स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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जब रावण ने कर चुकाया (शील का प्रभाव)

Rajesh Kumawat | 10:26 AM | | | | | | | | | Best Blogger Tips
रावण के जमाने में एक बड़े सदाचारी, शील को धारण करने वाले राजा चक्ववेण हुए। बड़ा सादा जीवन था उनका। राजपाट होते हुए भी योगी का जीवन जीते थे। प्रजा से जो कर आता था, उसको प्रजा का खून-सा समझते थे। उसका उपयोग व्यक्तिगत सुख, ऐश्वर्य, स्वार्थ या विलास में बिल्कुल नहीं होने देते थे। राजमहल के पीछे खुली जमीन थी, उसमें खेती करके अपना गुजारा कर लेते थे। हल जोतने के लिए बैल कहाँ से लायें ? खजाना तो राज्य का था, अपना नहीं था। उसमें से तो खर्च नहीं करना चाहिए। .....तो राजा स्वयं बैल की जगह जुत जाते थे और उनकी पत्नी किसान की जगह। इस प्रकार पति पत्नी खेती करते और जो फसल होती उससे गुजारा करते। कपास बो देते। फिर घर में ताना-बुनी करके कपड़े बना लेते, खद्दर से भी मोटे।

चक्ववेण राजा के राज्य में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती थी, अकाल नहीं पड़ता था, प्रजा में ईमानदारी थी, सुख-शान्ति थी। प्रजा अपने राजा-रानी को साक्षात् शिव-पार्वती का अवतार मानती थी। पर्व त्यौहार के दिनों में नगर के लोग इनके दर्शन करने आते थे।

पर्व के दिन थे। कुछ धनाढ्य महिलायें सज धजकर राजमहल में गईं। रानी से मिलीं। रानी के वस्त्र तो सादे, घर की ताना-बुनी करके बनाये हुए मोटे-मोटे। अंग पर कोई हीरे-जवाहरात, सुवर्ण-अलंकार आदि कुछ नहीं। कीमती वस्त्र-आभूषणों से, सुवर्ण-अलंकारों से सजीधजी बड़े घराने की महिलाएँ कहने लगीं- "अरे रानी साहिबा ! आप तो हमारी लक्ष्मी जी हैं। हमारे राज्य की महारानी पर्व के दिनों में ऐसे कपड़े पहनें ? हमें बड़ा दुःख होता है। आप इतनी महान विभूति की धर्मपत्नी ! .....और इतने सादे, चिथड़े जैसे कपड़े ! ऐसे कपड़े तो हम नौकरानी को भी पहनने को नहीं देते। आप ऐसा जीवन बिताती हो ? हमें तो आपकी जिन्दगी पर बहुत दुःख होता है।"

आदमी जैसा सुनता है, देर सवेर उसका प्रभाव चित्त पर पड़ता ही है। अगर सावधान न रहे तो कुसंग का रंग लग ही जाता है। हल्के संग का रंग जल्दी लगता है। अतः सावधान रहें। कुसंग सत्पथ से विचलित कर देता है।

दूसरी महिला ने कहाः "देखो जी ! हमारे ये हीरे कैसे चमक रहे हैं ! .... और हम तो आपकी प्रजा हैं। आप हमारी रानी साहिबा हैं। आपके पास तो हमसे भी ज्यादा कीमती वस्त्रालंकार होने चाहिए ?"

तीसरी ने अपनी अंगूठी दिखायी। चौथी ने अपने जेवर दिखाये। चक्ववेण की पत्नी तो एक और उसको बहकाने वाली अनेक। उनके श्वासोच्छावास, उनके विलासी वायब्रेशन से रानी हिल गई। वे स्त्रियाँ तो चली गईं लेकिन चक्ववेण के घर में आग लग गई।

रानी ने बाल खोल दिये और स्त्रीचरित्र में उतर आई। राजा राज-दरबार से लौटे। देखा तो देवी जी का रूद्र स्वरूप ! पूछाः

"क्या बात है देवी ?"

"आप मुझे मूर्ख बना रहे हैं। मैं आपकी रानी कैसी ? आप ऐसे महान् सम्राट और मैं आप जैसे सम्राट की पत्नी ऐसी दरिद्र ? मेरे ये हाल ?"

"तुझे क्या चाहिए ?"

"पहले वचन दो।"

"हाँ, वचन देता हूँ। माँग।"

"सुवर्ण-अलंकार, हीरे जवाहरात, कीमती वस्त्र-आभूषण..... जैसे महारानियों के पास होते हैं, वैसी ही मेरी व्यवस्था होनी चाहिए।"

राजा वस्तुस्थिति से ज्ञात हुए। वे समझ गये किः "वस्त्रालंकार और फैशन की गुलाम महिलाओं ने इसमें अपनी विलासिता का कचरा भर दिया है। अपना अन्तःकरण सजाने के बजाय हाड़-मांस को सजाने वाली अल्पमति माइयों ने इसे प्रभावित कर दिया है। मेरा उपदेश मानेगी नहीं।

इसके लिये हीरे-जवाहरात, गहने-कपड़े कहाँ से लाऊँ ? राज्य का खजाना तो प्रजा का खून है। प्रजा के खून का शोषण करके, स्त्री का गुलाम होकर, उससे उसको गहने पहनाऊँ ? इतना नालायक मुझे होना नहीं है। प्रजा का शोषण करके औरत को आभूषण दूँ ? धन कहाँ से लाऊँ ? नीति क्या कहती है ?

नीति कहती है कि अपने से जो बलवान् हो, धनवान हो और दुष्ट हो तो उसका धन ले लेने से कोई पाप नहीं लगता। धन तो मुझे चाहिए। नीतियुक्त धन होना चाहिए।'

राजा सोचने लगेः "धनवान और दुष्ट लोग तो मेरे राज्य में भी होंगे लेकिन वे मुझसे बलवान नहीं हैं। वे मेरे राज्य के आश्रित हैं। दुर्बल का धन छीनना ठीक नहीं।"
विचार करते-करते अड़ोस-पड़ोस के राजाओं पर नजर गई। वे धनवान तो होंगे, बेईमान भी होंगे लेकिन बलवान भी नहीं थे। आखिर याद आया कि रावण ऐसा है। धनवान भी है, बलवान भी है और दुष्ट भी हो गया है। उसका धन लेना नीतियुक्त है।

अपने से बलवान् और उसका धन ? याचना करके नहीं, माँगकर नहीं, उधार नहीं, दान नहीं, चोरी करके नहीं, युक्ति से और हुक्म से लेना है।

राजा ने एक चतुर वजीर को बुलाया और कहाः "जाकर राजा रावण को कह दो कि दो मन सोना दे दे। दान-धर्म के रूप में नहीं, ऋण के रूप में नहीं। राजा चक्ववेण का हुक्म है कि 'कर' के रूप में दो मन सोना दे दे।"

वजीर गया रावण की सभा में और बोलाः "लंकेश ! राजा चक्ववेण का आदेश है, ध्यान से सुनो।"

रावणः "देव, दानव, मानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व आदि सब पर लंकापति रावण का आदेश चलता है और उस रावण पर राजा चक्ववेण का आदेश ! हूँऽऽऽ...." रावण गरज उठा।

विभीषण आदि ने कहाः "राजन ! कुछ भी हो, वह सन्देशवाहक है, दूत है। उसकी बात सुननी चाहिए।"
रावणः "हाँ, क्या बोलते हो ?" रावण ने स्वीकृति दी।

वजीरः "दान के रूप में नहीं, ऋण के रूप में नहीं, लेकिन राजा चक्ववेण का आदेश है कि 'कर' के रूप में दो मन सोना दो, नहीं तो ठीक नहीं रहेगा। लंका का राज्य खतरे में पड़ जायेगा।" चक्ववेण के वजीर ने अपने स्वामी का आदेश सुना दिया।

रावणः "अरे मच्छर ! इस रावण से बड़े-बड़े चक्रवर्ती डरते हैं और वह जरा सा चक्ववेण राजा ! मुझ पर 'कर' ? हूँऽऽऽ..... अरे ! इसको बाँध दो, कैद में डाल दो।" रावण आगबबूला हो गया।

सबने सलाह दीः "महाराज ! यह तो बेचारा अनुचर है, चिट्ठी का चाकर। इसको कैद करना नीति के विरूद्ध है। आप सोना न दें, कोई हर्ज नहीं किन्तु इसको छोड़ दें। हमने राजा चक्ववेण का नाम सुना है। वह बड़ा शीलसम्पन्न राजा है। बड़ा सज्जन, सदाचारी है। उसके पास योग-सामर्थ्य, सूक्ष्म जगत का सामर्थ्य बहुत है।"

"तो रावण क्या कम है ?"

"लंकेश ! आप भी कम नही है। लेकिन वह राजा शील का पालन करता है।"

"सबकी क्या राय है ?" पूरे मंत्रिमण्डल पर रावण ने नजर डालते हुए पूछा।

"या तो दो मन सोना दे दें......"

"मैं सोना दे दूँ ?" सलाहकारों की बात बीच से ही काटते हुए रावण गरज उठा। "याचक भीख माँगने आये तो दे दूँ लेकिन मेरे ऊपर 'कर' ? मेरे ऊपर आदेश ? यह नहीं होगा।" सिर धुनकर रावण बोला।

"अच्छा, तो दूत को बाहर निकाल दो।"

चक्ववेण के वजीर को बाहर निकाल दिया गया। रावण महल में गया तो वार्त्तालाप करता हुआ मन्दोदरी से बोलाः

"प्रिये ! दुनियाँ में ऐसे मूर्ख भी राज्य करते हैं। देव, दानव, मानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व आदि सबके सब जिससे भय खाते हैं, उस लंकापति रावण को किसी मूर्ख चक्ववेण ने आदेश भेज दिया कि 'कर' के रूप में दो मन सोना दे दो। 'अरे मन्दोदरी ! कैसे कैसे पागल राजा हैं दुनियाँ में !"

"नाथ ! चक्ववेण राजा बड़े सदाचारी आदमी हैं। शीलवान् नरेश हैं। आपने क्या किया ? दो मन सोना नहीं भेजा उनको ?" मन्दोदरी विनीत भाव से बोली।

"क्या 'कर' के रूप में सोना दे दूँ ? लंकेश से ऊँचा वह होगा ?" रावण का क्रोध भभक उठा।

"स्वामी ! दे देते तो अच्छा होता। उनका राज्य भले छोटा है, आपके पास विशाल साम्राज्य है, बाह्य शक्तियाँ हैं, लेकिन उनके पास ईश्वरीय शक्तियाँ हैं, आत्म-विश्रान्ति से प्राप्त अदभुत सामर्थ्य है।"

"अरे मूर्ख स्त्री ! रावण के साथ रहकर भी रावण का सामर्थ्य समझने की अक्ल नहीं आई ? पागल कहीं की !" रावण ने मन्दोदरी की बात उड़ा दी।

कहानी कहती है कि दूसरे दिन सुबह मन्दोदरी ने रावण को छोटा सा चमत्कार दिखाया। रोज सुबह कबूतरों को ज्वार के दाने डालने के लिए राजमहल की छत पर जाती थी। उस दिन रावण को भी साथ ले गई और बोलीः

"महाराज ! देव, दानव, मानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि सब आपकी आज्ञा मानते हैं तो अपने प्रभाव का आज जरा अनुभव कर लो। देखो, इन पक्षियों पर आपका कितना प्रभाव है ?"

पक्षियों को दाने डालकर मन्दोदरी उन्हें कहने लगीः

"हे विहंग ! राजा लंकेश की दुहाई है कि जो दाने खायेगा, उसकी गरदन झुक जायेगी और वह मर जायेगा।" सब पक्षी दाने खाते रहे। उन्हें कुछ नहीं हुआ। मन्दोदरी बोलीः

"प्राणेश ! आपकी दुहाई का प्रभाव पक्षियों पर कुछ नहीं पड़ा।"

"मूर्ख औरत ! पक्षियों को क्या पता कि मैं लंकेश हूँ ?"

"स्वामी ! ऐसा नहीं है। अब देखिए।" फिर से दाने डालकर रानी पक्षियों से बोलीः "राजा चक्ववेण की दुहाई है। दाने चुगने बन्द कर दो। जो दाने चुगेगा, राजा चक्ववेण की दुहाई से उसकी गरदन टेढ़ी हो जाएगी और वह मर जाएगा।"

पक्षियों ने दाना चुगना बन्द कर दिया। पाषाण की मूर्तिवत् वे स्थिर हो गये। एक बहरे कबूतर ने सुना नहीं था। वह दाने चुगता रहा तो उसकी गरदन टेढ़ी हो गई, वह मर गया। रावण देखता ही रह गया ! अपनी स्त्री के द्वारा अपने ही सामर्थ्य की अवहेलना सह न सका। उसको डाँटते हुए वह कहने लगा।

"इसमें तेरा कोई स्त्रीचरित्र होगा। हम ऐसे अन्धविश्वास को नहीं मानते। जिसके घर में स्वयं वरूणदेव पानी भर रहे हैं, पवनदेव पंखा झल रहे हैं, अग्निदेव रसोई पका रहे हैं, ग्रह नक्षत्र चौकी कर रहे हैं उस महाबली त्रिभुवन के विजेता रावण को तू क्या सिखा रही है ?" क्रुद्ध होकर रावण वहाँ से चल दिया।

इधर, राजा चक्ववेण के मंत्री ने समुद्र के किनारे एक नकली लंका की रचना की। काजल के समान अत्यन्त महीन मिट्टी को समुद्र के जल में घोलकर रबड़ी की तरह बना लिया तथा तट की जगह को चौरस बनाकर उस पर उस मिट्टी से एक छोटे आकार में लंका नगरी की रचना की। घुली हुई मिट्टी की बूँदों को टपका-टपकाकर उसी से लंका के परकोटे, बुर्ज और दरवाजों आदि की रचना की। परकोटों के चारों ओर कंगूरे भी काटे एवं उस परकोटे के भीतर लंका की राजधानी और नगर के प्रसिद्ध बड़े-बड़े मकानों को भी छोटे आकार में रचना करके दिखाया। यह सब करने के बाद वह पुनः रावण की सभा में गया। उसे देखकर रावण चौंक उठा और बोलाः

"क्यों जी ! तुम फिर यहाँ किसलिये आये हो ?"
"मैं आपको एक कौतूहल दिखलाना चाहता हूँ।"

"क्या कौतूहल दिखायेगा रे ? अभी-अभी एक कौतूहल मन्दोदरी ने मुझे दिखाया है। सब मूर्खों की कहानियाँ हैं। उपहास करते हुए रावण बोला।

"मैंने समुद्रतट पर आपकी पूरी लंका नगरी सजायी है। आप चलकर तो देखिये !"

रावण उसके साथ समुद्रतट पर गया। वजीर ने अपनी कारीगरी दिखायीः

"देखिये, यह ठीक-ठीक आपकी लंका की नकल है न ?"
रावण ने उसकी अदभुत कारीगरी देखी और कहाः "हाँ ठीक है। यही दिखाने के लिए मुझे यहाँ लाया है क्या ?"
"राजन ! धैर्य रखो। इस छोटी सी लंका से मैं आपको एक कौतूहल दिखाता हूँ। देखिये, लंका के पूर्व का परकोटा, दरवाजा, बुर्ज और कंगूरे साफ-साफ ज्यों-के-त्यों दिख रहे हैं न ?"

"हाँ दिख रहे हैं।"

"मेरी रची हुई लंका के पूर्व द्वार के कंगूरों को मैं राजा चक्ववेण की दुहाई देकर जरा सा हिलाता हूँ, इसके साथ ही आप अपनी लंका के पूर्व द्वार के कंगूरे हिलते हुए पायेंगे।"
इतना कहकर मंत्री ने राजा चक्ववेण की दुहाई देकर अपनी रची हुई लंका के पूर्व द्वार के कंगूरे हिलाये तो उसके साथ-ही-साथ असली लंका के कंगूरे भी डोलायमान होते दिखाई दिये। यह देखकर रावण को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसे मन्दोदरी की बात याद आ गई। चक्ववेण के वजीर ने बारी-बारी से और भी कंगूरे, परकोटे के द्वार, बुर्ज आदि हिलाकर दिखाया। इसे देखकर रावण दंग रह गया। आखिर वजीर ने कहाः

"राजन ! अभी दो मन सोना देकर जान छुड़ा लो तो ठीक है। मैं तो अपने स्वामी राजा चक्ववेण का छोटा सा वजीर हूँ। उनकी दुहाई से इन छोटे रूप में बनी हुई लंका को उजाडूँगा तो तुम्हारी लंका में भी उजाड़ होने लगेगा। विश्वास न आता हो तो अभी दिखा दूँ।"
आखिर रावण भी बड़ा विद्वान था। अगम अगोचर जगत विषयक शास्त्रों परिचित था। समझ गया बात। वजीर से बोलाः "चल, दो मन सोना ले जा। किसी से कहना मत।"

दो मन सोना लेकर वजीर राजा के पास पहुँचा। चक्ववेण ने कहाः "लंकेश जैसे हठी और महा अहंकारी ने 'कर' के रूप में दो मन सोना दे दिया ? तूने याचना तो नहीं की ?"

"नहीं, नहीं प्रभु ! मेरे सम्राट की ओर से याचना ? कदापि नहीं हो सकती।" वजीर गौरव से मस्तक ऊँचा करके बोला।

"फिर कैसे सोना लाया ?" राजा ने पूछा। रानी भी ध्यानपूर्वक सुन रही थी।
"महाराज ! आपकी दुहाई का प्रभाव दिखाया। पहले तो मुझे कैद में भेज रहा था, फिर मंत्रियों ने समझाया तो मुझे दूत समझकर छोड़ दिया। मैंने रातभर में छोटे-छोटे घरौंदे सागर के तट पर बनाये.... किला, झरोखे, प्रवेशद्वार आदि सब। उसकी लंका की प्रतिमूर्ति खड़ी कर दी। फिर उसको ले जाकर सब दिखाया। आपकी दुहाई देकर खिलौने की लंका का मुख्य प्रवेशद्वार जरा-सा हिलाया तो उसकी असली लंका का द्वार डोलायमान हो गया। थोड़े में ही रावण आपकी दुहाई का और आपके सामर्थ्य का प्रभाव समझ गया एवं चुपचाप दो मन सोना दे दिया। दया-धर्म करके नहीं दिया वरन् जब देखा कि यहाँ का डण्डा मजबूत है, तभी दिया।"

रानी सब बात एकाग्र होकर सुन रही थी। उसको आश्चर्य हुआ किः "लंकेश जैसा महाबली ! महा उद्दण्ड ! देवराज इन्द्र सहित सब देवता, यम, कुबेर, वरूण, अग्नि, वायु, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, दानव, मानव, नाग आदि सब जिससे काँपते हैं, ऐसे रावण पर भी मेरे पतिदेव के शील-सदाचार का इतना प्रभाव और मैं ऐसे पति की बात न मानकर विलासी स्त्रियों की बातों में आ गई ? फैशनेबल बनने के चक्कर में पड़ गई ? धिक्कार है मुझे और मेरी क्षुद्र याचना को ! ऐसे दिव्य पति को मैंने तंग किया !"

रानी का हृदय पश्चाताप से भर गया। स्वामी के चरणों में गिर पड़ीः "प्राणनाथ ! मुझे क्षमा कीजिए। मैं राह चूक गई थी। आपके शील-सदाचार के मार्ग की महिमा भूल गई थी इसीलिए नादानी कर बैठी। मुझे माफ कर दीजिए। अपना योग मुझे सिखाइये, अपना ध्यान मुझे सिखाइये, अपना आत्महीरा मुझे भी प्राप्त कराइये। मुझे बाहर के हीरे जवाहरात कुछ नहीं चाहिए। जल जाने वाले इस शरीर को सजाने का मेरा मोह दूर हो गया।"

"तो इतनी सारी खटपट करवायी ?"

"नहीं.... नहीं... मुझे रावण के सोने का गहना पहनकर सुखी नहीं होना है। आपने जो शील का गहना पहना है, आत्म-शांति का, योग की विश्रांति का जो गहना पहना है, वही मुझे दीजिए।"

"अच्छा..... तो वजीर ! जाओ। यह सोना रावण को वापस दे आओ। उसको बता देना कि रानी को गहना पहनने की वासना हो आई थी, इसलिए आदमी भेजा था। अब वासना निवृत्त हो गई है। अतः सोना वापस ले लो।"

वासनावाले को ही परेशानी होती है। जो शील का पालन करता है, उसकी वासनाएँ नियंत्रित होकर निवृत्त होती हैं। जिसकी वासनाएँ निवृत्त हो जाती हैं वह साक्षात् नारायण का अंग हो जाता है। शील का पालन करते हुए राजा चक्ववेण नारायणस्वरूप में स्थिर हुए। उनकी अर्धांगिनी भी उनके पवित्र पदचिह्नों पर चलकर सदगति को प्राप्त हुई।

शीलवान् भोग में भी योग बना लेता है। यही नहीं, नश्वर संसार में शाश्वत् स्वरूप का साक्षात्कार भी कर सकता है।