स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

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अगर भगवान से मिलना हो तो

Rajesh Kumawat | 10:21 AM | | | | | | | | | Best Blogger Tips
यदि मनुष्य विद्या, संपत्ति, त्याग, वैराग्य आदि किसी बात को लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उन विद्या आदि की पराधीनता, दासता ही है। जैसे, कोई धन को लेकर अपने को विशेष मानता है तो यह विशेषता वास्तव में धन की ही हुई, खुद की नहीं। वह अपने को धन का मालिक मानता है, पर वास्तव में वह धन का गुलाम है।
 
प्रभु का यह कायदा है कि जिस भक्त को अपने में कुछ भी विशेषता नहीं दिखती, अपने में किसी बात का अभिमान नहीं होता, उस भक्त में भगवान की विलक्षणता उतर आती है। किसी-किसी में यहाँ तक विलक्षणता आती है कि उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जड़ता का अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान के प्रेमी भक्त भगवान में ही समा गये हैं, अन्त में उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीर सहित भगवान के श्रीविग्रह में लीन हो गईं। केवल पहचान के लिए उनकी साड़ी का छोटा-सा छोर श्रीविग्रह के मुख में रह गया और कुछ नहीं बचा। ऐसे ही संत श्री तुकाराम जी शरीर सहित वैकुण्ठ चले गये।
 
ज्ञानमार्ग में शरीर चिन्मय नहीं होता, क्योंकि ज्ञानी असत् से सम्बन्ध-विच्छेद करके, असत् से अलग होकर स्वयं चिन्मय तत्त्व में स्थित हो जाता है। परंतु जब भक्त भगवान के सम्मुख होता है तो उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण आदि सभी भगवान के सम्मुख हो जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जिनकी दृष्टि केवल चिन्मय तत्त्व पर ही है, जिनकी दृष्टि में चिन्मय तत्त्व से भिन्न जड़ता की स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं होती तो वह चिन्मयता उनके शरीर आदि में भी उतर आती है और वे शरीर आदि चिन्मय हो जाते हैं। हाँ, लोगों की दृष्टि में तो उनके शरीर में जड़ता दिखती है, पर वास्तव में उनके शरीर चिन्मय होते हैं।
 
भगवान की सर्वथा शरण हो जाने पर शरणागत के लिए भगवान की कृपा विशेषता से प्रकट होती है, पर मात्र संसार का स्नेहपूर्वक पालन करने वाली और भगवान से अभिन्न रहने वाली वात्सल्यमयी माता लक्ष्मी का प्रभु-शरणागत पर कितना अधिक स्नेह होता है, वे कितना अधिक प्यार करती है, इसका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। लौकिक व्यवहार में भी देखने में आता है कि पतिव्रता स्त्री को पितृभक्त पुत्र बहुत प्यारा लगता है।
 
प्रेमभाव से परिपूर्ण प्रभु जब अपने भक्त को देखने के लिए पधारते हैं तो माता लक्ष्मी भी प्रभु के साथ आती हैं। परन्तु कोई भगवान को न चाहकर केवल माता लक्ष्मी को ही चाहता है तो उसके स्नेह के कारण माता लक्ष्मी भी आ जाती हैं, पर उनका वाहन दिवान्ध उल्लू होता है। ऐसे वाहनवाली लक्ष्मी को प्राप्त करके मनुष्य भी मदान्ध हो जाता है। अगर उस माँ को कोई भोग्या समझ लेता है तो उसका बड़ा भारी पतन हो जाता है क्योंकि वह तो अपनी माँ को ही कुदृष्टि से देखता है, इसलिए वह महान अधम् है।
 
जहाँ केवल भगवान का प्रेम होता है वहाँ तो भगवान से अभिन्न रहने वाली लक्ष्मी भगवान के साथ आ ही जाती है। पह जहाँ केवल लक्ष्मी की चाहना है वहाँ लक्ष्मी के साथ भगवान भी आ जायें यह नियम नहीं है।
 
शरणागति के विषय में एक कथा आती है। सीताजी, राम जी और लक्ष्मणजी जंगल में एक वृक्ष के नीचे बैठे थे। उस वृक्ष की शाखाओं और टहनियों पर एक लता छाई हुई थी। लता के कोमल-कोमल तन्तु फैल रहे थे। उन तन्तुओं में कही पर नयी-नयी कोंपलें निकल रही थीं और कहीं पर ताम्रवर्ण के पत्ते निकल रहे थे। पुष्प और पत्तों से लता छाई हुई थी। उससे वृक्ष की सुन्दर शोभा हो रही थी। वृक्ष बहुत ही सुहावना लग रहा था। उस वृक्ष की शोभा को देखकर भगवान श्रीराम लक्ष्मण जी से बोलेः "देखो लक्ष्मण ! यह लता अपने सुन्दर-सुन्दर फल, सुगन्धित फूल और हरी-हरी पत्तियों से इस वृक्ष की कैसी शोभा बढ़ रही है ! जंगल के अन्य सब वृक्षों से यह वृक्ष कितना सुन्दर दिख रहा है ! इतना ही नहीं, इस वृक्ष के कारण ही सारे जंगल की शोभा हो रही है। इस लता के कारण ही पशु-पक्षी इस वृक्ष का आश्रय लेते हैं। धन्य है यह लता !"
 
भगवान श्रीराम के मुख से लता की प्रशंसा सुनकर सीताजी लक्ष्मण से बोलीः
 
"देखो लक्ष्मण भैया ! तुमने ख्याल किया कि नहीं ? देखो, इस लता का ऊपर चढ़ जाना, फूल पत्तों से छा जाना, तन्तुओं का फैल जाना, ये सब वृक्ष के आश्रित हैं, वृक्ष के कारण ही हैं। इस लता की शोभा भी वृक्ष के ही कारण है। अतः मूल में महिमा तो वृक्ष की ही है। आधार तो वृक्ष ही है। वृक्ष के सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है ? कैसे छा सकती है ? अब बोलो लक्ष्मण जी ! तुम्हीं बताओ, महिमा वृक्ष की ही हुई न ? वृक्ष का सहारा पाकर ही लता धन्य हुई न ?"
 
राम जी ने कहाः "क्यों लक्ष्मण ! यह महिमा तो लता की ही हुई न ? लता को पाकर वृक्ष ही धन्य हुआ न ?"
 
लक्ष्मण जी बोलेः "हमें तो एक तीसरी ही बात सूझती है।"
 
सीता जी ने पूछाः "वह क्या है देवर जी ?"
 
लक्ष्मणजी बोलेः "न वृक्ष धन्य है न लता धन्य है। धन्य तो यह लक्ष्मण है जो दोनों की छाया रहता है।"
 
भगवान और उनकी दिव्य आह्लादिनी शक्ति, दोनों ही एक दूसरे की शोभा बढ़ाते हैं। कोई उन दोनों को श्रेष्ठ बताता है, कोई केवल भगवान को श्रेष्ठ बताता है और कोई केवल उनकी आह्लादिनी शक्ति को श्रेष्ठ बताता है। शरणागत भक्त के लिए तो प्रभु और उनकी आह्लादिनी शक्ति दोनों का ही आश्रय श्रेष्ठ है।
 
जब मनुष्य भगवान की शरण हो जाता है, उनके चरणों का सहारा ले लेता है तो वह सम्पूर्ण प्राणियों से, विघ्न-बाधाओं से निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
 
भगवान के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्नेह आदि से भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीव का कल्याण करने वाला ही होता है।
 
केवल एक भगवान की शरण होने का तात्पर्य है – केवल भगवान मेरे हैं, अव वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात है और कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और इतने निष्ठुर, कठोर हैं कि उनके समान दुनियाँ में कोई कठोर ही नहीं, तो भी बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं हो तो भी बड़ी अच्छी बात। शरणागत में इन बातों की कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान जैसे भी हैं, हमारे हैं। भगवान की इन बातों की परवाह न होने से भगवान का ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, गुण, प्रभाव आदि चले जायेंगे ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे तो हमारी असली शरणागति होगी।
 
भगवान के प्रति भक्तों के अलग-अलग भाव होते है। कोई कहता है कि दशरथ जी की गोद में खेलनेवाले जो रामलाला है, वे ही हमारे इष्ट हैं, राजाधिराज रामचन्द्रजी नहीं, छोटा सा रामलाला। कोई भक्त कहता है कि हमारे इष्ट तो लड्डूगोपाल है, नन्द के लाला हैं। वे भक्त अपने रामलाला को, नन्दलाला को संतों से आशीर्वाद दिलाते हैं। तो भगवान को यह बहुत प्यारा लगता है। तात्पर्य है कि भक्तों की दृष्टि भगवान के ऐश्वर्य की तरफ जाती ही नहीं।
 
संत कहते हैं कि अगर भगवान से मिलना हो तो साथ में साथी नहीं होना चाहिए और सामान भी नहीं होना चाहिए। साथी और सामान के बिना भगवान से मिलो। जब साथी, सहारा साथ में है तो तुम क्या मिले भगवान से ? और मन, बुद्धि, विद्या, धन आदि सामान साथ में बँधा रहेगा, तो उसका परदा रहेगा। परदे में मिलन थोड़े ही होता है ! साथ में कोई साथी और सामान न हो तो भगवान से जो मिलन होगा, वह बड़ा विलक्षण और दिव्य होगा।
 
कुछ भी चाहने का भाव न होने से भगवान स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं, मीठे लगते हैं। जिसमें चाह नहीं है, कोई आकांक्षा इच्छा नहीं है वह भगवान का खास घर है। भगवान के साथ सहज स्नेह हो। स्नेह में कुछ मिलावट न हो, कुछ भी चाहना न हो। जहाँ कुछ भी चाहना हो जाय वहाँ प्रेम कैसा ? वहाँ तो आसक्ति, वासना, मोह, ममता ही होते हैं।
 
भगवान एक बार भक्त को खींच लें तो फिर छोड़ें नहीं। भगवान से पहचान न हो तब तक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गई तो फिर मामला खत्म। फिर किसी काम के नहीं रहोगे। तीनों लोकों में निकम्मे हो जाओगे।
 
हाँ, जो किसी काम का नहीं होता, वह सब के लिए सब काम का होता है। परंतु उसको किसी से कोई मतलब नहीं होता।
 
शरणागत भक्त को भजन नहीं करना पड़ता, उसके द्वारा स्वतः स्वाभाविक भजन होता है। भगवान का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा, प्यारा लगता है। जैसे श्वास अपने आप चलता रहता है, श्वास के बिना हम जी नहीं सकते ऐसे ही शरणागत भक्त भजन के बिना नहीं रह सकता।
 
जिसको सब कुछ अर्पित कर दिया उसके विस्मरण में परम व्याकुलता, महान् छटपटाहट होने लगती है। 'नारदभक्ति सूत्र' में आया हैः तद्विस्मरणे परम व्याकुलतेति। ऐसे भक्त से अगर कोई कहे कि आधे क्षण के लिए भगवान को भूल जाओ तो तीनों लोकों का राज्य मिलेगा, तो वह इसे ठुकरा देगा। भागवत में आया हैः
 
'तीनों लोकों के समस्त ऐश्वर्य के लिए भी उन देवदुर्लभ भगवच्चरणकमलों को जो आधे निमेष के लिए भी नहीं त्याग सकते, वे ही श्रेष्ठ भगवदभक्त हैं।'
 
भगवान कहते हैं- 'स्वयं को मुझे अर्पित करने वाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्मा का पद, इन्द्र का पद, सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य, पातालादि लोकों का राज्य, योग की समस्त सिद्धियाँ और मोक्ष को भी नहीं चाहता।'