स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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जन्मदिवस असल में ......

Rajesh Kumawat | 2:08 PM | Best Blogger Tips

….जन्मदिवस असल में सेवा दिवस, साधना दिवस, सत्संग दिवस, आत्म -विश्रांति दिवस के रूप में मनाये…

        जो जनम दिवस के दिन सोचते की , ‘अगले साल इतना कमाउंगा .. ऐसा वैसा..अभी इतना पढ़ा हूँ ऐसा बन के दिखाना है..आदि आदि..’ .. बोलते वो ये समझ ले की अपने को कर्म के दल-दल में ना फेंके.. श्रीकृष्ण के नजरिये को अपनाए…कर्म में धन लोलुपता, फल आकांक्षा ना रखे तो तुम्हारे ज्ञान स्वभाव की ना मृत्यु होगी ना जन्म..

        शरीर के तो करोडो करोडो बार जन्म हुए, मृत्यु हुयी… केवल ये ना-समझी है की , ‘मैं ’ दुखी हूँ.. ‘मैं ’ बच्चा हूँ.. ‘मैं ’ फलानी जाती का हूँ.. ये सभी व्यवहार की रमणा है..अपना व्यवहार चलाने के लिए बाहर से चले लेकिन अन्दर से जाने की “सोऽहं.. सोऽहं” मैं वो ही हूँ!..सत -चित-आनंद स्वरुप!….जो पहेले था, बाद में भी रहेगा वो ही मैं अब भी हूँ…

अगर सत्संग समझ में आया तो निर्लेप नारायण में प्राप्त हो सकता है.. जो नहीं है उस को नहीं मानो और जो है उस को मानो बस!… बचपन,जवानी, बुढापा कुछ भी रहेने वाला नहीं, उस को जानने वाला सदा रहेगा… ‘इदं’ बोलते वो सच्चा नहीं लेकिन ‘इदं’ जिस से प्रकाशित होता वो सच्चा है…

बोले, ‘बाबा मेरा बेटा ठीक नहीं’ ..दुनिया में कई बे-ठीक है..मेरा कुत्ता ठीक नहीं ..तो दुनिया में कई कुत्ते है..

जितना बे-ठीक है उस को जाने दो… जो ठीक है उस में ही आप बैठ जाओ..

तो अवतार भगवान के होते है… स्फूर्ति अवतार होता…. प्रवेश अवतार भी होता है.. अवतारो को जान लो…

अवतरिती इति अवतार |

         ऐसे वास्तविक में आप का भी अवतार ही है..ये ज्ञान भी केवल मनुष्य जनम में ही आयेगा… अब समझो की इस मनुष्य देह से विशेष सम्बन्ध नहीं …जैसे और देह छुट गया ऐसे ये भी छुट जाएगा…जहां जाना है वहाँ पहुँचने के लिए जैसे बस से जाते तो पहुँचने पर बस छोड़ देते ऐसे इस शरीर को छोड़ देंगे..ऐसे शरीर सबंध को छोड़ देंगे…इन को साथ नहीं रख सकते…आप तो असल में चैत्यन्य है लेकिन जुड़ते संबंधो से…मनुष्य देह में आये.. ये सदा साथ नहीं रहेता… ऐसे शरीर के संबंधो को सदा साथ में नहीं रख सकते.. जो सदा साथ है, उस को कभी छोड़ नही सकते, तो जिस को छोड़ नहीं सकते उस को ‘मैं ’ मानने में क्या आपत्ति है? उस को अपना ‘मैं ’ मानो… जिस को नहीं रख सकते उस की आसक्ति छोड़ दीजिये…

     आप अपने ज्ञान स्वभाव को छोड़ सकते है क्या? ‘ये भगवान है’ ये समझने के लिए भी ज्ञान स्वभाव चाहिए…

       अपना ज्ञान स्वभाव नित्य अवतरित होता रहेता है.. परिस्थितियाँ बदल जाती परमात्म सत्ता ज्यों की त्यों रहेती है.. अपना ज्ञान स्वभाव नित्य अवतरित होता रहेता सभी परिस्थितियों में… उस से ही परिस्थितियों का पता चलता है.. परिस्थितियाँ बदल जाती लेकिन परमात्मा ज्यों का त्यों रहेता है..

       तो भगवान के अवतार होते रहेते है…ऐसे परशुराम जी का आवेश अवतार तब तक था जब राम जी अवतार लेकर आये …राम जी आये तो फिर वो अवतार उन में समा गया… राम जी और कृष्ण जी का अवतार भी सदा के लिए नहीं, रावण और कंस के लिए नैमित्तिक अवतार था..

         ऐसे ही भगवान के ज्ञान स्वभाव, चैत्यन्य स्वभाव का, लोक मांगल्य स्वभाव का अवतरण संतो के रूप में होता है.. इस को नित्य अवतरण बोलते है ..संतो के रूप में जो भगवान का अवतरण होता इस को नित्य अवतरण बोलते है..

       भगवान का अर्चना अवतार भी होता है.. एक भक्त ने हनुमानजी की उपासना की…भक्त हनुमानजी के सामने अर्चना में ध्यान मग्न बैठा है..उस का वैरी आया की पीछे से रामपुरी आर-पार कर दूँ तो सदा के लिए मिट जाएगा….उस को भक्त के पीठ में छुरा भोकना है.. तो हनुमान जी के मूर्ति के २ टुकड़े हुए और हनुमान जी प्रगट हो कर उस को सीधा यमपुरी पहुंचा दिया…तो यहाँ हनुमान जी कही से भाग के आये ऐसी बात नहीं..या उन को भक्त ने बोला ऐसी भी बात नहीं….लेकिन कण कण में जो ज्ञान सत्ता , चैत्यन्य सत्ता व्याप रही है वो आवेश अवतार के निमित्त रक्षा करने के लिए प्रगट भी हो जाती है…. …ऐसा ही प्रल्हाद की रक्षा के लिए आवेश अवतार नरसिंह अवतार हुआ, द्रोपदी की रक्षा के लिए साड़ीयों में प्रवेश अवतार हुआ..

        ऐसे आप के ह्रदय में भी वो सत्ता अवतरित होती..पूजा, पाठ, जप, ध्यान से विवेक जागता तो अन्तर्यामी को संकेत मिलते रहेते…

        कोई बस से जा रहा था..लोगो ने कहा की कोई खतरा नहीं..लेकिन ह्रदय से आवाज आई की नहीं अभी उतर जा..वो आदमी अन्दर की आवाज सुन के उतर जाता और बाद में पता चला की ‘अरे बाप रे बाप ! प्रेरणा नहीं मानता , उस बस की यात्रा करता तो मर जाता!’ .. बस का एक्सिडेंट हो कर इतने इतने लोग मरे है..

         भोपाल के गैस काण्ड में कितनो को प्रेरणा हुयी थी तो बच गए थे…तो कभी कभी ऐसे समय में अंतरयामी ईश्वर का प्रेरणा अवतरण होता है..

           एक भक्त रेलवे स्टेशन में सोया था..उस को प्रेरणा हुयी की बाहर जाओ..उठ कर बाहर चला गया और देखा की थोड़ी देर में रेलवे स्टेशन में गोली बरसाई जा रही थी…जप, ध्यान, साधना नियम से करता था तो अन्तर्यामी भगवान ने प्रेरणा से अवतरित हो के बचा दिया..

       पूजा, पाठ, जप, ध्यान से विवेक जागता तो अन्तर्यामी को संकेत मिलते रहते… लेकिन जिस में वासना हो वो संकेत अन्तर्यामी के नहीं होते… एक भक्त को गुरु ने बोला की नर्मदा किनारे अनुष्टान करो..तपस्या नर्मदा के तट पर फलती है..ध्यान विष्णु जी के रूपों का किया जाता है..

कुछ ही दिन हुए भक्त वापस आ गया…गुरु ने पूछा क्या हुआ? अनुष्टान छोड़ के आ गया?

बोले, ‘भगवान प्रेरणा किये की फलानी लड़की अच्छी है…उस से शादी कर लो..दोनों मिल के भजन करना तो मैं राजी हो जाउंगा..’

गुरु डांट दिए, ‘ये तेरा मन ही प्रेरणा दे रहा!’

मन की बदमाशी को या पुराने संस्कारों की वासनाओ को प्रेरणा नहीं समझना …

ईश्वर की प्रेरणा में, सत्ता में अपने भी संस्कार ही काम करते ..

शराबी को अंतरयामी प्रेरणा देगा तो क्या देगा?..दिवाली मनाओ!ये बोतलों को बातो और पियो!’ तो जैसे संस्कार से मन बना है ऐसा अंतरयामी बन जाएगा!..

भक्त को प्रेरणा होगी तो कैसे होगी?भक्त का अन्तर्यामी तो ये ही कहेगा की ध्यान में गोता मारो..!!

…जिस के जन्म और कर्म दिव्य होते उस के चित्त में स्फुरणा होती तो वो सच्ची, अन्तर्यामी की स्फुरणा होती है..क्यों की वो तटस्थ होता है..

एक भगतडा जा रहा था…गुरु की आधी अधूरी बात समझा था… की सब में भगवान है…सामने से पागल हाथी आ रहा है ..महावत बोला, ‘अरे हट जाओ..हाथी पागल है’

..लेकिन नहीं माना…

बोले, ‘मैं जानता हूँ..सब भगवान का मंगलमय विधान है ..सब में भगवान है!’

हाथी आया.. धडाक से सुण्ड मारा.. खोपड़ी टूटी …जब ठीक हुआ तो सब पूछे की क्या हुआ?…

बोले, ‘हाथी में भगवान है..मैंने सूना था लेकिन ऐसा कैसे हुआ?’

.. तो सामने वाले बोले कि, ‘हाथी में ही तुझे भगवान देखना था?..महावत में भगवान चिल्ला चिला कर बोल रहा था वो क्यों नहीं सुना ?’

ऐसा आधा कच्चा ज्ञान बड़ा खतरा देता है…

इसलिए भगवान को किसी भी रूप में मानो..ये समझ लो कि, भगवत सत्ता हमारे मंगल-मय उन्नति के लिए, विकास के लिए है…

तो शास्त्र नुसार जन्म दिवस आदि मनाये तो हरकत नहीं..