स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

Ashram Livestream TV

Ashram Internet TV

Ashram Internet TV

हम तो खाली तीसरी पढ़े हैं - "ज्यों केले की पात पात में पात. त्यों संतन की बात बात में बात "

Rajesh Kumawat | 8:12 AM | Best Blogger Tips
 (श्री सुरेशानंदजी की अमृतवाणी) 
             पुराने सत्संगी जो हमेशा आते रहते है शिविरों में, उनको पता है कि बापूजी कई बार बोलते रहते है हम तो खाली तीसरी क्लास पढ़े है , हम तो भाई खाली तीसरी पढ़े है | अब तीसरी पढ़े है उसकी बातें आज मैं आपको बताना चाहता हूँ | तीसरी पढ़े है मतलब:
ज्यों केले के पात पात में पात,
त्यों सदगुरु की बात बात में बात |
भक्ति, योग और ज्ञान | भक्ति मार्ग, ज्ञान मार्ग, निष्काम कर्मयोग का मार्ग | इन तीनों से जो विभूषित है,
कोई कोई महापुरुष भक्ति मार्ग से ईश्वर को पाये है, कोई ज्ञान मार्ग से पाये है, कोई निष्काम कर्म योग के मार्ग से पाये है पर अपने गुरुदेव के पास ये तीनों है | इसलिये ज्ञानमार्गी साधकों को भी लाभ मिलता है जो भक्तिमार्गी होते है उनको भी लाभ मिलता है और जो निष्काम कर्ममार्गी होते है, उनको भी लाभ होता है | सबको लाभ होता है |
सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण | इन तीनो से पार ! तीसरी पढ़े है ! बापूजी नहीं कहते है ! तीनों से पार ! देखो अब आपको एक बात बताऊँ, जनम और मरण क्यों होता है ? चौरासी लाख योनियों में जीव क्यों जाता है ?
जाना पड़ता है ये बात पक्की है | गीता में लिखा हुआ है इसमें कोई ना नहीं कह सकता | ना बोले तो कोई बात नहीं, जायेगा तब पता चल जायेगा | चार पैर वाला बनेगा तब पता चल जायेगा | तब झक मार के मानेगा पर तब गीता नहीं पढ़ सकेगा | तब माला नहीं घुमा सकेगा | तब दीक्षा लेने नहीं बैठ सकेगा | जो लोग बोलते है न कि अरे ये सब बाते है, कुछ नहीं है इन सब बातों में, नहीं माना करो, सब बकवास है, ढकोसला है | भगवान ऐसे लोगों के लिए बोलते है तू इधर आ मैं तुझे दिखाऊंगा क्या बकवास है क्या ढकोसला है ? सत्वगुण, तमोगुण, रजोगुण, इनमे जो उलझते रहते है उसके कारण जनम मरण होता है | कोई कोई सत्वगुण में भी उलझते है कि मैं चार बजे उठ जाता हूँ | ये लोग तो आलसी है छः बजे उठते है | छः बजे तक तो मैं मेरा नियम पूरा कर लेता हूँ | पर मेरे दूसरे साथी है न ! सब आलसी है, आठ बजे तक नियम पूरा होता है उनका | तो ये क्या है | सत्वगुण में भी बंध गए कि मैं नियम करता हूँ चार बजे उठकर | ये सत्वगुण में बंधना है पर गुरुदेव चाहते है, गुरुदेव स्वयं तो पार तीनों गुणों से है ही पर अपने साधकों को भी तीनो गुणों से पार ले जाना चाहते है |
तीसरी बात प्रकृति में तीन दोष है : आधि, व्याधि और उपाधि | आधि माने लोगों में देखो मन का रोग, टेंशन, चिंता | व्याधि शरीर का रोग | उपाधि मैं फलाना ! मैं फलाना ! मैं फलाना ! पर गुरुदेव तीनों से पार ! आधि व्याधि उपाधि और अपने साधकों को भी बापू आधि, व्याधि और उपाधि तीनों से पार ले जाना चाहते है | न मन में आधि रहे न शरीर में व्याधि रहे न मैं बड़ा अफसर हूँ ! मैं बड़ा अधिकारी हूँ ! मैं बड़ा सेठ हूँ ! इन सबसे पार ले जाना चाहते है |
चौथी बात कि तीन मुख्य पाश है एक तो द्वेष, दूसरा लोभ और तीसरा मोह | ये तीन जिसमे बढते जाते है उसका मन चंचल बना रहता है और ये तीन जिसमे घटते जाते है उसका मन स्थिर होता जाता है और ये तीन जिसमे है या तीन में से एक भी है तो समझो मन में पशुता आ गयी है | द्वेष पशुता है, मोह पशुता है, लोभ पशुता है | मन में पशुता आई तो शरीर भी पशु का मिलने ही वाला है | समझो अब तैयारी है  | मन में आ गयी न तो अब तन में भी आएगी | गुरुदेव द्वेष, लोभ और मोह इन तीनों से हमको भी पार ले जाना चाहते है |
पांचवी बात तीन लोक है : इस लोक में कुछ सुखभोग के साधन है फिर मरने के बाद परलोक में जो कुछ सुखभोग के साधन है, स्वर्ग आदि ऊँचे लोकों में और तीसरा व्यक्ति का अपना मनः लोक भी होता है | काल्पनिक सृष्टि | जैसे स्वर्ग के बारे में सुना है तो सोचते है कि दान पुण्य करो मरने के बाद स्वर्गलोक मिलेगा पर गुरुदेव के साधक स्वर्ग की भी इच्छा नहीं करते | क्यों?  उससे भी पार जाना है |
छठी बात शरीर की तीन प्रकृतियाँ है : जो मन पर असर डालती है वात, पित्त और कफ | तुलसीदासजी ने मानस रोगों में कहा है:
काम वात कफ लोभ अपारा |
क्रोध पित्त नित छाती जारा ||
ये आदमी को सताते रहते है | गुरुदेव की कृपा से और उनके बताये हुए उपायों से शरीर में भी वात, पित्त, कफ का संतुलन रहता है और इन तीनों की विकृति से उत्पन्न जो रोग है उसपर भी नियंत्रण हो जाता है | वात, पित्त, कफ का बेलेंस रहा तो इन तीन का भी संतुलन रहा |

फिर सातवीं बात की सर्दी गर्मी और बरसात तीन ऋतुएं है न ! इन तीनों ऋतुओं में भी सम रहो , सर्दी में भी सम रहो, कई लोग बोलते है कि सर्दी की सीजन में तो ठिठुरते रहो... स्वेटर पहनो, कम्बल ओढ़ो, गरम पानी करो.. ये करो... वो करो... झंझट बहुत है | कोई बोले नहीं नहीं !  गर्मी की ऋतु में बहुत परेशानी है, कोई बोले बरसात की ऋतु में परेशानी है पर गुरुदेव कहते है तुम इन तीनो के साक्षी बनो और तीनों में सम रहो और पार हो जाओ |
आठवी बात गुरुदेव चाहते है हमारे जीवन में भी ध्याता, ध्यान और ध्येय ! दृष्टा, दर्शन और दृश्य ! कर्ता, करण और कर्म ! प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ! भक्ति, भक्त और भगवान ! इन तीनों की त्रिपुटी से बापूजी पार है और हमको भी पार ले जाना चाहते है | ऐसा नहीं कि बस मैं ध्यान करता रहूँ  तो किसका ? ध्यान किया गया, ध्याता करने वाला, ध्येय जिसका कर रहे है तो ये तीन तो बने रहे | गुरुदेव चाहते है कि ये तीन न रहे | अद्वैत का अनुभव हो जाये |
भूत, भविष्य और वर्तमान नौवी बात | जैसे गुरुवन्दना में गाते है न जय काल अबाधित...  काल का प्रभाव जिनके ऊपर नहीं है | कालातीत तत्व में जो जगे है, गुरुदेव हमको भी उसमे ले जाना चाहते है | न भूतकाल की बातें सोचते रहें न वर्तमान में कुछ न भविष्य की कल्पना | इससे पार हो जाएँ ताकि वर्तमान भी बढ़िया रहे, भविष्य भी बढ़िया रहे |  इसमें उलझे न रहे कि मेरा वर्तमान अच्छा हो ताकि मेरा भविष्य भी अच्छा हो जाये | खाली इसी में ही उलझे नहीं रहना है, इससे पार हो जाओ कालातीत तत्व में गुरुदेव हमें जगाना चाहते है |
और तीसरी पढ़े है का एक ये भी है कि गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर... ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का जो....... वहां शब्द नहीं जा सकते..... शब्द वहां छोटे पड़ जाते है | इस प्रकार गुरुदेव हमें इन तीनों से ले जाना चाहते है पार ! सोचो कितनी ऊँची उपलब्धि गुरुदेव कराना चाहते है !  
Video Link : 
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=YuWtEhmXGZU