स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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उत्तम भूषण और उत्तम तीर्थ क्या है ?

Rajesh Kumawat | 7:24 AM | | | | | | | | | Best Blogger Tips
किं भूषणाद् भूषणमस्ति शीलम्
तीर्थं परं किं स्वमनो विशुद्धम्।
किमत्र हेयं कनकं च कान्ता
श्राव्यं सदा किं गुरूवेदवाक्यम्।।
'उत्तम-से-उत्तम भूषण क्या है ? शील। उत्तम तीर्थ क्या है ? अपना निर्मल मन ही परम तीर्थ है। इस जगत में त्यागने योग्य क्या है ? कनक और कान्ता (सुवर्ण और स्त्री)। हमेशा सुनने योग्य क्या है ? सदगुरू और वेद के वचन।'

श्री शंकराचार्यविरचित 'मणिरत्नमाला' का यह आठवाँ श्लोक है।
बाहर की सब संपत्ति पाकर भी आदमी वह सुख, वह चैन, वह शांति, वह कल्याण नहीं पा सकता, जो शील से पा सकता है। इन्द्र को स्वर्ग के राज-वैभव, नन्दनवन आदि होते हुए भी वह आनन्द, वह प्रसन्नता न थी, जो प्रहलाद के पास थी। इन्द्र ने अपने गुरू बृहस्पति से यह बात पूछी थी।
प्रह्लाद के जीवन में शील था इसलिए वह साधनों के नहीं होने के बावजूद भी सुखी रह सका। जिसके पास शील है उसके पास साधन न हों तो भी वह सुखी रह सकता है। जिसके जीवन में शील नहीं है वह साधन होते हुए भी परेशान है।
....तो भूषणों का भूषण क्या है ? शील। कई लोग सोने-चाँदी के गहने पहनते हैं, गले में सुवर्ण की जंजीर, पग में झाँझन, कण्ठ में चन्दनहार, हाथ-पैरों में कड़े, कानों में कर्णफूल, उँगली में अँगूठी, नाक में नथ इत्यादि पहनते हैं और समझते हैं कि गहने-आभूषण पहनने से हम सुशोभित होते हैं। लेकिन शास्त्रकारों का कहना है, बुद्धिमानों का अनुभव है कि गहने पहनने से हम सुशोभित नहीं होते। गहने आभूषण से हमारा हाड़-मांस-चामवाला देह थोड़ा सा सुशोभित हो सकता है, लेकिन हमारी शोभा इनमें नहीं है। इन अलंकारों से तो हमारी शोभा दब जाती है। हमारी असली शोभा जो निखरनी चाहिए, वह देह का लालन-पालन और बाहरी टिप-टॉप करने की वृत्ति से दब जाती है। बाहरी भूषणों से हाड़-चामवाले देह की कृत्रिम चमक-दमक दिखती है। हमारी शोभा भूषणों से नहीं है, हमारी शोभा है शील से। शीलवान् पुरूष हो या स्त्री, उसका प्रकाश कुटुम्ब, मोहल्ले, जाति आदि में जैसा पड़ता है, वैसा प्रकाश सोने-चांदी के आभूषणों का नहीं पड़ता। किसी ने चाहे उपरोक्त सब आभूषणों को धारण किया हो, यदि शील न हो तो वे सब व्यर्थ हैं।
मन, वचन और कर्म से अयोग्य क्रिया न करना, देश-काल के अनुसार योग्यता से, सरलता से विचारपूर्वक बर्तना-इस आचरण को शास्त्र में 'शीलव्रत' कहा गया है। उन्नति का मार्ग शील ही है। गीता में बताये हुए दैवी संपत्ति के लक्षण शीलवाले व्यक्ति में होते हैं। यदि आत्मज्ञान न भी हो और शील हो तो मनुष्य नीच गति को प्राप्त नहीं होता। शीलवान ही आत्मबोध प्राप्त करके मुक्त हो सकता है। शीलरहित पुरूष को कड़ा, कुण्डल आदि गहने ऊपर की शोभा भले ही देते हों, परन्तु सज्जन पुरूषों का तो शील ही भूषण है।
शीलरहित मूर्ख को कड़ा, कुण्डल आदि बोझरूप हैं। ये भूषण जीव को जोखिम में डालने वाले और भय के कारण है, जबकि शीलरूपी भूषण लोक और परलोक में उत्तम प्रकार का सुख देने वाला है, इस लोक में शोभा और कीर्ति बढ़ानेवाला है, परलोक में अक्षय सुख को प्राप्त कराता है। मूर्ख पहने हुए गहनों को भी लजा देता है जबकि शीलवान् पहने हुए भूषणों को शोभा देता है।
एक राजपुत्र ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध एक स्त्री के साथ विवाह कर लिया था और गुप्त स्थान में उसके साथ रहा करता था। राजा को जब यह समाचार मिला कि मेरा पुत्र मेरे शत्रु की पुत्री के साथ विवाह करके गुम हो गया है तो वह बहुत दुःखी हुआ। पुत्र की यह कार्यवाही उसे योग्य न लगी इसलिए दुःखी होते हुए मरण के समीप आ गया। उसको एक ही पुत्र था। मरने के समय उसने कुँवर को बुलाने के लिए आदमी भेजे और अपनी परिस्थिति के समाचार कहलवाये।
कुँवर ने अपनी पत्नी से कहाः "पिता जी मरने की तैयारी में हैं। मुझे उन्होंने अपने पास बुलाया है। इस समय मुझे जाना ही चाहिए। मेरे जाने से वे स्वस्थ हो जायेंगे तो मुझ पर प्रसन्न होंगे। अगर वे चल बसेंगे तो मैं राजा बन जाऊँगा।"
पत्नी बोलीः "तुम राजा बन जाओगे तो मेरा क्या होगा ?"
"मैं तुझे वहाँ बुला लूँगा और पटरानी बनाऊँगा।" यह कहकर राजकुमार ने अपनी नामवाली अँगूठी अपनी उँगली से उतारक पत्नी को पहनाई और स्वयं राजधानी को चल दिया।
आकर देखा तो राजा मृत्युशैय्या पर पड़ा था। कुँवर को देखकर राजा प्रसन्न हुआ और बोलाः "मैं तुझसे एक बात कहना चाहता हूँ। यदि तू मेरी बात मान लेगा तो मेरे प्राण सुख से निकलेंगे। पिता के वचन पुत्र को मानने चाहिए। श्रीराम, देवव्रत भीष्म आदि पुत्रों ने माने हैं। यदि तू मानना स्वीकार करे तो कहूँ।"
"पिताजी ! मैं आपकी अन्त समय की आज्ञा का पालन करूँगा।" कुँवर ने स्वीकृति दी।
राजा ने कहाः "हे सुपुत्र ! तू मेरे मित्र गंधर्वराज की कन्या से विवाह करना स्वीकार कर।"
कुँवर ने बात मान ली। राजा का प्राणांत हो गया। कुँवर ने गंधर्वराज की कन्या से विवाह कर लिया। वह राजा होकर राज्य करने लगा और अपनी पूर्व पत्नी से जो बात कहकर आया था, उसको अत्यन्त सुख में भूल गया।
प्रथमवाली राजकन्या ने सुना कि मेरे श्वसुर का देहान्त हो गया है, मेरा पति राजा हो गया है और उसने एक दूसरी राजकन्या से विवाह कर लिया है। इस राजकन्या के पास एक बहुत चतुर दासी थी। राजकुँवर की मुलाकात के लिए वह तीन और कन्याओं को ले आई और उसने राजकन्या सहित चारों को पुरूष की पोशाक पहनाकर राजकुँवर के पास नौकरी करने को भेजा। कुँवर चारों युवान पुरूषों को देखकर प्रसन्न हुआ और चारों को अपने रक्षकों की नौकरी पर रख लिया।
कुँवर को देखकर राजकन्या के बार-बार आँसू गिरा करते थे। कुँवर ने कई बार पूछा, परन्तु उसने कुछ उत्तर न दिया।
एक दिन कुँवर अकेला उद्यान में बैठा था तो वह अंगरक्षक उदासी से हाथ जोड़कर उसके सामने जा बैठा। कुमार ने उसकी उँगली पर अपने नामवाली अँगूठी देखी तो विस्मय से पूछाः
"हे मित्र ! यह अँगूठी तुझे कहाँ से प्राप्त हुई ?"
"आपके पास से।"
"मैंने यह अँगूठी तुझे कब दी थी ?" राजकुमार का आश्चर्य बढ़ गया।
"जब तुम मुझे छोड़कर आये और राजा बने तब।"
रहस्य खुल गया। वह समझ गया कि यह मेरी प्राणेश्वरी राजकन्या है। प्रिया से क्षमा माँगते हुए उसने अपने पिता की अन्तिम समय की आज्ञा की सारी बात कही। तब राजकन्या बोलीः
"आपने पिता की आज्ञानुसार जो विवाह किया है, उससे मैं प्रसन्न हूँ। परन्तु आप मेरा त्याग न कीजिए। अपने निवास में दासी के समान रहने दीजिए जिससे मैं नित्य आपके दर्शन कर सकूँ।" कुँवर ने स्वीकार कर लिया और अन्य तीनों को पुरस्कार देकर विदा किया।
गंधर्वराज की कन्या यह विवाह विषयक बात सुनकर कुँवर से बोलीः "आपने जिसके साथ पूर्व में विवाह किया है, उसका हक मारा जाये यह मैं नहीं चाहती। वही आपकी पटरानी होने की अधिकारिणी है। मैं उसकी छोटी बहन के समान रहूँगी।"
इस प्रकार दोनों पत्नियाँ प्रेमपूर्वक बहनों के समान रहने लगीं। इन दोनों ने ही शील का अनुसरण किया इसलिए दोनों ही सुखी हुईं। एक दूसरे का आदर करके सामने वाले के अधिकार की रक्षा करने लगीं।
जैसे भरतजी कहते थे कि राज्य बड़े भाई श्रीराम का है और रामजी कहते थे कि पिता की आज्ञानुसार राज्य का अधिकार भरत का है। यह है शील।

सास सोचे की बहू को सुख कैसे मिले, उसका कल्याण कैसे हो और बहू चाहे कि माता जी का हृदय प्रसन्न रहे.... तो यह शील है।
अगर सास चाहे कि घर में मेरा कहना ही हो और बहू चाहे कि मेरा कहना ही हो, देवरानी चाहे मेरा कहना ही हो और जेठानी चाहे मेरा कहना ही हो – ऐसा वातावरण होगा तो देह पर चाहे कितने ही गहने लदे हों, फिर भी जीवन में सच्चा रस नहीं मिलेगा। सच्चा गहना तो शील है।
सत्य बोलना, प्रिय बोलना, मधुर बोलना, हितावह बोलना और कम बोलना, जीवन में व्रत रखना, परहित के कार्य करना इससे शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है। जिसके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण नहीं हुआ वह चाहे अपनी स्थूल काया को कितने ही पफ-पाऊडर-लाली और वस्त्रालंकारों से सुसज्जित कर दे, लेकिन भीतर की तृप्ति नहीं मिलेगी, हृदय का आनन्द नहीं मिलेगा।
स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गये थे। उनके प्रवचन सुनने के लिए लोग इकट्ठे हो जाते। एक बार एक महिला आई। उसके अंग पर लाखों रूपये के हीरे जड़ित अलंकार लदे थे। फिर भी वह महिला बड़ी दुःखी थी। प्रवचन पूरा होते ही वह स्वामी रामतीर्थ के पास पहुँची और चरणों में गिर पड़ी। बोलीः
"मुझे शान्ति दो..... मैं बहुत दुःखी हूँ। कृपा करो।"
स्वामी रामतीर्थ ने पूछाः "इतने मूल्यवान, सुन्दर तेरे गहने, वस्त्र-आभूषण ! तू इतनी धनवान ! फिर तू दुःखी कैसे ?"
"स्वामी जी ! ये गहने तो जैसे गधी पर बोझ लदा हो ऐसे मुझ पर लदे हैं। मुझे भीतर से शांति नहीं है।"
अगर शीलरूपी भूषण हमारे पास नहीं है तो बाहर के वस्त्रालंकार, कोट-पैन्ट-टाई आदि सब फाँसी जैसे काम करते हैं। चित्त में आत्म-प्रसाद है, भीतर प्रसन्नता है तो वह शील से, सदगुणों से। परहित के लिए किया हुआ थोड़ा सा संकल्प, परोपकारार्थ किया हुआ थोड़ा-सा काम हृदय में शान्ति, आनन्द और साहस ले आता है।
अगर अति उत्तम साधक है तो उसे तीन दिन में आत्म-साक्षात्कार हो सकता है। तीन दिन के भीतर ही परमात्म तत्त्व की अनुभूति हो सकती है। जन्म-मृत्यु के चक्कर को तोड़कर फेंक सकता है। पृथ्वी जैसी सहनशीलता उसमें होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि इधर-उधर की थोड़ी सी बात सुनकर भागता फिरे।
पृथ्वी जैसी सहनशक्ति और सुमन जैसा सौरभ, सूर्य जैसा प्रकाश और सिंह जैसी निर्भीकता, गुरूओं जैसी उदारता और आकाश जैसी व्यापकता। पानी में किसी का गला घोंटकर दबाये रखे और उसे बाहर आने की जैसी तड़प होती है ऐसी जिसकी संसार से बाहर निकलने की तीव्र तड़प हो, उसको जब सदगुरू मिल जाय तो तीन दिन में काम बन जाय। ऐसी तैयारी न हो तो फिर उपासना, साधना करते-करते शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना होगा।

शील में क्या आता है ? सत्य, तप, व्रत, सहिष्णुता, उदारता आदि सदगुण।
आप जैसा अपने लिए चाहते हैं, वैसा दूसरों के साथ व्यवहार करें। अपना अपमान नहीं चाहते तो दूसरों का अपमान करने का सोचें तक नहीं। आपको कोई ठग ले, ऐसा नहीं चाहते तो दूसरों को ठगने का विचार नहीं करें। आप किसी से दुःखी होना नहीं चाहते तो अपने मन, वचन, कर्म से दूसरा दुःखी न हो इसका ख्याल रखें।
प्राणिमात्र में परमात्मा को निहारने का अभ्यास करके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना यह शील है। यह महा धन है। स्वर्ग की संपत्ति मिल जाय, स्वर्ग में रहने को मिल जाय लेकिन वहाँ ईर्ष्या है, पुण्यक्षीणता है, भय है। जिसको जीवन में शील होता है उसको ईर्ष्या, पुण्यक्षीणता या भय नहीं होता। शील आभूषणों का भी आभूषण है।
मीरा के पास कौन-से बाह्य आभूषण थे ? शबरी ने कितने गहने पहने होंगे ? वनवास क समय द्रोपदी ने कौन-से गहने सजाये होंगे ? शील के कारण ही आज वे इतिहास को जगमगा रही हैं।
उदारता देखनी हो तो रंतिदेव की देखो। दान करते-करते अकिंचन हो गये। जंगल में पड़े हैं भूखे-प्यासे। काफी समय के बाद कुछ भोजन मिला और ज्यों ही ग्रास मुख तक पहुँचा कि भूखा अतिथि आ गया। स्वयं भूखे रहकर उसे तृप्त किया। दूसरों की क्षुधानिवृत्ति के लिए अपने शरीर का मांस भी काट-काटकर देने लगे। कैसी अदभुत दानवीरता और उदारता !
साधक में रंतिदेव जैसी दानवीरता और उदारता होनी चाहिए।
उदारता पदार्थों की भी होती है और विचारों की भी होती है। किसी ने कुछ कह दिया, अपमान कर दिया तो बात को पकड़ मत रखिये। जो बीत गई सो बीत गई। उससे छुटकारा नहीं पाएँगे तो अपने को ही दुःखी होना पड़ेगा। जगत को सुधारने का ठेका हमने-आपने नहीं लिया है। अपने को ही सुधारने के लिए हमारा आपका जन्म हुआ है। माँ के पेट से जन्म लिया, गुरू के चरणों में गया और पूरा सुधर गया ऐसा नहीं होता। जीवन के अनुभवों से गुजरते-गुजरते आदमी सुधरता है, पारंगत होता है और संसार-सागर से पार हो जाता है। व्यक्ति में अगर कोई दोष न रहे तो उसे अभी निर्विकल्प समाधि लग जाय और वह ब्रह्मलीन हो जाय।
रामकृष्ण परमहंस बार-बार सत्संग से उठकर रसोईघर में चले जाते और बने हुए व्यंजन पकवानों के बारे में पूछताछ करते। शारदा माँ कहतीं-
"आप तत्त्वचिन्तन की ऊँची बात करते हैं और फिर तुरन्त दाल, सब्जी, चटनी की खबर लेने आ जाते हैं ! लोग क्या कहेंगे ?"
रामकृष्ण बोलेः "यह माँ की कोई लीला है। मेरी जीवन-नाव तो ब्रह्मानंद-सागर की ऐसी मझधार में है कि कोई उसमें बैठ न सके। इसीलिए माँ ने मेरे चित्त को जिह्वा के रस में शायद लगा दिया है। जिह्वारस के जरिये मैं बाहर के जगत में आ जाता हूँ। जिस दिन यह जिह्वारस छूटा तो समझ लेना... उसी दिन हमारी जीवन-नाव किनारा छोड़कर सागर की मझधार में पहुँच जाएगी। फिर यह देह टिकेगी नहीं।"
....और हुआ भी ऐसा ही। एक दिन शारदामणि देवी भोजन की थाली सजाकर रामकृष्ण देव के समक्ष लायी। थाली को देखकर परमहंस जी ने मुँह फेर लिया। शारदा माँ को उनकी बात याद आ गयी.... हाथ से थाली गिर पड़ी। ढाई-तीन दिन में ही उस महान् विभूति ने अपनी जीवनलीला समेट ली।