स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

किसको बोलते हैं संसार का संग?


ध्यान लगाना अच्छा है लेकिन विकारों से बचना उससे और अच्छा है। और विक्षेप रहित स्थिति में टिके रहना वह सर्वोपरि है।


आकर्षण के समय आकर्षण रहित होना, उसका एक ही उपाय है कि जो आकर्षण रहित सत्ता स्वरूप परमात्मा है, उसकी प्रीति उसमें स्थिति हो जाए।


लाख उपाय कर ले प्यारे, कदी न मिलसी यार।
बेखुद हो जा, देख तमाशा, आपे खुद दिलदार।

अपने इस देह के अहं को छोड़कर परमात्मा अहं में शांत होता जा। फिर दिलदार की शांति, मस्ती और मति की ऊंचाई आ जाती है।

मति दुर्बल होती है तो मन उसे खींच लेता है और मन को इंद्रियां खींच लेती हैं और इंद्रियां विषयों में गिरा देती हैं। मति बार-बार परमात्मा सुमिरन और ध्यान में रहे, मति पुष्ट रहे। मन सात्विक बनता है, इंद्रियों के धोखे में नहीं आता।
फिर गिरता है कभी तब उठता है, फिर गिरता है, उठता है। जैसे बच्चा चलते-चलते कई बार गिरता है, फिर दौड़ भी लगा लेता है और दौड़ में, हरीफाई में नंबर भी पा लेता है। जो अभी हरीफाई में दौड़ के नंबर पा रहे हैं, वे कई बार गिरे होंगे चलते समय बचपन में। ऐसे ही ईश्वर का रास्ता है, चलते हैं, फिसलते हैं, चलते हैं, फिसलते हैं, चलते हैं, फिसलते हैं।
ऐसा कोई माई का लाल नहीं आया होगा कि भई चल पड़ा और फिसला न हो। फिसलाहट तो आती होगी। लेकिन फिसल कर जो निराश हो जाते हैं, वे अपना गला घोंटते हैं। जो फिसल कर फिसलते ही रहते हैं, वह अपनी तबाही करते हैं। जो फिसल कर प्रभु का आश्रय लेते हैं, सत्संग का आश्रय लेते हैं, नियम और व्रत का आश्रय लेते हैं, वे धनभागी देर-सवेर पहुंच जाते हैं।

जो फरियाद करते रहते हैं, वे बेचारे उलझ जाते हैं। काबे अर्जुन लूटिया, वही धनुष वही बाण। जब लूटे तब लूटे, अब तू काहे को अपने को लूटे। 
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत रहा न कोय। 

तो राग, द्वेष, सुख, दुख,जड़ चेतन के दो पाटों में सारे पिसे जा रहे हैं। कोई विरले हैं जो अपने चेतन में टिक जाते हैं।
चक्की चले तो चालन दे, तू काहे को रोये। 
लगा रहे तू कील से तो बाल न बांका होये।

तू अपने परमात्मा सत्ता से लगा रह भैया! बहन तू लगी रह बेटा, परमात्मा सत्ता से। फिसले तो फिर लग, फिसले फिर लग, फिर लग, फिर लग। जैसे बच्चा चलता है, गिरता है, फिर चलता है, गिरता है, चलने की गाड़ी लेके चलता है, वहां भी गिरता है। फिर भी चलना नहीं छोड़ता है, तो वो दौड़ता है, आप भी ऐसे ही करके आए हो।
नारायण, नारायण, नारायण, नारायण।

जो सत्संग नहीं करता, वह कुसंग जरूर करेगा। अकेले में बैठकर साधन भजन करना अच्छा है लेकिन दोष... दोषों का पता बिना सत्संग के नहीं मिलता। दोषों को उखाड़ने की युक्ति बिना सत्संग के नहीं मिलती। और सामूहिक सत्संग में ध्यान और जप में तुमुल ध्वनि का फायदा अकेले में नहीं मिलता।

इसीलिए शुकदेव जी जैसे महान परमात्मा रत महापुरुष, ब्रह्म सुख में निमग्न, कहीं जाते नहीं थे। गृहस्थी के यहां उतनी देर ठहरते जितनी देर वो गाय का दूध दुह ले बस, फिर लिया और चलते। ब्रह्म सुख... ऐसे शुकदेव जी महाराज भी सत्संग में सराबोर होते हैं, भागवत की कथा करने में। भगवत गुणगान, भगवान की वूरी-वूरी प्रशंसा, लीला, अनुवाद, गुणानुवाद।

मन चुप नहीं बैठता, उसे खुराक चाहिए। तो खुराक वो दो जो भगवत भाव का प्यारा बन जाए। वृत्ति में भगवत भाव आना चाहिए। वृत्ति शांत करता... वृत्ति को विषय विकारों में फंसाता है, वो भोगी है। वृत्ति को नियम और कर्म धर्म में लगाता है, वो धर्मात्मा है। वृत्ति को एकाग्र करता है, वृत्ति का पेट खाली करता है, वो योगाभ्यासी है। वृत्ति को भगवत भाव से भरता है, वो भक्त है। लेकिन वृत्ति जहां से उठती है उस अकाल पुरुष में जो सोहं स्वभाव में जगता है, वो ब्रह्मवेता, ब्रह्मज्ञानी है।

धीरे-धीरे यात्रा करते-करते वहां का लक्ष्य बनना चाहिए। लक्ष्य ऊंचा होना चाहिए।

लक्ष्य न ओझल होने पाए, कदम मिलाकर चल। 
सफलता तेरे चरण चूमेगी आज नहीं तो कल।

ब्रह्माकार वृत्ति, ब्रह्म परमात्मा का चिंतन, ब्रह्म परमात्मा का रस अद्भुत सामर्थ्य देता है। पंद्रह-पंद्रह सत्ताएं उसी में छुपी हैं जैसे बीज में टहनियां, डाल, पत्ते, फूल, फल और अनंत बीज छुपे हैं। ऐसे भगवन नाम और भगवत चिंतन में अनंत योग्यताएं छुपी हैं। उसका फायदा ले, व्यर्थ समय ना गंवाएं। आवारा मन के लोग ही इधर-उधर की बातों में पड़ते हैं, इधर-उधर की चर्चा में लगते हैं।

न चलति भगवत् पदारविन्दात् लव निमिषार्धमपि स वैष्णवाग्र्यः।
जो भगवत पदार्थ से, भगवत शरण से, सुख से लव निमेष मात्र भी चलित नहीं होता, वह वैष्णवों में, भक्तों में अग्रगण्य है।

भगवान करे कि हम भगवान के सिवाय किसी वस्तु का महत्व न समझें। भगवान करे कि किसी पदार्थ का महत्व न समझें। भगवान करे कि किसी नाम और रूप का महत्व न समझें। हे भगवान ही महत्वपूर्ण, सच्चिदानंद परमात्मा। जो सृष्टि की उत्पत्ति करते, स्थिति करते, प्रलय करते, ऐसे सच्चिदानंद परमात्मा में ही शांति मिलती रहे।

ओम शांति। ओम शांति। ओम शांति। ओम शांति। ओम, ओम, शांति। नारायण, नारायण, नारायण।

योग वाशिष्ठ सत्संग 

वशिष्ठ जी बोले, हे राम जी! जिसकी बुद्धि शास्त्रों के अभ्यास से तीक्ष्ण हुई और वैराग्य के अभ्यास से संपन्न और निर्मल है, उसको आत्मपद प्राप्त होता है।

व्याख्या 

शास्त्रों का अभ्यास और वैराग्य। उसकी बुद्धि निर्मल होती है, उसका मन निर्मल होता है।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
भगवत प्राप्ति की प्यास जितनी तीव्र उतना मन निर्मल। भगवत प्राप्ति की प्यास नहीं तो पापी मन है। जिसको दुनिया की चीजों की प्यास है, वो समझो उसको बहुत दुख भोगना है। जिससे भोगा, खाया जाता है, वो मन, बुद्धि सब मिथ्या है लेकिन सत्य तो है। मैं तुझे कैसे पाऊं, कैसे जानूं... बस इसी पुकार में, प्रयास में पुण्य पुंज पाएगा। समय बीता जा रहा है।
रामतीर्थ तो रात को बीच-बीच में उठके रोते थे कि आज की रात भी बीती गई, तेरी मुलाकात नहीं हुई। भगवत प्राप्ति के बिना रात बीती, सुबह तकिया गीला मिलता था। पत्नी जानती थी कि मेरे पति से क्या वेदना है। ऐसा विवेक, ऐसा वैराग्य! तू ध्रुव को मिला, तू प्रह्लाद को मिला, कबीर जी के हृदय में प्रगट हुआ तो प्रभु मेरा हृदय... तेरे लिए नहीं तड़पता, मैं क्या करूं? तू ही तड़प दे दे, तू ही कृपा कर। जैसे बच्चा नन्हा नहीं चल सकता तो मां-बाप को पुकारता है। ऐसे भगवान को पुकारते, पुकारते रोते, आंसू बहाते।
डबल M.A. में पढ़े थे, गणित के बड़े अच्छे विद्वान थे। प्रोफेसर थे लाहौर कॉलेज में। 

धिक् उना दा जीवन जो रब बिना जींदे हैं। 
धिक्कार है उनके जीवन को जो भगवत प्रेम के बिना जीते हैं। 

वे नूर बेनूर भले, जिस नूर में पिया की प्यास नहीं। 
बिन खेती के बाड़ किस काम की। बाड़ करते खेती के लिए, ऐसे ही जीवन रखते हैं परमात्मा अनुभूति के लिए, परमात्मा की तरफ नहीं चला तो फिर ये जीवन किस काम का। खाना-पीना किस काम का आखिर!
तुम जो एक कौर भी खाते हो तो किसी न किसी के मुंह से छीना-झपटी किया हुआ है। कई जीव-जंतुओं को मारकर, कई पक्षियों को भगाकर, कई बछड़ों को मां के थनों से धकेलकर तुम्हारे नजदीक लाया जाता है... अन्न, फल, दूध आदि। एक कौर भी छीना-झपटी के बिना नहीं आता। तुम जो खा रहे हो, किसी न किसी के मुंह से छीना-झपटी करके तुम्हारे तक पहुंचाया जाता है।

उसका फिर क्या करते हो? खा-पी के उसका रस बनता है, काम में, क्रोध में, लोभ में, मोह में, अहंकार में, जगत के बड़बड़ में जाता है कि भगवत ध्यान में जाता है? एक कौर तुम चाहे मिठाई का खाओ, चाहे एक घूंट दूध पियो, किसी न किसी बछड़े को, बछड़े के हक को छीनकर तुम्हारे तक पहुंचाया गया है। कोई फल खाते हो तो जीव, जंतु और पक्षियों के मुंह से छीनकर तुम्हारे तक लाया गया है। अन्न खाते हो तो जंतुओं को मारकर, उनके मुंह से छीनकर पक्षियों और जंतुओं से तुम्हारे तक लाया जाता है। उसका तुम बदला क्या देते हो? खा-पी के खाद बनाते हो या अजीर्ण होता है, एसिडिटी बनाते हो या ठीक-ठीक माप से खाते हो, पचाकर रस बनाते हो और रस स्वरूप में लगाते हो। तुम्हारे कर्म तुम्हारे हाथ में हैं।

करनी आपे आपणी, के नेड़े के दूर।
अपनी करनी से तुम अपने को परमात्मा के निकट पाते हो। और अपनी हल्की करनी से आप परमात्मा से और गुरु से अपने को दूर पाते हो।

जो न तरे भव सागर, नर समाज अस पाई। 
सो कृत निंदक मंदमति, आतम हन अधोगति जाई।
वो निंदक है, मंदमति है, कृतघ्न है, मूर्ख है, सृष्टि की चीजों का दुरुपयोग करता है, खाद बनाता है।
मां का यौवन व्यर्थ किया उसने। मां के पेट में रहा, मां को पीड़ा देके पैदा हुआ, व्यर्थ जिया वो। अभी भी जीता है तो कई जीव-जंतुओं को मारकर जीता है। व्यर्थ हो गया जीवन! जिस वृक्ष में फल नहीं लगे वो निष्फल है। जिस वृक्ष में फल लगे वो सफल है। ऐसे ही जिसके जीवन में भगवत फल नहीं लगा, भगवत ध्यान, भगवत ज्ञान, भगवत रस के फल रसीले नहीं लगे, उसका जीवन क्या है! ऐसे तो जीने को भैंसे, कुत्ते, गधे, घोड़े भी तो जी रहे हैं, क्या हो गया?
उसकी माता, पिता और गुरु कुल धन्य है जिसके हृदय में गुरु भक्ति है, भगवत भक्ति है। रूखे चने चबाएंगे, प्रभु के गीत गाएंगे, सूखे टुकड़े चबाएंगे। नरेंद्र को तो रामकृष्ण के चरणों में जा पड़े, भगवत ध्यान करते-करते जब भूख लगती तो फिर रोटी कौन बनाए, समय खराब होता। भिक्षा मांग के आते, वो जमाने में मिट्टी के तवे थे, मोटी रोटी बनती थी। ले आते, चबा-चबा के खाते, बाकी की टांग देते, दूसरे दिन उसी से गुजारा करते। कौन जाए मांगने, समय खराब होगा।

कभी-कभी सूखी रोटी चबाते-चबाते मसूड़ों से खून आ जाता था। ऐसा करके महापुरुषों ने ध्यान-भजन में गहरी यात्राएं की। आश्रम में बंगाल है तो चावल बनते, नमक डालने को नहीं होता था। कभी-कभार दो पैसे की सेर सब्जी आती थी, बैंगन की वो उबाल... कैसे-कैसे जिए और कैसे-कैसे लगे रहे! और कितने ऊंचे पहुंच गए।

जो समय का सदुपयोग करता है और ऊंचे में ऊंचा उपयोग है, उसको ऊंचा फल मिलता है। 
शबरी भीलन बुहारी करती लेकिन भगवत प्राप्ति के लिए, उसकी पूजा बन जाती है।
जो सेवा को बोझा मानते हैं, वो सेवा का महत्व नहीं जानते, सेवा को सेवा नहीं समझते। 

जो टालते हैं वो सेवा का महत्व नहीं समझते। अथवा जो सेवा करके बखान करते हैं वो सेवा को गटर में डाल देते हैं। सेवा तो हृदय के आनंद को पाने के लिए है। सेवा तो सेव्य के सुख को उभारने के लिए है।


कर्म तो जड़ है, कर्ता की अपनी भावना है। एक मकान बनना था, बाबा गया, बोले, मजदूरों से पूछा क्या कर रहे हैं? क्या करें, बोझा... पत्थर तोड़ रहे हैं, अपना भाग्य तोड़ रहे हैं महाराज। मजूरी करके मर रहे हैं और क्या कर रहे हैं! बड़ा महल बनना था। दूसरे कोने कुछ और मजदूर थे, उनसे पूछा क्या कर रहे हो? बोले बाबा, रोजी कमा रहे हैं, गुजारा... रोजगार कर रहे हैं। थोड़ा सा और कोने में गया, तीसरे मजदूर से पूछा क्या कर रहे हो? बोले महाराज, महल बना रहे हैं हम लोग। किसका है? बोले किसका है... लाला का है, सेठ जी का महल है। और सेठ में भी बैठने वाला मेरा लाला है, लाला का महल बन रहा है। चौथे से पूछा क्या कर रहे हो? बोले महाराज, मंदिर बना रहे हैं। अरे बोले सेठ का बंगला है! बोले सेठ क्या, सेठ के हृदय मंदिर में तो देव बैठा है, मंदिर बना रहे हैं। मजूरी सब कमा रहे हैं लेकिन वो मंदिर की भावना वाले को अलग आनंद है। महल की भावना वाले को अलग है। रोजी वाले को ठीक-ठाक है, और जो 'क्या करें यार, सेवा करनी पड़ती है, कठिन पत्थर तोड़ रहे हैं, अपना भाग्य कूट रहे हैं', वो भाग्य ही कूट रहा है। आप कर्म में अपनी निगाह कैसी मिलाते हैं? कर्म में स्वार्थ रखते हो, कपट रखते हो तो फिर कर्म खड्डे बनाएगा। खड्डे में गिरोगे। कर्म को ही ईश्वर की पूजा मानो।
तो जो कर्म करने में तत्पर है, उसका ध्यान भजन भी तत्परता से होता है। उसको सत्संग भी अच्छा समझ में आ जाएगा। जो लापरवाह है अपने कर्तव्य में, उसको सत्संग में भी रुचि नहीं होगी। संध्या में, पूजा में भी रुचि नहीं होगी। जी चुराएगा।
नारायण, नारायण, और सेवा का अपना आनंद है। सेवा से अपनी सूझबूझ बढ़ती है। सेवा से आत्मबल बढ़ता है। सेवा से सद्गुण विकसित होते हैं। नारायण, नारायण, नारायण, नारायण। ओम शांति। हां जी।
वशिष्ठ जी बोले, हे राम जी! जिन पदार्थों को पाने के लिए मनुष्य यत्न करता है, वे मायिक पदार्थ बिजली की चमक के समान उदय होते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। ये पदार्थ बिना विचार सुंदर दिखते हैं और इनकी इच्छा मूर्ख करते हैं क्योंकि उनको जगत सत्य प्रतीत होता है। ज्ञानवान को जगत के पदार्थों की तृष्णा नहीं होती।
हे राम जी! विषयों में आसक्त होना ही बड़ी कृपणता है। इनसे उपराम होना ही बड़ी उदारता है।
संसार के विषय विकारों में आसक्त होना बड़ी कृपणता है, बड़ी बेवकूफी है। इनसे विमुख होना ही बड़ी उदारता है, बड़ी समझदारी है।
इससे मन को वश करो, जिसमें तुम्हारी जय हो। जिस-जिस ओर मन जाए, उस-उस ओर से उसे रोको। जब दृश्य जगत की ओर से मन को रोकोगे, तब वृत्ति संवित् ज्ञान की ओर आएगी। जब संवित् ज्ञान की ओर आई, तब तुमको परम उदारता प्राप्त होगी और शुद्ध आत्मसत्ता का अनुभव होगा।
बिल्कुल सीधी बात है। जहां-जहां मन जाए वहां से हटाकर आत्म-संवित् में आ जाओ, तो शुद्ध संवित् का अनुभव होगा, परमात्मा का साक्षात्कार। बादशाह बन जाएगा, बुद्धि धीरे-धीरे, धीरे अभ्यास करके बुद्धि भी महान बन जाएगी।
आत्मा के प्रमाद से जीव को कष्ट होता है। जो अपनी विभूति विद्या को त्यागकर प्रसन्न होता है और फिर संसार के क्रूर मार्ग में कष्ट पाता है, वह मनुष्य नहीं, मानो मृग है। वह संसार रूपी वन में भटकता कष्ट पाता है। जब प्यास से व्याकुल होता है, तब जल की ओर दौड़ता है पर जहां जाता है, वहां मरुस्थल की नदी मृगमरीचिका ही दिखती है, जल नहीं प्राप्त होता।
हे राम जी! जो पुरुष इंद्रियों के इष्ट विषयों को पाकर सुख नहीं मानता और अनिष्ट विषयों को पाकर दुख नहीं मानता, इनके भ्रम से मुक्त है और बड़े भोग प्राप्त हों तो भी अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता... बड़ा भोग प्राप्त हो जाए, बड़ा यश हो जाए फिर भी अपने आत्मज्ञान से नीचे नहीं आता। सत्यम। ओम शांति, शांति।
चलो अपने-अपने काम में लग जाओ। समय बीता जा रहा है। समय बहुत कीमती है, समय किसी का इंतजार नहीं करता। अपने-अपने काम में तत्परता से लग जाओ।
सब अनर्थों का कारण संग है। संसार के संग से ही जन्म मरण के बंधन को प्राप्त होता है। संसार का संग क्या? जो सरकने वाली चीजें हैं उसमें सत्य बुद्धि करके सुख लेने की वासना, इसको बोलते हैं संसार का संग। इनका उपयोग कर लिया और सुख स्वरूप में आए, तो हो गए निःसंग। रहेगा तो संसार में, खाएगा, पिएगा, लेगा, देगा, लेकिन वो सरकने वाली चीजों से सुख बुद्धि, उसका चिंतन, उसकी सत्यता, सारे दुखों का मूल है। और परमात्मा की सत्यता और उसका चिंतन सारे सुखों का मूल है।
हे राम जी! और कभी भी बीती हुई बातें वो याद नहीं करनी चाहिए जिससे दुख पैदा हो। इसने ऐसा बोला, ये ठीक नहीं है, ऐसा किया, वैसा किया। बार-बार वही बातें नहीं बतानी जिससे मन दुखी हो। जब हो गया तो हो गया, अभी दुख मना कर और संसर्ग करता है। ये निगुगरे आदमी की पहचान है। मनमुख आदमी की पहचान है, कपटी आदमी की पहचान है।
हे राम जी! जो कुछ संसार की वासना है, बल करके उसको त्याग करिए और शुद्ध आत्मा में तीव्र अभ्यास करिए, तब शीघ्र ही अविघ्न आत्मस्वरूप की प्राप्ति होगी।
हे राम जी! तुम पौरुष प्रयत्न करके मन के संकल्प-विकल्प को निवृत्त करो और अभ्यास, विचार करके विवेक का उपाय करो। भोगों की वासना दूर से त्यागो, इसी से तुम शांतिमान होगे। इन तीनों के सम अभ्यास से तत्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का बारंबार अभ्यास करो। जब तक इनको न साधोगे, तब तक अनेक उपायों से भी शांति को न प्राप्त होगे।
हे राम जी! वासनाक्षय हो और मनोनाश, तत्वज्ञान से वासनाक्षय न करे तो कार्य सिद्ध नहीं होता। और जो मनोनाश करे और तत्वज्ञान से वासनाक्षय न करे, तब भी कल्याण न होगा। और तत्वज्ञान का विचार करे और वासनाक्षय न हो, तो भी कुशल न होगी। जब इन तीनों का सम अभ्यास हो, तब फल की प्राप्ति होगी।
हे राम जी! जिस पुरुष को देह में अभिमान नहीं होता और जिसकी स्वरूप में स्थिति है, वह शरीर के इष्ट-अनिष्ट में राग-द्वेष नहीं करता क्योंकि उसका शुद्ध वासना है। और जो करता है, सो बंधन का कारण नहीं होता।
राग-द्वेष नहीं करता, और राग-द्वेष करता हुआ दिखता भी है तो बंधन का कारण नहीं है, क्योंकि उस ज्ञानी महापुरुष का राग-द्वेष होता है वैसे, पानी में लकीर जैसा। राजी-नाराजी में गहराई में नहीं होती, ऊपर से व्यवहार चलाने के लिए होती है। दुष्टों का विरोध भी करेगा, दमन भी करेगा, युद्ध भी करेगा। सज्जनों को साथ सहकार भी देगा। अशुभ का विरोध भी करेगा, आग्रह भी करेगा। जो दुर्मति हैं, बुद्धू हैं, उनको डांट-पोंछ के भी उन्नत करेगा। जो दुर्मति है उसको शासन करेगा, जो सतमति है उसको प्रोत्साहित करेगा। लेकिन अंदर से समझेगा कि सबके अंदर एक सत्ता मात्र है। ऐसा नहीं कि सबमें भगवान हैं तो बुद्धू होकर रहेगा। नहीं, व्यवहार तो यथायोग्य करेगा। दुष्टों से बचेगा, दबाएगा दुष्टों को, सज्जनों से स्नेह करेगा। जैसा ज्ञानी करता है, ऐसा ही करेगा, लेकिन सत्य बुद्धि नहीं रहेगी। अज्ञानी तो डर के मारे दुष्टों के आगे घुटना टेक लेगा, ज्ञानी घुटना नहीं टेकेगा, युक्ति से उसको ठीक भी कर देगा।
एक ज्ञानी संत थे, वो जाते थे, लोटे बैठे। तो किसी बदमाश ने आकर उसको डंडा मार दिया। उसने एक रुपया निकालकर दे दिया। बदमाश समझा कि ये बाबा को देखो डंडा मारा तो एक रुपया मिला। दूसरे दिन आया तो फिर डंडा मारा, तो दूसरा रुपया दिया। चेले ने कहा गुरुजी, वो हरामी है, डंडे मार रहा है। एक दिन डंडा मारा तो रुपया दे दो, दूसरे दिन... बोले तू देख क्या होता है। तीसरे दिन वो बाबा की जगह पे दूसरा कोई जबरदस्त आदमी था। बाबा तो बूढ़े थे। उसने देखा कि ये डंडा मारने से रुपया मिलता है, तो उसको मार दिया। उसने उठाकर चार डंडे मार दिए, सिर फोड़ दिया उसका। साधु बाबा ने बोला, देखो अपने पास इतना बल और इतना संघर्ष करने का टाइम नहीं था, दो रुपये में परभारा हो गया। (हँसी) वापस राम जपा दिया उसको। हे राम, राम, हे राम... दो रुपया तो एक दिन में, पट्टा-पुट्टी में दो रुपया क्या काम करे! वापस राम जपता रहा पूरा दिन, पूरी जिंदगी बेचारा। नारायण, नारायण, नारायण।
हे राम जी! ज्ञानी को जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति दोनों तुल्य हैं। जैसे भूषण के होते भी सुवर्ण है और भूषण के अभाव में भी सुवर्ण है, वैसे ही ज्ञानवान को देह के होते भी ब्रह्म है और देह के अभाव में भी ब्रह्म है। जो अज्ञानी है, उसको नाना प्रकार का जगत फुरता है और अज्ञानी वही है जिसको मन का संबंध है। हे राम! यह जगत भिन्न-भिन्न फुरता है, जैसे काष्ठ के खंभ में चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है। वे और को नहीं दिखतीं, उसी के मन में होती हैं। वैसे ही भिन्न-भिन्न पदार्थ रूपी पुतलियां अज्ञानी के मन में फुरती हैं और ज्ञानवान को नहीं भासित होतीं। जब काष्ठ रूप आधार होता है, तब चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है। पर आश्चर्य देखो कि मन रूपी ऐसा चितेरा है कि आकाश में पदार्थ रूपी पुतलियों की कल्पना करता है।
जैसे मन चंचल है, मन रूपी दीया जल रहा है। दीये में तेल की जगह पे पानी डाल दो तो क्या करेगा? जलेगा फिर? दीये में पानी डाल देंगे तो? जलेगा? दीया तो तेल से ही करता है। ऐसे ही मन वासना से बाहर भागता है। ज्ञान रूपी पानी डाल दो तो वासना शांत। निर्वासनीक होकर मन अमनी भाव को प्राप्त हो जाता है।
ओम शांति।

सूली पर भी चढ़ा दो, तब भी संत तो संत है और सारी दुनिया माने, तभी भी संत, संत है।


आपणा बापू आऽऽऽश्...
लेकिन कोई आने से अपड़े बापू नहीं। सब लोग खिलाफ हो जाएं और जूतों के हार पहनाएं, तब भी भी अपने बापू तो अपने ही होते हैं बाबा, ऐसा अगर समझ में आ जाए तब...
जरूरी नहीं कि लोग वाह-वाह करें, प्रशंसा करें अथवा राजद्वारी, ऊंची लेवल के लोग मानें, तभी कोई महात्मा-महात्मा है। ना, ना।
राजकारणी लोग मानते हैं, इसलिए कोई बड़ा है, ऐसा मत कहना। जय, जय।
संत की तो अपनी भीतर की संतत्व की स्थिति होती है, उसे सूली पर भी चढ़ा दो, तब भी संत तो संत है और सारी दुनिया माने, तभी भी संत, संत है, अगर वो संत है तो।
नहीं तो कभी तो कोई प्रशंसा करेगा और जो लोग प्रशंसा करते हैं, वो कब निंदा कर लें, कोई पता नहीं।

जो बोलते हैं, (એમ તો બસ તમારી સાથે ખભો મેળવીશું તમારી સાથે જ, તમારી સાથે જ,આખી પબ્લિક તમારી સાથે જ... એ લોકોજ પાછા ચોકઠાં ઉંધા કરીને બીજા ને બેસાડી દીધા હોય, એવું જ હોય પાછું) हम तो बस तुम्हारे साथ कन्धा मिलाएंगे, तुम्हारे साथ है, तुम्हारे साथ है, सारी पब्लिक तुम्हारे साथ है... वो लोग ही फिर मुंह पलटाके दूसरे को बिठा देते हैं... ऐसा ही होता है फिर...

बहुत लोगों की वाहवाही पे भरोसा करके जो जीता है न! वो तो मृगेश हो जाता है, मृग बन जाता है। जय, जय। मृगलो बापड़ों पांजरा मां...

बहुत लोगों का सहारा, सत्ता वालों का सहारा, किसी का सहारा... बाहर का सहारा अगर तुमने पकड़ा, तो आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, इतनी जल्दी क्या है, बहुत पड़े हैं बरसों... कभी ना कभी आपको पछताना पड़ेगा।

जिसका विवेक प्रखर है वो निरावरण बन जाएगा!


दो प्रकार के लोग होते हैं, एक होते हैं सावरण, दूसरे होते हैं निरावरण।
सावरण वे होते हैं जिनको अपने आत्म विषय का प्रकाश, ज्ञान, सामर्थ्य नहीं होता। खाना, पीना, ये, वो संसार के इसमें तो आवरण मतलब उनकी योग्यता और उनका प्रभाव, उनका बल ढका हुआ है। दूसरे होते हैं निरावरण। उनको अपनी योग्यता, अपने प्रभाव स्वरूप में डटे होते हैं। तो वो निरावरण जो होते हैं उनका संकल्प में बल होता है। और सावरण होते हैं उनके संकल्पों में दम नहीं होता। तो सावरण वाले क्षीण संकल्प होते हैं और निरावरण वाले दृढ़ संकल्प होते हैं।
तो निरावरण कैसे बनता है आदमी?
जिसका विवेक प्रखर है। वो निरावरण बन जाएगा। विवेक प्रखर क्या? कि सत् क्या है, असत् क्या है ठीक से जो जाने। नश्वर क्या है, शाश्वत क्या है ठीक से जो जाने। जैसे बच्चे का विवेक प्रखर नहीं है, तो लॉलीपॉप, चॉकलेट, बिस्किट, खिलौने पकड़ लेगा, हीरे, मोती, जवाहरात छोड़ देगा। विवेक कच्चा है। ऐसे जिनका कच्चा विवेक है वो जगत के दृश्यमान परिस्थितियों को सच्चा समझेंगे, उन्हीं को पाएंगे, उन्हीं को भोगेंगे और उन्हीं में खप जाएंगे। यह कच्चा विवेक है।
और सच्चा विवेक यह है कि आखिर तो यह नश्वर है, तो उनका उपयोग करेंगे लेकिन उसमें खपेंगे नहीं। खपेंगे नहीं तो मन को संकल्प विकल्प उधर कम होंगे। तो ऐहिक जगत की प्राप्ति की उनको भीतर से तीव्र लालसा नहीं होगी, तो चित्त में शांति होगी। शांत चित्त में आत्म विषयिणी बुद्धि हो जाती है। आत्म विषयिणी बुद्धि होती है तो बुद्धि बलवान होती है, तो मन उसको घसीटता नहीं है। बलवान के पक्ष में ही सब होते हैं। तो चित्त में विश्रांति होती है तो बुद्धि बलवान होती है। बुद्धि बलवान होती है तो मन उसके पक्ष में रहता है, इंद्रियों के पक्ष में नहीं जाता। तो संयम, सदाचार, शांति, सामर्थ्य उसका बढ़ता जाता है। कितना भी खर्च करता जाता है लेकिन उसके पास वो टेक्निक आ गई विश्रांति पाने की। क्योंकि विवेक तीव्र है।
विवेक तीव्र होने से दूसरा फायदा होगा कि वैराग्य आएगा। किस चीज में राग करें? कब तक राग करें? इनकी शाश्वतता कब तक? आखिर कुछ नहीं। ये मिल गया, वो हो गया, वो हो गया लेकिन आखिर तो देखो तो स्वप्न। ऐसे ऐसे राजा आए, मानधाता जैसे आए, अश्वपति आए, कैसे कैसे राजा रामचंद्र जी आए। कृष्णचंद्र जी आए, कंस भी आए, ऐसे ऐसे राजा आए, सब छोड़ छोड़ के गए तो अपना कब तक रहेगा ये? तो तीव्र विवेक है। 

वशिष्ठ जी बोले हे राम जी! एक सावरण होता है, दूसरा निरावरण। जिसका शुद्ध अंतःकरण है, वह निर् आवरण है और जिसका मलिन अन्तःकरण है, वह सावरण है। शुद्ध अंतःकरण में जैसा भी निश्चय होता है, वैसा ही तत्काल आगे सिद्ध हो जाता है। और मलिन अंतःकरण का निश्चय सिद्ध नहीं होता।
हे राम जी! जिनमें शुद्ध अंतःकरण उदय हुआ है, वो जैसी इच्छा करे वैसी ही सिद्धि होती है।
हे राम जी! ऐसे ज्ञानवान परस्पर ज्ञान मात्र का निर्णय और चर्चा करते हैं। और ज्ञान की ही कथा कीर्तन करते और उसी से प्रसन्न होते हैं। ऐसे नित्य जाग्रत पुरुष जो निरंतर प्रीतिपूर्वक आत्मा को भजते हैं, उनमें आत्म विषयिणी बुद्धि उदय होती है और उससे वे शांति को प्राप्त होते हैं।
जिनको सदा अध्यात्म का अभ्यास है और उस अभ्यास में जो तत्पर हुए हैं, उनको आत्मपद प्राप्त होता है।
हे राम जी! शुभ-अशुभ गुणों के समूह जिनके नष्ट हुए हैं और अकस्मात फल जिनको प्राप्त हुआ है, उनका निर्मल क्रम सुनो।
एक समय राजा जनक लीला करके अपने बाग में, जिसमें मीठे फल लगे थे और नाना प्रकार के सुंदर बेलों पर कोकिला शब्द करती थी, इस भांति गया जैसे नंदन वन में इंद्र प्रवेश करे। उस सुंदर वन में पुष्पों से सुगंध फैल रही थी। राजा अपने संग के अनुचरों को दूर त्याग कर आप अकेला कुंजों में विचरने लगा।
कभी-कभी एकांत में अकेले में विश्रांति लेने से मनोबल बढ़ता है, विश्रांति मिलती है, बुद्धि बल बढ़ता है, संकल्प बल बढ़ता है। दो प्रकार के लोग होते हैं, एक होते हैं सावरण, दूसरे होते हैं निरावरण।
सावरण वे होते हैं जिनको अपने आत्म विषय का प्रकाश, ज्ञान, सामर्थ्य नहीं होता। खाना, पीना, ये, वो संसार के इसमें तो आवरण मतलब उनकी योग्यता और उनका प्रभाव, उनका बल ढका हुआ है। दूसरे होते हैं निरावरण। उनको अपनी योग्यता, अपने प्रभाव स्वरूप में डटे होते हैं। तो वो निरावरण जो होते हैं उनका संकल्प में बल होता है। और सावरण होते हैं उनके संकल्पों में दम नहीं होता। तो सावरण वाले क्षीण संकल्प होते हैं और निरावरण वाले दृढ़ संकल्प होते हैं।
तो निरावरण कैसे बनता है आदमी?
जिसका विवेक प्रखर है। वो निरावरण बन जाएगा। विवेक प्रखर क्या? कि सत् क्या है, असत् क्या है ठीक से जो जाने। नश्वर क्या है, शाश्वत क्या है ठीक से जो जाने। जैसे बच्चे का विवेक प्रखर नहीं है, तो लॉलीपॉप, चॉकलेट, बिस्किट, खिलौने पकड़ लेगा, हीरे, मोती, जवाहरात छोड़ देगा। विवेक कच्चा है। ऐसे जिनका कच्चा विवेक है वो जगत के दृश्यमान परिस्थितियों को सच्चा समझेंगे, उन्हीं को पाएंगे, उन्हीं को भोगेंगे और उन्हीं में खप जाएंगे। यह कच्चा विवेक है।
और सच्चा विवेक यह है कि आखिर तो यह नश्वर है, तो उनका उपयोग करेंगे लेकिन उसमें खपेंगे नहीं। खपेंगे नहीं तो मन को संकल्प विकल्प उधर कम होंगे। तो ऐहिक जगत की प्राप्ति की उनको भीतर से तीव्र लालसा नहीं होगी, तो चित्त में शांति होगी। शांत चित्त में आत्म विषयिणी बुद्धि हो जाती है। आत्म विषयिणी बुद्धि होती है तो बुद्धि बलवान होती है, तो मन उसको घसीटता नहीं है। बलवान के पक्ष में ही सब होते हैं। तो चित्त में विश्रांति होती है तो बुद्धि बलवान होती है। बुद्धि बलवान होती है तो मन उसके पक्ष में रहता है, इंद्रियों के पक्ष में नहीं जाता। तो संयम, सदाचार, शांति, सामर्थ्य उसका बढ़ता जाता है। कितना भी खर्च करता जाता है लेकिन उसके पास वो टेक्निक आ गई विश्रांति पाने की। क्योंकि विवेक तीव्र है।
विवेक तीव्र होने से दूसरा फायदा होगा कि वैराग्य आएगा। किस चीज में राग करें? कब तक राग करें? इनकी शाश्वतता कब तक? आखिर कुछ नहीं। ये मिल गया, वो हो गया, वो हो गया लेकिन आखिर तो देखो तो स्वप्न। ऐसे ऐसे राजा आए, मानधाता जैसे आए, अश्वपति आए, कैसे कैसे राजा रामचंद्र जी आए। कृष्णचंद्र जी आए, कंस भी आए, ऐसे ऐसे राजा आए, सब छोड़ छोड़ के गए तो अपना कब तक रहेगा ये? तो तीव्र विवेक है। तो नश्वर है, तो नश्वर में प्रीति और आकर्षण नहीं होगा तो फिर शाश्वत में विश्रांति होगी, बुद्धि बलवान होगी।
विश्रांति से जो सुख और सामर्थ्य आएगा, दोषों का उन्मूलन होगा और सद्गुणों की वृद्धि होगी। और विश्रांति और सामर्थ्य से जुड़े नहीं, विश्रांति में भी रमण न करें। तो फिर तत्वज्ञान। विश्रांति में रमण करा तो वहीं रुक जाएगा। विश्रांति मिलेगी तो अंतःकरण में ही मिलेगी। लेकिन उससे भी आगे जाए तो अंतःकरण से भी पार नित्य नवीन रस परमात्मा का उसके चित्त में उभरेगा। उसको बोलते हैं जीवनमुक्त। जीते जी मुक्त।
वैसे तो कोई विरले-विरले होते हैं। लाखों करोड़ों में कोई-कोई होते हैं। रिद्धि-सिद्धि वाले होते हैं। अष्ट सिद्धि वाले होते हैं। जल सिद्धि वाले होते हैं, थल सिद्धि वाले होते हैं। भूत-प्रेत की सिद्धि वाले होते हैं। ये सब होते हैं लेकिन सर्वोपरि है निरावरण पुरुष की बात। जैसे कृष्ण है, निरावरण। राम जी हैं, निरावरण हैं, नानक जी निरावरण हैं।
तो शास्त्रों में भी बहुत सारे अच्छे पुरुषों की बात आती है। भक्ति सिद्ध, योग सिद्ध, ज्ञान सिद्ध इन ज्ञान के द्वारा, भक्ति के द्वारा, योग के द्वारा निरावरण पद में टिके परमात्मा को पाए, ऐसे सिद्धों की बातें शास्त्रों में आती हैं। लेकिन भभूत सिद्ध की कोई बात नहीं आती। कि भभूत निकाल दी वो सिद्ध पुरुष है, नहीं। वो अपनी उपासना है, अपनी साधना है।
तो अब निरावरण होने के लिए तीव्र विवेक चाहिए। तीव्र विवेक होने से वैराग्य आएगा, वैराग्य से षट् संपत्ति और मोक्ष की इच्छा एक दूसरे से जुड़ी हुई है। कि मुक्ति हो जाए। तो जो मुक्त स्वरूप है, उसमें जिज्ञासा होगी। मैं कौन हूँ? दुख-सुख किसको होता है? मान-अपमान किसको होता है? तो मैं कौन हूँ इसको जानने की इच्छा होगी। आखरी जगत क्या? सुकरात की नाईं तड़प पैदा होगी। अपने आत्मा को, ईश्वर को जानने की इच्छा होगी।
तो इसमें भी दो होते हैं, एक भक्त मानकर फिर जानता है। और विवेकी जानकर फिर मानता है। भक्त पहले मान्यता करता है, ठाकुर जी को स्नान करा दिया, सुला दिया, जगा दिया, भगवान को मानता है फिर धीरे धीरे भगवान को जानता है, भक्त। और जिज्ञासु पहले जानता है बाद में मानता है भगवान को। तो जिनकी बुद्धि की प्रधानता है, वो पहले जानते हैं ईश्वर क्या है, फिर मानते हैं कि ये ईश्वर है। और भक्त भावना की प्रधानता है तो पहले मानते हैं और फिर वो यात्रा करते-करते जानते हैं।)
हाँ जी।
हे राम जी! शालमली नामक एक वृक्ष था, उसके नीचे राजा ने शब्द सुना कि अदृष्ट सिद्ध...
(तो शालमली वृक्ष के नीचे राजा जनक जा के बैठे। विश्रांति पाए। तो सिद्ध आपस में चर्चा कर रहे थे। एक सिद्ध ने कहा कि हम उस परमेश्वर की उपासना करते हैं कि जो सदा अपना आपा है, बुद्धि के अनुरूप होता है और तब जो आनंद आता है जिस पर, जो आनंद स्वरूप है उस ईश्वर की हम उपासना करते हैं। जो चीज आप चाहते हैं, जो घटना घटती है और आप चाहते हैं ऐसी घटना और फिर जो सुख मिलता है, तो बुद्धि में जिसका सुख प्रतिबिंबित होता है उस परमेश्वर की हम उपासना करते हैं। हाँ। नौ योगेश्वरों की कथा है। नौ योगेश्वर की कथा सुनकर जनक राजा को विवेक वैराग्य हुआ और भगवान का साक्षात्कार हो गया। ये वो प्रसंग है। हाँ जी।)
दूसरा सिद्ध बोला यह द्रष्टा जो पुरुष है और दृश्य जो जगत है, उस द्रष्टा और दृश्य के मिलाप में जो बुद्धि में निश्चित आनंद होता है और इष्ट के संयोग और अनिष्ट के वियोग का जो आनंद चित्त में दृढ़ होता है, वह आनंद आत्म तत्व से उदय होता है। उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
दूसरा सिद्ध बोला कि द्रष्टा, दर्शन और दृश्य को वासना सहित त्याग करो। जो दर्शन से प्रथम प्रकाश रूप है और जिसके प्रकाश से यह तीनों प्रकाशते हैं, उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
(पहले सिद्ध ने कहा कि द्रष्टा (मतलब देखने वाला), दर्शन (माना देखना) और दृश्य (माना दिखने की चीज), तीन चीज होता है। दृश्य, देखना और देखने वाला। ये तीनों की एकांतता होती है, अनुकूलता तब जो आनंद भासता है... पिक्चर देखने की इच्छा हुई और वही पिक्चर मेरी आंखें देखने में सक्षम हैं, कोई रोग नहीं, तकलीफ नहीं है। जो इच्छा हुई वही पिक्चर है और वही मैं देख रहा हूँ। तो मेरी इच्छा पूर्ति हुई। इच्छा पूर्ति हुई तो बुद्धि में, अंतःकरण में सुख मिला। जिस व्यक्ति को हम चाहते हैं, वो व्यक्ति आ गए और हम उनको देख रहे हैं। तो हमको सुख मिला। जो चीज हम चाहते हैं, वो चीज कोई ले आया या बन गई, हमने खाई, भोगी, सुख मिला। तो द्रष्टा, दर्शन और दृश्य के मेल से जो बुद्धि वृत्ति में सुख मिलता है, वो सुख स्वरूप वास्तविक में आत्मा का है। हम उस आत्मा की उपासना करते हैं, ये मिले तो सुखी हो जाऊं, ये खाऊं तो सुखी हो जाऊं, इधर जाऊं तो सुखी हो जाऊं, ये बेवकूफी हमने छोड़ दी। लेकिन तीनों के मेल से जिस बुद्धि में जिसका सुख मिलता है, हम उस सुख स्वरूप का उपासना, ध्यान करते हैं।
तो दूसरे सिद्ध ने कहा कि द्रष्टा, दर्शन और दृश्य ये त्रिपुटी के मेल की इच्छा ही छोड़ दो, और उनमें जो सुख मिलता है उसको ही छोड़ दो। हम तो उस सुख स्वरूप में ही एकाकार होते हैं।)
तीसरे सिद्ध ने कहा...
(तीसरा सिद्ध बोला जो निराभास और निर्मल है, जिसमें मन का भी अभाव है, अर्थात अद्वैत रूप है, उसकी हम उपासना करते हैं।
चौथा सिद्ध बोला कि जो निर्मल है, जिसमें मन नहीं है, द्रष्टा, दर्शन, दृश्य ये सब अंतःकरण में है, वो जो शांत परमेश्वर है ज्यों का त्यों, हम उसकी उपासना करते, तीसरे ने कहा।
चौथे ने कहा...)
जो द्रष्टा दृश्य दोनों के मध्य में है और अस्ति-नास्ति दोनों पक्षों से रहित प्रकाश रूप सत्ता है और सूर्य आदि को भी प्रकाशता है, उस आत्मा की हम उपासना करते हैं।
(वो कोई साधारण नहीं है। सूर्य को भी प्रकाशता है। सूर्य तो दुनिया को प्रकाशता है, लेकिन वो चैतन्य परमेश्वर सूर्य को भी प्रकाशित करता है। आंखें तो सारी चीजों को प्रकाशित करती हैं, लेकिन आंखों को मन प्रकाशित करता है कि आंखें देख रही हैं कि नहीं देख रही हैं। और मन को जीव प्रकाशित करता है, लेकिन जीव को भी जो प्रकाशित करता है वो परमेश्वर की हम उपासना करते हैं। कितना सरल है। आंखें सबको प्रकाशित करती हैं। लेकिन मन को आंखें नहीं देखती, सबको देखती हैं, मन को नहीं देखती, मन आंखों को भी देखता है। और बुद्धि को मन नहीं देखता, बुद्धि मन को भी देखती है। और बुद्धि आत्मा को नहीं देखती, आत्मा बुद्धि को भी देखता है कि मेरी बुद्धि बिगड़ गई कि सही है? मेरी बुद्धि पहले ऐसी थी, अभी ऐसी है। उसको जो देखता है... तो जैसे आंखों को, मन को, बुद्धि को जो प्रकाशित करता है, वही सूर्य को, चंद्रमा को भी वही प्रकाशित करता है। जैसे तुम्हारी सूर्य और चंद्र, दायीं सूर्य है नाड़ी और बायीं चंद्र है, ऐसे ही आसमान में सूरज चंद्र... तो जैसे इस सूर्य चंद्र को तुम्हारा द्रष्टा प्रकाशित करता है, ऐसे उस सूर्य चंद्र को भी वही परमेश्वर प्रकाशित करता है। हम उसी परमेश्वर की उपासना करते हैं। बहुत ऊंची बात है, ये तो सुनने से ही करोड़ों गौओं का दान करने का फल मिले, ऐसी बात है। खाली सुनने मात्र से। इसकी उपासना करो तो कहना ही क्या है। ये तो बहुत बड़ा भारी, इसमें ऊंचा सत्संग है। ऐसा कहीं मिला था सुनने को? क्या बात है, ऐसा एकदम टॉप माल देते हैं इधर। हम्म।)
पंचम सिद्ध बोला कि जो ईश्वर सकार और हकार है, अर्थात सकार जिसके आदि में है और हकार...
(ये तो सब के काम का है। सब आसानी से कर सकते हैं। पंचम सिद्ध पुरुष बोला कि जो ईश्वर सकार और हकार आदि और अंत में है, हम उसकी उपासना करते हैं। हम श्वास लेते हैं तो 'सो' ध्वनि होता है। छोड़ते हैं तो 'हं' होता है। लेकिन सुनाई नहीं पड़ता। जैसे वो घड़ियाल, लोलक चल रहा है, एकाएक आवाज सुनाई बंद हो गया, सेठ ने बोला मुनीम को कि क्या वो घड़ियाल का लोलक बंद हो गया क्या? बोले लोलक तो चल रहा है। बोले आवाज नहीं आता है, बोले ये बाराती आए हैं ना बैंड बाजे, इसीलिए लोलक का आवाज दब गया। ऐसे ही अपने अंदर जो डॉक्टर बोलते हैं ना हार्ट, हार्ट, हार्ट, हृदय, वो डॉक्टरों को खाली हृदय रहने की जगह को हृदय बोलते हैं। हृदय तो शुद्ध मन होता है। उसमें जो चैतन्य सत्ता होती है उसी से श्वास आता-जाता है। तो श्वास लेते हैं तो गरम होता है। और छोड़ते हैं तो ठंडा होता है। तो श्वास लिया और फिर छोड़ा तो उसकी जो बीच की अवस्था है, हम उसमें टिकते हैं। बहुत सूक्ष्म होता है। वही चैतन्य है, वही सारे ब्रह्मांड का स्वामी है। उसी में भगवान शंकर, विष्णु, महेश रस लेते हैं। बहुत सूक्ष्म बुद्धि चाहिए। तो श्वास लेने के जो आदि में सो और अंत में हम् रूप है, उस सोऽहं स्वरूप की हम उपासना करते हैं। ये सब लोग कर सकते हैं, सोऽहं स्वरूप की उपासना। जैसे वो सिद्ध करते थे वो। ये गुरु मंत्र जो लेते हैं ना उनको मैं पहले यही... है तो बहुत ऊंचा। सब आदमी को देना नहीं चाहिए, लेकिन अब फिर कब पात्र बने और कब मिले, तो पात्र को पात्रा भी तो दो। जितना होगा श्रद्धा, जितना होगा भाग्य उतना आगे चलेगा।
हाँ जी, पढ़ो।)
सातवां सिद्ध बोला कि जो सब आशा त्यागता है, उसको फल प्राप्त होता है और आशारूपी विष की बेल...
(आप भी सब आशा छोड़ दो, पूरे बेटे-बेटी की, अपने आप फल प्राप्त होता है। निश्चिंत हो जाओ, जो मंत्र दिया है जपा करो, जाओ। खामखा सुकड़-सुकड़ के मर रहे हैं, पचास उपाय बताओ। डॉक्टर ऐसा बोलता है, फलाना ऐसा बोलता है, ढिकना ऐसा बोलता है। छोड़ो, होता है तो होता है, नहीं होता है तो जा। निश्चिंत होके भगवान में लग जाओ, अपने आप अच्छा होता है। अब ये मानेंगे नहीं ना, अब उसने तो मान लिया, आंकड़े के पत्ते का दूध डाल दिया। ऐसा तो नहीं बोलता हूँ जा, आंकड़े के पत्ते का दूध डाल लूं, ऐसा तो नहीं बोलता हूँ। इतनी बात मान लो फिर भी। अच्छा है, जो मंत्र दिया है वो जपा करो।
हाँ जी।)
हे राम जी! नाना प्रकार के दुःख, संकट, स्नेह आदिक विकार रूप जो...
(एक महात्मा थे, उनका दर्शन करने जाते थे अखंडानंद सरस्वती। तो महात्मा ऐसे ही मस्ती में बैठे रहते थे, अपने सोऽहं स्वरूप का तो ज्ञान हो गया था। तो कोई बोले बाबाजी मैं बहुत दुखी हूँ, मेरे को ये तकलीफ है, ये तकलीफ है। बोले जा, तिनका सिर का पत्ता। ले क्या है, बोले पेट में ऐसा-ऐसा। बोले घोट के पी लीजियो। कोई आया बोले मेरे को सिर में है, वो घास में बैठे रहते, घास का तिनका उठा के दे देते। किसी को बेटा नहीं होता, तो तिनका उठा के दे दिया। किसी को धंधा नहीं, तिनका... जो भी सब दुखों की एक दवाई, तिनका घोट के ले लो भाई।
गजब के महात्मा हैं भाई!
आखिर अखंडानंद सरस्वती ने एक दिन पूछ ही लिया, कि बाबा, आप तो इधर घास पे, लॉन में बैठे रहते, लेटे रहते, बैठे रहते। और कोई भी आता है तो घास का टुकड़ा उठा के दे देते हैं, और फिर हमने जांच किया तो कईयों को फायदा भी हुआ है। तो ये क्या होता है महाराज?
बोले क्या होता है, ये तो सीधी बात है। इसमें शंका क्यों करते हो?
बोले महाराज सब कोई भी रोग हो और तिनका तोड़ के आप दे देते हो और फायदा होता है, ये कैसे होता है?
बोले देखो भाई। शरीर में पांच भूत हैं? बोले हैं। और ये तिनके में भी पांच भूत हैं? जल तत्व है, सूर्य के किरण, पृथ्वी के कण, पांच भूत हैं तिनके में भी। वो भी पांच भूत, ये भी पांच भूत, हम उठाते हैं तो संकल्प करते हैं कि इसका जो भूत कम ज्यादा है वो सेट हो जाए। तो भूत तो है, और क्या! अब तो जड़ भूत है, तो चेतन की तो आज्ञा मानेंगे कि नहीं मानेंगे? तो ठीक हो जाते हैं और क्या, इसमें क्या बड़ी बात है।
अब उनको तो बड़ी बात नहीं लगती और साइंटिस्ट का तो मुंह पौड़ा हो जाए। वो तो मर जाए ये मानने में तो। ऐसा, वो तो मानेगा ही नहीं।
अब बोले मानेगा तो ऐसा है, ऐसा है, उनके श्रद्धा का कारण हो गया, फलाना हो गया, ढिकना हो गया। उसके खोपड़ी में तो बैक्टीरिया ही घुसा हुआ है बस। डॉक्टर बोलेगा इसको ये बैक्टीरिया नहीं है, अंडे नहीं है, फलाना नहीं है, ढिकना नहीं है। बैक्टीरियावादी को बैक्टीरिया दिखता है, पित्त, कफ और वात वादी को वात, पित्त, कफ दिखता है। शरीर के कण वालों को कण दिखता है, तत्व वालों को तत्व दिखता है। लेकिन ओ ब्रह्मवेत्ताओं को तो सब ब्रह्म परमात्मा की लीला दिखती है।
वो सिद्ध क्या बोला?)
हे राम जी! तृणवत् जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्म तत्व में स्थित है...
(जगत को त्याग दिया मतलब कोई ऐसा नहीं कि लंगोटी पहन के भाग गया। जगत तो त्याग दिया माना ये तू-मैं की सत्यता त्याग कर सब की गहराई में उस परमेश्वर तत्व को जानता है, उसने जग को त्यागा। जगत को त्याग देने का मतलब है, जैसा जगत आपको दिखता है, ज्ञानी को भी आंखों से तो ऐसा ही दिखता है। लेकिन अंदर से वो ठीक से जानते हैं।
एक तेल का व्यापारी था, जरा तेजी में थोड़ा पैसा कमाया और गया राम जी की मूर्ति ले आया, 250 रुपये की, दो तोले की। फिर तेजी आई, तो हनुमान जी की मूर्ति ले आया, ज्यादा पैसा कमाया, 700 रुपये की। फिर मंदी आई, तो लगा लपड़क, तो थैली में डाल के माणिक चौक चला गया बेचने को। तो सोनी ने कहा कि तुम्हारे हनुमान जी के तो साढ़े पांच सौ मिलेंगे। और राम जी के 255, भाव सोने का बढ़ गया था थोड़ा।
बोले राम स्वामी हैं, और सेवक के तुम 550 देते हो, तो बेवकूफ कहीं के, स्वामी का तो भाव ज्यादा होना चाहिए।
उसने बोला, भाई स्वामी राम जी हैं, सेवक हनुमान जी हैं हम मानते हैं। तो राम जी भी तुम ले जाओ, हनुमान जी भी तुम ले जाओ, मेरे को तो ढाई तोला और पांच तोला सोना निकाल के दे दो बस।
अब ढाई तोला राम जी में से सोना निकाल दे, तो राम जी की मूर्ति कैसे रहेगी? और पांच तोला सोना हनुमान जी की मूर्ति से निकाल दे, तो फिर हनुमान जी... पहले सोना है, बाद में हनुमान की आकृति है। तो सुनार को तो सोना दिखता है, और भक्त को हनुमान जी दिखते हैं। सुनार बोलता है हनुमान जी तुम ले जाओ, मेरे को तो पांच तोला माल दे दो बस।
तो ऐसे ही, ज्ञानी को तो ब्रह्म दिखता है, और संसारियों को जगत दिखता है। जैसे सोनी को सोना दिखता है, ग्राहक को आकृति दिखती है। ऐसे संसारी को संसार दिखता है, और ज्ञानी को रॉ मटेरियल दिखता है, ब्रह्म। कैसी निगाह है देख लो। सो तो है।
पढ़ो जल्दी।)
हे राम जी! तृणवत् जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्म तत्व में स्थित है, उस महापुरुष को किसकी उपमा दीजिए। उस पुरुष के उदय, अस्त, अहं, त्वं आदिक सारी कल्पनाएं नष्ट हो गई हैं और केवल आत्म स्वभाव को प्राप्त हुआ है। उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है? जब दूसरा...
(उस सोऽहं स्वरूप को पाया, उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है? उसका आदि, अंत, ये वो सब आगम अपाय सब पूरा हो गया। उस ईश्वर स्वरूप को कौन सी उपमा दो? कोई गुरु बोलो, कोई साधु बोलो, कोई बापजी बोलो, कोई बुद्धू जी बोलो, कोई कुछ बोलो, कोई दिखाड़ो बोलो, बोलते रहो। उसको क्या उपाधि दोगे, क्या उपमा दोगे? एक शरीर में दिखते हुए भी करोड़ों-करोड़ शरीरों में व्याप रहा है। एक जगह दिखते हुए भी अखिल ब्रह्मांड में व्याप रहा है। सूर्य, नक्षत्र और चंद्रमा भी उसने घेर रखा है अपने स्वरूप में। उसको क्या उपाधि दोगे? ये तो तुम्हारे बीच है तो तुम नहीं जानो, तो तुम्हारी महिमा, तुम जानो। बाकी वो तो जो है, वही जान सकते हैं।
ज्ञानी को जानने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। ऊंधे माथे नहीं, ऊंधे माथे तो बहुत करते हैं। सीधे माथे तपस्या करें।
इसलिए गुरु गीता में लिखा है... वैसे भी शास्त्र कहते हैं माता, पिता और गुरु। जो कहते हैं, वो शास्त्र अनुकूल हो चाहे शास्त्र विरुद्ध हो, उनकी बात माननी हितकारी... हितकारी कहेंगे।
ऐसा भी आता है, जैसे 10 शिक्षक, एक आचार्य। 10 आचार्य, एक प्रधानाचार्य। 10 प्रधानाचार्य, एक पिता। 10 पिता बराबर एक माता।
हे माता रेणुका पानी भरने गई। सारस-सारसिका आपस में विहार देखा, उसके मन में आ गया हमारे पति जमदग्नि खाली ध्यान, भजन, सत्संग। मेरे तरफ तो देखते ही नहीं, हमें तो संसार का सुख ही नहीं। परशुराम का जन्म हुआ, बाद में ऋषी समझ गए। ऐ परशुराम, इधर आओ। पहले तो दूसरे लड़के को बुलाया कि तुम्हारी मां के मन में व्यभिचार आया, इसका गला काट दो। उसने नहीं काटा। परशुराम को बुलाया कि तेरी मां के मन में बुरे विचार आए, गला काट दे। परशुराम ने तो उठाया फरसा... अब माता, 10 पिता बराबर माता है, लेकिन अब पिता की आज्ञा है तो... जमदग्नि प्रसन्न हुए, बोलो बेटा क्या चाहते हो? मैं प्रसन्न हूँ। बोले पिताजी बस आप प्रसन्न हैं तो इतना ही वरदान दीजिए कि मेरी मां जीवित हो जाए और उसको पता नहीं चले कि मैंने गला काटा था।
आज्ञा पालने वाले की बुद्धि भी बड़ा काम कर देती है।
माता-पिता की आज्ञा, गुरु की आज्ञा पालने वाले की बुद्धि उसका बड़ा साथ देती है।
तो 10 आचार्य, एक प्रधानाचार्य। 10 प्रधानाचार्य, एक पिता। 10 पिता बराबर माता का दर्जा। ऐसी 84 लाख माताएं बराबर एक ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु होता है।)