स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

ऐसा विलक्षण ज्ञान, ऐसा विलक्षण आनंद, ऐसा विलक्षण जीवन कि पृथ्वी का राज्य का सुख भी कोई माना नहीं रखता

भगवद्गीता उपनिषदों का सारामृत भगवान के अनुभव की पोथी है। भगवान ऐसी ऊँची बात बताते हैं कि जिसको पाने का मनुष्य के पास योग्यता है, सामर्थ्य है, अधिकार है, स्वतंत्रता है। ऐसे तो सभी जीवों में भगवान की चेतना है, सभी जीव सुख चाहते हैं, लेकिन मनुष्य में उस चैतन्य सुख स्वरूप को ठीक से जानने की स्वतंत्रता है, सामर्थ्य है, अधिकार है, योग्यता है।

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना। भगवद्गीता दूसरे अध्याय का 28वाँ श्लोक है। हे भारत, सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे, जन्म से पहले हम लोग अप्रकट थे, और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाएँगे। मरते हुए जीव को हमने जाते हुए प्रकट किसी को देखा नहीं। जब मरता है, तो वैज्ञानिकों ने बड़े-बड़े मोटे कांच में मरने वाले व्यक्ति को रखा और माइक्रोस्कोप लेकर खड़े हो गए। फिर भी देखा नहीं कि यह जीव कैसा निकला। मरा वह बात पक्की, जिंदा था वह बात भी पक्की, अभी कुछ मिनटों में मरेगा ऐसी स्थिति वाले मरीज पर प्रयोग किए गए। लेकिन फिर भी जो निकल जाता है, जो मर जाता है, यह शरीर छोड़ जाता है, वह वैज्ञानिक साधनों में, यंत्रों में पकड़ में नहीं आया। क्योंकि हमारा स्थूल शरीर दृश्य है और स्थूल जगत दृश्य है। सूक्ष्म शरीर भी, मन, बुद्धि भी चिंतन में आता है और उसके अस्तित्व का पता चल जाता है। कारण शरीर से भी यह परे है जीव। तो स्थूल शरीर स्थूल सृष्टि में, सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म सृष्टि का, कारण शरीर अविद्याजन्य है, लेकिन यह जीव इन तीनों से अलग है। इसीलिए यह चिंतन का विषय नहीं है, यह दर्शन का विषय नहीं है, आत्मा दर्शन का विषय नहीं, चिंतन का विषय नहीं, फिर भी महापुरुषों ने इसका चिंतन करने की रीत खोज ली कि भाई वह चेतन है, वह साक्षी है, निर्विकार है, अव्यक्त है। सब नहीं-नहीं के बाद भी वह रहता है, इस प्रकार के केवल संकेत किए।

जैसे जो वस्तु छान्दोग्य माण्डूक्य उपनिषद में लिखा है, आदौ अन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। जो पहले नहीं है, बाद में नहीं है, तो वर्तमान में भी वैसा ही है। जैसे सपना पहले नहीं था, सपना बाद में नहीं है, तो सपना जब दिख रहा है वह भी नहीं में ही जा रहा है। ऐसे ही समुद्र में तरंग पहले नहीं थे, बाद में नहीं रहेंगे, तो अभी भी हो-हो के नहीं में जा रहे हैं। ऐसे ही यह शरीर पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, तो अभी भी नहीं के तरफ जा रहा है। सब नहीं के तरफ जा रहा है तो उसकी चिंता इतनी सारी क्यों करना। इसकी फिक्र में फंस के मरने की क्या जरूरत है। दिक्कतें क्यों बनाना। जब शरीर को सच्चा मानते हैं, संसार को सच्चा मानते हैं तभी दिक्कतें बनती हैं। जब शरीर पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, अभी भी नहीं के तरफ जा रहा है, तो फिर दिक्कत काहे की, दिक्कत नहीं है।

ऐसे ही दुख पहले नहीं था, जो पहले नहीं था अभी दुख आया है। जो पहले नहीं था अभी आया है तो वह थोड़े समय में नहीं हो जाएगा। लेकिन हम नासमझी से दुख को इतना महत्व देते हैं कि दुख हमारे सिर पर चढ़ जाता है और हम दुख से दब मरते हैं। ऐसे ही सुख अभी आया, तो पहले सुख नहीं था। तो पहले सुख नहीं था तो थोड़े दिन में सुख नहीं हो जाएगा। लेकिन सुख नहीं था तब भी हम थे। सुख है तब भी हम हैं, और सुख नहीं हो जाएगा तब भी हम रहेंगे, तो हम हैं चैतन्य और शाश्वत, नित्य, सुख है अनित्य। हम हैं ज्ञान स्वरूप और सुख है अज्ञान स्वरूप। हमारे सिवाय सुख नहीं दिख सकता। हमारे सिवाय दुख नहीं दिख सकता। हमारे सिवाय शरीर नहीं रह सकता और शरीर के सिवाय हम रह सकते हैं। सोने के बिना गहना नहीं रह सकता, लेकिन गहने के बिना सोना रह सकता है। पानी के बिना तरंग नहीं रह सकता, लेकिन तरंग के बिना पानी रह सकता है।

तो भगवान कहते हैं कि हे भारत, सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाएँगे, केवल बीच में प्रकट दिखते हैं, अतः इसमें शोक करने की क्या बात है। तो पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, अभी भी नहीं के तरफ जा रहा है, उन बातों में फिर शोक करके डूबने की क्या जरूरत है। जो आदमी भूतकाल का चिंतन करता है उसे तमोगुण घेर लेता है और शोक में पड़ेगा। जो भविष्य का चिंतन करता है उसको रजोगुण घेर लेगा। लेकिन जो निश्चिंत नारायण के चिंतन और आनंद में रहता है, उसका सत्वगुण और ज्ञान बढ़ेगा। उस सत्व स्वरूप में और ज्ञान स्वरूप ईश्वर में प्रीति करो। भजन इस स्थूल शरीर से नहीं होता है। भजन भाव शरीर से होता है।

यह जो व्यक्त में दो प्रकार होते हैं। व्यक्ति भी एक... दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते। चाहे जुड़वे भाई हों, फिर भी थोड़ा देर-सबेर पैदा होते हैं, ग्रह में थोड़ी बदलाहट, स्वभाव में, चेहरे में थोड़ा सा... लेकिन अव्यक्त में सभी एक हैं। देखने में दो व्यक्ति एक नहीं होंगे, लेकिन आत्म रूप से करोड़ों व्यक्ति एक ही स्वरूप हैं। तो उस एक ही स्वरूप का भजन-स्मरण करने से जीव सब दुखों से छूट जाता है। सब कर्म बंधनों से छूट जाता है। सब शोकों से, पापों से छूट जाता है। और ऐसा विलक्षण ज्ञान, ऐसा विलक्षण आनंद, ऐसा विलक्षण जीवन की प्राप्ति होती है कि पृथ्वी का राज्य का सुख भी एक तरफ रखो तो कोई माना नहीं रखता

। इंद्र का पद भी दे दो तो आत्मज्ञान के सुख के आगे वह इंद्र का पद भी कोई माना नहीं रखता। इतना आत्मज्ञान होने से परम शांति और परम सुख प्राप्त होता है।

तो कैसे हो। तो यह भाव शरीर से भजन होता है। पान घारी सुनु प्रेम सम भजन न दूसरो आन। आप उस अव्यक्त स्वरूप परमात्मा में प्रीति कीजिए। भजतां प्रीतिपूर्वकम् ददामि बुद्धियोगं तम्। जो मुझे प्रीतिपूर्वक भजता है, उसको मैं बुद्धि योग देता हूँ। जो प्रीतिपूर्वक भजते हैं उसको बुद्धि योग मिलता है। बुद्धि सबके पास है, लेकिन बुद्धि योग आने से भगवत सुख प्रकट होता है। भगवत आनंद प्रकट होता है। भगवत शांति प्रकट होती है। और सारे दुख और शोक आए तभी भी कोई ज्यादा देर उसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। मृत्यु भी आ जाए तो मृत्यु शरीर की होती है। यह शरीर नहीं था तब भी आप थे। शरीर न तो, तमे न हता, त्यारे तमे हता। अने बाबला हता त्यारे हता, जुवान हता त्यारे हता, अने मर्या पछि पण तमे रहशो। मरने के बाद भी तुम तो रहोगे। चाहे स्वर्ग में रहें, चाहे नरक में रहेंगे, लेकिन आप तो रहेंगे। तो वह अव्यक्त शरीर, अव्यक्त स्वरूप है। और यह व्यक्त आदि में नहीं था, अंत में नहीं रहेगा, तो अभी भी श्वासोश्वास में इसके कई कण बदल रहे हैं।

आंवले के नीचे, वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करने में भी स्वास्थ्य और प्रसन्नता और पुण्यों की प्राप्ति होती है। पीपल को सींचने से या पीपल को स्पर्श (जो स्नान किए बिना पीपल को स्पर्श करते हैं), तो उनको स्नान करने का फल होता है। और स्नान करके पीपल के वृक्ष को स्पर्श करते हैं, तो उनको और विशेष सात्विक फल की प्राप्ति होती है। जो पीपल का वृक्ष लगाते हैं, मानो वह अपने पितरों को तारने के लिए और शीतलता देने के लिए एक सुंदर काम किया उन्होंने। पीपल का वृक्ष के नीचे बैठना, पीपल के वृक्ष को स्पर्श करना, पीपल को सींचना, यह सारा पापनाशक और सुखदायी, पुण्यदायी कृत्य है। पद्मपुराण के पाताल खण्ड में लिखा है कि पीपल को जल देने वाला व्यक्ति दरिद्रता से छूट जाता है। दुष्ट स्वप्नों से और दुखद चिंता से दूर हो जाता है। और उसके दुख नष्ट हो जाते हैं और दिक्कतों से वह पार हो जाता है। खाली पीपल को सींचने वाला, दर्शन करने वाला, स्पर्श करने वाला पाप नाश करता है, दिक्कतों से बच जाता है, चिंताओं से बच जाता है, बुरे स्वप्नों से बच जाता है। अष्टांग योग साधन ग्रंथ में लिखा है कि पीपल सींचना माना साक्षात तुम गोविंद भगवान को ही तृप्त कर रहे हो। पीपल को जो जल देता है उसकी दुर्गति कभी नहीं होती। यहाँ पीपल लगा था, हमने सत्संग हॉल की डिजाइन ऐसी बनवाई कि पीपल के वृक्ष को हटाना न पड़े। ताकि सब लोग पीपल की हवा से स्वस्थ रहें, स्पर्श से भी पुण्यात्मा हों, यह रहा पीपल का वृक्ष। और अपने जहाँ भी आश्रम हैं, तो घर के और आश्रम के पश्चिम की तरफ पीपल हो तो बड़ा सुखदायी उसकी हवा होती है। ऋण आयन वाली हवा होती है। पीपल की डाली से, पीपल के पत्ते से, पीपल की छाया से, पीपल के स्पर्श से, पीपल के दर्शन से, पीपल के सींचने से सत्वगुण बढ़ता है, और भगवान ने गीता में कहा है वृक्षों में पीपल तो मेरा ही स्वरूप है। अर्थात् भगवान की उसमें विशेष सत्व और चेतना और प्रभाव है।

सबका कारण भूत प्रकृति में भी जो विकृति है, तो प्रकृति बदलती है, प्रकृति में विकृति होती है, लेकिन इस जीवात्मा में विकृति नहीं होती। जैसे बुद्धि कभी विकृत हो गई। शरीर विकृत हो गया, मन विकृत हो गया, लेकिन उसको जानने वाला अव्यक्त आत्मा वही का वही। अब तो मेरे को ऐसी परेशानी होती, मैं बड़ा दुखी हूँ, परेशान हूँ, बस लगता है कि बस यह हर की पौड़ी में जाकर कूद के मर जाऊँ। तो यह बुद्धि में विकृति आई, मन में विकृति आई, तो उसको जानने वाला शुद्ध अव्यक्त आत्मा है। इस प्रकार का चिंतन करने से किसी प्रेत का प्रभाव अथवा किसी दुःस्वप्न और दुश्चिंतन का प्रभाव से आदमी बच जाएगा, आत्महत्या से बच जाएगा। लगता है कि फलाने को मार दूँ, तो यह विकृति आई, द्वेष आया, बुद्धि में आया। ॐ प्रभु नारायण नारायण, यह विकृति बुद्धि में आई, मन में आई, बचाओ। तुरंत आपकी बुद्धि शुद्ध हो जाएगी। किसी ने चोरी की, जेबकतरे ने जेब काटी। अब जेब काटी तो उसकी तो गलती है, लेकिन आपन फिर उसके जैसे हो जाए तो अपनी भी तो गलती हो जाएगी। नहीं, एक आदमी सज्जन थे, कोई जेब काट रहा था, देखा, अच्छा भैया लो, आप अच्छी तरह से काटो। बोले नहीं भाईसाहब मैं तो जरा गलती हो गई, जरा मैं तो मजाक कर रहा था। तो आदमी सुधर जाएगा। तो अपने हृदय से स्नेह भरा व्यवहार करने से जो विकृति होती है स्वभावों में, मन में, शरीर में, वह प्रकृति की है, और आप जल्दी पुरुष के करीब आ जाओ, तो प्रकृति की विकृति से बच जाओगे। पत्नी ने भोजन बनाया और कंकड़ आ गया। बाल आ गया। ज्यादा नमक आ गया, मिर्च आ गई या कुछ गड़बड़ हो गई। तो उसने असावधानी की, गलती उसकी है। लेकिन आपने थाली पछाड़ी, चोटा पकड़ा, देख रांड कैसा बनाती है, ऐसा करती, वैसा करती। तो वह बोलेगी मेरे हाथ का तो अच्छा ही नहीं लगता, दूसरी ले आओ, तो विकृति बढ़ जाएगी। और तुम बुलाओ कि फलानी अथवा मुन्ने की माँ अथवा हेदां, जो भी बोलते हो, जुगली मुमली जो भी नाम रखते हो। मुमली, जुगली, छुंगली, मिमी, मई, मम्मा, देखो, आज तो मानो भोजन में नमक देवता की बड़ी विशेष कृपा कर दी तुमने। बहुत बढ़िया है। बोले कि ज्यादा है क्या, ठहरो ठहरो ठहरो। दूसरी चीज मिला के नमक कम करके मसाला मसाला डाल के काम चल गया। लेकिन उसने बेवकूफी की, विकृति की, और आपने गुस्सा करके विकृति को और हवा दे दी। तो घर में झगड़ा और अशांति बढ़ जाएगी।

तो विकृति जीव का स्वभाव नहीं है, आप झगड़ा और अशांति नहीं चाहते। झगड़े और अशांति से दिक्कत होती है। शांति से कोई दिक्कत नहीं। शांति में आदमी घंटों भर रह सकता है। लेकिन क्रोध में एक घंटा भी सतत नहीं रह सकते। तो विकृति जीव का स्वभाव नहीं है, विकृति प्रकृति में है। तो जहाँ विकृति है वहाँ संस्कृति की जाती है, लेकिन विकृति में संस्कृति संस्कार डाल के संस्कृति की। लेकिन वह संस्कार डालने के बाद भी संस्कार नहीं थे तब भी जीव ऐसे ही शुद्ध था। और संस्कार पड़े तो विकृति से बचा, बाकी परमात्मा का तो आत्मा वो पहले ही था।

जैसे पीपल के वृक्ष को सींचना और पूजा करने से विष्णु भगवान की पूजा, सब ग्रहों की पूजा और पितरों की तृप्ति मानी जाती है पाताल खण्ड में लिखा है पद्मपुराण में। ऐसे ही आप इस परमात्म ज्ञान से भी सारे पितरों की तृप्ति, सारे देवों की और ग्रहों की शांति और अपने आत्मा परमात्मा में विश्रांति पा लेते हैं। तीरथ नहाए एक फल, धर्म लाभों का। संत मिले फल चार, धर्म अर्थ काम और मोक्ष। सतगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार। वह सतगुरु मिलेंगे तो सत स्वरूप जहाँ विकृति नहीं होती उधर का ज्ञान देंगे। और जब भी मन इधर-उधर आए तो यह मन की विकृति हुई, बुद्धि की विकृति हुई, स्वभाव की विकृति हुई, उसको जानने वाला परमात्मा, ॐ ॐ हरि नारायण नारायण। आप विकृति से बच जाएँगे। गरीबी के दुख से पीड़ित हैं, बच जाओगे। अमीरी के अहंकार से पीड़ित हैं या पैसे के तनाव से, टेंशन से पीड़ित हैं, किसी भी, आप तुरंत जहाँ पीड़ा नहीं होती वहाँ पहुँच जाओ। क्योंकि पहले भी आप वहीं थे। बाद में भी वहीं रहेंगे। तो अब भी वहीं पहुँचते जाओ बार-बार। जैसे जंगल में आग लगती है न। तो सयाने जानवर क्या करते हैं कि सरोवर में आकर खड़े हो जाते हैं पानी में। तो जंगल की आग उनको सता नहीं सकती। ऐसे ही संसार की जब आग लगे विकृति की, तो आप तुरंत अव्यक्त में आ जाओ। ॐ नारायण, हरि, आखिर क्या होगा। सब सपना, यह हो जाएगा, वो हो जाएगा, भूखे मर जाएँगे, रोटी नहीं मिलेगी, अब क्या हो जाएगा, इज्जत चली जाएगी, फिर क्या। तो यह पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, तो अब क्या है। अपनी तरफ से कोशिश करो लेकिन घबराहट जब पैदा हो अथवा असमंजसता अथवा विमूढ़ता पैदा हो जाए, तो भगवान अर्जुन को निमित्त करके संपूर्ण प्राणियों की विमूढ़ता हरने की बात बताते हैं। कि यह सारा संसार मेरे में अव्यक्त स्वरूप में व्याप्त है, संपूर्ण प्राणी मेरे में स्थित है। परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरे में स्थित नहीं हैं। ईश्वर की प्रकृति परा, अव्यक्त, और जीव अपरा। तो एक व्यक्त ईश्वर की दो प्रकृतियां हैं। ईश्वर की दो प्रकृति, एक परा माना अव्यक्त प्रकृति। वह जीव रूप है। जीव भी अव्यक्त है। और दूसरी अपरा जो व्यक्त, तो शरीर ईश्वर की, आत्मा की दो प्रकृति। एक अव्यक्त और एक व्यक्त। तो शरीर है व्यक्त, दिखता है, और जीव है अव्यक्त।

तो भगवान कहते हैं यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है, संपूर्ण प्राणी मेरे में स्थित है। परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरे में स्थित नहीं हैं। ध्यान देना। बहुत ऊँची बात है, बहुत सूक्ष्म बात है। संपूर्ण प्राणियों में मैं व्याप्त हूँ। मेरे में हैं। और सब, सब में मैं हूँ और सब मुझ में है। सब में मैं नहीं हूँ और सब मुझ में नहीं है। इतनी गहरी बात है कि ऐरा-गैरा तो भगवान की गलती मान लेगा। कि अपनी बात आप ही काट रहे हैं।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः। नौवां अध्याय, चौथा श्लोक। यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है, संपूर्ण प्राणी मेरे में स्थित हैं। परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरे में स्थित नहीं हैं। बताओ। दुनिया के बड़े-बड़े वकीलों को बोलो कि इसका करो व्याख्या। यह बुद्धिपूर्वक व्याख्या पंडित तो चाहे कर भी लें, लेकिन हृदयपूर्वक व्याख्या तो कोई हृदयेश्वर का प्यारा ही कर सकता है। और बड़ी आसान है। ईश्वर की दो प्रकृति, परा और अपरा। परा माना अव्यक्त, जीव। जो जीव मरता है न, जीव शरीर छोड़ देता है, आत्महत्या करता है, शरीर छोड़ दिया, तो गया, वह दिखेगा नहीं, वह अव्यक्त है। शरीर मरा हुआ दिखता है। यह भी भगवान की प्रकृति है।

तो भगवान बोलते हैं मैं इनमें व्याप्त हूँ, यह मुझ में है, फिर भी मैं इनमें नहीं हूँ और यह मुझ में नहीं है। कैसे। जैसे कि यह सारे समुद्र कहता है कि सारे तरंग यह मुझ में हैं। और सारे तरंगों में मैं हूँ। फिर भी मैं इनमें नहीं हूँ, यह मुझ में नहीं है, क्योंकि तरंग मर जाते हैं, तो मैं मरता नहीं हूँ। फिर भी आप उनमें नहीं थे, वे आप में नहीं थे, अगर आप में होते तो जगने के बाद रहते। और सपने के पहले होते। अगर वे आप में थे, तो अभी क्यों नहीं हैं। पहले क्यों नहीं थे। फिर भी स्वप्न काल में आप सब उन्हीं में थे, वह आप में थे, और फिर भी आप उनमें नहीं थे, और वे आप में नहीं थे। ऐसे ही सृष्टिकाल में वह जो अव्यक्त अपना चैतन्य है, तो सृष्टि के पहले जो था, सृष्टि के बाद रहेगा, सृष्टि में भी अभी वह है, और सृष्टि भी उसी में है, फिर भी उसमें सृष्टि नहीं है, और वह सृष्टि में नहीं है। बहुत सूक्ष्म बात है। बहुत ऊँची बात है। और भगवत प्राप्ति का तो सभी को जन्मसिद्ध अधिकार है। जब तक भगवत प्राप्ति नहीं हुई, तब तक कुछ भी प्राप्त हुआ तो धोखा है। मेरे को धन मिल गया, मेरे को पत्नी मिल गई, मेरे को बेटा मिल गया, मेरे को पति मिल गया, मेरे को फलाना मिल गया। और शरीर पहले था नहीं, बाद में नहीं रहेगा, तो मिला हुआ कब तक रहेगा। जरा सा सोचो तो एकदम धोखे में जी रहे हैं। अभी 10 करोड़ का बिजनेस किया, 1 करोड़ मिल गया, अब 100 करोड़ का करूँगा तो 10-20 करोड़ कमा लूँगा। फिर 500 करोड़ का करूँगा, बस उसी में समय गँवा के। 5 हजार करोड़ वाली व्यक्ति विल करके चली गई। अब वह झगड़े में पड़ा है, बिड़ला ग्रुप का पैसा वह बेचारे बोलते हैं कि हमको तो नहीं चाहिए, लेकिन यह 5 करोड़ अच्छे काम में लगने चाहिए। तो जब शरीर भी नहीं रहा, तो वह भाई के 5 करोड़ कैसे हो, 5 हजार करोड़। 1 लाख लाख रुपया एक कुटुंब को दें तभी भी 5 लाख कुटुंब की जिंदगी बदल जावे। एक माई के इतने पैसे थे। 5 हजार करोड़। लाख-लाख रुपया एक परिवार को गरीब परिवार को देवे, तो 5 लाख परिवार। 5 हजार करोड़ माना 5 लाख परिवार। बिल्कुल सीधा गणित है। वो बोलेंगे कोई दिक्कत नहीं, अच्छी जिंदगी हो गई। लेकिन अच्छी जिंदगी जिनके पास लाख-लाख, दो-दो लाख हैं वो भी दुखी हो रहे हैं। तो लाख-लाख मिल जाएँगे, 5 हजार... 5 लाख परिवारों को तो अच्छी जिंदगी हो जाएगी, यह तो ऐसे ही चलता रहेगा। अच्छी जिंदगी तो होगी कृष्ण के ज्ञान से। फिर चाहे 5 लाख हों, चाहे 5 रुपये हों, चाहे 5 दमड़ी भी न हों। कोई दिक्कत नहीं। चाहे नारायण हरि नारायण हरि। आप जो अव्यक्त अपना स्वरूप है, उसको जान लोगे, तो आपके पास 5 दमड़ी नहीं है तभी भी आपको कोई तकलीफ नहीं, और 5 हजार करोड़ है तभी भी आप सुंदर व्यवस्था करके जाओगे। नारायण नारायण नारायण नारायण।

तो आप थोड़ा समय केवल निकालिए अपने लिए। शरीर के लिए तो आप आठ घंटे काम करते हैं। अपने लिए कितना करते हैं। अपने लिए समय निकालिए। आप अव्यक्त हैं। जो व्यक्त है, पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, इसके पीछे सारी जिंदगी खप रहे हैं। और जो पहले था, अब भी है, जिसकी सत्ता से यह शरीर दिखता है। अगर आप नहीं हैं तो शरीर की क्या कीमत है साहब। आप अगर इस शरीर से नाता छोड़ देते हैं तो आपके 100, 200, 500 लाख, 2 लाख, 50 लाख करोड़ क्या काम के। तो तुम्हारा कारण शरीर है, शरीर के कारण तुम नहीं हो। शरीर न हो तो भी तुम थे, शरीर है तो तुम हो, और शरीर नहीं रहे तो भी तुम रहोगे। तो तुम अविनाशी हो, शरीर नाशवान है। तुम चेतन हो, शरीर जड़ है। तुम ज्ञान स्वरूप हो, और शरीर अज्ञान स्वरूप है। तुम शाश्वत हो, और शरीर नश्वर है। तो शाश्वत होकर नश्वर की चिंता में खप रहा है। चेतन होकर जड़ के चक्कर में दिक्कत पर दिक्कत आ रही है। बोलता है काई दिक्कत नहीं, काई दिक्कत नहीं, लेकिन इनकम टैक्स का जरा नोटिस आ जाए तो दिक्कत हो गई। जरा खाना पचा नहीं तो दिक्कत हो गई। जरा बुढ़ापा आया तो जोड़ों में दर्द तो दिक्कत हो गई। काई दिक्कत नहीं, काई दिक्कत नहीं जीवन भर रटता रहा आदत के अनुसार। लेकिन फिर भी देखो दिक्कती दिक्कत, दिक्कती दिक्कत।

जहां कोई दिक्कत नहीं पहुँचती है वहां अपनी बुद्धि को लगाओ। अर्जुन इतनी ऊँचाई वाला, सशरीर स्वर्ग में गया, और उर्वशी जैसी अप्सरा के हाव-भाव, काम-विकार से बचने की ताकत वाला, और भगवान कृष्ण जिसका रथ चला रहे हैं, ऐसे अर्जुन को भी दिक्कत आ गई। बिना ज्ञान के दिक्कत आ ही जाती है। काई दिक्कत नहीं, काई दिक्कत नहीं बोलने वालों को भी दिक्कतें आई हैं। जो दिखता है उसको व्यक्त कहते हैं। और जो नहीं दिखता है उसको अव्यक्त कहते हैं। तो नहीं दिखने में सूक्ष्म चीज भी नहीं दिखती है, फिर भी वह सूक्ष्म साधनों से दिखती है, जैसे माइक्रोस्कोप से कोई चीजें दिखती हैं। टेलीविजन की चीजें टेलीविजन पर दिखती हैं। रेडियो के तरंग रेडियो से दिखते हैं, तो यह भी व्यक्त हैं। लेकिन आत्मा ऐसा भी नहीं है कि किसी माइक्रोस्कोप से दिखे। अथवा किसी और साधन से दिखे, सारे साधन जिसकी सत्ता से देखने की, दिखाने की योग्यता लाते हैं वो है परमात्मा। मति न लखे जो मति लखे सो मैं शुद्ध अपार। जिसको बुद्धि नहीं देख सकती है। लेकिन जो बुद्धि को देखता है। जिसको मन नहीं देख सकता है, लेकिन जो मन को देखता है। जिसको शरीर नहीं जानता है, लेकिन जो शरीर को जानता है। तो शरीर को कौन जानता है। बोले मैं जानता हूँ। बस मैं को खोज ले। बुद्धि को कौन जानता है। बोले मैं जानता हूँ। दुख को कौन जानता है। बोले मैं जानता हूँ। सुख को कौन जानता है। बोले मैं जानता हूँ। तो तू कौन है। बोले मैं जुगलू, दत्त रे की, धोखा खा गया। नहीं-नहीं बापूजी, मैं जानती, तो कौन है, मैं माणेकूँ, अरे जा। तो कंकड़ हो गई फिर। जब शरीर का नाम लेकर अपने को मैं में माने तो आप कंकड़-पत्थर हो गए, जड़ वस्तु हो गए। आप मैं, मैं, मैं, वो कौन है उसको खोजोगे ना, तो हो... खोजते-खोजते खोजने वाला खो गया, जिसको खोजता था वही हो गया। खोजत-खोजत कबीरो गयो हेराई।

जैसे लूण की पुतली (नमक की पुतली) समुद्र को खोजने जाए तो क्या होगा। कोई दिक्कत नहीं है। अरे पूरी दिक्कत आ जाएगी, उसकी आकृति गायब और वो समुद्र हो जाएगी, कोई दिक्कत की नहीं पन की जगह पर पहुँच जाएगी। बोल्या जबी आपनु तभी होया खराब, नानक जी ने कहा। समर्थ रामदास ने जप इतना किया, 13 करोड़, 14 करोड़, 15 करोड़, तो भगवान सपने में दर्शन देते थे एक 3 करोड़ करने से। 4-5 करोड़ करने से तो हस्त की रेखाएं, भाग्य की रेखाएं बदल जाती हैं। तो जब 15-15 करोड़ हो तो भगवान तो 13 करोड़ में प्रकट हो गए। फिर जब चाहो तो भगवान को प्रकट कर देते थे। दूसरों को भगवान के दर्शन करा देते थे सगुण साकार, सीताराम आदि के। समर्थ रामदास, शिवाजी के गुरुजी। ऐसे समर्थ ने भी अपने दासबोध में लिखा है कि अपना उद्धार करना हो, तो अद्वैत ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। भगवान अलग है, आप अलग है, यह तो द्वैत हुआ। लेकिन भगवान का आत्मा और आपका आत्मा, भगवान का मैं और आपका मैं मूल में एक ही है, ऐसा तत्व ज्ञान ग्रंथों का करना चाहिए अध्ययन करना चाहिए। नरसी मेहता, जहां लगी आत्मतत्व चीन्यो नहीं, तहां लगी साधना सर्व झूठी रे। जब तक आत्मज्ञान नहीं हुआ, अपना अव्यक्त स्वरूप का अनुभव नहीं हुआ, तब तक साधना सब झूठी। क्योंकि झूठा लेना, झूठा देना, झूठा खाना, झूठा आना, झूठा पेना, झूठा मिलना, झूठा बिछड़ना। सब झूठ हो गया, सपना हो गया। बचपन में कितनों से मिले। माइयां तुम याद रखो वो दिन थे, मंगनी हो रही थी, घूंघट में निकले, लाडे गाए रहे थे, शादी के दिनों में नथनी पहनी थी। बैंड-बाजे आ रहे थे, बजा के अब दूल्हा आ रहा है, टुड टुड टुड... तो सहेलियां, ए भाई आ गया, शादी। वो दिन देखो उस समय बड़ा सच्चा लग रहा था, अभी क्या। सब सपना हो गया। ऐसे ही तुम भी मेरी शादी हो रही है, घोड़े पर बैठे था, बग्घी में बैठे, जरा रुमाल... आप देखा तो बोले कुछ नहीं। तो सब बदलने वाला है न, लेकिन उस बदलाहट को जानने वाला बदला है क्या। बस जो नहीं बदला उसको जान ले। जो नहीं बदला उसके करीब आते जा।

बचपन बदला। जवानी बदली। सुख भी बदला, दुख भी बदला। मित्र भी बदला, शत्रु भी बदला, यह जग है अदला-बदला, एक चेतन ना बदला रे। जवानी में न जाने कितने-कितने बड़े तरंगों पर नाच रहे थे कि मैं डॉक्टर बनूँगा। मैं वकील बनूँगा। मैं सीए बनूँगा, मैं फलाना करूँगा। मैं शादी करूँगा, मैं ऐसी जगह करूँगा, मैं शादी करूँगी, ऐसा करूँगी, वैसा करूँगी। लेकिन अब देखो तो हैं, नाक टेढ़ी हो गई। आंखें अंदर चली गईं। रात को ठीक से नींद नहीं आती। दिन को खाना नहीं पचता है। बुढ़ापे में कोई मानता ही नहीं। कितने ऊंचे तरंगों पे नाच रहे थे। अब देखो तो सब अदला-बदला। तो बुढ़ापा आ जाए और लाचारी आ जाए उसके पहले, जहां बुढ़ापे की दाल नहीं गलती। लाचारी की दाल नहीं गलती, वहां पहुंच जाओ, बस। कहने का तात्पर्य यह है, भगवान भी इसीलिए कह रहे हैं, और हम भी भगवान की इस वाणी का इसीलिए फायदा उठाते हैं, कि दुखों का सदा के लिए अंत हो जाए। और साधारण सुख नहीं, परम सुख की प्राप्ति हो जाए, परम ज्ञान की प्राप्ति हो जाए, परम पद की प्राप्ति हो जाए। इंद्र पद भी परम पद नहीं है।

प्रधानमंत्री पद तो परम पद नहीं है यह तो तुम समझ लोगे। लेकिन सारे धरतियों के राजा के मिलाकर भी वो बहुत छोटा पद है, उससे इंद्र पद बहुत ऊंचा है। लेकिन वो इंद्र पद पाया हुआ इंद्र देव भी, आत्म पद पाए बिना अपने को कभी-कभी कंगाल मानता है। यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः। अहो तत्र स्थितो योगी हर्षं नोपगच्छति। जिस आत्म पद को पाए बिना इंद्र भी अपने को कभी-कभी कंगाल मानता है कि यह पहले नहीं था इंद्र पद, बाद में नहीं रहेगा, तो नहीं होने वाली चीजों में, जो है, मैं उसको भूल रहा हूँ, हाय रे। इंद्र भी जो इंद्रासन पर बैठे उसे इंद्र बोलते हैं। जो प्रधानमंत्री पद पे बैठे उसे प्रधानमंत्री बोलते हैं। तो कई इंद्र हुए, इसमें कई कोई-कोई ऐसे इंद्रविवेकी कि इंद्र का राज्य मिलने के बाद भी देखा कि यह तो कुछ भी नहीं है। और गुरु के पास गए। आत्मविद्या लेने के लिए। यह वो चीज है, ब्रह्मज्ञान वो चीज है। नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण।

भगवान कृष्ण सुबह नींद में से उठते थे। शांत बैठ जाते थे। मैं नित्य हूँ, शरीर और व्यवहार अनित्य है। मैं शाश्वत हूँ, आनंद स्वरूप हूँ। यह बदलने वाला व्यवहार मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। ओम, ओम, आज यह सत्ता बांटूंगा। और वस्तुओं का दान करूँगा, गौओं का दान करूँगा। ओम, ओम, क्योंकि छोड़कर जाना है। सदुपयोग करूँगा। तो वस्तुओं का भी सदुपयोग, मन का भी सदुपयोग, मन को सत में लगाएँ। बुद्धि का भी सदुपयोग, बुद्धि को भी सत में लगाएँ। चित्त का भी सदुपयोग, चित्त को सत स्वरूप चेतन में लगाएँ। हम इधर-उधर की बातों में चित्त को असत में लगा देते हैं। मन को असत में लगा देते हैं। तो सत्संग तो थोड़ी देर होता है। चार सकार हैं। सत चिंतन। सत सुमिरन। सत कर्म और सत्संग। तो अकेला बैठेगा तो सत चिंतन करेगा। कुछ करेगा ईश्वर की प्राप्ति के लिए तो सत कर्म करेगा। चिंतन, सुमिरन, कर्म और सत्संग। तो अकेले में चिंतन होगा। आपस में बैठकर चिंतन होगा। अकेले में सुमिरन होगा। और कर्म करेंगे तब सत्कर्म होगा। और सत्संग तो फिर सहज में हो जाएगा। तो सत चिंतन, सत सुमिरन, तो सत का सुमिरन हो। सत की प्रीति के लिए कर्म हो। तो उसको फिर सत के संग में स्थिति हो जाएगी। बस। तो कर्म में भी असत कर्म में ना लगे, सत्कर्म में लगे। सुमिरन में भी कुसुमिरन में न लगे। व्यर्थ के सुमिरन में न लगे। सत सुमिरन में लगे। चिंतन अकेले में बैठा तो व्यर्थ का चिंतन न करे, सत का चिंतन करे। तो परमात्म ज्ञान हो जाएगा। और परमात्म ज्ञान जब तक नहीं हुआ तब तक जो कुछ भी मिलेगा अंत में समय, शक्ति और जीवन खत्म। हाथ में कुछ भी नहीं आएगा।

अब 5 हजार करोड़ वालों के हाथ में नहीं आया तो तुम्हारे हाथ में क्या आएगा। दिक्कत ही दिक्कत है। बोले कोई दिक्कत नहीं, नहीं सारी दिक्कत है जब तक आत्मज्ञान नहीं हुआ। क्यों भांजे। कोई दिक्कत नहीं, नहीं सारी दिक्कतें हैं जब तक आत्मज्ञान नहीं हुआ। जब तक शाश्वत को नहीं पाया, पहचाना, तब तक सारी दिक्कतें ही दिक्कतें हैं, अरे जाएँगे वो काम हो जाएगा कोई दिक्कत नहीं, होने के बाद भी दिक्कत है, न हुआ तब भी दिक्कत है क्योंकि छूट जाएगा। अरे वो तो मेरा दोस्त है, ऑफिसर, मेरे घर आता, मेरा कोई दिक्कत नहीं मैं करवा देता हूँ। अब ऑफिसर की बदली हो गई तब भी दिक्कत है। अगर वो चक्कर कटवाए तब भी दिक्कत और ओके कर दिया तब भी अंत में छूट जाने वाला है, दिक्कत ही दिक्कत है, कोई दिक्कत नहीं कैसे। नारायण हरि, नारायण हरि। यह है वीआईपी ट्रीटमेंट। नारायण हरि, नारायण हरि। तड़प बढ़ानी चाहिए ईश्वर प्राप्ति के लिए।

तो विकार शरीर में होता है, विकार बुद्धि में होता है, मन में होता है। लेकिन जो निर्विकार अपना नारायण अव्यक्त स्वरूप है, उसको पा ले। तो निर्विकारी सुख, निर्विकारी संबंध, निर्विकारी आनंद, निर्विकारी नारायण के साथ आपका जो शाश्वत संबंध है उसका साक्षात्कार हो जाएगा। यह शरीर ही, शरीर तो काट सकते हैं लेकिन शरीर के अंदर जो शरीरी है उसको काट नहीं सकते। शरीर को तो जला सकते हैं लेकिन चैतन्य आत्मा को जला नहीं सकते। शरीर तो पड़ा-पड़ा भी गल जाएगा लेकिन चैतन्य नहीं गला सकते। और यह सुखाया भी नहीं जाता। तो न हन्यते हन्यमाने शरीरे। शरीर के नष्ट होने से यह शरीरी, आत्मा, तुम नष्ट नहीं होते। और यह सब में रहने वाला पूर्ण है। परिपूर्ण है, अचल, अस्थिर स्वभाव वाला और अनादि है। एक होता है देह, दूसरा होता है देही, तो देह तो दिखता है, देही नहीं दिखता है। तो देही की महिमा अपरंपार है। इसमें उनका वर्णन करना बड़ा कठिन है। फिर भी उसको सुगम कर दिया महापुरुषों ने। अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, अचलः, अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य। इसमें विकार नहीं है। यह इसका चिंतन नहीं कर सकते हो, सारे चिंतन इसी से बुद्धि करती है। इसको व्यक्त नहीं करते हो, सारा व्यक्त इसी से होता है। यह अचल है, सारे चल कार्य इसी से होते हैं। यह अशोष्य है, सारे शोष्य इसी से दिखते हैं। अक्लेद्य, सारे क्लेद्य इसी से दिखते हैं। अदाह्य, सारा दाहन इसी से दिखता है। अच्छेद्य, सारा छेदन-भेदन इसी से दिखता है। यह 8 विशेषताएं इस परमात्मा की वर्णन करके विधि मुख से उपदेश दिया। निषेध मुख से उपदेश दिया। भाई यह सुखाया नहीं जा सकता, यह नहीं किया जा सकता, यह निषेध मुख हो गया। और यह विधि मुख। विधि मुख, निषेध मुख से उपदेश देकर जीव को जगा दिया तो बस उसको इतना मिला, इतना मिला कि सारी सृष्टि का वैभव भी उस आत्मज्ञान के आगे कोई माना नहीं रखता। एक बार ब्रह्माजी अपने बड़े बेटे पर इतने प्रसन्न हुए कि बेटा जो चाहिए तू मांग ले। तूने मेरी आज्ञा का पालन किया, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ। तो बेटे का नाम था अथर्वा, ब्रह्माजी के ज्येष्ठ बड़े बेटे का नाम। तो उसने कहा कि पिताजी आप तो सृष्टि के कर्ता हो और सारे रहस्यों को जानते हो। सबसे जो उत्तम चीज है आप वही दीजिए मेरे को। ॐ ब्रह्मादेवानां प्रथमः विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्यां प्रतिष्ठाय अथर्वाय प्रतिप्राह। ब्रह्माजी सृष्टि के कर्ता हैं, भुवनों के रहस्य जानकार हैं। अपने ज्येष्ठ पुत्र को बड़े बेटे को प्रसन्न होकर सबसे ऊंची चीज देने को जब बेटे ने प्रार्थना की, तो वही दिया यह ब्रह्मज्ञान जो अभी तुम सुन रहे हो। आत्मविद्या दिया।

ऐसा नहीं कि यह इंद्र बना दे। चलो प्राइम मिनिस्टर बन जा। और प्राइम मिनिस्टर बनने के बाद भी क्या होता है। जो भूतपूर्व बैठे हैं देखो। और अभी भी जो हैं वो भी भूतपूर्व हो जाएँगे देर-सबेर। किसी भी पद पर हम बैठें। तो मिली हुई चीज है न, वो तो छूटेगी। भगवान शाश्वत हैं। ऐसा नहीं कि भगवान मिलेंगे, भगवान मिले-मिलाए हैं केवल भगवान और हमारे बीच की नासमझी हटी तो बस मिले। जो मिला-मिलाया है लेकिन उसका ज्ञान नहीं, उसकी स्मृति नहीं, उसकी प्रीति नहीं। तो भगवान का होना तो है ही है भगवान तो छे। लेकिन भगवान का ज्ञान होना, भगवान की स्मृति होना, भगवान की प्रीति होना यह चार चांद लाती है। एक भिखमंगा था, उसने ठान लिया कि मैं लखपति बनूँगा। करोड़पति बनूँगा। तो उसने क्या करा। तो दूसरे भिखमंगे तो सुबह 10 बजे की गाड़ी पर अपनी चद्दर बिछाकर बैठ जाते स्टेशन पर। वो तो सुबह 4 बजे चद्दर बिछा के बैठ जाता। और उसने वहीं अपना छोटा-मोटा छपरा, तंबू तान लिया। भाईसाहब कुछ देते जाओ, कुछ देते जाओ। सुबह 4 बजे से भीख मांगे-मांगे, रात को कभी 2 बजे वाली गाड़ी आवे लेट-सेट तभी भी बैठ जाए। तो काफी चिल्लर इकट्ठी की और वो वहीं मर गया किसी कारण। मरना तो है सभी को।

जब समाज सुधारकों ने देखा कि यह भिखमंगा तो जो कुछ डिब्बे-बिब्बे, खोद-खाद के थोड़े रख दिए थे चिल्लर के, बड़ी चिल्लर करके। फिर देखा कि क्या है, जरा खोदें। तो जरा गहरे चले गए तो पुराने जमाने के राजा के सोने के देगें हीरों से भरी थी। अब वो फिर भी जीवन भर भीख मांग रहा था, उन्हीं पर रह रहा था। देगें भरी थी सोने की देगें हीरे जवाहरात से भरी थी। लेकिन भिखमंगा 10-10, 5-5 पैसे भीख मांग के अमीर होना चाहता था। मांगने की जरूरत नहीं थी, जहां बैठा था वहीं गहरा खोदता। ऐसे ही हम मांग रहे हैं कि चाय तू सुख दे, पान-मसाला तू सुख दे। स्त्री संभोग तू सुख दे, फलाना तू सुख दे। भीख मांगे-मांगे खपे जा रहे हैं। लेकिन जिसकी सत्ता से जहां बैठे हैं वहां अगर खोजें तो। आनंद ही आनंद।

डिट्ठो मुख शहंशाह जो हिअरे थियम करार। लथा रोग शरीर जा सतगुर जे दीदार। उस शाहों के शाह परमात्मा में विश्रांति पाई तो शरीर की चिंता। उधर चिंता, प्रिय चर्चा, विरहिणा, संभारना, स्वस्वरूपे स्थिरता, ये बधा सहजे टले। वो सब। सारे दुख मिट जाएंगे। एक साथ। जैसे नींद में सब समान हो जाते हैं। चेहरे में सब समान नहीं, नींद में सब समान अव्यक्त में चले जाते हैं। चाहे पलंग पर सोया हो राजा, चाहे फुटपाथ पर गधड़ी नींद में सब अव्यक्त में आ जाते हैं। ऐसे जाग्रत में जो अव्यक्त में आ गया, आहा, उसका तो काम बन गया, उसके दर्शन करने वाले का भी पुण्य लाभ हो जाएगा।

तीरथ नहाए एक फल, संत मिले फल चार। वो संत पद को पा लेगा। उसके जन्मों का अंत हो जाएगा। उसके पापों का अंत हो जाता है। उसके दुखों का अंत हो जाता है, उसकी चिंताओं का अंत हो जाता है। उसके क्लेशों का अंत हो जाता है। जो अव्यक्त की तरफ आता है। और अव्यक्त दूर नहीं है, व्यक्त भगवान का मंदिर तो बाहर है, दूर है। व्यक्त मित्र दूर है, और व्यक्त जो मिलेगा बिछड़ जाएगा, अव्यक्त कभी नहीं बिछड़ता। तुम पत्नी को सदा साथ में नहीं रख सकते। पति को सदा साथ में नहीं रख सकते। जवानी भी सदा साथ में नहीं रख सकते। बचपन भी सदा नहीं रख सकते। लेकिन उस अव्यक्त परमात्मा को कभी छोड़ नहीं सकते। जिसको कभी नहीं छोड़ सकते उसकी प्रीति हो जाए। जिसको कभी नहीं छोड़ सकते उसका ज्ञान हो जाए। जिसको कभी नहीं छोड़ सकते उसमें जरा शांत हो जाए, बस। आइशों हइशों की आदत पड़ी है न। तो सत्संग में भी धमाधम धमाधम इधर भी कुछ ना कुछ करो करो। कुछ ऐसा भी समय लाओ कि बस। उसके चिंतन करते-करते जिसके लिए कर रहे हैं उसी में थोड़ी क्षण डूब जाए, फिर मन इधर-उधर जाए ॐ ॐ ॐ ॐ शांति ॐ।

हरि ॐ ॐ ॐ ॐ आनंद ॐ ॐ ॐ ॐ माधुर्य ॐ ॐ ॐ ॐ प्रसन्नता हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ शिव ॐ ॐ ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ हरि आनंद हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ राम राम राम शिव शिव शिव शम्भो भोलेनाथ बिन फेरे हम तेरे हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ राम ॐ श्याम ॐ शिव ॐ शिव ॐ राम ॐ श्याम ॐ शिव ॐ शिव ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ आनंद है, माधुर्य है। तुम्हारे कान में किसकी ध्वनि पड़ रही है मुझे पता है। तुम किसको प्यार कर रहे हो मुझे पता है। और उसको भी। प्रभु तेरी जय हो। हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ आनंद ॐ ॐ ॐ माधुर्य हरि ॐ ॐ ॐ शक्ति हरि ॐ ॐ ॐ आरोग्य हरि ॐ ॐ ॐ निर्विकारिता हरि ॐ ॐ ॐ भक्ति हरि ॐ ॐ।