चेतन स्वभाव तो है, कीड़ी में भी चेतन है। तो जो सत है उसका अस्तित्व सदा है। जो चेतन है उसमें ज्ञान है। तो कीड़ी में भी ज्ञान है कि ये शक्कर है और ये नमक का कंकड़ है। कीड़ी में भी ज्ञान है कि ये धुआं है यहां से भाग चल। और ये ठंडी हवाएं आ रही है ये तो बरसात आएगी कहीं पड़ रही है हमारे बिल में बच्चे पड़े कहीं डूब न जाएं तो कीड़ी बच्चों को लेकर सुरक्षित जगह पे जाती है। कौन उसको नोटिस देता है? कौन टेलीफोन करता है? तो कीड़ी के अंदर भी वो सच्चिदानंद छोटे से छोटा अगर ब्रह्मांड में कोई चीज है तो भगवान है। ईश्वर से बढ़कर कोई छोटा नहीं। अणुरो अणियान। अणु से भी अणु। और बड़े से बड़ा भी ईश्वर है। महतो महीयान। बड़े से बड़ा भी वो परमात्मा है। छोटे से छोटा इतना है कि बैक्टीरिया के अंदर भी उसकी सत्यता, चेतनता और आनंदता दिखती है। बैक्टीरिया को भी अनुकूल वातावरण में मजा आता है। हैं? बैक्टीरिया में भी चेतना है। और बैक्टीरिया का भी शरीर जो भी है छोटा-मोटा वो... खूब बैक्टीरिया हो गए गन्ने का रस में अथवा ताड़ में। बैक्टीरिया हो गए फिर खराब हो गया तो बैक्टीरिया मर गए दारू बन गया। दारू दीने पिया तो कुछ बन गया। वो कुछ भी कुछ न कुछ अस्तित्व उसका मौजूद रहेगा। बैक्टीरिया की आकृति नाश होती है। जैसे कंगन है, कुंडल है, अंगूठी है, चैन है, पट्टा है। तो ये पट्टा, चैन सब में सुवर्ण है। ये है पना सुवर्ण का है बाकी नाम सुवर्ण के आधार पर रखे गए हैं। तो जब एक सुनार देखता है तो सोने को देखता है। एक को हुआ कि चलो भगवान की दया हुई तेल में कमाई हुई है चलो ठाकुर जी की मूर्ति सोने की बना लें। और तेल में आ गई तेजी। महाराज उसने लाखों रुपये और कमा लिए। तो बोले राम जी की मूर्ति तो लाये हैं लेकिन सेवक के बिना स्वामी की मूर्ति तो चलो सरकार का सेवक भी ले आएं तो हनुमान जी को भी ले आए। अब कुछ तेजी मंदी में घाटा पड़ गया। तो वो राम जी को भी उठाया और हनुमान जी को भी उठाया रखा थैली में और माणेक चौक बेचने गया। तो बोला कि भाई हनुमान जी के तो आपको हम आठ हजार दे सकते हैं। और राम जी के दो हजार मिलेंगे। बोले पागल हुए हो? राम जी भगवान है स्वामी है। और हनुमान जी सेवक है। बोले हनुमान आप ले जाओ और राम जी भी आप ले जाओ। इतने वजन का सोना उनमें से दे दो। इतने वजन का हनुमान जी का सोना हमको दे दो बाकी हनुमान जी तुम ले जाना। तो हम तो सोने की ही कीमत आंकते हैं हनुमान जी की आकृति भक्तराज तुम ले लो। तो सुनार की नजर सोने पर है। ऐसे ही हिन्दू संस्कृति के वेद शास्त्रों की और धर्म की नजर है उस परब्रह्म परमात्मा पर। तो सभी को परब्रह्म परमात्मा का सत्ता का, चेतनता का, आनंदता का ज्ञान हो इसीलिए सारे कर्म कांड विधि विधान हैं। बच्चे के पुंस संस्कार से लेकर गर्भ में बच्चा है तब से लेकर मृत्यु के सोलहवें संस्कार तक हमारी व्यवस्था ये है कि आपके अंदर छुपे हुए परमात्मा के सत्य को, चेतनता को, आनंदता को पाकर आप निर्दुख हो जाएं। रसमय हो जाएं, सुखमय हो जाएं। आनंदमय हो जाएं। जैसे अभी कीर्तन के पहले हम लोगों ने थोड़ा नृत्य जैसा किया। तो क्या है कि हमारे पैरों में और हमारे हाथों में सारे शरीर की नाड़ियों का स्विच बोर्ड है। तो थोड़ा बहुत नृत्य करने से इड़ा और पिंगला नाड़ी, इसमें श्वास की रिदम तेज से चलती तो बीच में सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है। जिससे आपके ध्यान भजन में बरकत पड़े। और दस अरब न्यूरॉन्स हैं हमारे सिर में। दोनों मस्तकों में मिलाकर। उन न्यूरॉन्स को पुष्ट करने वाली सुषुम्ना नाड़ी जितना सजग रहेगी उतने वे न्यूरॉन्स सजग होंगे। एक-एक न्यूरॉन्स एक-एक ग्रह नक्षत्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है रिमोट कंट्रोल की नाईं उनसे काम करवा सकता है। इतनी उनमें ताकत है। इतने छोटे हैं तो भी। जैसे सेलुलर इतना सा है और दुनिया के हर घर और ऑफिस में उसकी रिंग चमत्कार दिखा देती है। तो इस सेलुलर की खोज भी तो तुम्हारे न्यूरॉन्सों ने की ने? दिमाग ने की ने? तो सेलुलर बड़ा के सेलुलर को पैदा करने वाला बड़ा? बोले सेलुलर को पैदा करने वाला बड़ा। तो सेलुलर को पैदा करने वाला मनुष्य का मस्तक बड़ा के मनुष्य के मस्तक के पीछे जो चेतना सत चित आनंद की काम कर रही है वो बड़ी? बोले वो बड़ी। तो बस उस तक पहुंचने की व्यवस्था का नाम है भारतीय संस्कृति। समग्र ज्ञान भरा हुआ है। सच्चिदानंद रूपाय... सच्चिदानंद रूपाय... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... तापत्रय विनाशाय... तापत्रय विनाशाय... श्री कृष्णाय वयं नुमः... श्री कृष्णाय वयं नुमः... ये भागवत के पहले स्कन्ध में मंगलाचरण के वक्त आता है। ये ग्रंथ तो भगवान कृष्ण की लीलाओं का है। फिर भी मंगलाचरण में क्या? कि हम किसका पूजन करते हैं? सच्चिदानंद रूपाय जो सत है, चेतन है और आनंद रूप है। श्री कृष्ण रूपाय नहीं, सच्चिदानंद रूपाय। वो सच्चिदानंद कैसे हैं? जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं। तो उनको हम क्यों प्रणाम करते हैं कि तापत्रय विनाशाय। आदिदैविक, आदिभौतिक और आध्यात्मिक ये तीनों प्रकार के तापों में संसार तप रहा है, उन तापों से हम मुक्ति चाहने के लिए परमात्मा को प्रणाम करते हैं। तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः। तो कौन से कृष्ण हैं कि जो सत चित आनंद है। कृष्ण का वास्तविक... श्री कृष्ण नंद यशोदा के घर आए, वसुदेव देवकी के घर आए उसके पहले उसके बाद में हम लोग कृष्ण कृष्ण करते ऐसी बात नहीं। श्री कृष्ण प्रकटे उसके पहले वेदों में कृष्ण शब्द की महिमा है। जो सबको कर्षित करते, आकर्षित कर दे, आनंदित कर दे उसे कृष्ण कहते हैं। तो वही सच्चिदानंद सबको आकर्षित करते हैं, सबको आनंदित करते हैं और सबके कर्मों के नियामक हैं। और प्ररेणादाता हैं और फलदाता हैं। आप छुपकर भी कुछ निर्दोष पक्षियों को पकड़ के कमरे में ले जाओ। अथवा कीड़े मकोड़ों को। और कोई नहीं देखता और कीड़े मकोड़े आप पर कोई केस भी नहीं कर सकते। और आप उनको अपने हाथ से कुचलो। तो देखो आपके हृदय में नालत्य कौन बरसाता है? अशांति और खिन्नता कौन देता है? और कोई नहीं देखे और उनको आपने कुछ खाने की मधुर वस्तु दी। तो हृदय में शांति, प्रसन्नता और अच्छाई का फल कौन देता है? वही सच्चिदानंद देता है। तो हिन्दू की पूजा में मूर्ति पूजकों को जो बेवकूफ मानते हैं अथवा अनेक देवताओं को मानने वाले हिन्दू लोग ऐसे हैं वैसे हैं उन बेचारों को पता ही नहीं कि तुम्हारा तो क्या तुम्हारे पुरखों का भी जन्म नहीं हुआ था, उनके पहले तुम्हारे कल्चर का जन्म नहीं हुआ था, उनके पहले ही हिन्दुओं ने जड़ में से भी भगवान को प्रगट किया और चेतन गुरु में से और माता पिता में से भी ईश्वर के आशीर्वाद को और बातचीत को प्रगट किया। यहां तक कि ऋषभ से भी ईश्वर की प्रागट्य का वर्णन आता है उपनिषदों में। शिष्य ने प्रार्थना की कि गुरुदेव मुझे भगवान का दर्शन करना है। जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का कारण है। मुझे ब्रह्म ज्ञान चाहिए। बेटे ये जो गायें हैं पांच पच्चीस ले जाओ जंगल में। और गायों को चराते चराते बैल भी है उनके साथ सांड भी है जब एक हजार गायें हो जाएं ने तब आना। तो तुमको परमात्म प्राप्ति हो जाएगी। अब वो तो बेचारा गिने न गिने लेकिन गुरु का वचन, जब एक हजार गायों से भी एकाध ज्यादा हो गई तो ऋषभ, एक बछड़ा बोला कि अब हमें ले चलो हमारी संख्या हो गई है। कहा आप कौन बोल रहे हो? कि जिसको तुम खोजते हो वो ही मैं बोल रहा हूं। उपदेश दीजिए। तो ब्रह्म के प्रथम पाद का उपदेश उस ऋषभ के द्वारा सच्चिदानंद प्रभु ने दिया बैल के द्वारा। फिर आधे रास्ते में आए रात्रि विश्रांति करते-करते फिर दूसरे दूसरे पाद का उपदेश दिया। ऐसे करते करते कई दिनों में आश्रम पहुंचना था दूर जंगल से। तो फिर तीसरे पाद का उपदेश दिया। तो उसको शांति, आनंद और निर्भिकता और चेहरे पर दिव्यता आई। क्योंकि ब्रह्मचर्य का पालन करता था। गायों को चराता था। झूठ कपट का तो सवाल नहीं है। गाय का दूध पीता था। गायों के बीच रहता था। आसुरी शक्ति, आसुरी वातावरण तो गायों के बीच हो नहीं सकता। मरे हुए भूत प्रेतों का प्रभाव भी गौशाला के इर्द गिर्द नहीं हो सकता है। अपने आश्रमों में गौशाला की गायें घुमाने का मैंने कह दिया घूमती है ने? वाटिका में भी घूमती यहां भी हालांकि यहां तो कोई भूत प्रेत नहीं है फिर भी गायों के शरीर से जो ओरा निकलती है वो सूर्य के गो तत्व का प्रभाव वातावरण में बिखरता है। टीबी के परमाणु नहीं रह सकते। अशुद्ध वातावरण को शुद्ध करने के लिए गाय का घूमना और गाय का होना बहुत अच्छा है। और शुद्ध है तो और शुद्ध होता है। तुझमें राम मुझमें राम सबमें राम समाया है, कर लो सभी से स्नेह जगत में कोई नहीं पराया है। सब अपनी अपनी... बोले बेटा ऐसा है, पत्नी ऐसी है, पड़ोसी ऐसा है, ये ऐसा है... भाई स्वस्या प्रकृति प्रेरीतापी... स्वस्या अपनी अपनी प्रकृति से सब चलते रहते हैं। अपने अपने ज्ञान साक्षात्कार होने के बाद भी, सच्चिदानंद का दर्शन करने के बाद भी ज्ञानियों की भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा होती है। शुकदेव जी महान त्यागी हैं तो जनक भलाराज काज में अलमस्त हो रहे हैं, चंवर डुलवा रहे हैं, सोने के बर्तनों में भोजन कर रहे हैं। तो जो साक्षात्कार सच्चिदानंद का शुकदेव जी को हुआ है इतने मस्त कि फिर जगत की सुधि नहीं। और दूसरे राजा जनक इतना कि जगत का राजकाज कर रहे हैं। शुक त्यागी कृष्ण भोगी... कृष्ण तो द्वारका का उपभोग कर रहे हैं। जनक राघव नरेन्द्र... राजा जनक और रघुराजा राजकाज करते हैं। वसिष्ठ कर्मनिष्ठश्च... वसिष्ठ महाराज हैं तो हे राम जी अब सत्संग कल करेंगे संध्या का समय हुआ है। बड़े कर्म में चुस्त रहते हैं। सर्वेषाम ज्ञानिनाम समान मुक्तम... आत्म साक्षात्कार हो जाए फिर भी ज्ञानी भी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार जीते हैं तो जरूरी नहीं कि बेटा आपकी प्रकृति के अनुसार जिये। पत्नी आपके अनुसार ही चले। पति आपके अनुसार ही चले। चलते हैं तो अच्छा है, न चले तो आप अंदर में उद्विग्न मत हो। परेशान मत हो। और नहीं चलते हैं तो आसक्ति हो जाएगी, नहीं चलेंगे तो अच्छा है अनासक्ति आ जाएगी। इसीलिए आप तो इस संसार को अनादि काल से चला आ रहा है सब जीवों की अपनी-अपनी प्रकृति है। स्वस्या प्रकृति प्रेरीता... ज्ञानवानम अपि... निग्रह किम करिश्यते... अब मेरे गुरुदेव थे तो एक लंबा चोगा पहनते थे। और शरीर... सिर के बाल मुंडन रखते थे। दाढ़ी साफ रखते थे। और यहां कपड़ा पहनते थे। लेकिन मेरी प्रकृति ऐसी नहीं है। मैं तो दाढ़ी रखता हूं। मेरे गुरुजी को नहीं थी। मेरे बाल हैं और मेरा वेश ऐसा है। तो विवेकानंद का वेशभूषा और व्यवहार अलग है रामकृष्ण का अलग है। तत्व ज्ञान में जो गुरुजी को प्रसाद मिला है वो ही शिष्य को मिला। लेकिन व्यवहार में तो रमण महर्षि अलग ढंग से जीते हैं। रामकृष्ण अलग ढंग से, बुद्ध और महावीर अलग ढंग से जीते हैं। तो ये संसार है। खून पसीना बहता जा, तान के चादर सोता जा, ये नाव तो हिलती जाएगी तू हंसता जा या रोता जा। तो ऐसी बातों को कभी याद न करो जिससे दुख और वैमनस्य पैदा हो। अरे ऐसा है मेरा ये हो गया, ये वो हो गया। इसी का नाम तो दुनिया है। कभी अनुकूल होगा कभी प्रतिकूल... अरे मेरी कम आमदनी हो गई... अरे आमदनी हो गई... अरे इसमें क्या हो गया ये सब सपना जैसा संसार है। इनका चिंतन न करो। इनकी गहराई में जो सच्चिदानंद बैठा है उसका चिंतन करो। ये गहना ऐसा है ये गहना ऐसा है... गहने तो ठीक लेकिन इसके भीतर जो सोना है उस पर नजर रखो। ये बड़ा तरंग है ये छोटा तरंग है, ये ऐसा है, ये झाग है, ये बुलबुला है... लेकिन सब पानी का ही खेल है। ऐसे ही सब मेरे सच्चिदानंद का खेल है। तो मन जल्दी ब्रह्म परमात्मा में आएगा। यत्र यत्र मनो जाति तत्र तत्र समाधयः। जहां-जहां मन जाए वहां-वहां सच्चिदानंद का ज्ञान रख दो, समाधान। समाधि हो जाएगी। क्या करें हम भजन करते हैं ने... एक गाय हम बांधती हैं तो गाय की गहराई में चेतनता किसकी है? इसी की है जो माला घुमा रहा है। वाह प्रभु! जरा माला करने बैठे हो और दरवाजा खटखटाता है ये कैसे लोग हैं? मैं तो भजन करती हूं और ये टीवी जोर से चला रहा है। तो टीवी चलाकर राजसी सुख ले रहे हैं लेकिन तुझे ही खोज रहे हैं। और मैं माला घुमाकर सात्विक सुख लेना चाहता हूं, तुझे ही खोज रहा हूं। तो टीवी का विक्षेप भी भक्ति में बदल सकता है। वो टीवी चलाकर भी तुझे खोज रहे हैं आनंद को। और मैं माला घुमाकर भी तुझे खोज रहा हूं। वो खोजते-खोजते नीचे जा रहा है और मैं खोजते-खोजते तेरे तरफ आ रहा हूं प्रभु, तेरी कृपा है। हमारे यहां तो बेवकूफ नाम भी भगवान का रखा गया है। जय राम जी की। महात्मा जब बोलते हैं... अरे बेवकूफ! तो भक्त बुरा नहीं मानते। विष्णु शास्त्र नाम में आया अज्ञ... भगवान सुज्ञ भी हैं, अज्ञ भी हैं। सब जानने वाले भी हैं और न जानने वाले भी भगवान ही हैं। बेवकूफ में भी वही सच्चिदानंद है। कितनी ऊंची बात बता दी। सूअर, वराह अवतार में भी भगवान है। हयग्रीव घोड़े के अवतार में भी भगवान है। और मंदिर में जाते हैं ने तो कछुआ मिलता है पहले उसको प्रणाम करो। शिवजी के मंदिर में जाओ तो बैल मिलता है। तो पशुपति पशुओं में भी वो सच्चिदानंद है। जीव जंतुओं में मत्स्य अवतार, वराह अवतार, हयग्रीव अवतार, नरसिंह अवतार... तो ऐसे घर में हैं कि हे नंद गोपाल का बाल गोपाल का अवतरण हुआ है। तो ठीक बात है। माता जी आई मातृ देवो भव, गुरु देवो भव। नामदेव ने तो कुत्ते में भी सच्चिदानंद का दर्शन कर लिया। और भूत में भी सच्चिदानंद का दृढ़ भाव किया तो वहां से भगवान के दर्शन हो गए। एक संध्या को नामदेव जी जा रहे थे कोई बड़ी इमली का पेड़ था उसमें भूतड़ा रहता था। भूत ने देखा कि ये छोरा आ रहा है इसको जरा डराएं। तो जो डरता है उसमें फिर भूत घुसना आसान हो जाता है भूत को। और फिर अपनी वासना के अनुसार भोग भोगता है भूत। तो एक बड़ा लंबा चौड़ा... लेकिन नामदेव के... भले पधारो लंबक नाथ, लंबे लंबे नाथ भले पधारे। धरती पे चरण आकाश लो माथ। योजन भर के लंबे हाथ, भले पधारो लंबक नाथ। सुर सनकादि गुण तुम्हारे गाए। नामदेव को करो सनाथ, भले पधारो लंबक नाथ। अब वो सच्चिदानंद ने कहा कि ये तो भूतड़े में भी मुझे देखता है। तो भूतड़ा गायब हो गया और सच्चिदानंद भगवान नारायण प्रगट हो गए। साधो साधो! पैदल का जमाना था एक तीर्थ यात्रा करने का, तब की बात है। नामदेव, ज्ञानदेव, गोरा कुम्हार आदि ये यात्रा करके जब शाम होती तो अलग अलग अपना छोटा मोटा जो टेंट तंबू जैसा था उस समय का लगा देते। और भोजन बनाते कई यात्री अपनी-अपनी जगह पर। तो सूर्यास्त के पहले भोजन बन जाए, भगवान को भोग लगाके आरती के समय खाना है। तो वहां कोई गांव के नजीक डेरा डाला तो कोई काला कुत्ता आया। तो किसी साधु ने कहा ए काला कुत्ता आ गया अपशुकन है। किसी ने बोला अपशुकन है... भगा दिया। अभी भोग नहीं लगाया बाद में आना। आगे बढ़ा पूंछ हिलाने। लेकिन नामदेव ने जो बाजरी की रोटी बनाकर खड़ी कर रखी थी लोटे के सहारे। और अंदर गया कटोरी लेने घी की। तो इतने में कुत्ते ने वो रोटी उठाई। और कुत्ता तो चल पड़ा। नामदेव ने देखा रोटी... ओहो... ये श्याम मेरा श्याम इस रूप में आया? ओ रुक जा! ओ घी, घी के बिना खाएगा तो पेट में दुखेगा। रोटी मेरी कौन... ओहो रोटी मुझी केरव्यो चोराय। केरव्यो चोराय बिना भोग लगाए, बिना भोग लगाए... बणले रोटी खाओ मुरारी, घी मखे दिऐ गिरधारी। एडो कीने सताय, घणी खोले बुधाय। तू कैसे आ गया, चुपके से क्यों ले जा रहा है? जरा ठहर मैं तो घी लगाके तुझे भोग लगाने वाला था। अब तेरे को भोग लगाना था मूर्ति में, तो उससे तुझे अच्छा नहीं लगा तो इस रूप में आया है? ठहर तो सही जरा ठहर। नामदेव भागे तो कुत्ता और भागे। आखिर नामदेव थक गए बोले ऐसा क्यों सताता है? और कुत्ते के अंदर सच्चिदानंद ने प्रेरणा किया, रोटी धर दी नीचे... चतुर्भुजी नारायण का नन्हा रूप... विट्ठल भगवान की जय! तो है तो सच्चिदानंद सब जगह लेकिन भक्त जहां दृढ़ भावना करता है वहां से प्रगट कर लेता है। लकड़ी में तो आग व्याप्त है लेकिन जहां घर्षण करा यहां उसको संयोग मिला तो आग प्रगट हो गई। तो ऐसी संस्कृति वालों को भाई ये जरा से गोल पत्थर को पूज रहे हैं। ये तो हनुमान को पूज रहे हैं, बंदर वाले चेहरे को, ये तो हाथी वाले सिर को पूज रहे हैं। बेवकूफ है, बुतप्रस्ती वाले हैं, फलाने हैं... ऐसा बोलकर अपने चित्त को खराब मत करिए। ये तो इधर जा रहा है उधर जा... अरे सब उसी को खोज रहे हैं। सभी आनंद चाहते हैं, सत्ता तो है सब की, चेतनता भी सब में है लेकिन वो तीसरा गुण जो आनंद है उसी के लिए सारे खोज रहे हैं। और जब आनंद मिलता है तो अच्छा लगता है। लेकिन आनंद मिलता है तो बाहर की चीजों से मिलता है और फिर बदल जाता है। तो टिकता नहीं और सदा आनंद चाहते हैं। तो ये करके आनंद मिला, जितनी देर मजा आया रहा। फिर दूसरी जगह जाएंगे, तीसरी जगह। तो दिन भर रात भर जीवन भर, जब सोते-सोते ठीक लगता है। जब करवट दुखती है तो मजा नहीं आ रहा है तो करवट बदलते हैं तब भी आनंद के लिए। झगड़ा करते हैं तो भी आनंद के लिए कि क्या सिर खपाता है एकदम हो जाए दो हाथ। और मत्था झुकाते हैं तो भी सुख के लिए। डाइवोर्स देते हैं तो भी सुख के लिए कि पत्नी कहना नहीं मानती पति ऐसे हैं चलो मैं दूसरा करूंगी। वो भी सुख के लिए। लेकिन ये खोज गलत है। पत्नी बदलने से पति बदलने से सुख टिकाऊ सुख नहीं मिलता है। अपनी समझ बदलने से टिकाऊ सुख को खोज कर वहां गोता मारने से टिकाऊ सुख की प्राप्ति हो जाती है। मन तू ज्योति स्वरूप, अपना मूल पिछाण। तू ज्ञान स्वरूप है, तू जानता है सुख आता है उसको भी जानता है, दुख आता है उसको भी जानता है। और बुरा आया उसको भी जानता है, भला आया उसको भी जानता है। तो तू चेतन स्वरूप है। जो चेतन है वही आनंद है। पत्थर की मूर्ति को कोई स्वाद आएगा क्या? रोबोट को कोई स्वाद आएगा क्या बापू के दर्शन का? रोबोट के मुंह में रसगुल्ला डाल दो क्या उसको स्वाद आएगा क्या? क्योंकि वहां चेतना नहीं है। तो जो सत है, चित्त है, आनंद है। हालांकि रोबोट में भी चेतना है लेकिन वो घन सुषुप्ति रूप में है। और मनुष्य में तो... स्वप्न अवस्था में चेतना है। मनुष्य तो चेतना के एकदम करीब है। जब पत्थर में भी घन सुषुप्ति परमात्मा की है, तो पत्थर की मूर्ति में अगर कोई भगवत बुद्धि करता है तो उसकी भगवत भावना यहां स्वप्न अवस्था में जो चेतना है वहां, तो पत्थर की मूर्ति देर सवेर ओरा पाकर वो बातचीत कर सकती है, चल सकती है, दूध पी सकती है। मेरी मां... कोई किसी का कोई बेटा खो गया हो, कोई गहने खो गए हो, कोई मुसीबत आ गई हो तो मेरी मां के पास आते। वो क्या करती कि राख लेके थोड़ा धरती पर लीप देती। एक गोल कुंडाला बनाती उंगली से। फिर जिससे भोजन बनाते ने, जैसे अपना चम्मच... वो पकड़ती। और फिर बोलती कि इसका घर में जो पैसे हैं चोरी हो गए। घर वाले ने लिए हैं? घर वाले ने लिए हैं? नहीं हिला। बोले भाई घर वालों ने नहीं लिए। कोई बाहर का ले गया है? कोई पड़ोसी ले गया है? बोले पड़ोसी ले गया है। सच बोलेगा तो सच बताएगा तो सावन पहरेगा। कूड़ गालायेगा तो किन्नी कौड़ी थी मारनी। वाधुवा दायेगी। सामान मिलेगा? नहीं मिलेगा? मिले तो बदी बधाई देना। बदी बधाई। नहीं मिलेगा, मिलेगा... वो मिलता था। तो अब वो उसमें राख में और चमचे में नहीं है। लेकिन कुछ लेना नहीं है और भगवान की भक्ति तो वही सच्चिदानंद वहां हिल डुल कराके सच्ची खबर दे देता है। पहले तो समझते थे कि हमारी अम्मा जी के पास है या कोई कुछ आता होगा लेकिन जब सत्संग मिला तब पता चला कि वही सच्चिदानंद देव थे। जैसे भुआ भोपा ढूंढते हैं ने तो जब धूर्तता से ढूंढते हैं तो गप्प ठोकते हैं। लेकिन सचमुच ढूंढते-ढूंढते जब अपने भाव को भूल जाते हैं और स्वार्थ नहीं होता तो जो बोलते हैं तो सच्चिदानंद के करीब होते तो सच पड़ जाता है। तो है तो सच्चिदानंद। लेकिन जब धूर्तता का आधार लेते हैं जैसे हमने मजाक किया ने? हला वा धु भला वा धु ये वो... तो पंख का अपना प्रभाव है। लेकिन पंख घुमाकर टोना टोटका करके किसी को इम्प्रेस करके कुछ छीनना ये फिर नुकसान भी उतना ही करता है। है तो सच्चिदानंद और आप सच्चाई से उन चीजों का उपयोग करो तो सफलता भी होती है। जैसे थी तो राख और चम्मच। और मेरी मां को कुछ लेना नहीं होता था तो उसका सच्चा पड़ता था छक्का। और उसी जगह पर पुजवाना और लेने का भावना करती तो सच्चाई नहीं आती। वो सच्चिदानंद तो जानते ने कि ठगने से कर रही है कि सच्चाई से कर रही है। जब सच्चाई से कर रहे तो सच्चिदानंद मदद करते हैं। और ठगने को करते हैं तो फिर ऊंधा करवा देते हैं, नालत करवा देते हैं। अभी मां की समाधि पर लिखा है कि रुपया पैसा चीज वस्तु आश्रम में बोर्ड लगा है ने अभी इसी अहमदाबाद आश्रम में बोर्ड लगा होगा पढ़ा होगा आपने। कि चीज वस्तु रुपया पैसा रखना मना है। सख्त लिखा है कि नहीं? मना है लिखा है, दो बोर्ड लगे हैं। और जब स्वार्थ हो जाए कि हां ये आए और अपने को कुछ मिले तो फिर वो सच्चिदानंद का आनंद और सत्संग का वो प्रभाव नहीं रह सकता जो अभी है। तो सत्संग में अगर कुछ प्रभाव है या अच्छाई है या आपकी भलाई होती है तो इसमें मेरा कुछ नहीं है। उसी सच्चिदानंद रूपाय... सच्चिदानंद रूपाय... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे... जो सच्चिदानंद स्वरूप है, विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का जो है वही परमात्मा की सारी लीला है। तो जो कुछ अच्छा होता है, भला होता है इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है। उस परमात्मा की विशेषता है। और कहीं गड़बड़ होती है तो उसमें मेरी ही गड़बड़ी है। जब मेरी वासना, मेरा अहंकार और मेरा कपट आगे आ जाता है तो आपसे अन्याय तो होगा तब होगा, मैं अपने से ही अन्याय शुरू कर दूंगा। हो जाएगा। क्योंकि उस सच्चिदानंद से दूरी चली जाएगी मन बुद्धि। और जब मैं सच्चाई से चलता हूं तो आपका भला होगा तब होगा मेरा पहले भला हो जाता है हृदय पवित्र होने लगता है। तो गांधी जी क्यों सफल हुए? कि सच्चाई का आश्रय थे सच्चिदानंद के करीब थे। और दूसरे लोग गांधी जी से भी ज्यादा उस समय के प्रसिद्ध लोग, कौन सी खाई में खप गए? क्योंकि बुद्धिमान तो वकील रहे होंगे उस समय भी। लेकिन उन बेचारों को सच्चिदानंद की इतनी महत्ता नहीं जानते होंगे। तो आप जितना भी सच्चिदानंद को, ईश्वर को हाजरा हजूर मानते हैं या उसको पाने के लिए जितनी सच्चाई से व्यवहार करते हैं उतना ही आपका मंगल होता है। उतना ही आप ईश्वर के निकट होते हैं। करनी आपो आपनी के नेड़े के दूर। अपनी करनी से हम उस सच्चिदानंद के निकट हो जाते हैं और अपनी गंदी इच्छाएं वासनाएं इसको इतने मिलियन हो गया तो मैं भी कमाऊं, ये ये खाया तो मैं भी करूं... तो ऐसे निगुरे लोगों की नकल करेगा तो पतन होना पक्का है। और महापुरुषों की, बुद्ध पुरुषों की, भक्तों की और ज्ञानियों की नकल करेगा तो बेड़ा पार होना पक्का है। ॐ... ध्रुव ने गुरु मंत्र लिया तो कैसे लग गए? शबरी भीलन ने मतंग ऋषि का गुरु मंत्र लिया और कैसी लग गई? तो उसका अनुकरण करोगे तो आप ऊंचे उठोगे। लेकिन दूसरे लोगों का अनुकरण करोगे तो वैसे गिरोगे। इसीलिए जब सत्संग में आते हैं, साधना के तो लगता है कि हां ये सच्चा है। लेकिन जब निगुरे लोगों के बीच लगते हैं तो पुराने संस्कार में फिर फिसलने में भी देर नहीं होती। इसीलिए सावधान रहना चाहिए। दृढ़ निश्चय, इतनी माला करनी है, इतने प्राणायाम रोज करने हैं, इतना जप करना है। बहुत मदद करता है। दुष्ट संग का त्याग। दुष्ट संकल्प आए तो हे प्रभु! नाथ! ॐ! हरि! भगवान के नामों का उच्चारण। जैसे किसी को जंगल में डाकुओं ने घेरा हो तो पुकारता है तो भगवान का नाम लेना ये कोई कर्म नहीं है। ये पुकार है। जब पुरानी गंदी आदत अथवा विकारों में हम घिर जाएं तो हल्के विचार आएं तो भगवान के नाम का उच्चारण करो। तो ही पुकार परमेश्वर सुनते हैं और मदद रूप होते हैं। भगवान के भजन का नियम पक्का करो। जैसे टाइम नहीं मिलता फिर भी रोटी खा लेते हैं, पानी पी लेते हैं, स्नान कर लेते हैं। ऐसे ही भगवान के जप का, ध्यान का आग्रह रखना चाहिए। अपने स्वभाव में नम्रता, मधुरता, सज्जनता और उदारता रखने वाला व्यक्ति अगर प्रसन्नता मिला देता है तो उसके लिए असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। सो तो है। जो नेगेटिव विचारता है। और जो दूसरे पर दोषारोपण करता है, जिसके स्वभाव में सज्जनता नहीं है, उदारता नहीं है, प्रसन्नता नहीं है वो व्यवहार में सफल भी नहीं होता। जो सेवा में रुचि रखता है उसी का विकास होता है। चाहे भौतिक विकास चाहो चाहे आध्यात्मिक विकास चाहो। बिना सत्कर्म के, बिना परोपकार के विकास संभव नहीं है। पृथ्वी हजार हजार हाथों से लेती है लेकिन लाख लाख हाथों से देती है। मेघ सागर से लेता है और मधुर बनाकर देता है। ऐसे ही आप समाज से जो कुछ लेते हैं उसको मधुमय बनाकर समाज रूपी ईश्वर की सेवा में दें तो आपका विकास होता जाएगा। जब संग्रह संग्रह और अपने लिए अपने लिए सोचकर व्यवहार करते हैं वे छोटे दायरे में ही खप के मर जाते हैं। कि हमारा क्या मतलब? हमारा उससे क्या लेना? नहीं। ये सारा संसार एक अंग है अपना। जैसे अंगूठा बिगड़ जाए तभी भी अपना है और उंगली बिगड़े तो भी अपना है। नाक बिगड़े तो भी अपना है, कान बिगड़े तो भी अपना है। क्योंकि शरीर के सब अवयव मिलकर एक शरीर है। ऐसे ही पूरा समाज रूपी शरीर मानवता का है। जितना हो सके अपने स्वार्थ का त्याग करके भगवत प्रीति अर्थ कर्म करने से सुख की लालच और दुख का भय कम होने लगता है। जितने सुख की लालच और दुख का भय घटता है उतना ही आदमी निर्विकार नारायण के करीब होता है। वेद का एक उत्तम मंत्र है कठवल्ली का। ये सुनने से भी बड़ा पुण्य माना जाता है। सर्वे वेदा यत पदम आमनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्। सारे वेद जिस पद का प्रतिपादन करते हैं। समस्त तपों का भी जिसकी प्राप्ति के लिए वर्णन करते हैं। जिसकी प्राप्ति की इच्छा से ही ब्रह्मचर्य व्रत का आचरण मुमुक्षु लोग करते हैं। उसी पद को तुम्हारे प्रति संक्षेप से मैं कहता हूं। वो कौन सा पद है? ॐ! ॐ! यही वह पद है। अर्थात सारी सृष्टियां, सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जिस सच्चिदानंद ब्रह्म परमात्मा से होती है उसका स्वाभाविक सहज नाम है ॐ। हिन्दू जब उपासना करता है शालिग्राम की तो गोल सुपारी जैसे पत्थर, मैं तेरी पूजा करता हूं ये नहीं सोचता, बोलता। वो तो भगवान आदि नारायण समझ के पूजता है। मां को पूजता है चाहे चतुर्भुजी को पूजता है, गजानंद को पूजता है चाहे पिता को पूजता है। लेकिन पिता में भी उस परमेश्वर देव की भावना करता है। मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव। आचार्य अलग हैं, मां अलग है लेकिन अलग अलग में अनअलग एक परमेश्वर ही है। गणपति की मूर्ति और शिवजी की मूर्ति, शालिग्राम की मूर्ति और अम्बे मां की मूर्ति अलग-अलग है लेकिन वे सभी अलग-अलग पूजक उस एक परमेश्वर की पूजा करते हैं। सर्वे वेदा यत पदम... राजा राज भोग कर ऐश करके निस्सारता का कुछ पुण्य प्रभाव से जब ज्ञान पाते थे तो सब कुछ छोड़कर इसी आत्म सुख की यात्रा के लिए गुरुओं के दरवाजे पर झाड़ू बुहारी करना पसंद करते थे। तपी इसी परमेश्वर के सुख को पाने के लिए तप करते हैं। महापुरुष सिद्धार्थ और महावीर और बुद्ध और कबीर और नानक जी भी इसी पद के लिए सब कुछ छोड़कर चल पड़े थे। तो सब में जो एक है उस एक परमेश्वर की उपासना करते हैं और उस एक परमेश्वर में का कोई नाम नहीं सभी नाम उसी की सत्ता से स्फुरते हैं। इसीलिए सभी नाम उसके हैं। मां करके उसको पूजा जा सकता है जगदम्बे मां। और कृष्ण करके उसे पूजा जा सकता है। गोविंद करके भी उसे बुलाया जा सकता है और गोपाल गिरधारी अच्युत केशव माधव... बेकार करके भी उसको पूजा जा सकता है। तो बेकारों में भी तेरी सत्ता है। अनभिज्ञ आप अनजान हैं अर्थात अनजानों में भी आप ही हैं। तो इस प्रकार बुद्धिमानों में आप ही हैं और बुद्धिहीनों में भी आपकी सत्ता है। बुद्धि तीक्ष्ण है उसमें भी आपकी ही योग्यता है और बुद्धि मंद वाले में भी चेतना आपकी ही है। कीड़ी में जो अपने बच्चों को ठीक जगह ले जाने की चेतना है वो भी प्रभु तुम्हारी और ब्रह्मा जी में सृष्टि बनाने का जो ज्ञान और सामर्थ्य है वो भी तुम्हारा है। मां के शरीर में अन्न में से दूध बनाने की सत्ता भी तुम्हारी है। और बच्चे में सकुर सकुर करके स्तन पान करने की मति गति भी तुम्हारी सत्ता है। तो बाल गोपाल होकर बैठा है और तू मां होकर पय पान कराता है। तो पतियों में पति तू ही है। स्त्रियों में लक्ष्मी रूपा तू ही है। माताओं में मातृ शक्ति तू ही है और गुरुओं में गुरुत्व तेरा ही है। इस प्रकार सभी में उस ईश्वर की सत्ता स्फूर्ति और चेतना समझकर जो उपासना करता है। उसे जल्दी परमात्म पद ॐ... जैसे ओंकार सारे मंत्रों का सार है ॐ बोला मतलब हो गया बात। ॐ माना अलम। ॐ माना असाधु। जैसे साधु बोलते तो साधु अक्षर में भी बहुत सारी मानाएं आ जाती है। इससे भी ज्यादा ॐ में बहुत सारे भाव आ जाते हैं। तो उस ॐ पद को मैं कहता हूं, कठवल्ली में आया पहला अध्याय वल्ली दूसरी और मंत्र पंद्रहवां ये। सर्वे वेदा... तुम्हारे जन्म से पुंस संस्कार, मां के गर्भ में होते तभी संस्कार किए जाते हैं। छठी के संस्कार होते हैं, मंगनी के संस्कार होते हैं, शादी के संस्कार होते हैं। इस प्रकार मृत्यु के समय जो संस्कार होते हैं वो सोलहवें संस्कार। तो ये सारे संस्कार इस जीव को परम पद पाने के लिए सहायता रूप होते हैं। शादी में फेरे फिरते हैं तो क्यों? ऐसे भी तो शादी हो जाती है? नहीं। फेरे फिरते हैं। पहले चार कदम चार फेरे आगे वर चलता है फिर तीन फेरे कन्या चलती है। तो ये सब कैसी विधि है कि वर नारायण रूप है और कन्या लक्ष्मी रूप है। तो वर के अंदर जो नर नारायण का अयन है वो बैठा है। और कन्या के अंदर जो चैतन्य लक्ष्मी स्वरूपा बैठी है। तो संसार में शादी विवाह करके कुत्ते कुत्तियों की नाईं जिंदगी नहीं बिताना है। अपितु अपने मनुष्य जीवन को लक्ष्मी नारायण की नाईं परम पद में पहुंचाना है। ऐसे बालकों में ये मेरा बच्चा है नहीं ये गोपाल कृष्ण है। तो इस प्रकार की जो भगवत बुद्धि है भगवत भावना है। ऋग्वेद कहता है एकम संतम बहुधा कल्पयंति। वो एक ही परमात्म सत्ता है और बहुत सारी उसमें कल्पना होती है। जैसे रात को सो गए तो तुम एक ही तो हो। लेकिन रात के स्वप्ने में तुमने देखा कि मैं हरिद्वार जा रहा हूं। तो हरिद्वार की बहती गंगा भी तुमने अपने घर में देखी। और गंगा में नहाते कई लोग भी तुमने देखे, तुम एक हो कई लोग बन गए और गंगा की लहरियां बन गई, दुकानें बन गई, गाड़ियां बन गई, रास्ते में जाते समय खेत खलियान बन गई, अच्छे लोग भी बन गए और बुरे लोग भी बन गए। लेकिन सब बने तो तुम्हारे एक उस आत्म परमात्मा की सत्ता से बने स्वप्ने में। जैसे स्वप्ने में तुम्हारा एक ही आत्म देव अनेक रूप बन गया। ऐसे ही जाग्रत में भी वो एक ही परमेश्वर अनेक रूपों में लीला करता दिख रहा है। रूपम रूपम प्रतिरूपम बभुवः। तो इस प्रकार की जो सद्भावना है। उस सद्भावना में डूबते समय ॐ। किसी ने बुरा कहा, भला कहा, दुख आया, सुख आया। सारभूत दुख सुख भला बुरा का आधार देखने वाला वो परमात्मा ॐ। ये परमात्मा सत्य है बाकी सब... जैसे समुद्र पर तरंगें आईं और गई। झाग और बुलबुले और फेन आईं और गई। समुद्र की गहराई में शांत उदधि। ऐसे ही मुझ परमेश्वर में शांति है आनंद है। इसने भली बात कह दी बुरी बात कह दी। तो ऊपर ऊपर उथल पाथल होती है और नीचे गहराई में ॐ। समुद्र में सरोवर में ऊपर-ऊपर उछल पाथल होती है और समुद्र के तले में गहराई में जाओ तो शांत पानी। ऐसे ही मेरा परमात्मा शांत स्वरूप है, मैं उसमें शांत हो जाऊं। जब मृत्यु आती हो। और डॉक्टर बोले अब नहीं हो सकता है, तुम मर जाओगे। तब भी आप ये सोचो कि ॐ। जो मरता है वो मैं नहीं होता हूं। जो मरता है ये शरीर मरेगा। जो दुखी होगा वो मन दुखी होता है। बीमार होता है तन। मैं तो वही ॐ पद परमात्म पद में हूं। मृत्यु मेरी नहीं हो रही है। तो आप मौत के समय भी मुक्ति के धनी बन जाओगे। दुख आ जाए तो दुख मन को हो रहा है। ॐ... ॐ... दुख के समय भी आप दुख से न्यारे हो जाओगे। जैसे जंगल में आग लगती है तो सयाने पशु सरोवर में खड़े हो जाते हैं। तो जंगल की आग उनको कुछ नहीं कर सकती। ऐसे ही जब भी तुम्हारे जीवन में रोग आए, बीमारी आए, दुख आए, अशांति आए, चिंता आए। ॐ परमेश्वराय। ये आने जाने वाले और मेरा परमात्मा रहने वाला। तो जो दुख में दुखी हो जाते हैं और सोचते हैं दुख की बातें तो और दुख गहरा करते हैं। लेकिन ॐ के कटर से दुख की उस धारा को काट दें। ऐसे ही सुख आए इतना अच्छा था ऐसा था उधर बड़ा मजा था तो बड़ा मजा था तो फिर उस मजे के लिए भटकने की जरूरत नहीं। वो मजा वहां जहां जिस जगह पर जिस पिकनिक प्लेस पर तुमको मजा आया था। वहां तो कई लोग जी रहे हैं। उधर मजा होता तो वे वहां से फिर दूसरी जगह क्यों जाते? मजा तो तुम्हारी भावना में है तुम्हारी कल्पना में है ॐ... ॐ... ये बहुत अच्छा है, दोबारा आएंगे ऐसा संकल्प करके फसो मत। दोबारा तिबारा जाएंगे फिर भोगेंगे फिर मजा करेंगे खप जाएंगे। लेकिन मजा आई उसको जो जानता है वो मजा का आधार है। ॐ... ॐ... कोई सुंदर सुहावना बालक दिखा तो उसके सौंदर्य के पीछे उस ॐ स्वरूप परमात्मा की सत्ता है। कोई सुंदरी दिखी तो शरीर तो हाड़ मांस का है लेकिन सौंदर्य मेरे परमात्मा का है। तो सुंदरी के प्रति काम वासना के बदले राम भाव आ जाए परमेश्वर भाव आ जाए। कोई सुंदरा दिखे तो सुंदरे की सत्ता में वही... तो जहां-जहां कोई विशेषता दिखती है, जहां-जहां कोई आकर्षण दिखता है तो उसकी गहराई में वही परमेश्वर है। सर्वे वेदा यत पदम आपनन्ति तपांसि सर्वाणि च यत चान्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तते पदम संग्रहेण ब्रवीम्यो मित्येतः। सारे वेद, सारे कर्म, सारी साधना, सारे धंधे, सारी शादियां, सारे विवाह, सारे छठीयां, सारे विधि-विधान किसलिए किया जाता है? कि देर सबेरे जीव आत्मा परमात्मा सुख को पा ले। परमात्मा ज्ञान को पा ले। परमात्मा शांति को पा ले। जन्म मरण के चक्कर से सदा के लिए छूट जाए। तो इसमें सावधान रहना है बस। दुख आए तो सावधान सुख आए तो सावधान। किसी की निंदा सुनते तो सावधान। कि निंदा तो ये कर रहा है अपने राग द्वेष से। मैं अपना दिल क्यों बिगाड़ूं? ॐ... अच्छा अच्छा ठीक है, उसकी बात मोड़ दी। जो ऐसा है वो ऐसा है आप भी उसमें फिसलो मत। आप तो बार-बार घूम फिर के जैसे देवर्षि नारद। उनको... दो घड़ी से अधिक कहीं रहने, रह नहीं सकते थे ऐसा दक्ष प्रजापति का श्राप था। लेकिन वो श्राप द्वारिका में नहीं लगता था। तो नारद जी जाते द्वारिका, श्रीकृष्ण बोलते जाओ जरा वृंदावन का समाचार ले आओ। नारायण नारायण वृंदावन गए। फिर द्वारिका। जाओ जरा वैकुंठ जरा चक्कर मारके आओ, गए फिर द्वारिका। गए मथुरा फिर द्वारिका। गए काशी फिर द्वारिका। तो जाने की जगह अनेक लेकिन आने की जगह वह एक। तो पचास जगह गए, पचास जगह तो अलग-अलग हो गया उसको एक-एक मार्क मिला लेकिन द्वारका को तो पचास मार्क हो गया। ऐसे ही आप भी द्वारका में आया करो। रसोई घर में गए फिर आए द्वारिका में। पूजा के रूम में गए फिर द्वारिका में आए। दुकान में गए द्वारिका में आए। ग्राहक से मिले द्वारिका में आए। द्वारका... अर्थात भगवान का जहां वास है अपने अंतःकरण रूपी द्वारका में आओ। आपके लिए जीवन मधुमय हो जाएगा। सुखमय हो जाएगा, आनंदमय हो जाएगा। बार-बार द्वारका आओ, बार-बार ॐ आनंद। ये संसार है ये स्वप्ना है। हरि ॐ... ॐ... बार-बार उस परमेश्वर के चिंतन का अभ्यास डालने से आपका चित्त भगवत सुख से, भगवत ज्ञान से, भगवत शांति से तो संपन्न होगा और ज्यों शांति से संपन्न होने लगेगा त्यों आपमें शक्ति आ जाएगी। ऐसा कोई त्रिलोकी में सामर्थ्य नहीं जो शांति से पैदा न होता हो। परमात्म शांति सामर्थ्य की जननी है। अशान्तस्य कुतः सुखम्। अशांत को सुख कहां? और परमात्म शांत को दुख कहां? तो परमात्म शांति बढ़ाना ही बुद्धिमानी है। परमात्म सुख बढ़ाना ही बुद्धिमानी है। परमात्मा प्रीति बढ़ाना ही बुद्धिमानी है। ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ शांति ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ शांति ॐ ॐ माधुर्य ॐ ॐ ॐ आनंद ॐ ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ प्यारेजी ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ मेरे जीव ॐ ॐ ॐ प्यारे जीव ॐ ॐ ॐ... हृदय प्रसन्नता से भरता जा रहा है। रग-रग पावन हो रही है। भगवान के मधुमय नाम से, मधुमय सत्संग से, मधुमय सुमरण से। हम स्वयं मधुमय के हो रहे हैं। प्रभु! मारा वालुड़ा! मारा आनंद दाता! मारा कानुड़ा! कृष्ण कन्हैया बंसी बजैया। बंसी में ओंकार की ध्वनि गुंजावता मारा वालुड़ा। लोगों ने अधरामृत न पान कराबी दिधुं तुं... माधुर्य ॐ ॐ ॐ आनंद हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ आनंद ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ माधुर्य ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ प्रसन्नता हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ ॐ ॐ शिव ॐ ॐ ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ हरि आनंद हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम शिव शिव शिव शिव शिव शिव शम्भू भोलेनाथ! बिन फेरे हम तेरे! हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम आनंद है। माधुर्य है। तुम्हारे कान में किसकी ध्वनि पड़ रही है मुझे पता है। तुम किसको प्यार कर रहे हो मुझे पता है। और उसको भी... प्रभु तेरी जय हो! हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम आनंद ओम ओम ओम ओम माधुर्य हरि ओम ओम ओम ओम शक्ति हरि ओम ओम ओम ओम आरोग्य हरि ओम ओम ओम ओम ओम निर्विकारिता हरि ओम ओम ओम ओम भक्ति हरि ओम ओम ओम ओम... ये पुरुषोत्तम मास है। और साबरमती का किनारा है। जाबालि ऋषि ने यहां वर्षों तक यज्ञ किए थे तपस्या की थी। इसीलिए यहां आने वाले को यहां पिछले तीस साल से तो सतत जप ध्यान होता ही है। आने वाले को कैसा भी हो इधर आने से कुछ शांति, कुछ पवित्रता कुछ ईश्वरीय सुख मिलने के तरंग मिल जाते हैं। जगत का चिंतन करने से आप भीतर से कमजोर हो जाते हैं। और आत्म चिंतन करने से आप भीतर से बलवान हो जाते हैं। धिकबलं क्षत्रियबलं ब्रह्मबलमेव बलम्। विश्वामित्र को अहसास हो गया कि मेरा इतना बड़ा राज्य, वैभव, सत्ता, शक्ति। लेकिन ब्रह्म चिंतन करने वाले ब्रह्मऋषि वसिष्ठ जी के बल के आगे ब्रह्म ज्ञान के बल के आगे मेरा क्षत्रिय बल धिकबलं क्षत्रियबलं ब्रह्मबलमेव बलम्। तो ब्रह्म परमात्मा का चिंतन करने से ऋषियों को ब्रह्म बल की प्राप्ति होती है जहां राजर्षि भी नतमस्तक हो जाते ब्रह्मऋषियों के पास। वह ब्रह्म बल सबके अंदर छुपा है। सुंन्या सखणा कोई नहीं सबके भीतर लाल, मूरख ग्रंथि खोले नहीं कर्मी भयो कंगाल। और ब्रह्म बल तीन प्रकार से जाग्रत होता है। जिसके अंदर श्रद्धा भक्ति है तो भावना से, जिसके पास कर्म शक्ति है तो निष्काम कर्म से। और जिसके पास विचार ज्ञान शक्ति है तो ज्ञान से। अथवा तीनों से थोड़ा-थोड़ा करके भी ब्रह्म बल जगाया जाता है।