर गद्दा बिछा था। फिर एक कालीन बिछा था। उस पर सफेदी बिछी थी। अगल-बगल चार तकिये रखे थे। चाँद की अमृतवृष्टि हो रही थी। पलंग सजाने वाली दासी ने पलंग सजाया। दिनभर की थकी माँदी थी। बिस्तर सजाकर सोचा कि राजा साहब इस पर आराम फर्माते हैं। पुष्पों की सुगन्ध आ रही है। चाँद से शीतलता बरस रही है। मन्द मन्द पवन लहरा रहा है। कितना मजा आता होगा ! बादशाह सलामत अभी भोजन करेंगे, बाद में आयेंगे। तब तक जरा सा लेटकर देख लूँ दो-चार मिनट।
वह पलंग पर लेटी। थकी तो थी ही। पलंग पर पुष्पों की गुदगुदी। केवड़े की सुगन्ध। मन्द मस्तानी हवा। पूनम की चाँदनी। तीन मिनट भी नहीं बीते, दासी टप से सो गयी।
बादशाह सलामत भोजन करके आये।

देखा तो पलंग पर दासी ! जवानी हो..... सत्ता हो.... राजवैभव हो.... भोग की सामग्री हो... चापलूसी करने वाले लोग हों..... फिर..... अहंकार को बाकी बचता भी क्या है ? वह आग बबूला हो गया।
अपनी बेगम को बुलाया। पूछाः 'इसको क्या सजा देनी चाहिए ? तू जो कहेगी वह सजा दी जाएगी, क्योंकि इसने तेरा अपमान किया है। तू ही फर्मान कर, इसको क्या सजा दी जाय ?"
दासी तो बेचारी भय से थर-थर काँप रही थी। पसीने से तरबतर हो गई। प्राण सभी को प्यारे होते हैं। प्राण बचाने के लिए वह दासी बादशाह सलामत के कदमों में गिर पड़ी और रोने लगी। धन, सत्ता, यौवन और उसमें अहंकार मिलता है तो आदमी में क्रूरता भी आती है।
'बादशाह सलामत की बेगम का अपमान....! बादशाह का अपमान.....! बादशाह के बिस्तर पर सोने की गुस्ताखी....! ....और फिर माफी ?हरगिज नहीं। वैसे तो फाँसी की सजा होनी चाहिए लेकिन दया करते हैं। बेगम ! तू ही सजा का फर्मान दे।'
बेगम ने कहाः "यह घण्टाभर पलंग में सोयी है। साठ मिनट के साठ कोड़े फटकारे जायें।' साठ कोड़े आदमी मारे तो वह बेचारी मर ही जाय !ऐसा बादशाह सोच ही रहा था इतने में बेगम ने कहाः "मैं ही अपने हाथ से इसको मारूँगी। स्त्री है तो इसको मैं ही सजा दूँगी।"
बेगम ने कोड़ा दे मारा दासी की पीठ परः एक... दो... तीन.....। राजा गिनता जा रहा था। चार-पाँच कोड़ों में तो दासी गिर पड़ी। बेगम साहिबा भी थक गई। औरत की जात मुलायम होती ही है।
बादशाह एक..... दो....तीन....चार....पाँच..... कहकर गिनती गिनने लगा। तीस कोड़े तक दासी जोर-जोर से रोती रही, परन्तु इसके बाद दासी की मति पलट गई। तीस से साठ तक दासी खूब हँसती रही।
वह हास्य भी कोई गहराई को छूकर आ रहा था। कोई समझ की धारा से प्रकट हो रहा था। बादशाह ने पूछाः "पहले रोती थी और बाद में हँसने लगी। क्या बात थी ?"
"जहाँपनाह ! प्रारंभ में कोड़े लगे तब बहुत पीड़ा हो रही थी। सोचा कि अब क्या करूँ ? यह शरीर तो एक दिन जलने वाला ही है। कोड़े खाकर मरे चाहे मिठाइयाँ खाकर मरे इस मरने वाले शरीर को कोड़े लगते हैं। किसी बाबा की वाणी सुनी थी वह याद आ गई तो सहनशक्ति आ गई। सहनशक्ति आते ही ज्ञान की किरण मिली कि मैं तो केवल साठ मिनट सोयी हूँ और साठ कोड़े लगे हैं लेकिन जो रोज सोते हैं, रातभर सोते हैं, उनको न जाने कितनी सजा होगी ? अच्छा है कि मुझे अभी सजा मिल गयी और मैं ऐसी आदत से बच गई, अन्यथा मुझे भी आदत पड़ जाती तो मैं भी ऐसे पलंग की इच्छा करती, केवड़े की सुगन्ध की, पुष्पाच्छादित शय्या की इच्छा करती। अल्लाह की बन्दगी की इच्छा नहीं होती। भोग में विघ्न डालकर मेरे मालिक ने मुझे योग में प्रेरित कर दिया। मैं यह सोचकर हँसी कि सजा देने वालों को अपनी सजा की खबर ही नहीं है।"
इतना सुनते ही बादशाह की बुद्धि बदल गई। बादशाह ने ताज फेंक दिया, इमामा फेंक दिया, जामा फेंक दिया और जूते फेंककर फकीरी कफनी पहन ली। श्रीरामचन्द्रजी दिन में वन की ओर गये थे, बादशाह ठीक आधी रात को वनगामी हो गया।"
मनहर ने यह कहानी डिप्टी कलेक्टर साहब को सुनायी।
"फिर क्या हुआ ?"
"फिर होगा क्या ? धीरज रखो। सुनो। फिर उस बादशाह ने खुदा की बन्दगी की, मालिक को याद किया। जीवन धन्य किया।"
सप्रू साहब जा तो रहे थे नींद में लेकिन सदा सदा के लिए उनकी नींद खुल गई। वे बोलेः
"मनहर ! तुमने बहुत अच्छा किस्सा कहा, किन्तु अब हमको भी इस पलंग से उतरना चाहिए। हम साड़े पाँच सौ रूपये तनख्वाह पाते हैं। जो गरीब हैं, भूखे हैं, नंगे हैं, लाचार हैं, थके हैं, माँदे हैं उनसे भी सरकार टैक्स लेकर हमको पगार देती है। पीड़ित व्यक्तियों का पैसा लेकर मैं भी गिलम गालीचे बसा रहा हूँ। मैं भी चैन की नींद लेकर आयुष्य बरबाद कर रहा हूँ। नहीं, नहीं.... अब यह हरगिज नहीं होगा।"
मनहर कहता हैः "साहब ! आप क्या कहते हैं ? क्या हो गया आपको ?"
"आज तूने बहुत बढ़िया कथा सुनायी।"
"साहब ! यह तो कहानी है।"
"नहीं....! यह सत्य घटना है अथवा सत्य को छूती हुई बात है।"
सप्रू साहब पलंग से नीचे उतरे। भूमि पर एक सादी चद्दर बिछाकर उस पर निद्राधीन हुए।
दूसरे दिन सुबह सप्रू साहब उठे। अपनी डिप्टी कलेक्टर की पोस्ट का इस्तीफा लिख दिया। पत्नी को  माँ कहकर पैर छू लिये। बेटे से कहाः "तू भगवान का बेटा है। अगले जन्म में किसी का बेटा था। इस जन्म के बाद भी न जाने किसका बेटा होगा"
बेटा बड़ा हो और सुख दे यह मूर्खों की मान्यता है। सुख तो अपनी समझ से, अपनी तपस्या से होता है। बेटे बड़े हों और सुख दें ऐसी भावना से जो बेटों को पालते हैं उनको बुढ़ापे में दुःख के सिवा भी कुछ नहीं मिलता।
'"क्या इन हाड़ मांस के पुतलों से भगवान अनन्त गुने शक्तिशाली नहीं हैं ? जो मिट्टी के पुतलों में भरोसा रखता है और परमात्मा में भरोसा खोता है उसको तो रोना ही पड़ता है। मुझे बुढ़ापे में रोना पड़े उसके पहले ही मैं चेत गया। अब तू जान और तेरा काम जाने। पढ़ो, लिखो, जो तुम्हारा प्रारब्ध होगा वह मिलेगा।"
उस समय इटावा जिले में एक अंग्रेज कलेक्टर थे और तीन डिप्टी कलेक्टर थे। उन सबने सुना कि सप्रू साहब ने इस्तीफा दे दिया है और अपने बंगले के पास इमली के पेड़ के नीचे एक मात्र फटा कम्बल लेकर फकीरी वेश में बैठ गये हैं। कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, सुपरिन्टेंडेंट पुलिस, कोतवाल आदि सब उनको समझाने आये। अंग्रेज कलेक्टर बोलाः
"अरे सप्रू ! तुम क्या करते हो ? फकीर का वेश बनाया है ?"
"हाँ।"
"मेमसा'ब का क्या होगा ? लड़के का क्या होगा ? अभी सरकार की नौकरी करो। पाँच घण्टे का फर्ज अदा करो, बाकी के समय में फकीरी करो। जब लड़का बड़ा हो जाय, मेमसा'ब बूढ़ी हो जाय, पेन्शन मिलने लगे तब पूरे फकीर बनना। हम भी तुम्हारे साथ फकीर बनेंगे। राम राम करेंगे। तुम्हारे जैसे अमलदार का इस्तीफा हम नहीं लेते।
"तुम लो चाहे न लो। मैं अब बन्दों की गुलामी छोड़कर मालिक की गुलामी करूँगा। तुमको रिझाने के बदले उसी को ही रिझाऊँगा।"
उन्होंने बहुत समझाया लेकिन सप्रू साहब दृढ़ रहे अपने निर्णय में। साथवाले डिप्टी कलेक्टर ने अंग्रेज से कहाः
"साहब ! कभी-कभी कुछ पुण्य की घड़ियाँ होती हैं तब बात लग जाती है और आदमी की जिन्दगी बदल जाती हैं। किसी पावन क्षण में एक लफ्ज भी लग जाय तो जीवन करवट ले लेता है। अब इनकी राह बदल गई है। इनका मन काम में से मुड़कर राम की ओर चल पड़ा है। तुम्हारे हमारे समझाने से कुछ न होगा।
मेरा भाई बाँदा जिले में तहसीलदार था। वह नदी के किनारे कहीं जा रहा था। नदी की उस हरियाली भूमि में एक साँप मेढक को पकड़े हुए था। मेंढक 'ट्रें.....ट्रें....ट्रें....' चिल्ला रहा था। उसका आक्रन्द सुनकर मेरा भाई घर आया और नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बोलाः "हम लोग भी काल के मुँह में पड़े हैं। हमें भी काल ने पकड़ा ही है। संसार के दुःखों से कराह रहे है फिर भी हम अपने को तहसीलदार मानते हैं, वकील मानते हैं, डॉक्टर मानते हैं, इंजीनियर मानते हैं, सेठ-साहूकार मानते हैं। धिक्कार है ऐसे जीवन को !"
"मेरा भाई तहसीलदार छोड़कर फकीर हो गया। अब पता नहीं कहाँ है, गंगा किनारे है कि जमुना किनारे है कि नर्मदा किनारे है. किसी भी किनारे हो लेकिन है मोक्ष के किनारे।"
सप्रू साहब को और भी उत्साह मिल गया। अंग्रेज साहब ने सप्रू साहब को बहुत समझाया।
नासमझ लोग साधकों को समझाने का ठेका ले बैठते हैं। यह सोये हुए लोगों की दुनियाँ है। इसमें कोई कोई जागता है तो फिर उसे सुलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन जिसको शब्द की चोट लग जाती है वह फिर नहीं सोता। सप्रू साहब सोये नहीं। जगने की यात्रा पर चलते रहे। इटावा  दक्षिण दिशा में यमुना के किनारे पर अपना डेरा डाला। हाथ में एक डण्डा रखते थे। मन लगता तो हरि का ध्यान स्मरण करते। नहीं तो डण्डे से खटक खटक करते थे। अतः लोग उनको खटखटा बाबा कहने लगे।
दस बजे के करीब वे झोली लेकर भिक्षा लेने शहर में जाते थे। पब्लिक उनको पहचानती तो थी ही। सभी चाहते थे कि वे आज हमारे द्वार पर आयें। झोली में रोटी लेते थे और उस झोली को यमुना जी में डुबाते थे। तदनन्तर उस झोली को एक इमली की डाली पर लटका देते थे। चार बजे तक झोली लटकती रहती थी। फिर कुछ स्वयं खाते और बाकी बन्दरों को खिला देते थे। फटी कमली के सिवा कोई वस्त्र पास नहीं रखते थे। इस प्रकार इटावा के उस डिप्टी कलेक्टर ने इटावा में ही बारह साल घोर तपस्या की।
एक बार इन खटखटा बाबा ने भण्डारा किया। घी की कमी पड़ गई। कड़ाही चढ़ी हुई थी। शहर दूर था। बाबा ने एक चेले से कहा कि दो कलसा यमुनाजल लाकर कड़ाही में छोड़ दो। वैसा ही किया गया। यमुना का जल घी बन गया। पूड़ी तली गई।
यमुनाजी के बहाव में पद्मासन में बैठे हुए कोई सिद्ध जा रहे थे। उन्होंने कहाः "अरे खटखटा जरा पानी तो पिला दे !" खटखटा बाबा कमण्डल में पानी लेकर यमुनाजी में पानी पर चलते चलते गये और सिद्ध को पानी पिलाया। तब सिद्ध ने कहाः "मैं भी सिद्ध और तू भी सिद्ध हो गये।"
खटखटा बाबा की समाधि पर अब अनेक इमारतें बन गयी हैं। समाधि का मन्दिर और विद्यापीठ की इमारत दर्शनीय है। सहस्रों प्राचीन पुस्तकों का अपूर्व संग्रह किया गया है। साल में एक बार मेला लगता है। भारत के विद्वानों, योगियों और पण्डितों को निमंत्रण देकर बुलाया जाता है। खूब व्याख्यान होते हैं। खटखटा बाबा की समाधि इटावा का तीर्थस्थान है। इटावा जिले का बच्चा बच्चा खटखटा बाबा के नाम से परिचित है।
कहाँ तो अपने बंगले पर आराम और विलास.... और कहाँ कठोरता भरी फकीरी ! जिनके खून पसीने के पैसों से ऐशोआराम कर रहे हैं उनका बदला चुकाने का अवसर आ जाय उससे पहले ही चेत जायें तो अच्छा है।
जो शरीर का चैन और आराम चाहते हैं, शरीर का सुख और सुविधा चाहते हैं, ऐसे ही विलास में जीवन पूरा कर देते हैं वे साँप के मुँह में मेंढक जैसे हैं। काल के मुँह में पड़ा हुआ जीव शरीर के चैन और आराम की फिक्र करता है। लेकिन सच्चे साधक, सच्चे जिज्ञासु इस बात की फिक्र करते हैं कि आयु बीत रही है। जीवन नष्ट हो रहा है। देखते ही देखते दादा मरा.... दादी मरी.... चाचा मरा.... फूफी मरी... सब मरने वाला यहाँ हैं। काल-कराल किसी को छोड़ता नहीं। अनेक रूप लेकर, अनेक निमत्त बनाकर काल प्राणी मात्र को अपने पाश में बाँधकर मौत की खाई में ले जाता है।