स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

सुख दुख में सम रहने की कुंजी - पूज्य बापूजी


चेतन स्वभाव तो है, कीड़ी में भी चेतन है। तो जो सत है उसका अस्तित्व सदा है। जो चेतन है उसमें ज्ञान है। तो कीड़ी में भी ज्ञान है कि ये शक्कर है और ये नमक का कंकड़ है। कीड़ी में भी ज्ञान है कि ये धुआं है यहां से भाग चल। और ये ठंडी हवाएं आ रही है ये तो बरसात आएगी कहीं पड़ रही है हमारे बिल में बच्चे पड़े कहीं डूब न जाएं तो कीड़ी बच्चों को लेकर सुरक्षित जगह पे जाती है। कौन उसको नोटिस देता है? कौन टेलीफोन करता है? तो कीड़ी के अंदर भी वो सच्चिदानंद छोटे से छोटा अगर ब्रह्मांड में कोई चीज है तो भगवान है। ईश्वर से बढ़कर कोई छोटा नहीं। अणुरो अणियान। अणु से भी अणु। और बड़े से बड़ा भी ईश्वर है। महतो महीयान। बड़े से बड़ा भी वो परमात्मा है। छोटे से छोटा इतना है कि बैक्टीरिया के अंदर भी उसकी सत्यता, चेतनता और आनंदता दिखती है। बैक्टीरिया को भी अनुकूल वातावरण में मजा आता है। हैं? बैक्टीरिया में भी चेतना है। और बैक्टीरिया का भी शरीर जो भी है छोटा-मोटा वो... खूब बैक्टीरिया हो गए गन्ने का रस में अथवा ताड़ में। बैक्टीरिया हो गए फिर खराब हो गया तो बैक्टीरिया मर गए दारू बन गया। दारू दीने पिया तो कुछ बन गया। वो कुछ भी कुछ न कुछ अस्तित्व उसका मौजूद रहेगा। बैक्टीरिया की आकृति नाश होती है। जैसे कंगन है, कुंडल है, अंगूठी है, चैन है, पट्टा है। तो ये पट्टा, चैन सब में सुवर्ण है। ये है पना सुवर्ण का है बाकी नाम सुवर्ण के आधार पर रखे गए हैं। तो जब एक सुनार देखता है तो सोने को देखता है। एक को हुआ कि चलो भगवान की दया हुई तेल में कमाई हुई है चलो ठाकुर जी की मूर्ति सोने की बना लें। और तेल में आ गई तेजी। महाराज उसने लाखों रुपये और कमा लिए। तो बोले राम जी की मूर्ति तो लाये हैं लेकिन सेवक के बिना स्वामी की मूर्ति तो चलो सरकार का सेवक भी ले आएं तो हनुमान जी को भी ले आए। अब कुछ तेजी मंदी में घाटा पड़ गया। तो वो राम जी को भी उठाया और हनुमान जी को भी उठाया रखा थैली में और माणेक चौक बेचने गया। तो बोला कि भाई हनुमान जी के तो आपको हम आठ हजार दे सकते हैं। और राम जी के दो हजार मिलेंगे। बोले पागल हुए हो? राम जी भगवान है स्वामी है। और हनुमान जी सेवक है। बोले हनुमान आप ले जाओ और राम जी भी आप ले जाओ। इतने वजन का सोना उनमें से दे दो। इतने वजन का हनुमान जी का सोना हमको दे दो बाकी हनुमान जी तुम ले जाना। तो हम तो सोने की ही कीमत आंकते हैं हनुमान जी की आकृति भक्तराज तुम ले लो। तो सुनार की नजर सोने पर है। ऐसे ही हिन्दू संस्कृति के वेद शास्त्रों की और धर्म की नजर है उस परब्रह्म परमात्मा पर। तो सभी को परब्रह्म परमात्मा का सत्ता का, चेतनता का, आनंदता का ज्ञान हो इसीलिए सारे कर्म कांड विधि विधान हैं। बच्चे के पुंस संस्कार से लेकर गर्भ में बच्चा है तब से लेकर मृत्यु के सोलहवें संस्कार तक हमारी व्यवस्था ये है कि आपके अंदर छुपे हुए परमात्मा के सत्य को, चेतनता को, आनंदता को पाकर आप निर्दुख हो जाएं। रसमय हो जाएं, सुखमय हो जाएं। आनंदमय हो जाएं। जैसे अभी कीर्तन के पहले हम लोगों ने थोड़ा नृत्य जैसा किया। तो क्या है कि हमारे पैरों में और हमारे हाथों में सारे शरीर की नाड़ियों का स्विच बोर्ड है। तो थोड़ा बहुत नृत्य करने से इड़ा और पिंगला नाड़ी, इसमें श्वास की रिदम तेज से चलती तो बीच में सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है। जिससे आपके ध्यान भजन में बरकत पड़े। और दस अरब न्यूरॉन्स हैं हमारे सिर में। दोनों मस्तकों में मिलाकर। उन न्यूरॉन्स को पुष्ट करने वाली सुषुम्ना नाड़ी जितना सजग रहेगी उतने वे न्यूरॉन्स सजग होंगे। एक-एक न्यूरॉन्स एक-एक ग्रह नक्षत्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है रिमोट कंट्रोल की नाईं उनसे काम करवा सकता है। इतनी उनमें ताकत है। इतने छोटे हैं तो भी। जैसे सेलुलर इतना सा है और दुनिया के हर घर और ऑफिस में उसकी रिंग चमत्कार दिखा देती है। तो इस सेलुलर की खोज भी तो तुम्हारे न्यूरॉन्सों ने की ने? दिमाग ने की ने? तो सेलुलर बड़ा के सेलुलर को पैदा करने वाला बड़ा? बोले सेलुलर को पैदा करने वाला बड़ा। तो सेलुलर को पैदा करने वाला मनुष्य का मस्तक बड़ा के मनुष्य के मस्तक के पीछे जो चेतना सत चित आनंद की काम कर रही है वो बड़ी? बोले वो बड़ी। तो बस उस तक पहुंचने की व्यवस्था का नाम है भारतीय संस्कृति। समग्र ज्ञान भरा हुआ है। सच्चिदानंद रूपाय... सच्चिदानंद रूपाय... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... तापत्रय विनाशाय... तापत्रय विनाशाय... श्री कृष्णाय वयं नुमः... श्री कृष्णाय वयं नुमः... ये भागवत के पहले स्कन्ध में मंगलाचरण के वक्त आता है। ये ग्रंथ तो भगवान कृष्ण की लीलाओं का है। फिर भी मंगलाचरण में क्या? कि हम किसका पूजन करते हैं? सच्चिदानंद रूपाय जो सत है, चेतन है और आनंद रूप है। श्री कृष्ण रूपाय नहीं, सच्चिदानंद रूपाय। वो सच्चिदानंद कैसे हैं? जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं। तो उनको हम क्यों प्रणाम करते हैं कि तापत्रय विनाशाय। आदिदैविक, आदिभौतिक और आध्यात्मिक ये तीनों प्रकार के तापों में संसार तप रहा है, उन तापों से हम मुक्ति चाहने के लिए परमात्मा को प्रणाम करते हैं। तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः। तो कौन से कृष्ण हैं कि जो सत चित आनंद है। कृष्ण का वास्तविक... श्री कृष्ण नंद यशोदा के घर आए, वसुदेव देवकी के घर आए उसके पहले उसके बाद में हम लोग कृष्ण कृष्ण करते ऐसी बात नहीं। श्री कृष्ण प्रकटे उसके पहले वेदों में कृष्ण शब्द की महिमा है। जो सबको कर्षित करते, आकर्षित कर दे, आनंदित कर दे उसे कृष्ण कहते हैं। तो वही सच्चिदानंद सबको आकर्षित करते हैं, सबको आनंदित करते हैं और सबके कर्मों के नियामक हैं। और प्ररेणादाता हैं और फलदाता हैं। आप छुपकर भी कुछ निर्दोष पक्षियों को पकड़ के कमरे में ले जाओ। अथवा कीड़े मकोड़ों को। और कोई नहीं देखता और कीड़े मकोड़े आप पर कोई केस भी नहीं कर सकते। और आप उनको अपने हाथ से कुचलो। तो देखो आपके हृदय में नालत्य कौन बरसाता है? अशांति और खिन्नता कौन देता है? और कोई नहीं देखे और उनको आपने कुछ खाने की मधुर वस्तु दी। तो हृदय में शांति, प्रसन्नता और अच्छाई का फल कौन देता है? वही सच्चिदानंद देता है। तो हिन्दू की पूजा में मूर्ति पूजकों को जो बेवकूफ मानते हैं अथवा अनेक देवताओं को मानने वाले हिन्दू लोग ऐसे हैं वैसे हैं उन बेचारों को पता ही नहीं कि तुम्हारा तो क्या तुम्हारे पुरखों का भी जन्म नहीं हुआ था, उनके पहले तुम्हारे कल्चर का जन्म नहीं हुआ था, उनके पहले ही हिन्दुओं ने जड़ में से भी भगवान को प्रगट किया और चेतन गुरु में से और माता पिता में से भी ईश्वर के आशीर्वाद को और बातचीत को प्रगट किया। यहां तक कि ऋषभ से भी ईश्वर की प्रागट्य का वर्णन आता है उपनिषदों में। शिष्य ने प्रार्थना की कि गुरुदेव मुझे भगवान का दर्शन करना है। जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का कारण है। मुझे ब्रह्म ज्ञान चाहिए। बेटे ये जो गायें हैं पांच पच्चीस ले जाओ जंगल में। और गायों को चराते चराते बैल भी है उनके साथ सांड भी है जब एक हजार गायें हो जाएं ने तब आना। तो तुमको परमात्म प्राप्ति हो जाएगी। अब वो तो बेचारा गिने न गिने लेकिन गुरु का वचन, जब एक हजार गायों से भी एकाध ज्यादा हो गई तो ऋषभ, एक बछड़ा बोला कि अब हमें ले चलो हमारी संख्या हो गई है। कहा आप कौन बोल रहे हो? कि जिसको तुम खोजते हो वो ही मैं बोल रहा हूं। उपदेश दीजिए। तो ब्रह्म के प्रथम पाद का उपदेश उस ऋषभ के द्वारा सच्चिदानंद प्रभु ने दिया बैल के द्वारा। फिर आधे रास्ते में आए रात्रि विश्रांति करते-करते फिर दूसरे दूसरे पाद का उपदेश दिया। ऐसे करते करते कई दिनों में आश्रम पहुंचना था दूर जंगल से। तो फिर तीसरे पाद का उपदेश दिया। तो उसको शांति, आनंद और निर्भिकता और चेहरे पर दिव्यता आई। क्योंकि ब्रह्मचर्य का पालन करता था। गायों को चराता था। झूठ कपट का तो सवाल नहीं है। गाय का दूध पीता था। गायों के बीच रहता था। आसुरी शक्ति, आसुरी वातावरण तो गायों के बीच हो नहीं सकता। मरे हुए भूत प्रेतों का प्रभाव भी गौशाला के इर्द गिर्द नहीं हो सकता है। अपने आश्रमों में गौशाला की गायें घुमाने का मैंने कह दिया घूमती है ने? वाटिका में भी घूमती यहां भी हालांकि यहां तो कोई भूत प्रेत नहीं है फिर भी गायों के शरीर से जो ओरा निकलती है वो सूर्य के गो तत्व का प्रभाव वातावरण में बिखरता है। टीबी के परमाणु नहीं रह सकते। अशुद्ध वातावरण को शुद्ध करने के लिए गाय का घूमना और गाय का होना बहुत अच्छा है। और शुद्ध है तो और शुद्ध होता है। तुझमें राम मुझमें राम सबमें राम समाया है, कर लो सभी से स्नेह जगत में कोई नहीं पराया है। सब अपनी अपनी... बोले बेटा ऐसा है, पत्नी ऐसी है, पड़ोसी ऐसा है, ये ऐसा है... भाई स्वस्या प्रकृति प्रेरीतापी... स्वस्या अपनी अपनी प्रकृति से सब चलते रहते हैं। अपने अपने ज्ञान साक्षात्कार होने के बाद भी, सच्चिदानंद का दर्शन करने के बाद भी ज्ञानियों की भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा होती है। शुकदेव जी महान त्यागी हैं तो जनक भलाराज काज में अलमस्त हो रहे हैं, चंवर डुलवा रहे हैं, सोने के बर्तनों में भोजन कर रहे हैं। तो जो साक्षात्कार सच्चिदानंद का शुकदेव जी को हुआ है इतने मस्त कि फिर जगत की सुधि नहीं। और दूसरे राजा जनक इतना कि जगत का राजकाज कर रहे हैं। शुक त्यागी कृष्ण भोगी... कृष्ण तो द्वारका का उपभोग कर रहे हैं। जनक राघव नरेन्द्र... राजा जनक और रघुराजा राजकाज करते हैं। वसिष्ठ कर्मनिष्ठश्च... वसिष्ठ महाराज हैं तो हे राम जी अब सत्संग कल करेंगे संध्या का समय हुआ है। बड़े कर्म में चुस्त रहते हैं। सर्वेषाम ज्ञानिनाम समान मुक्तम... आत्म साक्षात्कार हो जाए फिर भी ज्ञानी भी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार जीते हैं तो जरूरी नहीं कि बेटा आपकी प्रकृति के अनुसार जिये। पत्नी आपके अनुसार ही चले। पति आपके अनुसार ही चले। चलते हैं तो अच्छा है, न चले तो आप अंदर में उद्विग्न मत हो। परेशान मत हो। और नहीं चलते हैं तो आसक्ति हो जाएगी, नहीं चलेंगे तो अच्छा है अनासक्ति आ जाएगी। इसीलिए आप तो इस संसार को अनादि काल से चला आ रहा है सब जीवों की अपनी-अपनी प्रकृति है। स्वस्या प्रकृति प्रेरीता... ज्ञानवानम अपि... निग्रह किम करिश्यते... अब मेरे गुरुदेव थे तो एक लंबा चोगा पहनते थे। और शरीर... सिर के बाल मुंडन रखते थे। दाढ़ी साफ रखते थे। और यहां कपड़ा पहनते थे। लेकिन मेरी प्रकृति ऐसी नहीं है। मैं तो दाढ़ी रखता हूं। मेरे गुरुजी को नहीं थी। मेरे बाल हैं और मेरा वेश ऐसा है। तो विवेकानंद का वेशभूषा और व्यवहार अलग है रामकृष्ण का अलग है। तत्व ज्ञान में जो गुरुजी को प्रसाद मिला है वो ही शिष्य को मिला। लेकिन व्यवहार में तो रमण महर्षि अलग ढंग से जीते हैं। रामकृष्ण अलग ढंग से, बुद्ध और महावीर अलग ढंग से जीते हैं। तो ये संसार है। खून पसीना बहता जा, तान के चादर सोता जा, ये नाव तो हिलती जाएगी तू हंसता जा या रोता जा। तो ऐसी बातों को कभी याद न करो जिससे दुख और वैमनस्य पैदा हो। अरे ऐसा है मेरा ये हो गया, ये वो हो गया। इसी का नाम तो दुनिया है। कभी अनुकूल होगा कभी प्रतिकूल... अरे मेरी कम आमदनी हो गई... अरे आमदनी हो गई... अरे इसमें क्या हो गया ये सब सपना जैसा संसार है। इनका चिंतन न करो। इनकी गहराई में जो सच्चिदानंद बैठा है उसका चिंतन करो। ये गहना ऐसा है ये गहना ऐसा है... गहने तो ठीक लेकिन इसके भीतर जो सोना है उस पर नजर रखो। ये बड़ा तरंग है ये छोटा तरंग है, ये ऐसा है, ये झाग है, ये बुलबुला है... लेकिन सब पानी का ही खेल है। ऐसे ही सब मेरे सच्चिदानंद का खेल है। तो मन जल्दी ब्रह्म परमात्मा में आएगा। यत्र यत्र मनो जाति तत्र तत्र समाधयः। जहां-जहां मन जाए वहां-वहां सच्चिदानंद का ज्ञान रख दो, समाधान। समाधि हो जाएगी। क्या करें हम भजन करते हैं ने... एक गाय हम बांधती हैं तो गाय की गहराई में चेतनता किसकी है? इसी की है जो माला घुमा रहा है। वाह प्रभु! जरा माला करने बैठे हो और दरवाजा खटखटाता है ये कैसे लोग हैं? मैं तो भजन करती हूं और ये टीवी जोर से चला रहा है। तो टीवी चलाकर राजसी सुख ले रहे हैं लेकिन तुझे ही खोज रहे हैं। और मैं माला घुमाकर सात्विक सुख लेना चाहता हूं, तुझे ही खोज रहा हूं। तो टीवी का विक्षेप भी भक्ति में बदल सकता है। वो टीवी चलाकर भी तुझे खोज रहे हैं आनंद को। और मैं माला घुमाकर भी तुझे खोज रहा हूं। वो खोजते-खोजते नीचे जा रहा है और मैं खोजते-खोजते तेरे तरफ आ रहा हूं प्रभु, तेरी कृपा है। हमारे यहां तो बेवकूफ नाम भी भगवान का रखा गया है। जय राम जी की। महात्मा जब बोलते हैं... अरे बेवकूफ! तो भक्त बुरा नहीं मानते। विष्णु शास्त्र नाम में आया अज्ञ... भगवान सुज्ञ भी हैं, अज्ञ भी हैं। सब जानने वाले भी हैं और न जानने वाले भी भगवान ही हैं। बेवकूफ में भी वही सच्चिदानंद है। कितनी ऊंची बात बता दी। सूअर, वराह अवतार में भी भगवान है। हयग्रीव घोड़े के अवतार में भी भगवान है। और मंदिर में जाते हैं ने तो कछुआ मिलता है पहले उसको प्रणाम करो। शिवजी के मंदिर में जाओ तो बैल मिलता है। तो पशुपति पशुओं में भी वो सच्चिदानंद है। जीव जंतुओं में मत्स्य अवतार, वराह अवतार, हयग्रीव अवतार, नरसिंह अवतार... तो ऐसे घर में हैं कि हे नंद गोपाल का बाल गोपाल का अवतरण हुआ है। तो ठीक बात है। माता जी आई मातृ देवो भव, गुरु देवो भव। नामदेव ने तो कुत्ते में भी सच्चिदानंद का दर्शन कर लिया। और भूत में भी सच्चिदानंद का दृढ़ भाव किया तो वहां से भगवान के दर्शन हो गए। एक संध्या को नामदेव जी जा रहे थे कोई बड़ी इमली का पेड़ था उसमें भूतड़ा रहता था। भूत ने देखा कि ये छोरा आ रहा है इसको जरा डराएं। तो जो डरता है उसमें फिर भूत घुसना आसान हो जाता है भूत को। और फिर अपनी वासना के अनुसार भोग भोगता है भूत। तो एक बड़ा लंबा चौड़ा... लेकिन नामदेव के... भले पधारो लंबक नाथ, लंबे लंबे नाथ भले पधारे। धरती पे चरण आकाश लो माथ। योजन भर के लंबे हाथ, भले पधारो लंबक नाथ। सुर सनकादि गुण तुम्हारे गाए। नामदेव को करो सनाथ, भले पधारो लंबक नाथ। अब वो सच्चिदानंद ने कहा कि ये तो भूतड़े में भी मुझे देखता है। तो भूतड़ा गायब हो गया और सच्चिदानंद भगवान नारायण प्रगट हो गए। साधो साधो! पैदल का जमाना था एक तीर्थ यात्रा करने का, तब की बात है। नामदेव, ज्ञानदेव, गोरा कुम्हार आदि ये यात्रा करके जब शाम होती तो अलग अलग अपना छोटा मोटा जो टेंट तंबू जैसा था उस समय का लगा देते। और भोजन बनाते कई यात्री अपनी-अपनी जगह पर। तो सूर्यास्त के पहले भोजन बन जाए, भगवान को भोग लगाके आरती के समय खाना है। तो वहां कोई गांव के नजीक डेरा डाला तो कोई काला कुत्ता आया। तो किसी साधु ने कहा ए काला कुत्ता आ गया अपशुकन है। किसी ने बोला अपशुकन है... भगा दिया। अभी भोग नहीं लगाया बाद में आना। आगे बढ़ा पूंछ हिलाने। लेकिन नामदेव ने जो बाजरी की रोटी बनाकर खड़ी कर रखी थी लोटे के सहारे। और अंदर गया कटोरी लेने घी की। तो इतने में कुत्ते ने वो रोटी उठाई। और कुत्ता तो चल पड़ा। नामदेव ने देखा रोटी... ओहो... ये श्याम मेरा श्याम इस रूप में आया? ओ रुक जा! ओ घी, घी के बिना खाएगा तो पेट में दुखेगा। रोटी मेरी कौन... ओहो रोटी मुझी केरव्यो चोराय। केरव्यो चोराय बिना भोग लगाए, बिना भोग लगाए... बणले रोटी खाओ मुरारी, घी मखे दिऐ गिरधारी। एडो कीने सताय, घणी खोले बुधाय। तू कैसे आ गया, चुपके से क्यों ले जा रहा है? जरा ठहर मैं तो घी लगाके तुझे भोग लगाने वाला था। अब तेरे को भोग लगाना था मूर्ति में, तो उससे तुझे अच्छा नहीं लगा तो इस रूप में आया है? ठहर तो सही जरा ठहर। नामदेव भागे तो कुत्ता और भागे। आखिर नामदेव थक गए बोले ऐसा क्यों सताता है? और कुत्ते के अंदर सच्चिदानंद ने प्रेरणा किया, रोटी धर दी नीचे... चतुर्भुजी नारायण का नन्हा रूप... विट्ठल भगवान की जय! तो है तो सच्चिदानंद सब जगह लेकिन भक्त जहां दृढ़ भावना करता है वहां से प्रगट कर लेता है। लकड़ी में तो आग व्याप्त है लेकिन जहां घर्षण करा यहां उसको संयोग मिला तो आग प्रगट हो गई। तो ऐसी संस्कृति वालों को भाई ये जरा से गोल पत्थर को पूज रहे हैं। ये तो हनुमान को पूज रहे हैं, बंदर वाले चेहरे को, ये तो हाथी वाले सिर को पूज रहे हैं। बेवकूफ है, बुतप्रस्ती वाले हैं, फलाने हैं... ऐसा बोलकर अपने चित्त को खराब मत करिए। ये तो इधर जा रहा है उधर जा... अरे सब उसी को खोज रहे हैं। सभी आनंद चाहते हैं, सत्ता तो है सब की, चेतनता भी सब में है लेकिन वो तीसरा गुण जो आनंद है उसी के लिए सारे खोज रहे हैं। और जब आनंद मिलता है तो अच्छा लगता है। लेकिन आनंद मिलता है तो बाहर की चीजों से मिलता है और फिर बदल जाता है। तो टिकता नहीं और सदा आनंद चाहते हैं। तो ये करके आनंद मिला, जितनी देर मजा आया रहा। फिर दूसरी जगह जाएंगे, तीसरी जगह। तो दिन भर रात भर जीवन भर, जब सोते-सोते ठीक लगता है। जब करवट दुखती है तो मजा नहीं आ रहा है तो करवट बदलते हैं तब भी आनंद के लिए। झगड़ा करते हैं तो भी आनंद के लिए कि क्या सिर खपाता है एकदम हो जाए दो हाथ। और मत्था झुकाते हैं तो भी सुख के लिए। डाइवोर्स देते हैं तो भी सुख के लिए कि पत्नी कहना नहीं मानती पति ऐसे हैं चलो मैं दूसरा करूंगी। वो भी सुख के लिए। लेकिन ये खोज गलत है। पत्नी बदलने से पति बदलने से सुख टिकाऊ सुख नहीं मिलता है। अपनी समझ बदलने से टिकाऊ सुख को खोज कर वहां गोता मारने से टिकाऊ सुख की प्राप्ति हो जाती है। मन तू ज्योति स्वरूप, अपना मूल पिछाण। तू ज्ञान स्वरूप है, तू जानता है सुख आता है उसको भी जानता है, दुख आता है उसको भी जानता है। और बुरा आया उसको भी जानता है, भला आया उसको भी जानता है। तो तू चेतन स्वरूप है। जो चेतन है वही आनंद है। पत्थर की मूर्ति को कोई स्वाद आएगा क्या? रोबोट को कोई स्वाद आएगा क्या बापू के दर्शन का? रोबोट के मुंह में रसगुल्ला डाल दो क्या उसको स्वाद आएगा क्या? क्योंकि वहां चेतना नहीं है। तो जो सत है, चित्त है, आनंद है। हालांकि रोबोट में भी चेतना है लेकिन वो घन सुषुप्ति रूप में है। और मनुष्य में तो... स्वप्न अवस्था में चेतना है। मनुष्य तो चेतना के एकदम करीब है। जब पत्थर में भी घन सुषुप्ति परमात्मा की है, तो पत्थर की मूर्ति में अगर कोई भगवत बुद्धि करता है तो उसकी भगवत भावना यहां स्वप्न अवस्था में जो चेतना है वहां, तो पत्थर की मूर्ति देर सवेर ओरा पाकर वो बातचीत कर सकती है, चल सकती है, दूध पी सकती है। मेरी मां... कोई किसी का कोई बेटा खो गया हो, कोई गहने खो गए हो, कोई मुसीबत आ गई हो तो मेरी मां के पास आते। वो क्या करती कि राख लेके थोड़ा धरती पर लीप देती। एक गोल कुंडाला बनाती उंगली से। फिर जिससे भोजन बनाते ने, जैसे अपना चम्मच... वो पकड़ती। और फिर बोलती कि इसका घर में जो पैसे हैं चोरी हो गए। घर वाले ने लिए हैं? घर वाले ने लिए हैं? नहीं हिला। बोले भाई घर वालों ने नहीं लिए। कोई बाहर का ले गया है? कोई पड़ोसी ले गया है? बोले पड़ोसी ले गया है। सच बोलेगा तो सच बताएगा तो सावन पहरेगा। कूड़ गालायेगा तो किन्नी कौड़ी थी मारनी। वाधुवा दायेगी। सामान मिलेगा? नहीं मिलेगा? मिले तो बदी बधाई देना। बदी बधाई। नहीं मिलेगा, मिलेगा... वो मिलता था। तो अब वो उसमें राख में और चमचे में नहीं है। लेकिन कुछ लेना नहीं है और भगवान की भक्ति तो वही सच्चिदानंद वहां हिल डुल कराके सच्ची खबर दे देता है। पहले तो समझते थे कि हमारी अम्मा जी के पास है या कोई कुछ आता होगा लेकिन जब सत्संग मिला तब पता चला कि वही सच्चिदानंद देव थे। जैसे भुआ भोपा ढूंढते हैं ने तो जब धूर्तता से ढूंढते हैं तो गप्प ठोकते हैं। लेकिन सचमुच ढूंढते-ढूंढते जब अपने भाव को भूल जाते हैं और स्वार्थ नहीं होता तो जो बोलते हैं तो सच्चिदानंद के करीब होते तो सच पड़ जाता है। तो है तो सच्चिदानंद। लेकिन जब धूर्तता का आधार लेते हैं जैसे हमने मजाक किया ने? हला वा धु भला वा धु ये वो... तो पंख का अपना प्रभाव है। लेकिन पंख घुमाकर टोना टोटका करके किसी को इम्प्रेस करके कुछ छीनना ये फिर नुकसान भी उतना ही करता है। है तो सच्चिदानंद और आप सच्चाई से उन चीजों का उपयोग करो तो सफलता भी होती है। जैसे थी तो राख और चम्मच। और मेरी मां को कुछ लेना नहीं होता था तो उसका सच्चा पड़ता था छक्का। और उसी जगह पर पुजवाना और लेने का भावना करती तो सच्चाई नहीं आती। वो सच्चिदानंद तो जानते ने कि ठगने से कर रही है कि सच्चाई से कर रही है। जब सच्चाई से कर रहे तो सच्चिदानंद मदद करते हैं। और ठगने को करते हैं तो फिर ऊंधा करवा देते हैं, नालत करवा देते हैं। अभी मां की समाधि पर लिखा है कि रुपया पैसा चीज वस्तु आश्रम में बोर्ड लगा है ने अभी इसी अहमदाबाद आश्रम में बोर्ड लगा होगा पढ़ा होगा आपने। कि चीज वस्तु रुपया पैसा रखना मना है। सख्त लिखा है कि नहीं? मना है लिखा है, दो बोर्ड लगे हैं। और जब स्वार्थ हो जाए कि हां ये आए और अपने को कुछ मिले तो फिर वो सच्चिदानंद का आनंद और सत्संग का वो प्रभाव नहीं रह सकता जो अभी है। तो सत्संग में अगर कुछ प्रभाव है या अच्छाई है या आपकी भलाई होती है तो इसमें मेरा कुछ नहीं है। उसी सच्चिदानंद रूपाय... सच्चिदानंद रूपाय... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... जो सच्चिदानंद स्वरूप है, विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का जो है वही परमात्मा की सारी लीला है। तो जो कुछ अच्छा होता है, भला होता है इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है। उस परमात्मा की विशेषता है। और कहीं गड़बड़ होती है तो उसमें मेरी ही गड़बड़ी है। जब मेरी वासना, मेरा अहंकार और मेरा कपट आगे आ जाता है तो आपसे अन्याय तो होगा तब होगा, मैं अपने से ही अन्याय शुरू कर दूंगा। हो जाएगा। क्योंकि उस सच्चिदानंद से दूरी चली जाएगी मन बुद्धि। और जब मैं सच्चाई से चलता हूं तो आपका भला होगा तब होगा मेरा पहले भला हो जाता है हृदय पवित्र होने लगता है। तो गांधी जी क्यों सफल हुए? कि सच्चाई का आश्रय थे सच्चिदानंद के करीब थे। और दूसरे लोग गांधी जी से भी ज्यादा उस समय के प्रसिद्ध लोग, कौन सी खाई में खप गए? क्योंकि बुद्धिमान तो वकील रहे होंगे उस समय भी। लेकिन उन बेचारों को सच्चिदानंद की इतनी महत्ता नहीं जानते होंगे। तो आप जितना भी सच्चिदानंद को, ईश्वर को हाजरा हजूर मानते हैं या उसको पाने के लिए जितनी सच्चाई से व्यवहार करते हैं उतना ही आपका मंगल होता है। उतना ही आप ईश्वर के निकट होते हैं। करनी आपो आपनी के नेड़े के दूर। अपनी करनी से हम उस सच्चिदानंद के निकट हो जाते हैं और अपनी गंदी इच्छाएं वासनाएं इसको इतने मिलियन हो गया तो मैं भी कमाऊं, ये ये खाया तो मैं भी करूं... तो ऐसे निगुरे लोगों की नकल करेगा तो पतन होना पक्का है। और महापुरुषों की, बुद्ध पुरुषों की, भक्तों की और ज्ञानियों की नकल करेगा तो बेड़ा पार होना पक्का है। ॐ... ध्रुव ने गुरु मंत्र लिया तो कैसे लग गए? शबरी भीलन ने मतंग ऋषि का गुरु मंत्र लिया और कैसी लग गई? तो उसका अनुकरण करोगे तो आप ऊंचे उठोगे। लेकिन दूसरे लोगों का अनुकरण करोगे तो वैसे गिरोगे। इसीलिए जब सत्संग में आते हैं, साधना के तो लगता है कि हां ये सच्चा है। लेकिन जब निगुरे लोगों के बीच लगते हैं तो पुराने संस्कार में फिर फिसलने में भी देर नहीं होती। इसीलिए सावधान रहना चाहिए। दृढ़ निश्चय, इतनी माला करनी है, इतने प्राणायाम रोज करने हैं, इतना जप करना है। बहुत मदद करता है। दुष्ट संग का त्याग। दुष्ट संकल्प आए तो हे प्रभु! नाथ! ॐ! हरि! भगवान के नामों का उच्चारण। जैसे किसी को जंगल में डाकुओं ने घेरा हो तो पुकारता है तो भगवान का नाम लेना ये कोई कर्म नहीं है। ये पुकार है। जब पुरानी गंदी आदत अथवा विकारों में हम घिर जाएं तो हल्के विचार आएं तो भगवान के नाम का उच्चारण करो। तो ही पुकार परमेश्वर सुनते हैं और मदद रूप होते हैं। भगवान के भजन का नियम पक्का करो। जैसे टाइम नहीं मिलता फिर भी रोटी खा लेते हैं, पानी पी लेते हैं, स्नान कर लेते हैं। ऐसे ही भगवान के जप का, ध्यान का आग्रह रखना चाहिए। अपने स्वभाव में नम्रता, मधुरता, सज्जनता और उदारता रखने वाला व्यक्ति अगर प्रसन्नता मिला देता है तो उसके लिए असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। सो तो है। जो नेगेटिव विचारता है। और जो दूसरे पर दोषारोपण करता है, जिसके स्वभाव में सज्जनता नहीं है, उदारता नहीं है, प्रसन्नता नहीं है वो व्यवहार में सफल भी नहीं होता। जो सेवा में रुचि रखता है उसी का विकास होता है। चाहे भौतिक विकास चाहो चाहे आध्यात्मिक विकास चाहो। बिना सत्कर्म के, बिना परोपकार के विकास संभव नहीं है। पृथ्वी हजार हजार हाथों से लेती है लेकिन लाख लाख हाथों से देती है। मेघ सागर से लेता है और मधुर बनाकर देता है। ऐसे ही आप समाज से जो कुछ लेते हैं उसको मधुमय बनाकर समाज रूपी ईश्वर की सेवा में दें तो आपका विकास होता जाएगा। जब संग्रह संग्रह और अपने लिए अपने लिए सोचकर व्यवहार करते हैं वे छोटे दायरे में ही खप के मर जाते हैं। कि हमारा क्या मतलब? हमारा उससे क्या लेना? नहीं। ये सारा संसार एक अंग है अपना। जैसे अंगूठा बिगड़ जाए तभी भी अपना है और उंगली बिगड़े तो भी अपना है। नाक बिगड़े तो भी अपना है, कान बिगड़े तो भी अपना है। क्योंकि शरीर के सब अवयव मिलकर एक शरीर है। ऐसे ही पूरा समाज रूपी शरीर मानवता का है। जितना हो सके अपने स्वार्थ का त्याग करके भगवत प्रीति अर्थ कर्म करने से सुख की लालच और दुख का भय कम होने लगता है। जितने सुख की लालच और दुख का भय घटता है उतना ही आदमी निर्विकार नारायण के करीब होता है। वेद का एक उत्तम मंत्र है कठवल्ली का। ये सुनने से भी बड़ा पुण्य माना जाता है। सर्वे वेदा यत पदम आमनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्। सारे वेद जिस पद का प्रतिपादन करते हैं। समस्त तपों का भी जिसकी प्राप्ति के लिए वर्णन करते हैं। जिसकी प्राप्ति की इच्छा से ही ब्रह्मचर्य व्रत का आचरण मुमुक्षु लोग करते हैं। उसी पद को तुम्हारे प्रति संक्षेप से मैं कहता हूं। वो कौन सा पद है? ॐ! ॐ! यही वह पद है। अर्थात सारी सृष्टियां, सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जिस सच्चिदानंद ब्रह्म परमात्मा से होती है उसका स्वाभाविक सहज नाम है ॐ। हिन्दू जब उपासना करता है शालिग्राम की तो गोल सुपारी जैसे पत्थर, मैं तेरी पूजा करता हूं ये नहीं सोचता, बोलता। वो तो भगवान आदि नारायण समझ के पूजता है। मां को पूजता है चाहे चतुर्भुजी को पूजता है, गजानंद को पूजता है चाहे पिता को पूजता है। लेकिन पिता में भी उस परमेश्वर देव की भावना करता है। मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव। आचार्य अलग हैं, मां अलग है लेकिन अलग अलग में अनअलग एक परमेश्वर ही है। गणपति की मूर्ति और शिवजी की मूर्ति, शालिग्राम की मूर्ति और अम्बे मां की मूर्ति अलग-अलग है लेकिन वे सभी अलग-अलग पूजक उस एक परमेश्वर की पूजा करते हैं। सर्वे वेदा यत पदम... राजा राज भोग कर ऐश करके निस्सारता का कुछ पुण्य प्रभाव से जब ज्ञान पाते थे तो सब कुछ छोड़कर इसी आत्म सुख की यात्रा के लिए गुरुओं के दरवाजे पर झाड़ू बुहारी करना पसंद करते थे। तपी इसी परमेश्वर के सुख को पाने के लिए तप करते हैं। महापुरुष सिद्धार्थ और महावीर और बुद्ध और कबीर और नानक जी भी इसी पद के लिए सब कुछ छोड़कर चल पड़े थे। तो सब में जो एक है उस एक परमेश्वर की उपासना करते हैं और उस एक परमेश्वर में का कोई नाम नहीं सभी नाम उसी की सत्ता से स्फुरते हैं। इसीलिए सभी नाम उसके हैं। मां करके उसको पूजा जा सकता है जगदम्बे मां। और कृष्ण करके उसे पूजा जा सकता है। गोविंद करके भी उसे बुलाया जा सकता है और गोपाल गिरधारी अच्युत केशव माधव... बेकार करके भी उसको पूजा जा सकता है। तो बेकारों में भी तेरी सत्ता है। अनभिज्ञ आप अनजान हैं अर्थात अनजानों में भी आप ही हैं। तो इस प्रकार बुद्धिमानों में आप ही हैं और बुद्धिहीनों में भी आपकी सत्ता है। बुद्धि तीक्ष्ण है उसमें भी आपकी ही योग्यता है और बुद्धि मंद वाले में भी चेतना आपकी ही है। कीड़ी में जो अपने बच्चों को ठीक जगह ले जाने की चेतना है वो भी प्रभु तुम्हारी और ब्रह्मा जी में सृष्टि बनाने का जो ज्ञान और सामर्थ्य है वो भी तुम्हारा है। मां के शरीर में अन्न में से दूध बनाने की सत्ता भी तुम्हारी है। और बच्चे में सकुर सकुर करके स्तन पान करने की मति गति भी तुम्हारी सत्ता है। तो बाल गोपाल होकर बैठा है और तू मां होकर पय पान कराता है। तो पतियों में पति तू ही है। स्त्रियों में लक्ष्मी रूपा तू ही है। माताओं में मातृ शक्ति तू ही है और गुरुओं में गुरुत्व तेरा ही है। इस प्रकार सभी में उस ईश्वर की सत्ता स्फूर्ति और चेतना समझकर जो उपासना करता है। उसे जल्दी परमात्म पद ॐ... जैसे ओंकार सारे मंत्रों का सार है ॐ बोला मतलब हो गया बात। ॐ माना अलम। ॐ माना असाधु। जैसे साधु बोलते तो साधु अक्षर में भी बहुत सारी मानाएं आ जाती है। इससे भी ज्यादा ॐ में बहुत सारे भाव आ जाते हैं। तो उस ॐ पद को मैं कहता हूं, कठवल्ली में आया पहला अध्याय वल्ली दूसरी और मंत्र पंद्रहवां ये। सर्वे वेदा... तुम्हारे जन्म से पुंस संस्कार, मां के गर्भ में होते तभी संस्कार किए जाते हैं। छठी के संस्कार होते हैं, मंगनी के संस्कार होते हैं, शादी के संस्कार होते हैं। इस प्रकार मृत्यु के समय जो संस्कार होते हैं वो सोलहवें संस्कार। तो ये सारे संस्कार इस जीव को परम पद पाने के लिए सहायता रूप होते हैं। शादी में फेरे फिरते हैं तो क्यों? ऐसे भी तो शादी हो जाती है? नहीं। फेरे फिरते हैं। पहले चार कदम चार फेरे आगे वर चलता है फिर तीन फेरे कन्या चलती है। तो ये सब कैसी विधि है कि वर नारायण रूप है और कन्या लक्ष्मी रूप है। तो वर के अंदर जो नर नारायण का अयन है वो बैठा है। और कन्या के अंदर जो चैतन्य लक्ष्मी स्वरूपा बैठी है। तो संसार में शादी विवाह करके कुत्ते कुत्तियों की नाईं जिंदगी नहीं बिताना है। अपितु अपने मनुष्य जीवन को लक्ष्मी नारायण की नाईं परम पद में पहुंचाना है। ऐसे बालकों में ये मेरा बच्चा है नहीं ये गोपाल कृष्ण है। तो इस प्रकार की जो भगवत बुद्धि है भगवत भावना है। ऋग्वेद कहता है एकम संतम बहुधा कल्पयंति। वो एक ही परमात्म सत्ता है और बहुत सारी उसमें कल्पना होती है। जैसे रात को सो गए तो तुम एक ही तो हो। लेकिन रात के स्वप्ने में तुमने देखा कि मैं हरिद्वार जा रहा हूं। तो हरिद्वार की बहती गंगा भी तुमने अपने घर में देखी। और गंगा में नहाते कई लोग भी तुमने देखे, तुम एक हो कई लोग बन गए और गंगा की लहरियां बन गई, दुकानें बन गई, गाड़ियां बन गई, रास्ते में जाते समय खेत खलियान बन गई, अच्छे लोग भी बन गए और बुरे लोग भी बन गए। लेकिन सब बने तो तुम्हारे एक उस आत्म परमात्मा की सत्ता से बने स्वप्ने में। जैसे स्वप्ने में तुम्हारा एक ही आत्म देव अनेक रूप बन गया। ऐसे ही जाग्रत में भी वो एक ही परमेश्वर अनेक रूपों में लीला करता दिख रहा है। रूपम रूपम प्रतिरूपम बभुवः। तो इस प्रकार की जो सद्भावना है। उस सद्भावना में डूबते समय ॐ। किसी ने बुरा कहा, भला कहा, दुख आया, सुख आया। सारभूत दुख सुख भला बुरा का आधार देखने वाला वो परमात्मा ॐ। ये परमात्मा सत्य है बाकी सब... जैसे समुद्र पर तरंगें आईं और गई। झाग और बुलबुले और फेन आईं और गई। समुद्र की गहराई में शांत उदधि। ऐसे ही मुझ परमेश्वर में शांति है आनंद है। इसने भली बात कह दी बुरी बात कह दी। तो ऊपर ऊपर उथल पाथल होती है और नीचे गहराई में ॐ। समुद्र में सरोवर में ऊपर-ऊपर उछल पाथल होती है और समुद्र के तले में गहराई में जाओ तो शांत पानी। ऐसे ही मेरा परमात्मा शांत स्वरूप है, मैं उसमें शांत हो जाऊं। जब मृत्यु आती हो। और डॉक्टर बोले अब नहीं हो सकता है, तुम मर जाओगे। तब भी आप ये सोचो कि ॐ। जो मरता है वो मैं नहीं होता हूं। जो मरता है ये शरीर मरेगा। जो दुखी होगा वो मन दुखी होता है। बीमार होता है तन। मैं तो वही ॐ पद परमात्म पद में हूं। मृत्यु मेरी नहीं हो रही है। तो आप मौत के समय भी मुक्ति के धनी बन जाओगे। दुख आ जाए तो दुख मन को हो रहा है। ॐ... ॐ... दुख के समय भी आप दुख से न्यारे हो जाओगे। जैसे जंगल में आग लगती है तो सयाने पशु सरोवर में खड़े हो जाते हैं। तो जंगल की आग उनको कुछ नहीं कर सकती। ऐसे ही जब भी तुम्हारे जीवन में रोग आए, बीमारी आए, दुख आए, अशांति आए, चिंता आए। ॐ परमेश्वराय। ये आने जाने वाले और मेरा परमात्मा रहने वाला। तो जो दुख में दुखी हो जाते हैं और सोचते हैं दुख की बातें तो और दुख गहरा करते हैं। लेकिन ॐ के कटर से दुख की उस धारा को काट दें। ऐसे ही सुख आए इतना अच्छा था ऐसा था उधर बड़ा मजा था तो बड़ा मजा था तो फिर उस मजे के लिए भटकने की जरूरत नहीं। वो मजा वहां जहां जिस जगह पर जिस पिकनिक प्लेस पर तुमको मजा आया था। वहां तो कई लोग जी रहे हैं। उधर मजा होता तो वे वहां से फिर दूसरी जगह क्यों जाते? मजा तो तुम्हारी भावना में है तुम्हारी कल्पना में है ॐ... ॐ... ये बहुत अच्छा है, दोबारा आएंगे ऐसा संकल्प करके फसो मत। दोबारा तिबारा जाएंगे फिर भोगेंगे फिर मजा करेंगे खप जाएंगे। लेकिन मजा आई उसको जो जानता है वो मजा का आधार है। ॐ... ॐ... कोई सुंदर सुहावना बालक दिखा तो उसके सौंदर्य के पीछे उस ॐ स्वरूप परमात्मा की सत्ता है। कोई सुंदरी दिखी तो शरीर तो हाड़ मांस का है लेकिन सौंदर्य मेरे परमात्मा का है। तो सुंदरी के प्रति काम वासना के बदले राम भाव आ जाए परमेश्वर भाव आ जाए। कोई सुंदरा दिखे तो सुंदरे की सत्ता में वही... तो जहां-जहां कोई विशेषता दिखती है, जहां-जहां कोई आकर्षण दिखता है तो उसकी गहराई में वही परमेश्वर है। सर्वे वेदा यत पदम आपनन्ति तपांसि सर्वाणि च यत चान्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तते पदम संग्रहेण ब्रवीम्यो मित्येतः। सारे वेद, सारे कर्म, सारी साधना, सारे धंधे, सारी शादियां, सारे विवाह, सारे छठीयां, सारे विधि-विधान किसलिए किया जाता है? कि देर सबेरे जीव आत्मा परमात्मा सुख को पा ले। परमात्मा ज्ञान को पा ले। परमात्मा शांति को पा ले। जन्म मरण के चक्कर से सदा के लिए छूट जाए। तो इसमें सावधान रहना है बस। दुख आए तो सावधान सुख आए तो सावधान। किसी की निंदा सुनते तो सावधान। कि निंदा तो ये कर रहा है अपने राग द्वेष से। मैं अपना दिल क्यों बिगाड़ूं? ॐ... अच्छा अच्छा ठीक है, उसकी बात मोड़ दी। जो ऐसा है वो ऐसा है आप भी उसमें फिसलो मत। आप तो बार-बार घूम फिर के जैसे देवर्षि नारद। उनको... दो घड़ी से अधिक कहीं रहने, रह नहीं सकते थे ऐसा दक्ष प्रजापति का श्राप था। लेकिन वो श्राप द्वारिका में नहीं लगता था। तो नारद जी जाते द्वारिका, श्रीकृष्ण बोलते जाओ जरा वृंदावन का समाचार ले आओ। नारायण नारायण वृंदावन गए। फिर द्वारिका। जाओ जरा वैकुंठ जरा चक्कर मारके आओ, गए फिर द्वारिका। गए मथुरा फिर द्वारिका। गए काशी फिर द्वारिका। तो जाने की जगह अनेक लेकिन आने की जगह वह एक। तो पचास जगह गए, पचास जगह तो अलग-अलग हो गया उसको एक-एक मार्क मिला लेकिन द्वारका को तो पचास मार्क हो गया। ऐसे ही आप भी द्वारका में आया करो। रसोई घर में गए फिर आए द्वारिका में। पूजा के रूम में गए फिर द्वारिका में आए। दुकान में गए द्वारिका में आए। ग्राहक से मिले द्वारिका में आए। द्वारका... अर्थात भगवान का जहां वास है अपने अंतःकरण रूपी द्वारका में आओ। आपके लिए जीवन मधुमय हो जाएगा। सुखमय हो जाएगा, आनंदमय हो जाएगा। बार-बार द्वारका आओ, बार-बार ॐ आनंद। ये संसार है ये स्वप्ना है। हरि ॐ... ॐ... बार-बार उस परमेश्वर के चिंतन का अभ्यास डालने से आपका चित्त भगवत सुख से, भगवत ज्ञान से, भगवत शांति से तो संपन्न होगा और ज्यों शांति से संपन्न होने लगेगा त्यों आपमें शक्ति आ जाएगी। ऐसा कोई त्रिलोकी में सामर्थ्य नहीं जो शांति से पैदा न होता हो। परमात्म शांति सामर्थ्य की जननी है। अशान्तस्य कुतः सुखम्। अशांत को सुख कहां? और परमात्म शांत को दुख कहां? तो परमात्म शांति बढ़ाना ही बुद्धिमानी है। परमात्म सुख बढ़ाना ही बुद्धिमानी है। परमात्मा प्रीति बढ़ाना ही बुद्धिमानी है। ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ शांति ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ शांति ॐ ॐ माधुर्य ॐ ॐ ॐ आनंद ॐ ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ प्यारेजी ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ मेरे जीव ॐ ॐ ॐ प्यारे जीव ॐ ॐ ॐ... हृदय प्रसन्नता से भरता जा रहा है। रग-रग पावन हो रही है। भगवान के मधुमय नाम से, मधुमय सत्संग से, मधुमय सुमरण से। हम स्वयं मधुमय के हो रहे हैं। प्रभु! मारा वालुड़ा! मारा आनंद दाता! मारा कानुड़ा! कृष्ण कन्हैया बंसी बजैया। बंसी में ओंकार की ध्वनि गुंजावता मारा वालुड़ा। लोगों ने अधरामृत न पान कराबी दिधुं तुं... माधुर्य ॐ ॐ ॐ आनंद हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ आनंद ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ माधुर्य ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ प्रसन्नता हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ ॐ ॐ शिव ॐ ॐ ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ हरि आनंद हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम शिव शिव शिव शिव शिव शिव शम्भू भोलेनाथ! बिन फेरे हम तेरे! हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम आनंद है। माधुर्य है। तुम्हारे कान में किसकी ध्वनि पड़ रही है मुझे पता है। तुम किसको प्यार कर रहे हो मुझे पता है। और उसको भी... प्रभु तेरी जय हो! हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम आनंद ओम ओम ओम ओम माधुर्य हरि ओम ओम ओम ओम शक्ति हरि ओम ओम ओम ओम आरोग्य हरि ओम ओम ओम ओम ओम निर्विकारिता हरि ओम ओम ओम ओम भक्ति हरि ओम ओम ओम ओम... ये पुरुषोत्तम मास है। और साबरमती का किनारा है। जाबालि ऋषि ने यहां वर्षों तक यज्ञ किए थे तपस्या की थी। इसीलिए यहां आने वाले को यहां पिछले तीस साल से तो सतत जप ध्यान होता ही है। आने वाले को कैसा भी हो इधर आने से कुछ शांति, कुछ पवित्रता कुछ ईश्वरीय सुख मिलने के तरंग मिल जाते हैं। जगत का चिंतन करने से आप भीतर से कमजोर हो जाते हैं। और आत्म चिंतन करने से आप भीतर से बलवान हो जाते हैं। धिकबलं क्षत्रियबलं ब्रह्मबलमेव बलम्। विश्वामित्र को अहसास हो गया कि मेरा इतना बड़ा राज्य, वैभव, सत्ता, शक्ति। लेकिन ब्रह्म चिंतन करने वाले ब्रह्मऋषि वसिष्ठ जी के बल के आगे ब्रह्म ज्ञान के बल के आगे मेरा क्षत्रिय बल धिकबलं क्षत्रियबलं ब्रह्मबलमेव बलम्। तो ब्रह्म परमात्मा का चिंतन करने से ऋषियों को ब्रह्म बल की प्राप्ति होती है जहां राजर्षि भी नतमस्तक हो जाते ब्रह्मऋषियों के पास। वह ब्रह्म बल सबके अंदर छुपा है। सुंन्या सखणा कोई नहीं सबके भीतर लाल, मूरख ग्रंथि खोले नहीं कर्मी भयो कंगाल। और ब्रह्म बल तीन प्रकार से जाग्रत होता है। जिसके अंदर श्रद्धा भक्ति है तो भावना से, जिसके पास कर्म शक्ति है तो निष्काम कर्म से। और जिसके पास विचार ज्ञान शक्ति है तो ज्ञान से। अथवा तीनों से थोड़ा-थोड़ा करके भी ब्रह्म बल जगाया जाता है।




किसको बोलते हैं संसार का संग?


ध्यान लगाना अच्छा है लेकिन विकारों से बचना उससे और अच्छा है। और विक्षेप रहित स्थिति में टिके रहना वह सर्वोपरि है।


आकर्षण के समय आकर्षण रहित होना, उसका एक ही उपाय है कि जो आकर्षण रहित सत्ता स्वरूप परमात्मा है, उसकी प्रीति उसमें स्थिति हो जाए।


लाख उपाय कर ले प्यारे, कदी न मिलसी यार।
बेखुद हो जा, देख तमाशा, आपे खुद दिलदार।

अपने इस देह के अहं को छोड़कर परमात्मा अहं में शांत होता जा। फिर दिलदार की शांति, मस्ती और मति की ऊंचाई आ जाती है।

मति दुर्बल होती है तो मन उसे खींच लेता है और मन को इंद्रियां खींच लेती हैं और इंद्रियां विषयों में गिरा देती हैं। मति बार-बार परमात्मा सुमिरन और ध्यान में रहे, मति पुष्ट रहे। मन सात्विक बनता है, इंद्रियों के धोखे में नहीं आता।
फिर गिरता है कभी तब उठता है, फिर गिरता है, उठता है। जैसे बच्चा चलते-चलते कई बार गिरता है, फिर दौड़ भी लगा लेता है और दौड़ में, हरीफाई में नंबर भी पा लेता है। जो अभी हरीफाई में दौड़ के नंबर पा रहे हैं, वे कई बार गिरे होंगे चलते समय बचपन में। ऐसे ही ईश्वर का रास्ता है, चलते हैं, फिसलते हैं, चलते हैं, फिसलते हैं, चलते हैं, फिसलते हैं।
ऐसा कोई माई का लाल नहीं आया होगा कि भई चल पड़ा और फिसला न हो। फिसलाहट तो आती होगी। लेकिन फिसल कर जो निराश हो जाते हैं, वे अपना गला घोंटते हैं। जो फिसल कर फिसलते ही रहते हैं, वह अपनी तबाही करते हैं। जो फिसल कर प्रभु का आश्रय लेते हैं, सत्संग का आश्रय लेते हैं, नियम और व्रत का आश्रय लेते हैं, वे धनभागी देर-सवेर पहुंच जाते हैं।

जो फरियाद करते रहते हैं, वे बेचारे उलझ जाते हैं। काबे अर्जुन लूटिया, वही धनुष वही बाण। जब लूटे तब लूटे, अब तू काहे को अपने को लूटे। 
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत रहा न कोय। 

तो राग, द्वेष, सुख, दुख,जड़ चेतन के दो पाटों में सारे पिसे जा रहे हैं। कोई विरले हैं जो अपने चेतन में टिक जाते हैं।
चक्की चले तो चालन दे, तू काहे को रोये। 
लगा रहे तू कील से तो बाल न बांका होये।

तू अपने परमात्मा सत्ता से लगा रह भैया! बहन तू लगी रह बेटा, परमात्मा सत्ता से। फिसले तो फिर लग, फिसले फिर लग, फिर लग, फिर लग। जैसे बच्चा चलता है, गिरता है, फिर चलता है, गिरता है, चलने की गाड़ी लेके चलता है, वहां भी गिरता है। फिर भी चलना नहीं छोड़ता है, तो वो दौड़ता है, आप भी ऐसे ही करके आए हो।
नारायण, नारायण, नारायण, नारायण।

जो सत्संग नहीं करता, वह कुसंग जरूर करेगा। अकेले में बैठकर साधन भजन करना अच्छा है लेकिन दोष... दोषों का पता बिना सत्संग के नहीं मिलता। दोषों को उखाड़ने की युक्ति बिना सत्संग के नहीं मिलती। और सामूहिक सत्संग में ध्यान और जप में तुमुल ध्वनि का फायदा अकेले में नहीं मिलता।

इसीलिए शुकदेव जी जैसे महान परमात्मा रत महापुरुष, ब्रह्म सुख में निमग्न, कहीं जाते नहीं थे। गृहस्थी के यहां उतनी देर ठहरते जितनी देर वो गाय का दूध दुह ले बस, फिर लिया और चलते। ब्रह्म सुख... ऐसे शुकदेव जी महाराज भी सत्संग में सराबोर होते हैं, भागवत की कथा करने में। भगवत गुणगान, भगवान की वूरी-वूरी प्रशंसा, लीला, अनुवाद, गुणानुवाद।

मन चुप नहीं बैठता, उसे खुराक चाहिए। तो खुराक वो दो जो भगवत भाव का प्यारा बन जाए। वृत्ति में भगवत भाव आना चाहिए। वृत्ति शांत करता... वृत्ति को विषय विकारों में फंसाता है, वो भोगी है। वृत्ति को नियम और कर्म धर्म में लगाता है, वो धर्मात्मा है। वृत्ति को एकाग्र करता है, वृत्ति का पेट खाली करता है, वो योगाभ्यासी है। वृत्ति को भगवत भाव से भरता है, वो भक्त है। लेकिन वृत्ति जहां से उठती है उस अकाल पुरुष में जो सोहं स्वभाव में जगता है, वो ब्रह्मवेता, ब्रह्मज्ञानी है।

धीरे-धीरे यात्रा करते-करते वहां का लक्ष्य बनना चाहिए। लक्ष्य ऊंचा होना चाहिए।

लक्ष्य न ओझल होने पाए, कदम मिलाकर चल। 
सफलता तेरे चरण चूमेगी आज नहीं तो कल।

ब्रह्माकार वृत्ति, ब्रह्म परमात्मा का चिंतन, ब्रह्म परमात्मा का रस अद्भुत सामर्थ्य देता है। पंद्रह-पंद्रह सत्ताएं उसी में छुपी हैं जैसे बीज में टहनियां, डाल, पत्ते, फूल, फल और अनंत बीज छुपे हैं। ऐसे भगवन नाम और भगवत चिंतन में अनंत योग्यताएं छुपी हैं। उसका फायदा ले, व्यर्थ समय ना गंवाएं। आवारा मन के लोग ही इधर-उधर की बातों में पड़ते हैं, इधर-उधर की चर्चा में लगते हैं।

न चलति भगवत् पदारविन्दात् लव निमिषार्धमपि स वैष्णवाग्र्यः।
जो भगवत पदार्थ से, भगवत शरण से, सुख से लव निमेष मात्र भी चलित नहीं होता, वह वैष्णवों में, भक्तों में अग्रगण्य है।

भगवान करे कि हम भगवान के सिवाय किसी वस्तु का महत्व न समझें। भगवान करे कि किसी पदार्थ का महत्व न समझें। भगवान करे कि किसी नाम और रूप का महत्व न समझें। हे भगवान ही महत्वपूर्ण, सच्चिदानंद परमात्मा। जो सृष्टि की उत्पत्ति करते, स्थिति करते, प्रलय करते, ऐसे सच्चिदानंद परमात्मा में ही शांति मिलती रहे।

ओम शांति। ओम शांति। ओम शांति। ओम शांति। ओम, ओम, शांति। नारायण, नारायण, नारायण।

योग वाशिष्ठ सत्संग 

वशिष्ठ जी बोले, हे राम जी! जिसकी बुद्धि शास्त्रों के अभ्यास से तीक्ष्ण हुई और वैराग्य के अभ्यास से संपन्न और निर्मल है, उसको आत्मपद प्राप्त होता है।

व्याख्या 

शास्त्रों का अभ्यास और वैराग्य। उसकी बुद्धि निर्मल होती है, उसका मन निर्मल होता है।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
भगवत प्राप्ति की प्यास जितनी तीव्र उतना मन निर्मल। भगवत प्राप्ति की प्यास नहीं तो पापी मन है। जिसको दुनिया की चीजों की प्यास है, वो समझो उसको बहुत दुख भोगना है। जिससे भोगा, खाया जाता है, वो मन, बुद्धि सब मिथ्या है लेकिन सत्य तो है। मैं तुझे कैसे पाऊं, कैसे जानूं... बस इसी पुकार में, प्रयास में पुण्य पुंज पाएगा। समय बीता जा रहा है।
रामतीर्थ तो रात को बीच-बीच में उठके रोते थे कि आज की रात भी बीती गई, तेरी मुलाकात नहीं हुई। भगवत प्राप्ति के बिना रात बीती, सुबह तकिया गीला मिलता था। पत्नी जानती थी कि मेरे पति से क्या वेदना है। ऐसा विवेक, ऐसा वैराग्य! तू ध्रुव को मिला, तू प्रह्लाद को मिला, कबीर जी के हृदय में प्रगट हुआ तो प्रभु मेरा हृदय... तेरे लिए नहीं तड़पता, मैं क्या करूं? तू ही तड़प दे दे, तू ही कृपा कर। जैसे बच्चा नन्हा नहीं चल सकता तो मां-बाप को पुकारता है। ऐसे भगवान को पुकारते, पुकारते रोते, आंसू बहाते।
डबल M.A. में पढ़े थे, गणित के बड़े अच्छे विद्वान थे। प्रोफेसर थे लाहौर कॉलेज में। 

धिक् उना दा जीवन जो रब बिना जींदे हैं। 
धिक्कार है उनके जीवन को जो भगवत प्रेम के बिना जीते हैं। 

वे नूर बेनूर भले, जिस नूर में पिया की प्यास नहीं। 
बिन खेती के बाड़ किस काम की। बाड़ करते खेती के लिए, ऐसे ही जीवन रखते हैं परमात्मा अनुभूति के लिए, परमात्मा की तरफ नहीं चला तो फिर ये जीवन किस काम का। खाना-पीना किस काम का आखिर!
तुम जो एक कौर भी खाते हो तो किसी न किसी के मुंह से छीना-झपटी किया हुआ है। कई जीव-जंतुओं को मारकर, कई पक्षियों को भगाकर, कई बछड़ों को मां के थनों से धकेलकर तुम्हारे नजदीक लाया जाता है... अन्न, फल, दूध आदि। एक कौर भी छीना-झपटी के बिना नहीं आता। तुम जो खा रहे हो, किसी न किसी के मुंह से छीना-झपटी करके तुम्हारे तक पहुंचाया जाता है।

उसका फिर क्या करते हो? खा-पी के उसका रस बनता है, काम में, क्रोध में, लोभ में, मोह में, अहंकार में, जगत के बड़बड़ में जाता है कि भगवत ध्यान में जाता है? एक कौर तुम चाहे मिठाई का खाओ, चाहे एक घूंट दूध पियो, किसी न किसी बछड़े को, बछड़े के हक को छीनकर तुम्हारे तक पहुंचाया गया है। कोई फल खाते हो तो जीव, जंतु और पक्षियों के मुंह से छीनकर तुम्हारे तक लाया गया है। अन्न खाते हो तो जंतुओं को मारकर, उनके मुंह से छीनकर पक्षियों और जंतुओं से तुम्हारे तक लाया जाता है। उसका तुम बदला क्या देते हो? खा-पी के खाद बनाते हो या अजीर्ण होता है, एसिडिटी बनाते हो या ठीक-ठीक माप से खाते हो, पचाकर रस बनाते हो और रस स्वरूप में लगाते हो। तुम्हारे कर्म तुम्हारे हाथ में हैं।

करनी आपे आपणी, के नेड़े के दूर।
अपनी करनी से तुम अपने को परमात्मा के निकट पाते हो। और अपनी हल्की करनी से आप परमात्मा से और गुरु से अपने को दूर पाते हो।

जो न तरे भव सागर, नर समाज अस पाई। 
सो कृत निंदक मंदमति, आतम हन अधोगति जाई।
वो निंदक है, मंदमति है, कृतघ्न है, मूर्ख है, सृष्टि की चीजों का दुरुपयोग करता है, खाद बनाता है।
मां का यौवन व्यर्थ किया उसने। मां के पेट में रहा, मां को पीड़ा देके पैदा हुआ, व्यर्थ जिया वो। अभी भी जीता है तो कई जीव-जंतुओं को मारकर जीता है। व्यर्थ हो गया जीवन! जिस वृक्ष में फल नहीं लगे वो निष्फल है। जिस वृक्ष में फल लगे वो सफल है। ऐसे ही जिसके जीवन में भगवत फल नहीं लगा, भगवत ध्यान, भगवत ज्ञान, भगवत रस के फल रसीले नहीं लगे, उसका जीवन क्या है! ऐसे तो जीने को भैंसे, कुत्ते, गधे, घोड़े भी तो जी रहे हैं, क्या हो गया?
उसकी माता, पिता और गुरु कुल धन्य है जिसके हृदय में गुरु भक्ति है, भगवत भक्ति है। रूखे चने चबाएंगे, प्रभु के गीत गाएंगे, सूखे टुकड़े चबाएंगे। नरेंद्र को तो रामकृष्ण के चरणों में जा पड़े, भगवत ध्यान करते-करते जब भूख लगती तो फिर रोटी कौन बनाए, समय खराब होता। भिक्षा मांग के आते, वो जमाने में मिट्टी के तवे थे, मोटी रोटी बनती थी। ले आते, चबा-चबा के खाते, बाकी की टांग देते, दूसरे दिन उसी से गुजारा करते। कौन जाए मांगने, समय खराब होगा।

कभी-कभी सूखी रोटी चबाते-चबाते मसूड़ों से खून आ जाता था। ऐसा करके महापुरुषों ने ध्यान-भजन में गहरी यात्राएं की। आश्रम में बंगाल है तो चावल बनते, नमक डालने को नहीं होता था। कभी-कभार दो पैसे की सेर सब्जी आती थी, बैंगन की वो उबाल... कैसे-कैसे जिए और कैसे-कैसे लगे रहे! और कितने ऊंचे पहुंच गए।

जो समय का सदुपयोग करता है और ऊंचे में ऊंचा उपयोग है, उसको ऊंचा फल मिलता है। 
शबरी भीलन बुहारी करती लेकिन भगवत प्राप्ति के लिए, उसकी पूजा बन जाती है।
जो सेवा को बोझा मानते हैं, वो सेवा का महत्व नहीं जानते, सेवा को सेवा नहीं समझते। 

जो टालते हैं वो सेवा का महत्व नहीं समझते। अथवा जो सेवा करके बखान करते हैं वो सेवा को गटर में डाल देते हैं। सेवा तो हृदय के आनंद को पाने के लिए है। सेवा तो सेव्य के सुख को उभारने के लिए है।


कर्म तो जड़ है, कर्ता की अपनी भावना है। एक मकान बनना था, बाबा गया, बोले, मजदूरों से पूछा क्या कर रहे हैं? क्या करें, बोझा... पत्थर तोड़ रहे हैं, अपना भाग्य तोड़ रहे हैं महाराज। मजूरी करके मर रहे हैं और क्या कर रहे हैं! बड़ा महल बनना था। दूसरे कोने कुछ और मजदूर थे, उनसे पूछा क्या कर रहे हो? बोले बाबा, रोजी कमा रहे हैं, गुजारा... रोजगार कर रहे हैं। थोड़ा सा और कोने में गया, तीसरे मजदूर से पूछा क्या कर रहे हो? बोले महाराज, महल बना रहे हैं हम लोग। किसका है? बोले किसका है... लाला का है, सेठ जी का महल है। और सेठ में भी बैठने वाला मेरा लाला है, लाला का महल बन रहा है। चौथे से पूछा क्या कर रहे हो? बोले महाराज, मंदिर बना रहे हैं। अरे बोले सेठ का बंगला है! बोले सेठ क्या, सेठ के हृदय मंदिर में तो देव बैठा है, मंदिर बना रहे हैं। मजूरी सब कमा रहे हैं लेकिन वो मंदिर की भावना वाले को अलग आनंद है। महल की भावना वाले को अलग है। रोजी वाले को ठीक-ठाक है, और जो 'क्या करें यार, सेवा करनी पड़ती है, कठिन पत्थर तोड़ रहे हैं, अपना भाग्य कूट रहे हैं', वो भाग्य ही कूट रहा है। आप कर्म में अपनी निगाह कैसी मिलाते हैं? कर्म में स्वार्थ रखते हो, कपट रखते हो तो फिर कर्म खड्डे बनाएगा। खड्डे में गिरोगे। कर्म को ही ईश्वर की पूजा मानो।
तो जो कर्म करने में तत्पर है, उसका ध्यान भजन भी तत्परता से होता है। उसको सत्संग भी अच्छा समझ में आ जाएगा। जो लापरवाह है अपने कर्तव्य में, उसको सत्संग में भी रुचि नहीं होगी। संध्या में, पूजा में भी रुचि नहीं होगी। जी चुराएगा।
नारायण, नारायण, और सेवा का अपना आनंद है। सेवा से अपनी सूझबूझ बढ़ती है। सेवा से आत्मबल बढ़ता है। सेवा से सद्गुण विकसित होते हैं। नारायण, नारायण, नारायण, नारायण। ओम शांति। हां जी।
वशिष्ठ जी बोले, हे राम जी! जिन पदार्थों को पाने के लिए मनुष्य यत्न करता है, वे मायिक पदार्थ बिजली की चमक के समान उदय होते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। ये पदार्थ बिना विचार सुंदर दिखते हैं और इनकी इच्छा मूर्ख करते हैं क्योंकि उनको जगत सत्य प्रतीत होता है। ज्ञानवान को जगत के पदार्थों की तृष्णा नहीं होती।
हे राम जी! विषयों में आसक्त होना ही बड़ी कृपणता है। इनसे उपराम होना ही बड़ी उदारता है।
संसार के विषय विकारों में आसक्त होना बड़ी कृपणता है, बड़ी बेवकूफी है। इनसे विमुख होना ही बड़ी उदारता है, बड़ी समझदारी है।
इससे मन को वश करो, जिसमें तुम्हारी जय हो। जिस-जिस ओर मन जाए, उस-उस ओर से उसे रोको। जब दृश्य जगत की ओर से मन को रोकोगे, तब वृत्ति संवित् ज्ञान की ओर आएगी। जब संवित् ज्ञान की ओर आई, तब तुमको परम उदारता प्राप्त होगी और शुद्ध आत्मसत्ता का अनुभव होगा।
बिल्कुल सीधी बात है। जहां-जहां मन जाए वहां से हटाकर आत्म-संवित् में आ जाओ, तो शुद्ध संवित् का अनुभव होगा, परमात्मा का साक्षात्कार। बादशाह बन जाएगा, बुद्धि धीरे-धीरे, धीरे अभ्यास करके बुद्धि भी महान बन जाएगी।
आत्मा के प्रमाद से जीव को कष्ट होता है। जो अपनी विभूति विद्या को त्यागकर प्रसन्न होता है और फिर संसार के क्रूर मार्ग में कष्ट पाता है, वह मनुष्य नहीं, मानो मृग है। वह संसार रूपी वन में भटकता कष्ट पाता है। जब प्यास से व्याकुल होता है, तब जल की ओर दौड़ता है पर जहां जाता है, वहां मरुस्थल की नदी मृगमरीचिका ही दिखती है, जल नहीं प्राप्त होता।
हे राम जी! जो पुरुष इंद्रियों के इष्ट विषयों को पाकर सुख नहीं मानता और अनिष्ट विषयों को पाकर दुख नहीं मानता, इनके भ्रम से मुक्त है और बड़े भोग प्राप्त हों तो भी अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता... बड़ा भोग प्राप्त हो जाए, बड़ा यश हो जाए फिर भी अपने आत्मज्ञान से नीचे नहीं आता। सत्यम। ओम शांति, शांति।
चलो अपने-अपने काम में लग जाओ। समय बीता जा रहा है। समय बहुत कीमती है, समय किसी का इंतजार नहीं करता। अपने-अपने काम में तत्परता से लग जाओ।
सब अनर्थों का कारण संग है। संसार के संग से ही जन्म मरण के बंधन को प्राप्त होता है। संसार का संग क्या? जो सरकने वाली चीजें हैं उसमें सत्य बुद्धि करके सुख लेने की वासना, इसको बोलते हैं संसार का संग। इनका उपयोग कर लिया और सुख स्वरूप में आए, तो हो गए निःसंग। रहेगा तो संसार में, खाएगा, पिएगा, लेगा, देगा, लेकिन वो सरकने वाली चीजों से सुख बुद्धि, उसका चिंतन, उसकी सत्यता, सारे दुखों का मूल है। और परमात्मा की सत्यता और उसका चिंतन सारे सुखों का मूल है।
हे राम जी! और कभी भी बीती हुई बातें वो याद नहीं करनी चाहिए जिससे दुख पैदा हो। इसने ऐसा बोला, ये ठीक नहीं है, ऐसा किया, वैसा किया। बार-बार वही बातें नहीं बतानी जिससे मन दुखी हो। जब हो गया तो हो गया, अभी दुख मना कर और संसर्ग करता है। ये निगुगरे आदमी की पहचान है। मनमुख आदमी की पहचान है, कपटी आदमी की पहचान है।
हे राम जी! जो कुछ संसार की वासना है, बल करके उसको त्याग करिए और शुद्ध आत्मा में तीव्र अभ्यास करिए, तब शीघ्र ही अविघ्न आत्मस्वरूप की प्राप्ति होगी।
हे राम जी! तुम पौरुष प्रयत्न करके मन के संकल्प-विकल्प को निवृत्त करो और अभ्यास, विचार करके विवेक का उपाय करो। भोगों की वासना दूर से त्यागो, इसी से तुम शांतिमान होगे। इन तीनों के सम अभ्यास से तत्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का बारंबार अभ्यास करो। जब तक इनको न साधोगे, तब तक अनेक उपायों से भी शांति को न प्राप्त होगे।
हे राम जी! वासनाक्षय हो और मनोनाश, तत्वज्ञान से वासनाक्षय न करे तो कार्य सिद्ध नहीं होता। और जो मनोनाश करे और तत्वज्ञान से वासनाक्षय न करे, तब भी कल्याण न होगा। और तत्वज्ञान का विचार करे और वासनाक्षय न हो, तो भी कुशल न होगी। जब इन तीनों का सम अभ्यास हो, तब फल की प्राप्ति होगी।
हे राम जी! जिस पुरुष को देह में अभिमान नहीं होता और जिसकी स्वरूप में स्थिति है, वह शरीर के इष्ट-अनिष्ट में राग-द्वेष नहीं करता क्योंकि उसका शुद्ध वासना है। और जो करता है, सो बंधन का कारण नहीं होता।
राग-द्वेष नहीं करता, और राग-द्वेष करता हुआ दिखता भी है तो बंधन का कारण नहीं है, क्योंकि उस ज्ञानी महापुरुष का राग-द्वेष होता है वैसे, पानी में लकीर जैसा। राजी-नाराजी में गहराई में नहीं होती, ऊपर से व्यवहार चलाने के लिए होती है। दुष्टों का विरोध भी करेगा, दमन भी करेगा, युद्ध भी करेगा। सज्जनों को साथ सहकार भी देगा। अशुभ का विरोध भी करेगा, आग्रह भी करेगा। जो दुर्मति हैं, बुद्धू हैं, उनको डांट-पोंछ के भी उन्नत करेगा। जो दुर्मति है उसको शासन करेगा, जो सतमति है उसको प्रोत्साहित करेगा। लेकिन अंदर से समझेगा कि सबके अंदर एक सत्ता मात्र है। ऐसा नहीं कि सबमें भगवान हैं तो बुद्धू होकर रहेगा। नहीं, व्यवहार तो यथायोग्य करेगा। दुष्टों से बचेगा, दबाएगा दुष्टों को, सज्जनों से स्नेह करेगा। जैसा ज्ञानी करता है, ऐसा ही करेगा, लेकिन सत्य बुद्धि नहीं रहेगी। अज्ञानी तो डर के मारे दुष्टों के आगे घुटना टेक लेगा, ज्ञानी घुटना नहीं टेकेगा, युक्ति से उसको ठीक भी कर देगा।
एक ज्ञानी संत थे, वो जाते थे, लोटे बैठे। तो किसी बदमाश ने आकर उसको डंडा मार दिया। उसने एक रुपया निकालकर दे दिया। बदमाश समझा कि ये बाबा को देखो डंडा मारा तो एक रुपया मिला। दूसरे दिन आया तो फिर डंडा मारा, तो दूसरा रुपया दिया। चेले ने कहा गुरुजी, वो हरामी है, डंडे मार रहा है। एक दिन डंडा मारा तो रुपया दे दो, दूसरे दिन... बोले तू देख क्या होता है। तीसरे दिन वो बाबा की जगह पे दूसरा कोई जबरदस्त आदमी था। बाबा तो बूढ़े थे। उसने देखा कि ये डंडा मारने से रुपया मिलता है, तो उसको मार दिया। उसने उठाकर चार डंडे मार दिए, सिर फोड़ दिया उसका। साधु बाबा ने बोला, देखो अपने पास इतना बल और इतना संघर्ष करने का टाइम नहीं था, दो रुपये में परभारा हो गया। (हँसी) वापस राम जपा दिया उसको। हे राम, राम, हे राम... दो रुपया तो एक दिन में, पट्टा-पुट्टी में दो रुपया क्या काम करे! वापस राम जपता रहा पूरा दिन, पूरी जिंदगी बेचारा। नारायण, नारायण, नारायण।
हे राम जी! ज्ञानी को जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति दोनों तुल्य हैं। जैसे भूषण के होते भी सुवर्ण है और भूषण के अभाव में भी सुवर्ण है, वैसे ही ज्ञानवान को देह के होते भी ब्रह्म है और देह के अभाव में भी ब्रह्म है। जो अज्ञानी है, उसको नाना प्रकार का जगत फुरता है और अज्ञानी वही है जिसको मन का संबंध है। हे राम! यह जगत भिन्न-भिन्न फुरता है, जैसे काष्ठ के खंभ में चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है। वे और को नहीं दिखतीं, उसी के मन में होती हैं। वैसे ही भिन्न-भिन्न पदार्थ रूपी पुतलियां अज्ञानी के मन में फुरती हैं और ज्ञानवान को नहीं भासित होतीं। जब काष्ठ रूप आधार होता है, तब चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है। पर आश्चर्य देखो कि मन रूपी ऐसा चितेरा है कि आकाश में पदार्थ रूपी पुतलियों की कल्पना करता है।
जैसे मन चंचल है, मन रूपी दीया जल रहा है। दीये में तेल की जगह पे पानी डाल दो तो क्या करेगा? जलेगा फिर? दीये में पानी डाल देंगे तो? जलेगा? दीया तो तेल से ही करता है। ऐसे ही मन वासना से बाहर भागता है। ज्ञान रूपी पानी डाल दो तो वासना शांत। निर्वासनीक होकर मन अमनी भाव को प्राप्त हो जाता है।
ओम शांति।

सूली पर भी चढ़ा दो, तब भी संत तो संत है और सारी दुनिया माने, तभी भी संत, संत है।


आपणा बापू आऽऽऽश्...
लेकिन कोई आने से अपड़े बापू नहीं। सब लोग खिलाफ हो जाएं और जूतों के हार पहनाएं, तब भी भी अपने बापू तो अपने ही होते हैं बाबा, ऐसा अगर समझ में आ जाए तब...
जरूरी नहीं कि लोग वाह-वाह करें, प्रशंसा करें अथवा राजद्वारी, ऊंची लेवल के लोग मानें, तभी कोई महात्मा-महात्मा है। ना, ना।
राजकारणी लोग मानते हैं, इसलिए कोई बड़ा है, ऐसा मत कहना। जय, जय।
संत की तो अपनी भीतर की संतत्व की स्थिति होती है, उसे सूली पर भी चढ़ा दो, तब भी संत तो संत है और सारी दुनिया माने, तभी भी संत, संत है, अगर वो संत है तो।
नहीं तो कभी तो कोई प्रशंसा करेगा और जो लोग प्रशंसा करते हैं, वो कब निंदा कर लें, कोई पता नहीं।

जो बोलते हैं, (એમ તો બસ તમારી સાથે ખભો મેળવીશું તમારી સાથે જ, તમારી સાથે જ,આખી પબ્લિક તમારી સાથે જ... એ લોકોજ પાછા ચોકઠાં ઉંધા કરીને બીજા ને બેસાડી દીધા હોય, એવું જ હોય પાછું) हम तो बस तुम्हारे साथ कन्धा मिलाएंगे, तुम्हारे साथ है, तुम्हारे साथ है, सारी पब्लिक तुम्हारे साथ है... वो लोग ही फिर मुंह पलटाके दूसरे को बिठा देते हैं... ऐसा ही होता है फिर...

बहुत लोगों की वाहवाही पे भरोसा करके जो जीता है न! वो तो मृगेश हो जाता है, मृग बन जाता है। जय, जय। मृगलो बापड़ों पांजरा मां...

बहुत लोगों का सहारा, सत्ता वालों का सहारा, किसी का सहारा... बाहर का सहारा अगर तुमने पकड़ा, तो आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, इतनी जल्दी क्या है, बहुत पड़े हैं बरसों... कभी ना कभी आपको पछताना पड़ेगा।

जिसका विवेक प्रखर है वो निरावरण बन जाएगा!


दो प्रकार के लोग होते हैं, एक होते हैं सावरण, दूसरे होते हैं निरावरण।
सावरण वे होते हैं जिनको अपने आत्म विषय का प्रकाश, ज्ञान, सामर्थ्य नहीं होता। खाना, पीना, ये, वो संसार के इसमें तो आवरण मतलब उनकी योग्यता और उनका प्रभाव, उनका बल ढका हुआ है। दूसरे होते हैं निरावरण। उनको अपनी योग्यता, अपने प्रभाव स्वरूप में डटे होते हैं। तो वो निरावरण जो होते हैं उनका संकल्प में बल होता है। और सावरण होते हैं उनके संकल्पों में दम नहीं होता। तो सावरण वाले क्षीण संकल्प होते हैं और निरावरण वाले दृढ़ संकल्प होते हैं।
तो निरावरण कैसे बनता है आदमी?
जिसका विवेक प्रखर है। वो निरावरण बन जाएगा। विवेक प्रखर क्या? कि सत् क्या है, असत् क्या है ठीक से जो जाने। नश्वर क्या है, शाश्वत क्या है ठीक से जो जाने। जैसे बच्चे का विवेक प्रखर नहीं है, तो लॉलीपॉप, चॉकलेट, बिस्किट, खिलौने पकड़ लेगा, हीरे, मोती, जवाहरात छोड़ देगा। विवेक कच्चा है। ऐसे जिनका कच्चा विवेक है वो जगत के दृश्यमान परिस्थितियों को सच्चा समझेंगे, उन्हीं को पाएंगे, उन्हीं को भोगेंगे और उन्हीं में खप जाएंगे। यह कच्चा विवेक है।
और सच्चा विवेक यह है कि आखिर तो यह नश्वर है, तो उनका उपयोग करेंगे लेकिन उसमें खपेंगे नहीं। खपेंगे नहीं तो मन को संकल्प विकल्प उधर कम होंगे। तो ऐहिक जगत की प्राप्ति की उनको भीतर से तीव्र लालसा नहीं होगी, तो चित्त में शांति होगी। शांत चित्त में आत्म विषयिणी बुद्धि हो जाती है। आत्म विषयिणी बुद्धि होती है तो बुद्धि बलवान होती है, तो मन उसको घसीटता नहीं है। बलवान के पक्ष में ही सब होते हैं। तो चित्त में विश्रांति होती है तो बुद्धि बलवान होती है। बुद्धि बलवान होती है तो मन उसके पक्ष में रहता है, इंद्रियों के पक्ष में नहीं जाता। तो संयम, सदाचार, शांति, सामर्थ्य उसका बढ़ता जाता है। कितना भी खर्च करता जाता है लेकिन उसके पास वो टेक्निक आ गई विश्रांति पाने की। क्योंकि विवेक तीव्र है।
विवेक तीव्र होने से दूसरा फायदा होगा कि वैराग्य आएगा। किस चीज में राग करें? कब तक राग करें? इनकी शाश्वतता कब तक? आखिर कुछ नहीं। ये मिल गया, वो हो गया, वो हो गया लेकिन आखिर तो देखो तो स्वप्न। ऐसे ऐसे राजा आए, मानधाता जैसे आए, अश्वपति आए, कैसे कैसे राजा रामचंद्र जी आए। कृष्णचंद्र जी आए, कंस भी आए, ऐसे ऐसे राजा आए, सब छोड़ छोड़ के गए तो अपना कब तक रहेगा ये? तो तीव्र विवेक है। 

वशिष्ठ जी बोले हे राम जी! एक सावरण होता है, दूसरा निरावरण। जिसका शुद्ध अंतःकरण है, वह निर् आवरण है और जिसका मलिन अन्तःकरण है, वह सावरण है। शुद्ध अंतःकरण में जैसा भी निश्चय होता है, वैसा ही तत्काल आगे सिद्ध हो जाता है। और मलिन अंतःकरण का निश्चय सिद्ध नहीं होता।
हे राम जी! जिनमें शुद्ध अंतःकरण उदय हुआ है, वो जैसी इच्छा करे वैसी ही सिद्धि होती है।
हे राम जी! ऐसे ज्ञानवान परस्पर ज्ञान मात्र का निर्णय और चर्चा करते हैं। और ज्ञान की ही कथा कीर्तन करते और उसी से प्रसन्न होते हैं। ऐसे नित्य जाग्रत पुरुष जो निरंतर प्रीतिपूर्वक आत्मा को भजते हैं, उनमें आत्म विषयिणी बुद्धि उदय होती है और उससे वे शांति को प्राप्त होते हैं।
जिनको सदा अध्यात्म का अभ्यास है और उस अभ्यास में जो तत्पर हुए हैं, उनको आत्मपद प्राप्त होता है।
हे राम जी! शुभ-अशुभ गुणों के समूह जिनके नष्ट हुए हैं और अकस्मात फल जिनको प्राप्त हुआ है, उनका निर्मल क्रम सुनो।
एक समय राजा जनक लीला करके अपने बाग में, जिसमें मीठे फल लगे थे और नाना प्रकार के सुंदर बेलों पर कोकिला शब्द करती थी, इस भांति गया जैसे नंदन वन में इंद्र प्रवेश करे। उस सुंदर वन में पुष्पों से सुगंध फैल रही थी। राजा अपने संग के अनुचरों को दूर त्याग कर आप अकेला कुंजों में विचरने लगा।
कभी-कभी एकांत में अकेले में विश्रांति लेने से मनोबल बढ़ता है, विश्रांति मिलती है, बुद्धि बल बढ़ता है, संकल्प बल बढ़ता है। दो प्रकार के लोग होते हैं, एक होते हैं सावरण, दूसरे होते हैं निरावरण।
सावरण वे होते हैं जिनको अपने आत्म विषय का प्रकाश, ज्ञान, सामर्थ्य नहीं होता। खाना, पीना, ये, वो संसार के इसमें तो आवरण मतलब उनकी योग्यता और उनका प्रभाव, उनका बल ढका हुआ है। दूसरे होते हैं निरावरण। उनको अपनी योग्यता, अपने प्रभाव स्वरूप में डटे होते हैं। तो वो निरावरण जो होते हैं उनका संकल्प में बल होता है। और सावरण होते हैं उनके संकल्पों में दम नहीं होता। तो सावरण वाले क्षीण संकल्प होते हैं और निरावरण वाले दृढ़ संकल्प होते हैं।
तो निरावरण कैसे बनता है आदमी?
जिसका विवेक प्रखर है। वो निरावरण बन जाएगा। विवेक प्रखर क्या? कि सत् क्या है, असत् क्या है ठीक से जो जाने। नश्वर क्या है, शाश्वत क्या है ठीक से जो जाने। जैसे बच्चे का विवेक प्रखर नहीं है, तो लॉलीपॉप, चॉकलेट, बिस्किट, खिलौने पकड़ लेगा, हीरे, मोती, जवाहरात छोड़ देगा। विवेक कच्चा है। ऐसे जिनका कच्चा विवेक है वो जगत के दृश्यमान परिस्थितियों को सच्चा समझेंगे, उन्हीं को पाएंगे, उन्हीं को भोगेंगे और उन्हीं में खप जाएंगे। यह कच्चा विवेक है।
और सच्चा विवेक यह है कि आखिर तो यह नश्वर है, तो उनका उपयोग करेंगे लेकिन उसमें खपेंगे नहीं। खपेंगे नहीं तो मन को संकल्प विकल्प उधर कम होंगे। तो ऐहिक जगत की प्राप्ति की उनको भीतर से तीव्र लालसा नहीं होगी, तो चित्त में शांति होगी। शांत चित्त में आत्म विषयिणी बुद्धि हो जाती है। आत्म विषयिणी बुद्धि होती है तो बुद्धि बलवान होती है, तो मन उसको घसीटता नहीं है। बलवान के पक्ष में ही सब होते हैं। तो चित्त में विश्रांति होती है तो बुद्धि बलवान होती है। बुद्धि बलवान होती है तो मन उसके पक्ष में रहता है, इंद्रियों के पक्ष में नहीं जाता। तो संयम, सदाचार, शांति, सामर्थ्य उसका बढ़ता जाता है। कितना भी खर्च करता जाता है लेकिन उसके पास वो टेक्निक आ गई विश्रांति पाने की। क्योंकि विवेक तीव्र है।
विवेक तीव्र होने से दूसरा फायदा होगा कि वैराग्य आएगा। किस चीज में राग करें? कब तक राग करें? इनकी शाश्वतता कब तक? आखिर कुछ नहीं। ये मिल गया, वो हो गया, वो हो गया लेकिन आखिर तो देखो तो स्वप्न। ऐसे ऐसे राजा आए, मानधाता जैसे आए, अश्वपति आए, कैसे कैसे राजा रामचंद्र जी आए। कृष्णचंद्र जी आए, कंस भी आए, ऐसे ऐसे राजा आए, सब छोड़ छोड़ के गए तो अपना कब तक रहेगा ये? तो तीव्र विवेक है। तो नश्वर है, तो नश्वर में प्रीति और आकर्षण नहीं होगा तो फिर शाश्वत में विश्रांति होगी, बुद्धि बलवान होगी।
विश्रांति से जो सुख और सामर्थ्य आएगा, दोषों का उन्मूलन होगा और सद्गुणों की वृद्धि होगी। और विश्रांति और सामर्थ्य से जुड़े नहीं, विश्रांति में भी रमण न करें। तो फिर तत्वज्ञान। विश्रांति में रमण करा तो वहीं रुक जाएगा। विश्रांति मिलेगी तो अंतःकरण में ही मिलेगी। लेकिन उससे भी आगे जाए तो अंतःकरण से भी पार नित्य नवीन रस परमात्मा का उसके चित्त में उभरेगा। उसको बोलते हैं जीवनमुक्त। जीते जी मुक्त।
वैसे तो कोई विरले-विरले होते हैं। लाखों करोड़ों में कोई-कोई होते हैं। रिद्धि-सिद्धि वाले होते हैं। अष्ट सिद्धि वाले होते हैं। जल सिद्धि वाले होते हैं, थल सिद्धि वाले होते हैं। भूत-प्रेत की सिद्धि वाले होते हैं। ये सब होते हैं लेकिन सर्वोपरि है निरावरण पुरुष की बात। जैसे कृष्ण है, निरावरण। राम जी हैं, निरावरण हैं, नानक जी निरावरण हैं।
तो शास्त्रों में भी बहुत सारे अच्छे पुरुषों की बात आती है। भक्ति सिद्ध, योग सिद्ध, ज्ञान सिद्ध इन ज्ञान के द्वारा, भक्ति के द्वारा, योग के द्वारा निरावरण पद में टिके परमात्मा को पाए, ऐसे सिद्धों की बातें शास्त्रों में आती हैं। लेकिन भभूत सिद्ध की कोई बात नहीं आती। कि भभूत निकाल दी वो सिद्ध पुरुष है, नहीं। वो अपनी उपासना है, अपनी साधना है।
तो अब निरावरण होने के लिए तीव्र विवेक चाहिए। तीव्र विवेक होने से वैराग्य आएगा, वैराग्य से षट् संपत्ति और मोक्ष की इच्छा एक दूसरे से जुड़ी हुई है। कि मुक्ति हो जाए। तो जो मुक्त स्वरूप है, उसमें जिज्ञासा होगी। मैं कौन हूँ? दुख-सुख किसको होता है? मान-अपमान किसको होता है? तो मैं कौन हूँ इसको जानने की इच्छा होगी। आखरी जगत क्या? सुकरात की नाईं तड़प पैदा होगी। अपने आत्मा को, ईश्वर को जानने की इच्छा होगी।
तो इसमें भी दो होते हैं, एक भक्त मानकर फिर जानता है। और विवेकी जानकर फिर मानता है। भक्त पहले मान्यता करता है, ठाकुर जी को स्नान करा दिया, सुला दिया, जगा दिया, भगवान को मानता है फिर धीरे धीरे भगवान को जानता है, भक्त। और जिज्ञासु पहले जानता है बाद में मानता है भगवान को। तो जिनकी बुद्धि की प्रधानता है, वो पहले जानते हैं ईश्वर क्या है, फिर मानते हैं कि ये ईश्वर है। और भक्त भावना की प्रधानता है तो पहले मानते हैं और फिर वो यात्रा करते-करते जानते हैं।)
हाँ जी।
हे राम जी! शालमली नामक एक वृक्ष था, उसके नीचे राजा ने शब्द सुना कि अदृष्ट सिद्ध...
(तो शालमली वृक्ष के नीचे राजा जनक जा के बैठे। विश्रांति पाए। तो सिद्ध आपस में चर्चा कर रहे थे। एक सिद्ध ने कहा कि हम उस परमेश्वर की उपासना करते हैं कि जो सदा अपना आपा है, बुद्धि के अनुरूप होता है और तब जो आनंद आता है जिस पर, जो आनंद स्वरूप है उस ईश्वर की हम उपासना करते हैं। जो चीज आप चाहते हैं, जो घटना घटती है और आप चाहते हैं ऐसी घटना और फिर जो सुख मिलता है, तो बुद्धि में जिसका सुख प्रतिबिंबित होता है उस परमेश्वर की हम उपासना करते हैं। हाँ। नौ योगेश्वरों की कथा है। नौ योगेश्वर की कथा सुनकर जनक राजा को विवेक वैराग्य हुआ और भगवान का साक्षात्कार हो गया। ये वो प्रसंग है। हाँ जी।)
दूसरा सिद्ध बोला यह द्रष्टा जो पुरुष है और दृश्य जो जगत है, उस द्रष्टा और दृश्य के मिलाप में जो बुद्धि में निश्चित आनंद होता है और इष्ट के संयोग और अनिष्ट के वियोग का जो आनंद चित्त में दृढ़ होता है, वह आनंद आत्म तत्व से उदय होता है। उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
दूसरा सिद्ध बोला कि द्रष्टा, दर्शन और दृश्य को वासना सहित त्याग करो। जो दर्शन से प्रथम प्रकाश रूप है और जिसके प्रकाश से यह तीनों प्रकाशते हैं, उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
(पहले सिद्ध ने कहा कि द्रष्टा (मतलब देखने वाला), दर्शन (माना देखना) और दृश्य (माना दिखने की चीज), तीन चीज होता है। दृश्य, देखना और देखने वाला। ये तीनों की एकांतता होती है, अनुकूलता तब जो आनंद भासता है... पिक्चर देखने की इच्छा हुई और वही पिक्चर मेरी आंखें देखने में सक्षम हैं, कोई रोग नहीं, तकलीफ नहीं है। जो इच्छा हुई वही पिक्चर है और वही मैं देख रहा हूँ। तो मेरी इच्छा पूर्ति हुई। इच्छा पूर्ति हुई तो बुद्धि में, अंतःकरण में सुख मिला। जिस व्यक्ति को हम चाहते हैं, वो व्यक्ति आ गए और हम उनको देख रहे हैं। तो हमको सुख मिला। जो चीज हम चाहते हैं, वो चीज कोई ले आया या बन गई, हमने खाई, भोगी, सुख मिला। तो द्रष्टा, दर्शन और दृश्य के मेल से जो बुद्धि वृत्ति में सुख मिलता है, वो सुख स्वरूप वास्तविक में आत्मा का है। हम उस आत्मा की उपासना करते हैं, ये मिले तो सुखी हो जाऊं, ये खाऊं तो सुखी हो जाऊं, इधर जाऊं तो सुखी हो जाऊं, ये बेवकूफी हमने छोड़ दी। लेकिन तीनों के मेल से जिस बुद्धि में जिसका सुख मिलता है, हम उस सुख स्वरूप का उपासना, ध्यान करते हैं।
तो दूसरे सिद्ध ने कहा कि द्रष्टा, दर्शन और दृश्य ये त्रिपुटी के मेल की इच्छा ही छोड़ दो, और उनमें जो सुख मिलता है उसको ही छोड़ दो। हम तो उस सुख स्वरूप में ही एकाकार होते हैं।)
तीसरे सिद्ध ने कहा...
(तीसरा सिद्ध बोला जो निराभास और निर्मल है, जिसमें मन का भी अभाव है, अर्थात अद्वैत रूप है, उसकी हम उपासना करते हैं।
चौथा सिद्ध बोला कि जो निर्मल है, जिसमें मन नहीं है, द्रष्टा, दर्शन, दृश्य ये सब अंतःकरण में है, वो जो शांत परमेश्वर है ज्यों का त्यों, हम उसकी उपासना करते, तीसरे ने कहा।
चौथे ने कहा...)
जो द्रष्टा दृश्य दोनों के मध्य में है और अस्ति-नास्ति दोनों पक्षों से रहित प्रकाश रूप सत्ता है और सूर्य आदि को भी प्रकाशता है, उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
(वो कोई साधारण नहीं है। सूर्य को भी प्रकाशता है। सूर्य तो दुनिया को प्रकाशता है, लेकिन वो चैतन्य परमेश्वर सूर्य को भी प्रकाशित करता है। आंखें तो सारी चीजों को प्रकाशित करती हैं, लेकिन आंखों को मन प्रकाशित करता है कि आंखें देख रही हैं कि नहीं देख रही हैं। और मन को जीव प्रकाशित करता है, लेकिन जीव को भी जो प्रकाशित करता है वो परमेश्वर की हम उपासना करते हैं। कितना सरल है। आंखें सबको प्रकाशित करती हैं। लेकिन मन को आंखें नहीं देखती, सबको देखती हैं, मन को नहीं देखती, मन आंखों को भी देखता है। और बुद्धि को मन नहीं देखता, बुद्धि मन को भी देखती है। और बुद्धि आत्मा को नहीं देखती, आत्मा बुद्धि को भी देखता है कि मेरी बुद्धि बिगड़ गई कि सही है? मेरी बुद्धि पहले ऐसी थी, अभी ऐसी है। उसको जो देखता है... तो जैसे आंखों को, मन को, बुद्धि को जो प्रकाशित करता है, वही सूर्य को, चंद्रमा को भी वही प्रकाशित करता है। जैसे तुम्हारी सूर्य और चंद्र, दायीं सूर्य है नाड़ी और बायीं चंद्र है, ऐसे ही आसमान में सूरज चंद्र... तो जैसे इस सूर्य चंद्र को तुम्हारा द्रष्टा प्रकाशित करता है, ऐसे उस सूर्य चंद्र को भी वही परमेश्वर प्रकाशित करता है। हम उसी परमेश्वर की उपासना करते हैं। बहुत ऊंची बात है, ये तो सुनने से ही करोड़ों गौओं का दान करने का फल मिले, ऐसी बात है। खाली सुनने मात्र से। इसकी उपासना करो तो कहना ही क्या है। ये तो बहुत बड़ा भारी, इसमें ऊंचा सत्संग है। ऐसा कहीं मिला था सुनने को? क्या बात है, ऐसा एकदम टॉप माल देते हैं इधर। हम्म।)
पंचम सिद्ध बोला कि जो ईश्वर सकार और हकार है, अर्थात सकार जिसके आदि में है और हकार...
(ये तो सब के काम का है। सब आसानी से कर सकते हैं। पंचम सिद्ध पुरुष बोला कि जो ईश्वर सकार और हकार आदि और अंत में है, हम उसकी उपासना करते हैं। हम श्वास लेते हैं तो 'सो' ध्वनि होता है। छोड़ते हैं तो 'हं' होता है। लेकिन सुनाई नहीं पड़ता। जैसे वो घड़ियाल, लोलक चल रहा है, एकाएक आवाज सुनाई बंद हो गया, सेठ ने बोला मुनीम को कि क्या वो घड़ियाल का लोलक बंद हो गया क्या? बोले लोलक तो चल रहा है। बोले आवाज नहीं आता है, बोले ये बाराती आए हैं ना बैंड बाजे, इसीलिए लोलक का आवाज दब गया। ऐसे ही अपने अंदर जो डॉक्टर बोलते हैं ना हार्ट, हार्ट, हार्ट, हृदय, वो डॉक्टरों को खाली हृदय रहने की जगह को हृदय बोलते हैं। हृदय तो शुद्ध मन होता है। उसमें जो चैतन्य सत्ता होती है उसी से श्वास आता-जाता है। तो श्वास लेते हैं तो गरम होता है। और छोड़ते हैं तो ठंडा होता है। तो श्वास लिया और फिर छोड़ा तो उसकी जो बीच की अवस्था है, हम उसमें टिकते हैं। बहुत सूक्ष्म होता है। वही चैतन्य है, वही सारे ब्रह्मांड का स्वामी है। उसी में भगवान शंकर, विष्णु, महेश रस लेते हैं। बहुत सूक्ष्म बुद्धि चाहिए। तो श्वास लेने के जो आदि में सो और अंत में हम् रूप है, उस सोऽहं स्वरूप की हम उपासना करते हैं। ये सब लोग कर सकते हैं, सोऽहं स्वरूप की उपासना। जैसे वो सिद्ध करते थे वो। ये गुरु मंत्र जो लेते हैं ना उनको मैं पहले यही... है तो बहुत ऊंचा। सब आदमी को देना नहीं चाहिए, लेकिन अब फिर कब पात्र बने और कब मिले, तो पात्र को पात्रा भी तो दो। जितना होगा श्रद्धा, जितना होगा भाग्य उतना आगे चलेगा।
हाँ जी, पढ़ो।)
सातवां सिद्ध बोला कि जो सब आशा त्यागता है, उसको फल प्राप्त होता है और आशारूपी विष की बेल...
(आप भी सब आशा छोड़ दो, पूरे बेटे-बेटी की, अपने आप फल प्राप्त होता है। निश्चिंत हो जाओ, जो मंत्र दिया है जपा करो, जाओ। खामखा सुकड़-सुकड़ के मर रहे हैं, पचास उपाय बताओ। डॉक्टर ऐसा बोलता है, फलाना ऐसा बोलता है, ढिकना ऐसा बोलता है। छोड़ो, होता है तो होता है, नहीं होता है तो जा। निश्चिंत होके भगवान में लग जाओ, अपने आप अच्छा होता है। अब ये मानेंगे नहीं ना, अब उसने तो मान लिया, आंकड़े के पत्ते का दूध डाल दिया। ऐसा तो नहीं बोलता हूँ जा, आंकड़े के पत्ते का दूध डाल लूं, ऐसा तो नहीं बोलता हूँ। इतनी बात मान लो फिर भी। अच्छा है, जो मंत्र दिया है वो जपा करो।
हाँ जी।)
हे राम जी! नाना प्रकार के दुःख, संकट, स्नेह आदिक विकार रूप जो...
(एक महात्मा थे, उनका दर्शन करने जाते थे अखंडानंद सरस्वती। तो महात्मा ऐसे ही मस्ती में बैठे रहते थे, अपने सोऽहं स्वरूप का तो ज्ञान हो गया था। तो कोई बोले बाबाजी मैं बहुत दुखी हूँ, मेरे को ये तकलीफ है, ये तकलीफ है। बोले जा, तिनका सिर का पत्ता। ले क्या है, बोले पेट में ऐसा-ऐसा। बोले घोट के पी लीजियो। कोई आया बोले मेरे को सिर में है, वो घास में बैठे रहते, घास का तिनका उठा के दे देते। किसी को बेटा नहीं होता, तो तिनका उठा के दे दिया। किसी को धंधा नहीं, तिनका... जो भी सब दुखों की एक दवाई, तिनका घोट के ले लो भाई।
गजब के महात्मा हैं भाई!
आखिर अखंडानंद सरस्वती ने एक दिन पूछ ही लिया, कि बाबा, आप तो इधर घास पे, लॉन में बैठे रहते, लेटे रहते, बैठे रहते। और कोई भी आता है तो घास का टुकड़ा उठा के दे देते हैं, और फिर हमने जांच किया तो कईयों को फायदा भी हुआ है। तो ये क्या होता है महाराज?
बोले क्या होता है, ये तो सीधी बात है। इसमें शंका क्यों करते हो?
बोले महाराज सब कोई भी रोग हो और तिनका तोड़ के आप दे देते हो और फायदा होता है, ये कैसे होता है?
बोले देखो भाई। शरीर में पांच भूत हैं? बोले हैं। और ये तिनके में भी पांच भूत हैं? जल तत्व है, सूर्य के किरण, पृथ्वी के कण, पांच भूत हैं तिनके में भी। वो भी पांच भूत, ये भी पांच भूत, हम उठाते हैं तो संकल्प करते हैं कि इसका जो भूत कम ज्यादा है वो सेट हो जाए। तो भूत तो है, और क्या! अब तो जड़ भूत है, तो चेतन की तो आज्ञा मानेंगे कि नहीं मानेंगे? तो ठीक हो जाते हैं और क्या, इसमें क्या बड़ी बात है।
अब उनको तो बड़ी बात नहीं लगती और साइंटिस्ट का तो मुंह पौड़ा हो जाए। वो तो मर जाए ये मानने में तो। ऐसा, वो तो मानेगा ही नहीं।
अब बोले मानेगा तो ऐसा है, ऐसा है, उनके श्रद्धा का कारण हो गया, फलाना हो गया, ढिकना हो गया। उसके खोपड़ी में तो बैक्टीरिया ही घुसा हुआ है बस। डॉक्टर बोलेगा इसको ये बैक्टीरिया नहीं है, अंडे नहीं है, फलाना नहीं है, ढिकना नहीं है। बैक्टीरियावादी को बैक्टीरिया दिखता है, पित्त, कफ और वात वादी को वात, पित्त, कफ दिखता है। शरीर के कण वालों को कण दिखता है, तत्व वालों को तत्व दिखता है। लेकिन ओ ब्रह्मवेत्ताओं को तो सब ब्रह्म परमात्मा की लीला दिखती है।
वो सिद्ध क्या बोला?)
हे राम जी! तृणवत् जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्म तत्व में स्थित है...
(जगत को त्याग दिया मतलब कोई ऐसा नहीं कि लंगोटी पहन के भाग गया। जगत तो त्याग दिया माना ये तू-मैं की सत्यता त्याग कर सब की गहराई में उस परमेश्वर तत्व को जानता है, उसने जग को त्यागा। जगत को त्याग देने का मतलब है, जैसा जगत आपको दिखता है, ज्ञानी को भी आंखों से तो ऐसा ही दिखता है। लेकिन अंदर से वो ठीक से जानते हैं।
एक तेल का व्यापारी था, जरा तेजी में थोड़ा पैसा कमाया और गया राम जी की मूर्ति ले आया, 250 रुपये की, दो तोले की। फिर तेजी आई, तो हनुमान जी की मूर्ति ले आया, ज्यादा पैसा कमाया, 700 रुपये की। फिर मंदी आई, तो लगा लपड़क, तो थैली में डाल के माणिक चौक चला गया बेचने को। तो सोनी ने कहा कि तुम्हारे हनुमान जी के तो साढ़े पांच सौ मिलेंगे। और राम जी के 255, भाव सोने का बढ़ गया था थोड़ा।
बोले राम स्वामी हैं, और सेवक के तुम 550 देते हो, तो बेवकूफ कहीं के, स्वामी का तो भाव ज्यादा होना चाहिए।
उसने बोला, भाई स्वामी राम जी हैं, सेवक हनुमान जी हैं हम मानते हैं। तो राम जी भी तुम ले जाओ, हनुमान जी भी तुम ले जाओ, मेरे को तो ढाई तोला और पांच तोला सोना निकाल के दे दो बस।
अब ढाई तोला राम जी में से सोना निकाल दे, तो राम जी की मूर्ति कैसे रहेगी? और पांच तोला सोना हनुमान जी की मूर्ति से निकाल दे, तो फिर हनुमान जी... पहले सोना है, बाद में हनुमान की आकृति है। तो सुनार को तो सोना दिखता है, और भक्त को हनुमान जी दिखते हैं। सुनार बोलता है हनुमान जी तुम ले जाओ, मेरे को तो पांच तोला माल दे दो बस।
तो ऐसे ही, ज्ञानी को तो ब्रह्म दिखता है, और संसारियों को जगत दिखता है। जैसे सोनी को सोना दिखता है, ग्राहक को आकृति दिखती है। ऐसे संसारी को संसार दिखता है, और ज्ञानी को रॉ मटेरियल दिखता है, ब्रह्म। कैसी निगाह है देख लो। सो तो है।
पढ़ो जल्दी।)
हे राम जी! तृणवत् जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्म तत्व में स्थित है, उस महापुरुष को किसकी उपमा दीजिए। उस पुरुष के उदय, अस्त, अहं, त्वं आदिक सारी कल्पनाएं नष्ट हो गई हैं और केवल आत्म स्वभाव को प्राप्त हुआ है। उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है? जब दूसरा...
(उस सोऽहं स्वरूप को पाया, उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है? उसका आदि, अंत, ये वो सब आगम अपाय सब पूरा हो गया। उस ईश्वर स्वरूप को कौन सी उपमा दो? कोई गुरु बोलो, कोई साधु बोलो, कोई बापजी बोलो, कोई बुद्धू जी बोलो, कोई कुछ बोलो, कोई दिखाड़ो बोलो, बोलते रहो। उसको क्या उपाधि दोगे, क्या उपमा दोगे? एक शरीर में दिखते हुए भी करोड़ों-करोड़ शरीरों में व्याप रहा है। एक जगह दिखते हुए भी अखिल ब्रह्मांड में व्याप रहा है। सूर्य, नक्षत्र और चंद्रमा भी उसने घेर रखा है अपने स्वरूप में। उसको क्या उपाधि दोगे? ये तो तुम्हारे बीच है तो तुम नहीं जानो, तो तुम्हारी महिमा, तुम जानो। बाकी वो तो जो है, वही जान सकते हैं।
ज्ञानी को जानने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। ऊंधे माथे नहीं, ऊंधे माथे तो बहुत करते हैं। सीधे माथे तपस्या करें।
इसलिए गुरु गीता में लिखा है... वैसे भी शास्त्र कहते हैं माता, पिता और गुरु। जो कहते हैं, वो शास्त्र अनुकूल हो चाहे शास्त्र विरुद्ध हो, उनकी बात माननी हितकारी... हितकारी कहेंगे।
ऐसा भी आता है, जैसे 10 शिक्षक, एक आचार्य। 10 आचार्य, एक प्रधानाचार्य। 10 प्रधानाचार्य, एक पिता। 10 पिता बराबर एक माता।
हे माता रेणुका पानी भरने गई। सारस-सारसिका आपस में विहार देखा, उसके मन में आ गया हमारे पति जमदग्नि खाली ध्यान, भजन, सत्संग। मेरे तरफ तो देखते ही नहीं, हमें तो संसार का सुख ही नहीं। परशुराम का जन्म हुआ, बाद में ऋषी समझ गए। ऐ परशुराम, इधर आओ। पहले तो दूसरे लड़के को बुलाया कि तुम्हारी मां के मन में व्यभिचार आया, इसका गला काट दो। उसने नहीं काटा। परशुराम को बुलाया कि तेरी मां के मन में बुरे विचार आए, गला काट दे। परशुराम ने तो उठाया फरसा... अब माता, 10 पिता बराबर माता है, लेकिन अब पिता की आज्ञा है तो... जमदग्नि प्रसन्न हुए, बोलो बेटा क्या चाहते हो? मैं प्रसन्न हूँ। बोले पिताजी बस आप प्रसन्न हैं तो इतना ही वरदान दीजिए कि मेरी मां जीवित हो जाए और उसको पता नहीं चले कि मैंने गला काटा था।
आज्ञा पालने वाले की बुद्धि भी बड़ा काम कर देती है।
माता-पिता की आज्ञा, गुरु की आज्ञा पालने वाले की बुद्धि उसका बड़ा साथ देती है।
तो 10 आचार्य, एक प्रधानाचार्य। 10 प्रधानाचार्य, एक पिता। 10 पिता बराबर माता का दर्जा। ऐसी 84 लाख माताएं बराबर एक ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु होता है।)

बापू तो बापू ही है। ये आँधी अभी नहीं आई ऐसी कई बार आई है।

 


गांधीजी का आश्रम और अपना आश्रम उसी लाइन में लगता है। 

तो हम ऐसे तो कई भक्तों के लिए, तो उनसे मिलने के लिए अथवा कईयों को सत्संग देने के लिए तो जेल में गए लेकिन अभी इन आरोपों के बहाने हम बोलेंगे पहले हम ही आते है भाई चलो। 

अगर थाणे पर बैठ जाएं, पहले हमको लो। उधर का भी मजा लेते आएंगे क्या फर्क पड़ता है! पाप करना बुरा है, गलती करना बुरा है लेकिन झूठ-मूठ में कोई निंदा करता है या झूठ-मूठ में जेल मिलता है तो नानकजी भी तो जाकर आए थे, नानकजी को भी जेल हुई थी। तो क्या नानकजी अपराधी थोड़े थे! और चमके। अपन और चमक के आ जाएंगे क्या फर्क पड़ता है।

जयेंद्र सरस्वती को भी जेल में डाल दिया था तो और चमके । अब वो साजिश वाले क्या-क्या साजिश कर रहे हैं, मैं तैयार बैठा हूं। बहुत बहुत तो जेल जाना है। क्या खयाल है? तैयार हो! हां.. लेकिन फिर जेल भेजनेवालों को भी प्रकृति क्या करेगी वह फिर प्रकृति का विधान लेंगे, समझ जाएंगे । निर्दोष को कोई सताता है तो उसके ऊपर भी कुदरत का नाराजी होती है। नारायण हरि... नारायण हरि... ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... वासुदेवाय... प्रीतिदेवाय... भक्तिदेवाय... माधुर्यदेवाय... ममदेवाय... प्रभुदेवाय... ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... 


वो साजिश करने वाले अगर मेरे को जेल में भेजते हैं तो जेलवालों का तो भला हो जाएगा। मेरा कुछ बिगड़ता वाला नहीं। मेरा बिगड़ जाएगा कुछ? 

अरेऽऽऽऽ मेरे को तो गुरुजी ने वो ज्ञान दे रखा है कि सारी दुनिया के लोग उलटे होकर भी कुछ भी कर ले और शरीर का टुकड़ा-टुकड़ा हो जाए फिर भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ता, मैं आकाश से भी सूक्ष्म, चिदाकाश ब्रह्म वपु... चिद्-घन चैतन्य का क्या बिगड़ता है! और शरीर का सुधर-सुधर कर कब तक सुधरता है, एक दिन तो इसको जलना-मरना है, गड़ना है। मैं शरीर नहीं हूं। आप जो देखते हैं मुझे मैं वो मैं उतना ही नहीं हूं, वो ही नहीं हूं। अनंत-अनंत ब्रह्मांड जिसमें फुरफुराकर लीन हो रहे हैं मैं वो चैतन्य हूं। अएऽऽऽऽऽ हएऽऽऽऽऽ । 


नारायण... यह सत्रहवीं बार आया हूं तुम लोगों के बीच 16 बार पहले आ चुका हूं । सत्रहवीं बार आया हूं तन लेकर। नहीं तो सोचो! तीसरी पढ़ा हुआ और ऐसा कर सकता है? बताओ जरा! सोचने की बात है, तीसरी पढ़ा हुआ व्यक्ति इतना कुछ कर सकता है क्या परिवर्तन! प्रत्यक्ष बात है। कैसी-कैसी कहानी बनाते हैं कैसा कैसा लेख लिखते हैं, कैसी-कैसी बात! पढ़ते है तो अपने को आश्चर्य होता है । वो अपने मन का ही नमन... फिर बोलते हैं आश्रम का एक आदमी ने हमको यह बताया है।

वो लिखने वाले और बोलने वाले कुछ भी... आश्रम के ये.. वो... ऐसा है, वैसा है ऐसी ऐसी कहानी और नमन करते हैं गंदगी कि पढ़ने वाले को लगे कि अरररररररर आश्रम में ऐसा है अरररररररर ऐसा करते हैं, ऐसे हैं... इस बहाने भी देखने को आएंगे और मेरे को देखने के बाद सबको हो जाएगा कि बापू तो बापू ही है। ये आँधी अभी नहीं आई ऐसी कई बार आई है।

संग की बलिहारी है

 संग की बड़ी बलिहारी है । संग की बड़ी महिमा है। संग तार देता है और कुसंग डूबा देता है। इसीलिए संग करने के पहले जरा सोचना चाहिए कि आपके रास्ते का संग कर रहे हो कि आपसे गिरते हुए व्यक्तियों का संग कर रहे हो। गिरते हुए व्यक्ति आपके संपर्क में आए तो हरकत नहीं लेकिन आप उनके संग से रंगे नहीं जाना। गुरुदेव बार-बार कहा करते थे- "गुलाब के फूल बनना।" 
गुलाब का फूल कंदोई की दुकान पर रखो, खांड वाले के दुकान पर रखो, गुड़ वाले की दुकान पर रखो, कपड़े वाले के दुकान पर रखो, अरे निदान घी वाले की दुकान पर रखो, सब जगह से घुमाकर आओ, फिर सूंघोगे तो किसी का रंग उस पर चढ़ेगा नहीं, किसी की बू उस पर आयेगी नहीं, गुलाब अपनी खुशबू देगा। ऐसे ही साधक अपने ईश्वर की तरफ के रंग से और रंगो को चढ़ने ना दे। 
"तू गुलाब होकर महक तुझे जमाना जाने"।
 जैसे गुलाब निर्लिप्त रहता है, ऐसा तू निर्लिप्त होकर महक तो तुझे जमाना जाने!  -ऐसा महापुरुषों का कहना है।

जन समुदाय में प्रीति है तो ज्ञान में रूचि कैसे होगी ?

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।विवक्तदेशसेवित्वरतिर्जनसंसदि ।।

“मुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना (यह ज्ञान है)।”
(भगवद् गीताः १३-१०)

अनन्य भक्ति और अव्यभिचारिणी भक्ति अगर भगवान में हो जाय, तो भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं है। भगवान प्राणी मात्र का अपना आपा है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पति के सिवाय अन्य पुरूष में पतिभाव नहीं रखती, ऐसे ही जिसको भगवत्प्राप्ति के सिवाय और कोई सार वस्तु नहीं दिखती, ऐसा जिसका विवेक जाग गया है, उसके लिए भगवत्प्राप्ति सुगम हो जाती है। वास्तव में, भगवत्प्राप्ति ही सार है। माँ आनन्दमयी कहा करती थी – “हरिकथा ही कथा…… बाकी सब जगव्यथा।”

मेरे अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना और जन समुदाय में प्रीति न होना…. इस प्रकार की जिसकी भक्ति होती है, उसे ज्ञान में रूचि होती है। ऐसा साधक अध्यात्मज्ञान में नित्य रमण करता है। तत्त्वज्ञान के अर्थस्वरूप परमात्मा को सब जगह देखता है। इस प्रकार जो है, वह ज्ञान है। इससे जो विपरीत है, वह अज्ञान है।

हरिरस को, हरिज्ञान को, हरिविश्रान्ति को पाये बिना जिसको बाकी सब व्यर्थ व्यथा लगती है, ऐसे साधक की अनन्य भक्ति जगती है। जिसकी अनन्य भक्ति है भगवान में, जिसका अनन्य योग हो गया है उसको जनसंपर्क में रूचि नहीं रहती। सामान्य इच्छाओं को पूर्ण करने में, सामान्य भोग भोगने में जो जीवन नष्ट करते है, ऐसे लोगों में सच्चे भक्त को रूचि नहीं होती। पहले रूचि हुई तब हुई, किन्तु जब अनन्य भक्ति मिली तो फिर उपरामता आ जायेगी। व्यवहार चलाने के लिए लोगों के साथ ‘हूँ…हाँ…’ कर लेगा, पर भीतर महसूस करेगा कि यह सब जल्दी निपट जाय तो अच्छा।

अनन्य भक्ति जब हृदय में प्रकट होती है, तब पहले का जो कुछ किया होता है वह बेगार-सा लगता है। एकान्त देश में रहने की रूचि होती है। जन-संपर्क से वह दूर भागता है। आश्रम में सत्संग कार्यक्रम, साधना शिविरें आदि को जन-संसर्ग नहीं कहा जा सकता। जो लोग साधन-भजन के विपरीत दिशा में जा रहे हैं, देहाध्यास बढ़ा रहे हैं, उनका संसर्ग साधक के लिए बाधक है। जिससे आत्मज्ञान मिलता है वह जनसंपर्क तो साधन मार्ग का पोषक है। जन-साधारण के बीच साधक रहता है तो देह की याद आती है, देहाध्यास बढ़ता है, देहाभिमान बढ़ता है। देहाभिमान बढ़ने पर साधक परमार्थ तत्त्व से च्युत हो जाता है, परम तत्त्व में शीघ्र गति नहीं कर सकता। जितना देहाभिमान, देहाध्यास गलता है, उतना वह आत्मवैभव को पाता है। यही बात श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने कहीः

गलिते देहाध्यासे विज्ञाते परमात्मनि।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।।

जब देहाध्यास गलित हो जाता है, परमात्मा का ज्ञान हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ समाधि का अनुभव होता है, समाधि का आनन्द आता है।

देहाध्यास गलाने के लिए ही सारी साधनाएँ हैं। परमात्मा-प्राप्ति के लिये जिसको तड़प होती है, जो अनन्य भाव से भगवान को भजता है, ‘परमात्मा से हम परमात्मा ही चाहते हैं…. और कुछ नहीं चाहते…..’ ऐसी अव्यभिचारिणी भक्ति जिसके हृदय में है, उसके हृदय में भगवान ज्ञान का प्रकाश भर देते हैं।

जिस माला से परमात्मा के साथ संबंध जोड़ा जाता है उस माला का मूल्य हम लोग नहीं जानते। जानिए कैसे ला सकते हैं अपनी माला में दिव्यता - बता रहे हैं पूज्य बापूजी

https://youtu.be/V7ah2asLJHU

शास्त्रों के अनुसार जपमाला जाग्रत होती है, यानी वह जड़ नहीं, चेतन होती है । माना जाता है कि देव शक्तियों के ध्यान के साथ-साथ अंगूठे या उंगलियों के अलग-अलग भागों से गुजरते माला के दाने आत्मा ब्रम्ह को जागृत करते हैं । इन स्थानों से ‘दैवीय उर्जा’ मन और शरीर में प्रवाहित होती है । इसलिए यह भी देवस्वरूप है। जिससे मिलनेवाली शक्ति या ऊर्जा अनेक दुखों का नाश करती है ।

यही कारण है कि मंत्रजप के पहले जपमाला की भी विशेष मंत्र से स्तुति एवं पूजा करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है । 
भगवन्नाम की दीक्षा देने वाले महापुरुष जब मंत्र दीक्षा देते हैं और साधक जपने लग जाता है तो साधक के पांच शरीर शुद्ध होने लगते हैं। 84 नाड़ियां भगवन्नाम से पावन होने लगती है । 26 उपत्काओं में भगवन्नाम का प्रताप पहुंचने लगता है। लिंग पुराण में लिखा है:

 _जपेन पापं शाम्येत शेषंयत्कृतं जन्मपरंपराषु ।_
_जपेन भोगान् जपेन च मृत्यु जपेन सिद्धिं लभते च मुक्तिं॥_ 

भगवन्नाम जपने के द्वारा अनेक जन्मपरंपराओं, कई जन्म की परंपराओं के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।
भगवन्नाम जपते सभी प्रकार के सुखभोग खींचकर आने लगते हैं। भगवत्नाम जप प्राप्ति करते जप के द्वारा मुक्ति भी सुलभ 
हो जाती है और प्रज्ञा में प्रकाश होने लगता है। भगवन्नाम का प्रारम्भ करते समय जरा माला-वाला जपने की प्रेक्टिस नहीं है तो कठिन लगता है लेकिन प्रेक्टिस हो जाए तो माला बहुत काम देती है क्योंकि माला मध्यमा उंगली और अंगूठे के मेल से घुमाई जाती है। इससे क्या कि अंगूठे में जो तीन पाईंट है : एक सुमृति की है, एक प्रज्ञा की है, एक कार्यक्षमता की है, ये तीनों पाईंटें माला जपने से सजग रहती है और भगवान के नाम से बाकी के लाभ होते रहते हैं। तो प्रतिदिन माला जपने का अभ्यास.... आरंभ में के.जी. में जाते हैं ना बच्चे 1, 2.. लिखने अथवा ए.बी.सी.डी. लिखना कठिन लगता है लेकिन हाथ जम जाता है तो आसान हो जाता है ऐसे ही पहले माला पर जप करते-करते बाद में आठ-दस.. दस माला हो गई थोड़ी देर बैठे रहे। और जप करते-करते अपने आप को छोड़ दिया तो अंदर की शक्तियां जागृत होने लगेगी। कभी ऐसा झटका आएगा तो आप डरना नहीं और कुछ रोकना नहीं अंदर की छुपी हुई शक्तियों जागेगी कभी प्रकाश दिखेगा कभी हंसी आएगी कभी भगवान कहते भागवत में : 

वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
हसति क्वचित् रुदत्यभीक्ष्णं।
उद्गायन्ति विलज्जै नृत्यनंति च
मद्भक्तियुक्ता भुवनं पुनाति ॥

कभी वह हंसने लगता है, कभी रोने लगता है । कभी गला भर जाता है । कभी लज्जा छोड़कर नाचने लग जाता है। उद्धव ऐसा मेरा भक्त त्रिभुवन को पावन करने वाला हो जाता है।

तो हम जप कराते हैं या मंत्र देते हैं तो यह कहते हैं कि जप-ध्यान करो तो आसन बिछाकर करना चाहिए क्योंकि जैसे जनरेटर घूमता है तो विद्युत बनती है वैसे भगवान के नाम की पुनरावृति से एक आध्यात्मिक बिजली बनती है । तो आसन बिछाए बिना जो जप होता है तो अर्थिंग मिलने के कारण जप की विद्युत धरती में चली जाती है। इसीलिए आसन बिछाकर जप करना चाहिए।

जप के समय मन को एकाग्र कैसे करें?

मानो किसी का मन बहुत चंचल है, एकाग्र नहीं होता तो जप करते जाए और दाने पर त्राटक करते जाए, देखते जाएं। जब उंगली दाने पर आए मंत्र बोला और फिर दूसरे दाने को देखा। तो मन दाने को देखने में और जपने में दो काम होने से चंचलता कम कर देगा। नजर... और जपते जाएं, इससे मन की एकाग्रता में मदद मिलेगी दूसरा उपाय है कि अगर खुला आकाश है और अच्छा लगता है तो आकाश में निगाह टिकाए और जप करते जाएं। तीसरा उपाय है जिसमें प्रीति हो, ओंकार में अथवा इस प्रकार के स्वस्तिक में तो उसकी आकृति, चित्र सामने रखें । न ऊपर देखें न नीचे, बिल्कुल बराबरी में रखें, उस पर टिकीटिकी लगाकर देखें अथवा कोई हयात जागृत महापुरुष हो, उनका चित्र पर एकाकार होने का अवसर मिलता है तो इससे भी मन की एकाग्रता में मदद मिलेगी।

 *सावधानियां* 
 _मंत्र जप का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए_ 

अमावस्या पूर्णिमा और पर्व के दिन मौन, जप-उपवास आदि से नाड़ियों का शोधन होता है। रोज दस प्राणायाम करने से विधिवत सुबह और दोपहर को करें तो एक महीने में सारी नाड़ियां शुद्ध होकर जापक को चमत्कारिक लाभ, आनंद प्राप्त हो सकता है। प्याज, लहसुन, मूली, आलू स्वास्थ्य के लिए और भक्ति के लिए विशेष हितकारी नहीं है । भैंस का दूध की अपेक्षा गाय का दूध साधन भजन वाले के लिए हितकारी है। मासिक धर्म में महिलाएं हों तो अपने हाथ से भोजन बनाकर पति को या बच्चों को ना खिलाएं, उनकी बुद्धि के विकास में, ओज में रुकावट आती है। इस प्रकार निगुरे लोगों से ज्यादा संपर्क या उनकी खुशामद में अथवा उनके हाथ का खानपान से थोड़ा बचें तो अपनी भक्ति के धर्म की रक्षा होगी। कभी-कभार महीने-दो महीने में दो दिन, चार दिन एकांत में चला जाए, जप-ध्यान और मौन तो बहुत सारी शक्तियां जल्दी जागृत होगी । चार-छह महीने में एक हफ्ता आश्रम में आ जाए, ध्यान योग, मौन में बैठ जाए तो गजब के फायदे होते हैं। तो आपके अंदर बहुत सारी संभावनाएं छुपी है, बहुत सारी योग्यताएं छुपी है, गुरुमंत्र के द्वारा, मौन के द्वारा, सत्कर्मों के द्वारा आप सारे दुखों को मिटाकर अपने हृदय में परमात्मा का आनंद, परमात्मा का ज्ञान, परमात्मा का माधुर्य पाकर सदा के लिए मुक्त आत्मा हो जाओ।

 *माला पूजन क्यों करना चाहिए?* 

अपनी माला दूसरे को नहीं देनी चाहिए और दूसरे की माला अपने नहीं जपनी चाहिए । सामान्य चैतन्य सब में है तो माला में भी सामान्य चैतन्य परमात्मा है और माला को जब पीपल के पत्ते पर रखकर उसको ग्रहण किया जाता है, पीपल के पत्ते पर रखकर "माले माले महा माले..." ऐसा जप करके, थोड़ा ध्यान करके "भगवान की दिव्यता, भगवान की चेतना इस माला में प्रवेश करो" ऐसी भावना करने के बाद, माला के दाने खंडित ना हो फिर तुलसी की हो, चंदन की हो, रुद्राक्ष की हो, मणियों की हो, स्वर्ण की हो, जैसी हो, ये ईष्टसिद्धि नाम की पुस्तक में शायद वर्णन है, माला विषयक।
तो पीपल के पत्ते पर रखकर माला को और उसमें दिव्यता अर्पित रखे, भगवान का ध्यान करके फिर अगर माला जपी जाए उस माला का जप अद्भुत होता है और माला को पवित्र जगह पर रखनी चाहिए । नाभि से नीचे के हिस्से में माला स्पर्श न करें, माला न घूमे और दूसरे की नजर भी ना पड़े तो अच्छा है माला गोमुखी में हो अथवा वस्त्र में हों ऐसे करके घूमे। जिस माला से परमात्मा का नाम लिया जाता है और जिस माला से परमात्मा के साथ संबंध जोड़ा जाता है उस माला का मूल्य हम लोग नहीं जानते। माला जपते-जपते कहीं रख दिया, कहीं रख दिया.. नहीं । माला का एक-एक मनका जो है उसमें, सामान्य चैतन्य तो सबमें है, लेकिन जब माला में आपने भावना की और प्राण प्रतिष्ठा जैसे मूर्ति में करते हैं तो वह भगवान हो जाती है ऐसे ही माला भी, माला... माला महालक्ष्मी, माला महान विद्या, माला वास्तविक में मातृ। तो जिसमें मन 'ल' हो जाए, जिसका सहारा लेकर मन परमात्मा में 'ल' हो जाए उसका नाम 'माला'।
"माले माले महा माले" ऐसा करके माला का जप करके माला को ग्रहण करने के बाद उसकी पवित्रता जो संभालता है उस साधक का मन दिव्यता की तरफ जाता है, निष्कामता की तरफ जाता और ध्यान भजन में रुचि होती है । प्रतिदिन एक हजार जप करने से आदमी का पतन नहीं होता है। 
मंत्र त्यागाद् दरिद्रता ! 
मंत्र का त्याग करने वाला दरिद्र होता है। धन का दरिद्र न हो तो विचारों का दरिद्र तो हो ही जाता है, आनंद का दरिद्र तो हो ही जाता है। तो हम लोग जब दुखी होते हैं, अशांत होते हैं, बेचैन होते है तो थोपते हैं कि फलाने ने मेरा अपमान किया, फलाने ने विघ्न लाया लेकिन हमारे पुण्यों की जब कमी होती है तभी हम दुखी होते तभी बेचैन होते अन्यथा बेचैनी या दुख दूसरा कोई नहीं दे सकता।

को काहू को नहीं सुख-दुख करि दाता।
निज कृत कर्म भोगतहिं भ्राता॥
तो जब-जब दुख हो, अशांति हो, बेचैनी हो तब-तब समझें कि हमारा जप-तप, साधन-भजन में कहीं न कहीं गड़बड़ है। कहीं ना कहीं उससे लापरवाही की।

माला पूजन विधि के लिए आवश्यक सामग्री

पूजन के लिए आवश्यक सामग्री
दो थालियां, एक माला पूजन के लिए दूसरी सामग्री रखने के लिए।
दो कटोरी, दो चम्मच अपने उपयोग के लिए एवं पूजन के लिए ।
पूजा की थाली में पीपल के 9 पत्ते, गंगाजल, पंचगव्य, चंदन, कुमकुम, फूल, तुलसी पत्ते, कलावा, धूपबत्ती, कपूर, माचिस, दीपक और अक्षत ।

पूजा कैसे करें ?

पूजा की थाली में पीपल का एक पत्ता बीच में और बाकी आठ को अगल-बगल इस ढंग से रखें कि ‘अष्टदल-कमल’ जैसा आकार बने । बीच वाले पत्ते पर अपनी जपमाला, करमाला और पहननेवाली माला रखें । पीपल एवं तुलसी के पत्ते रविवार के दिन नहीं तोड़ते हैं, अगर रविवार के दिन माला पूजन करना है तो पत्ते एक दिन पहले तोड़कर अवश्य रख लें ।
तीन बार ‘हरि ॐ’ का गुंजन करेंगे ।
हरि ॐ…
हरि ॐ....
हरि ॐ....

सर्वप्रथम प्रथम पूज्य गणेशजी, अपने सदगुरुदेव या इष्ट देव और माला देवी का पूजन करेंगे।

ॐ गं गणपतये नमः ।
ॐ श्री गुरुभ्यो नमः ।
ॐ श्री सरस्वत्यै नमः ।
ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः ।

आचमन 

यह मंत्र पढ़ते हुए तीन बार आचमन करें :
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।

यह मंत्र बोलते हुए हाथ धो लें ।
ॐ गोविंदाय नमः ।
इति हस्तं प्रक्षाल्य:

पवित्रीकरण :
मंत्र पढ़कर बाएं हाथ में जल लेकर पवित्रीकरण की भावना करते हुए हाथ से अपने शरीर पर छिड़कें।

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा ।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतर शुचि:।।

तिलक :
पूजन की थाली में से थोड़ा कुमकुम मिश्रित चंदन निकाल कर अपने ललाट पर तिलक कर लें। 

चंदनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
आपदां हरते नित्यं लक्ष्मीः तिष्ठति सर्वदा ॥

रक्षासूत्र बंधन :
हाथ में मौली बांध लें।

सूचना
भाई दाहिने हाथ में मौली बांधे ।
बहने बाएं हाथ में मौली बांधें।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

प्रार्थना

हाथ जोड़कर प्रार्थना करें।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुर्साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।

माला-स्नान :

अब पीपल के पत्तों पर रखी माला की थाली को अपने सामने रख लें और स्नान का मंत्र बोलते हुए माला को गंगाजल से स्नान कराएं।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेsस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः । स्नानं समर्पयामि ।

पंचगव्य स्नान :

अब इस मंत्रोचार के साथ माला को पंचगव्य से स्नान कराएं ।

पयोदधि घृतं चैव गोमूत्रम च कुशोदकम्। गोमयेन समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥

ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः । पंचगव्य स्नानं समर्पयामि ।

शुद्धोदक स्नान :
अब माला को शुद्ध जल से स्नान कराएं ।
ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः । शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ।

माला को गोल आकार बना कर पीपल के पत्ते पर मेरू ऊपर रहे इस प्रकार थाली में रख दें । अब इस मंत्र को बोलते हुए माला को कुमकुम मिश्री तो चंदन से तिलक करें व अक्षत चढ़ाएं।

चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् । आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मी: तिष्ठति सर्वदा॥

ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः । गंधं समर्पयामि ।

अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः ।
मया निवेदिता तुभ्यं गृहाण परमेश्वरी ॥

ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः । अक्षतआन् समर्पयामि ।

माला को तुलसी पत्र और पुष्प चढ़ाएं।

तुलसी हेमरूपांच रत्नरूपा च मंजरिं ।
भवमोक्षप्रदां रम्यां अर्पयामि हरिप्रियाम् ॥

ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः । तुलसीदलं समर्पयामि ।

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वे प्रभो।
मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः। पुष्पं समर्पयामि ।

अब गौ चंदन धूपबत्ती जलाकर माला को दाहिने हाथ से धूप दें।

वनस्पति रसोद्भूतो गन्धाढयो गन्ध उत्तम:।
आघ्रेय : सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ 

ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः। धूपमाघ्रापयामि ।

दीया जलाकर माला को दीप दिखाएं। पश्चात कपूर जलाकर माला की आरती करें।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम् ।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥

माला में इष्टदेव की प्रतिष्ठा की भावना से प्रार्थना करें ।

प्रतिष्ठा सर्वदेवानां मित्रा वरुण निर्मिता । प्रतिष्ठां ते करोम्यत्र मण्डले दैवते : सह ॥

अखण्डानन्दबोधाय शिष्यसंतापहारिणे । सच्चिदानन्दरूपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

दोनों हाथ जोड़कर माला में अपने सदगुरुदेव अथवा इष्ट देव की भावना करते हुए माला को प्रार्थना करें।

माले माले महामाले सर्वतत्त्व स्वरूपिणी । चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्ततस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ त्वं माले सर्वदेवानां सर्वसिद्धिप्रदा मता। 
तेन सत्येन मे सिद्धिं देहि मातर्नमोऽस्तु ते ॥
त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव ।
शिवं कुरुष्व मे भद्रे यशो वीर्यं च सर्वदा ॥

 ‘हे माले ! हे महामाले !! आप सर्वतत्व स्वरूपा हैं । आपमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चारों पुरुषार्थ समाये हुए हैं । इसलिए आप मुझे इनकी सिद्धि प्रदान करने वाली होईये । हे माले ! आप सभी देवताओं को समस्त सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली मानी जाती हैं । अतः मुझे सत्यस्वरूप परमात्मा की प्राप्तिरूपी सिद्धि प्रदान कीजिये । हे माते ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ । हे माले ! आप मुझे सभी देवताओं तथा परम देव परमात्मा की प्रसन्नता प्रदान करने वाली होईये, शुभ फल देनेवाली होईये । हे भद्रे ! आप सदैव मुझे सत्कीर्ति और बल दीजिये और मेरा कल्याण कीजिये।’
इस प्रकार माला का पूजन करने से उसमें परमात्म-चेतना का आविर्भाव हो आता है।
इसके पश्चात अपने गुरु मंत्र की एक माला करें। अब अपनी माला को दोनों हाथों से हार की तरह उठाकर सामने पकड़े रखें और अपने गुरुदेव के गले में माला पहना रहे हैं, ऐसी भावना करें और गुरुदेव से प्रार्थना करें कि "हे मेरे इष्ट देव ! हे गुरुदेव! आप जड़ और चेतन सबमें विराजमान हैं। जिस चैतन्य स्वरूप आत्मतत्व में आप नित्य स्थित हैं उसमें हम भी आपके दिए हुए चेतन मंत्र को जपते हुए सर्वदा प्रतिष्ठित हो, ऐसी हम पर कृपा करें।"

 जिन्होंने मंत्र दीक्षा नहीं ली है वे अपने इष्टदेव का स्मरण और प्रार्थना कर सकते हैं । 
दोनों हाथ ऊपर करके तीन बार बोलेंगे:
ॐ तं नमामि हरिं परम् 
ॐ तं नमामि हरिं परम् 
ॐ तं नमामि हरिं परम् 

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जब राम तीर्थ ने किया रिजाइन ! ईश्वर साक्षात्कार था कारण

https://youtu.be/49FzyvcX8RI

          मन के मौन से मानसिक शक्तियों का विकास होता है। बुद्धि के मौन से, बुद्धि के मौन से आत्मशक्ति का विकास होता है। जितना बाहर का कम देखना,सुनना,सोचना उतना ही मौन में सफ़लता ज्यादा आसानी से। घर में अथवा कहीं भी साधना की जगह पर एक ऐसा आसान लगा देना चाहिए या तो पूर्व या तो उत्तर की तरफ बैठकर वहां साधन किया जाय और वो साधन तुम्हारी छुपी हुई शक्तियों को जगाने वाला हो और वहां पर वो साधन के परमाणु इकट्ठे हो जाते है। फिर तुम कितने भी बाहर बिखरे हो, थके हो, चंचल हो लेकिन वो साधना की जगह पर जाने से ही शांति और दिव्य विचार, दिव्य परमाणु सहायक बन जाते है। 

          जिसके जीवन में अपने स्थूल शरीर से सर्वहितकारी प्रवृत्ति कर लिया, हृदय से सरल रहे और बुद्धि से किसीका बुरा न सोचे निर्णय करे और लोको से असंग रहे जिससे आत्मशक्ति का खज़ाना बढ़ेगा। मस्तक में १० अरब, १ अरब मे १०० करोड़ होता है, १ करोड़ मे १०० लाख होता है तो १० अरब अपने दिमाग में न्यूरॉन्स है विज्ञानी अभी कहते है लेकिन योगियों ने उन न्यूरॉन्स को, विज्ञानी न्यूरॉन्स कहते है, योगी सूक्ष्म कोष कहते है। एक -एक कोष एक -एक नक्षत्र के प्रतिनिधित्व कर सकता है। उन न्यूरॉन्स में आत्मा की ऊर्जा जितनी अधिक आए उतना ही वो व्यक्ति प्रभावशाली, इस जगत में भी उथल-पुथल कर सकते है । जैसे विश्वामित्रजी उन्होंने मकई बनाई । पहले तो विलासी राजा थे । फिर देखा की संसार में अपनी एनर्जी नष्ट हो रही है । भोग भोगने में संयम किया , मौन रहे, एकांत में रहे, साधना किया, अपनी शक्तियों को एकाकार किया तो फिर उनको मौज आ गई कि ब्रह्माजी ने गेहूं बनाया, जौ बनाया, चावल बनाया तो मैं भी अपनी सृष्टि मैं बनाऊंगा । तो मकई जो है वो विश्वामित्र ने बनाई। मकई है, बाजरी है , ज्वार है, नारियल है ये विश्वामित्र ने बनाया। 
         ईश्वर अगर अपने से अलग मिलेगा तो आधा मिलेगा और मिलेगा तो चला जायेगा। ईश्वर अपने से दूर होगा, अलग होगा और अलग होकर मिलेगा तो आधा मिलेगा, दूर रह जायेगा। तो जिसको भी ईश्वर मिला है तो अपना जीवत्व और ईश्वरत्व में एकाकारता से ईश्वर की पूर्ण अनुभूति होती है। ईश्वरत्व की अनुभूति होती है और ईश्वर के ऐश्वर्य में एकाकार होने के लिए एकाग्रता सामर्थ्य देती है। 

         संसार की जो प्रवृति है, संसार के जो काम है उसमें शक्ति का ह्रास होता है। सुबह उठ कर शांति शक्ति होती है काम करते करते शाम को हय....। तो संसार में और संसार के सुखभोग में शक्ति का ह्रास होता है। ध्यान में और आत्मा की शक्ति का, आत्मा के आनंद-भोग में शक्ति का संचय होता है। तो शक्ति का ह्रास होनेवाला व्यक्ति सुरा-सुंदरी अर्थात सेक्स की और नशे की उसको आवश्यकता लगती है शारीरिक-मानसिक थकान वाले को। लेकिन जो ध्यान करता है उसको सेक्स की, शराब की जरूरत नहीं है, उसका अपना आत्मा का आनंद आता है उससे वो प्रसन्न तो रहता है लेकिन ये १० अरब न्यूरॉन्स है वो भी पुष्ट होते है, उनको भी एनर्जी मिलती रहती है और जो संसार की प्रवृत्ति में ज्यादा लगता है उसकी शक्ति का ह्रास होता है तो फिर शराब और सुंदरी और मादक द्रव्यों से उनके न्यूरॉन्स, सूक्ष्मकण और कुंठित हो जाते है। इसीलिए उनकी योग्यता ऑर्डिनरी साधारण होती है और जो शांत रहते है उनकी योग्यता निखरती है, बढ़ती है। जो ज्यादा नहीं बोलते है तो उनमें मनन करने की शक्ति होती है। जो ज्यादा ठांस-ठांस के नही खाते तो उनको पचाने की शक्ति बरकरार रहती है।जो ज्यादा नबही सोते, ज्यादा नहीं जगते, ज्यादा खर्चाल नहीं और ज्यादा कंजूस नही, इस प्रकार ठीक-ठीक युक्ताहारविहार करते- ऐसे लोग प्रतिदिन चार घंटे अगर साधना के लिए निकाले तो नौकरी-धंधा के लिए जो हाथ फैला रहे, हाथा-जोड़ी कर रहे उसमें तो धना-धन होने लग जाए और ईश्वर प्राप्ति का रास्ता ज्यों-ज्यों आनंद बढ़ता जाए तो वो भी सब फीका हो जाए । फिर तो रामतीर्थ की नाईं है:- "प्रभु अब दो-दो काम नहीं होता । एक तो तेरे आंनद में रहना और फिर प्रोफेसर होकर पढ़ाने जाना । अब दो-दो काम नहीं होते ।" 
       रिजाइन कर दिया, और गहरे उतरे और परमात्मा का साक्षात्कार पूरा कर लिया। ईश्वर से अलग बना था वो भी पूरा हो गया। अमेरिका में गये तो वहां का राष्ट्रपति मिस्टर रूजवेल्ट उनके चरणों में आकर बड़ी शांति, बड़ा ज्ञान पाकर सुख का आनंद का अहसास करता।
        तो जो कम बोलते है और ध्यान करते तो संकल्प विकल्प कम होते है।निश्चयात्मिका बुद्धि रखते तो बुद्धि में भी शांति और असंगता आती है तो फिर वो आत्मा परमात्मा में ठहरती है। जैसे बिल्लोरी कांच ठहरता है तो सूर्य की दाहक शक्ति, प्रकाशिनी शक्ति पदार्थ में प्रवेश हो जाती है ऐसे ही अपना चित्त शांत होता है तो सर्वव्यापक परमेश्वर की सत्ता उसमें अधिक आती है। सूर्य का प्रकाश तो सर्वत्र है लेकिन बिल्लौरी कांच स्थिर होता है तो वहां उसकी दाहक शक्ति। एक बिल्लौरी कांच खड़ा करो तो वहां उसकी दाहक शक्ति लेकिन हजार-लाख-दस लाख बिल्लौरी कांच रख दिए जाएं तो दस लाख जगह पर उसकी दाहक शक्ति प्रकट होगी एक ही सूर्य से । ऐसे दस लाख योगी योग करे तभी भी एक ही सर्वेश्वर परमात्मा की सत्ता से उनमे सामर्थ्य आ जायेगा। दस लाख मिनिस्टर नहीं बन सकते हैं लेकिन दस लाख महापुरुष, दस लाख उत्तम साधक बन सकते है।

      तो आप अपने-अपने घर में उत्तम ढंग की साधना का इरादा पक्का करो। अपने हल्के मन की पसंद का काम करने से वासना बढ़ेगी । न्यूरॉन्स और आपका मन कमज़ोर हो जाएगा। शास्त्र और गुरु के सम्मत साधन करोगे तो वासना मिटेगी। वासना मिटेगी तो बुद्धि में स्थिरता आएगी, मन में चांचल्य कम आएगा, वाणी में संयम आएगा और आपका बल बढ़ेगा । फिर विश्वामित्र की नाईं आप सृष्टि बनाएं इतना बल न भी पाएं कम से कम अपना गृहस्थी जीवन सुख पूर्वक जिए और जीवन की शाम हो, मौत आए उसके पहले मौत जिसकी होती है वो मैं नही हूं, मौत होती है शरीर की और शरीर ऐसे कई मिले और मर गए तो मैं कोन हूं उसको खोजकर उस परमात्मा में एकाकार होने का जम्प मार सके इतना तो काम कर ही लेना चाहिए।

       तो बाहर की बाते कम सुने, कम बोले, कम सोचे और उनकी लालच कम करे। ये आज कल की जो फिल्मी दुनिया और टीवी-बीवी बड़ी हानि करती है। टेलीफोन की सहूलतों ने भी बड़ी हानि कर दी, आदमी को बाहर ले गए, बिखेर दिया। अकेले आए हैं-अकेले जाना है तो अकेले बैठने का अभ्यास करो। अभी हम इधर से गए तो लोकों से थोड़ी मिले, अपने अकेले जगह पे रहे, पुष्ट होके आगए। मिलते रहते तो फिर अभी ऐसा थोड़ी निकलता। तो अकेले में भी आलस्य न हो जाए, मन इधर-उधर न हो जाए तो उच्चारण किया भगवतस्वरूप का, फिर एकाकारता का अभ्यास किया, शास्त्र पढ़े, पढ़ते-पढ़ते, जैसे जीवन रसायन पुस्तक है अथवा गीता है, उपनिषद है थोड़ा पढ़ा और इसमें वैदिक बाते हैं, तत्वज्ञान की, उपनिषदो की बाते है, ऊंची ऊंची बाते मन उर्ध्वगामी हो जाए उसी विचारो में थोड़ी देर शांत.....
दिन में दस बीस बार जीवन रसायन पुस्तक देखे, विचारे इससे मनोबल, बुध्दिबल, संकल्पबल का विकास और साथ साथ में शुद्धिकरण भी होगा फिर आत्मबल में प्रवेश पाने में मदद मिलेगी ये है तो दिखने में जरा सी पुस्तक लेकिन है उपनिषदों का सत्व-सार। ऐसे और भी जो भी आप को अच्छी उपनिषद शास्त्र दिखे। वाणी के मौन से शक्ति, मन के मौन से शांति और बुद्धि के परम मौन से परम पुरुष परमात्मा का साक्षात्कार। एकदम पूर्ण परमात्मा को पाने के लिए आठ चीज़ों की जरूरत है।
एक तो सदाचार, झूठ-कपट-चोरी-बेईमानी हृदय खराब होगा उस को छोड़ दे, सदाचार का व्यवहार करे।

दूसरा सबके हित की सोचे। हितकारी प्रवृत्ति सेवा जितनी हो जाए कर लिया बस...।

तीसरा चरित्र अच्छा रखे। खान-पान या बुरी नजर से किसी स्त्री को, पुरुष को न देखना, ब्रह्मचर्य का थोड़ा-बहुत पालन करना। 
सुख मिल जाए तो उस में अभिमान न करे।
दुख मिल जाए तो ये बेवकूफी न करे कि मैं दुखी हूं।
 *को काहू को नही सुख-दुख करि दाता।* 
 *निज कृत कर्म भोगहि भ्राता* 
अपने ही कर्म के फल आ-आ के चले जाते है। उससे चिपके नही। अपने परमात्म स्वभाव में चिपके रहे। सुख आ के चला जाएगा, दुख आ के चला जाएगा। हम सुख को चिपकते रहते है और दुख से डरते रहते है तो न सुख में निश्चिंत है न दुख में निश्चिंत है। 
 *सुख स्वप्नना दुख बुलबुला* 
 *दोनो है मेहमान* 
इंह ये छो तो करे... ये ऐसा क्यों करता है...ये ऐसा... ये तो दुनिया है। ढिंढोरा होता रहता है। ऐसा क्यों न करे !.....ऐसा ये क्यों करे! क्यू न करे!.....इस झंझट में क्यू पडु!
 *मन तू राम भजन कर जग मरवा दे, नर्क पड़े ने पड़वा दे।* 
इस प्रकार का दृढ़ विचार करके अपने मन को बार बार भगवान में लाए। कभी कभी नही लगे तो पंजों के बल से जैसे ऐसे कीर्तन करते ऐसा थोड़ा किया। फिर बैठे। लंबा उच्चारण करे जितनी देर उच्चारण करे उतना देर शांत हो शांति....आनंद.... 
तो अपना आत्मा परमेश्वर शांत स्वरूप है , आनंद स्वरूप है, सत स्वरूप है। संसार असत स्वरूप है, दुख स्वरूप है और जड़ है। हाथ को पता नहीं मैं हाथ हूं, मकान को पता नही मैं मकान हूं, पैसे को पता नही मैं पैसा हूं लेकिन आप को पता है मैं हूं। पता है ना?....तो आप चेतन हुए। शरीर जड़ है तो आपकी चेतना लेकर शरीर चलता है। तो शरीर को मैं माना और मैं गुजरात। गुजरात को पता नहीं मैं गुजरात हूं हम लोगो ने नाम रखा ये गुजरात, ये महाराष्ट्र, ये यूपी , ये फलाना । तो ये मन की कल्पना से व्यवहार चलता है। तो व्यवहार के लिए कल्पना वाला व्यवहार कल्पना में लेकिन ध्यान के समय कोई कल्पना नहीं। 
ॐ शांति... ईश्वर में हम....

       दांतो के मूल में जीभ की नोक लगा के बैठ गए। आरोग्य के कण भी बनेंगे, श्वासोश्वास गिनेगे तो मन की चंचलता भी मिटेगी। मन शांत होता है, आनंद आता जाए। अभी करो अभ्यास। 
         जो परमात्मा है वो चेतन है, जो परमात्मा है वो ज्ञानस्वरूप है ,जो परमात्मा है आनंद स्वरूप है वो ही आत्मा होकर मेरे इस हृदय में बैठा है तभी शरीर को चेतना मिलती है। उसी से दस अरब न्यूरॉन्स सत्ता पाते है। भीतर से, बाहर से आके ले बैठो। शरीर को मैं मान कर नही बैठो। ये काम करूंगा, ऐसा करूंगा, बाद में ये करूंगा.... छोड़ो। अगड़म-तगड़म स्वाहा। भीतर बाहर से अभी अकेले। हे केशव! नाम लिए अनेक यूपी के, पंजाब के, हरियाणा के लेकिन वास्तव में सब भारत के है और जो अमेरिका और लंडन के है वे भी कुल मिलाकर वास्तव में सब धरती के है और ऐसी कई धरतियां है वो सब प्रकृति की है और प्रकृति है जिस परमात्मा की वो परमात्मा चैतन्य रूप में सर्वत्र होते हुए भी मेरे हृदय में व्याप रहा है। जैसे सूर्य सब जगह होते हुए भी मेरे कटोरे भी दिखता है, आकाश सर्वत्र होते हुए भी मेरे घर में है। आकाश सर्वत्र है मेरे घर में भी है। ऐसे ही सच्चिदानंद परमेश्वर सर्वत्र है और वे मेरे हृदयेश्वर है। 
ॐ शांति और वे मेरे प्रेरक है। आकाश तो जड़ है लेकिन परमात्मा चैतन्य है और मैं सत्कर्म करता हूं और सुबह ध्यान में बैठता हू तो मुझे सत्प्रेरणा भी देते है, मैं सत्संग करता हूं तो सत्प्रेरणा देते है, मैं झूठ बोलता हूं तो मेरे हृदय को टोकते है वे इतने मेरे हितैषी है....हो ना प्रभु!.... हां ना!... हां ना ऐसे करते उनसे दुलार करो।
ॐ शांति..... ॐ आनंद..... ॐ माधुर्य.... ॐ ॐ....... ॐ शांति..... ॐ आनंद 
इस प्रकार चिंतन करते-करते शांति और आनंद में डूबते जाएं। 
रूपं मधुरं, शांति मधुरं, प्रीति मधुरं, मति मधुरं, गति मधुरं, मधुराधिपते मधुरं मधुरं..... ॐ.... ॐ.... बाहर का कोई भी शब्द सुनाई पड़े, कोई भी रूप दिखाई पड़े उसकी इच्छा भी न करो, उसे हटाओ भी नहीं। तुम तो शांति और आनंद में खोते जाओ और उसीके होते जाओ बस। कोई कठिन काम नहीं है । नया-नया है तो कठिन लगता है। भगवान को पाना, अपनी आत्मा का उद्धार करना कोई कठिन काम थोड़े है! कठिन तो संसार का कर-कर के मर जाओ कुछ भी हाथ में नहीं आता। बधु छोड़ी ने मरी जवानु। डॉलर भी यांज मुकी ने जाता रेवानु। डॉलर साथे आवे! थोड़ा ध्यान, पुण्य, आत्मशक्ति तो मौत वखते भी साथे ने साथे। ऐनी प्रैक्टिस वधारे करवी पड़े। काफी लक खुली जाय, भाग खुली जाय। बहु परिश्रम नई करवानु संसार नु। बाहर काम करी ने टायर्ड थया होय ने पछी ध्यान करे तो नई लागे। थोड़ा फ्रेश रेवे। आपणा हाथे बनावेलू भोजन हेल्प करे, मदद करे। रोज नियमित ध्यान करे तो उसी समय मन स्वाभाविक लगता है। भगवान और गुरु और महापुरुषो की मदद मिलती है प्रभात काल को, वातावरण की मदद मिलती है। अभी भी मदद मिल रही है वातावरण में। सभी का एक प्रकार का ध्यान बड़ी मदद मिलती है।
ॐ.... ॐ....
मन में बोलते जाओ। बल, शांति, आनंद 
ॐ....... 
तं नमामि हरिं परम् 
तं नमामि हरिं परम्..... 
तं नमामि हरिं परम् ।
तं नमामि हरिं परम्... 
तं नमामि हरिं परम् । 
तं नमामि हरिं परम्...


हरि ओ.........म......हरि ओ.....म