स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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तीन प्रकार के सिद्ध !

Rajesh Kumawat | 1:45 PM | | | | | | | | | Best Blogger Tips
हमारे सनातन धर्म के ग्रन्थों में तीन प्रकार के सिद्धों की महिमा आती है। एक जो भक्ति से सिद्ध हुए हैं उन पुरूषों एवं महिलाओं की महिमा आती है। दूसरे जो योग से सिद्ध हुए हैं उनकी महिमा आती है। तीसरे जो ज्ञान से सिद्ध हुए हैं अर्थात् भक्ति करते करते भेदभावरहित अभिन्न तत्त्व को पाये हैं, ऐसे सिद्धों की महिमा आती है।
भक्त और भगवान में ही दूरी मिट जाए..... भक्ति का अर्थ यही है। 'भक्त' अर्थात् जो ईश्वर से विभक्त न हो, उसको भक्त कहते हैं। योग का अर्थ है जीव ब्रह्म की एकता। तत्त्वज्ञान से भी कोई आत्मज्ञान पा लेता है। ऐसे तीन प्रकार के सिद्धों की महिमा का वर्णन हमारे धर्मग्रन्थों में आता है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करूण एव च।

निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी।।

'जो पुरूष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है....'   (गीताः 12.13)

यह भक्ति मार्ग के सिद्धों की महिमा है। संतुष्टः सततं योगी.... यह योग मार्ग की महिमा है। न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते.... आदि श्लोक ज्ञानमार्ग की महिमा का बयान करते हैं।

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।

'जो पुरूष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और मेरे लिए वह अदृश्य नहीं होता।' (गीताः 6.30)

जो मुझमें सबमें और सब मुझमें देखता है उससे मैं अलग नहीं और अर्जुन ! वह मुझसे अलग नहीं। ऐसा ब्रह्मज्ञानी तो मेरा ही स्वरूप है। मैं अपनी बात काट लूँगा लेकिन उसकी बात पूरी होने दूँगा, ऐसा वह मुझे प्यारा है।

ब्रह्मज्ञानी का दर्शन बड़भागी पावहि।
ब्रह्मज्ञानी को बल-बल जावहि।।
ब्रह्मज्ञानी मुगत-भुगत का दाता।
ब्रह्मज्ञानी पूरण पुरूष विधाता।।
ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर।
ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर।।
ब्रह्मज्ञानी का कथ्या न जाई आधा अक्खर।
नानक ब्रह्मज्ञानी सबका ठाकुर।।

इन तीन प्रकार के सिद्धों की महिमा गीता में तथा अन्य धर्मग्रन्थों में आती है। वैसे तो और भी कई प्रकार के सिद्ध होते हैं। जैसे चुटकी बजाकर अंगूठी या अन्य कोई वस्तु निकालने वाले। आम का मौसम नहीं है फिर भी आम निकालकर दे देंगे। यहाँ मौसम नहीं है तो क्या हुआ, मद्रास में तो है। एक क्षण में वहाँ से लाकर दिखा देंगे।

वृन्दावन वाले अखंडानंद सरस्वती जी महाराज अपने साथ नौ अन्य साधुओं को लेकर किसी ऐसे ही सिद्ध की सिद्धाई देखने के लिए गये थे जो चुटकी बजाते ही मनचाही वस्तुएँ दे देता था। उस समय रात के दस बजे थे। उन्होंने सोचा कि इससे ऐसी कोई चीज माँगे जिसे देने में इसको जरा विचार करना पड़े।

सिद्ध ने स्वागत कियाः "अच्छा ! संत लोग आये हो। कैसे हो ?"
संतों ने कहाः "ठीक है, महाराज ! आपका नाम सुनकर आये हैं। भूखे हैं, भोजन करा दो।"
सिद्ध ने पूछाः "क्या खाओगे ?"
संतजनः "मालपूए खाने की इच्छा है, महाराज !"
सिद्धः "अच्छा ! रात को दस बजे साधुओं को मालपूए खाना है ? चलो, ठीक है।" उसने संतों को थोड़ा बातों में लगा दिया और अपनी ओर से भीतर जो भी संकल्प करना था, वह कर दिया। उन्होंने आकाश में हाथ घुमाया और दस लोग जितने मालपूए खा सकें, इतने मालपूए आ गये। दसों साधुओं ने मालपूए खाए, स्वाद भी आया, भूख भी मिटी और नींद भी आई। यह कोई स्वप्न या हिप्नोटिज्म नहीं था, उन्होंने सचमुच में मालपूए खाये थे।

अखंडानंदजी के ही शब्दों में- "प्रातः जब हम लोग मालपूए खाली करने, लोटा लेकर गाँव के बाहर की ओर गये तो देखा कि उधर दो मेहतरानी (हरिजन बाई) आपस में झगड़ा कर रही थीं। एक बाई दूसरी से कह रही थीः "तेरी नजर पड़ती है और मेरी चीजें चोरी हो जाती हैं।"
दूसरीः "मैं जानती ही नहीं की तेरे मालपूए कहाँ गये। मैंने तो देखे भी नहीं।"
पहलीः "तू झूठ बोलती है, रांड ! कल शादी थी और बारातियों के जूठन में से तथा इधर उधर से माँगकर बड़ी मेहनत से मैं दस आदमी भरपेट खा सके, इतनी बड़ी थाली भर के मालपूए लाई थी और सारे के सारे मालपूए तसले सहित गायब हो गये। एक भी नहीं बचा। तो क्या भूत ले गये या डाकिन ले गई ? रांड ! तू ही ले गई होगी।"
साधू बाबा सोचते हैं- 'न यह रांड ले गई न कोई डाकिन ले गई। मालपूए तो भूत उठाकर लाया और हमने खाये। मालपूए तो खाली हो गये लेकिन ग्लानि खाली करने में बड़ा परिश्रम लगा। धत्त तेरी की ! यह तो भूत सिद्धि है भाई !'
चुटकी बजाकर यूँ चीज आदि दे देना तो अलग सिद्धियाँ हैं, आत्मसिद्धि नहीं। इससे सामने वाला प्रभावित तो होगा, थोड़ी देर वाह-वाही करेगा लेकिन जिसकी वाह-वाही हुई वह शरीर तो जल जायेगा और जो वाह-वाही करेगा उसका भी कल्याण नहीं होगा। उसे आत्मज्ञान और आत्मशांति भी नहीं मिलेगी। आप देव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, भूत आदि को पूजकर वश में करके भभूत, रिंग या मालपूए मँगाकर दो यह तो ठीक है लेकिन इससे ईश्वर का साक्षात्कार नहीं होगा।
अफ्रीका में नैरोबी से करीब 350 कि.मी. दूर मोंबासा में पुनीत महाराज के भक्तों का पुनीत भक्त मंडल चलता है। वे गुजराती लोग थे और सत्संगी थे। उन्होंने मुझे बतायाः
"स्वामी जी ! दो-चार दिन पहले भारत का एक डुप्लीकेट साईंबाबा, भभूत निकालनेवाला आया था। हमारे सम्मुख भभूत निकालकर वह अपने चमत्कार का प्रभाव दिखा रहा था।"
मैंने पूछाः "फिर क्या हुआ ?"
वे बोलेः "बाबाजी ! हम तो सत्संगी हैं। हमें इन चमत्कारों से, भभूत आदि से कोई प्रभावित नहीं कर सकता।"
मैंने पूछाः "फिर तुमने क्या कहा उसे ?"
वे बोलेः "हमने कहाः बाबा ! आप भभूत निकालते हैं, ठीक है.... लेकिन इससे तो अच्छा यह है कि हिन्दुस्तान के कच्छ में अकाल पड़ा है, वहाँ अपने चमत्कार से जरा गेहूँ निकालकर लोगों की भूख मिटाओ। इस भभूत से क्या होगा ?"
कहने का तात्पर्य यह है कि भक्ति, योग और ज्ञान की सिद्धि के आगे अन्य सभी सिद्धियाँ छोटी हो जाती हैं। भक्ति भगवान से मिलाती है, योग भगवान में बिठाता है और ज्ञान भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार करा देता है।