स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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सच्चा शिष्य कौन ?

Rajesh Kumawat | 8:42 AM | | | | | | | | Best Blogger Tips
ब्रह्मवेत्ता संत के चरणों में बैठकर सत्संग सुनने वाला बड़ा भाग्यशाली होता है, परंतु सत्संग किसलिये सुनना है ? उसे आचरण में लाकर मनुष्य जन्म को सफल बनाने के लिए। आचरण के बिना विद्या लूली लँगड़ी है। ठीक ऐसे ही, जैसे केवट के बिना नाव।
एक संत ने अपने दो शिष्यों को दो डिब्बों में मूँग के दाने दिये और  कहाः "ये मूँग हमारी अमानत हैं। ये सड़े गले नहीं बल्कि बढ़े-चढ़े यह ध्यान रखना। दो वर्ष बाद जब हम वापस आयेंगे तो इन्हें ले लेंगे।"
संत तो तीर्थयात्रा के लिए चले गये। इधर एक शिष्य ने मूँग के डिब्बे को पूजा के स्थान पर रखा और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरे शिष्य ने मूँग के दानों को खेत में बो दिया। इस तरह दो साल में उसके पास बहुत मूँग जमा हो गये।
दो साल बाद संत वापस आये और पहले शिष्य से अमानत वापस माँगी तो वह अपने घर से डिब्बा उठा लाया और संत को थमाते हुए बोलाः"गुरूजी ! आपकी अमानत को मैंने अपने प्राणों की तरह सँभाला है। इसे पालने में झुलाया, आरती उतारी, पूजा-अर्चना की..."
संत बोलेः "अच्छा ! जरा देखूँ त सही कि अन्दर के माल का क्या हाल है ?"
संत ने ढक्कन खोलकर देखा तो मूँग में घुन लगे पड़े थे। आधे मूँग की तो वे चटनी बना गये, बाकी बचे-खुचे भी बेकार हो गये। संत ने शिष्य को मूँग दिखाते हुए कहाः "क्यों बेटा ! इन्ही घुनों की पूजा अर्चना करते रहे इतने समय तक !"
शिष्य बेचारा शर्म से सिर झुकाये चुपचाप खड़ा रहा। इतने में संत ने दूसरे शिष्य को बुलवाकर उससे कहाः "अब तुम भी हमारी अमानत लाओ।"
थोड़ी देर में दूसरा शिष्य मूँग लादकर आया और संत के सामने रखकर हाथ जोड़कर बोलाः "गुरूजी ! यह रही आपकी अमानत।"
संत बहुत प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद देते हुए बोलेः "बेटा ! तुम्हारी परीक्षा के लिए मैंने यह सब किया था। मैं तुम्हें वर्षों से जो सत्संग सुना रहा हूँ, उसको यदि तुम आचरण में नहीं लाओगे, अनुभव में नहीं उतारोगे तो उसका भी हाल इस डिब्बे में पड़े मूँग जैसा हो जायेगा। यदि सुने हुए सत्संग का मनन करोगे, खुद गोता मारोगे और दूसरों को भी यह अमृत बाँटोगे तो उसका फल अनंत गुना मिलेगा।"
मिश्री-मिश्री रटने मात्र से मुँह मीठा नही हो जाता बल्कि उसके लिए धन कमाना पड़ता है, फिर दुकान से मिश्री खरीदकर उसे खाने से उसके स्वाद का अनुभव होता है। भले ही आपके सामने एक से बढ़कर एक व्यंजन रखे हों परंतु उन्हें खाये बिना आपकी भूख नहीं मिटेगी। ऐसे ही सत्संग से जो पवित्र ज्ञान सुना है उसे अपनाने से अपना जीवन बदलता है और इच्छित वस्तु की अर्थात् जिसके लिए सत्संग सुना उस परमात्मा की प्राप्ति होती है। सत्संग को जीवन में उतारने वाला पुरूषार्थी व्यक्ति ही सच्चा सत्संगी एवं संत-प्रेमी है।