स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण


सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण

सूर्यग्रहण में सूतक 12 घंटे पहले और चंद्रग्रहण में सूतक 9 घंटे पहले लगता है । सूतक काल में जहाँ देव दर्शन वर्जित माने गये हैं वहीं मन्दिरों के पट भी बन्द कर दिये जाते हैं । इस दिन जलाशयों, नदियों व मन्दिरों में राहू, केतु व सुर्य के मंत्र का जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है और ग्रहों का दुष्प्रभाव भी खत्म हो जाता है ।
       हमारे ऋषि मुनियों ने सुर्यग्रहण लगने के समय भोजन करने के लिये मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में किटाणु बहुलता से फैल जाते हैं । खाद्य वस्तु, जल आदि में सुक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं।  इसलिये ऋषियों ने पात्रों में क़ुश अथवा तुलसी डालने को कहा है, ताकि सब किटाणु कुश में एकत्रित हो जायें और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है, ताकि किटाणु मर जायें। ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिये बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अन्दर ऊष्मा का प्रवाह बढे, भीतर बाहर के किटाणु नष्ट हो जायें, और धूल कर बह जायें।
       ग्रहण के दौरान भोजन न करने के विषय में जीव विज्ञान विषय के प्रोफेसर टारिंस्टन ने पर्याप्त अनुसन्धान करके सिद्ध किया है कि सुर्य चन्द्र ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है ।

भारतीय धर्म विज्ञान वेत्‍ताओं का कहना है कि सूर्य-चन्‍द्र ग्रहण लगने से 10 घंटे पूर्व से ही इसका कुप्रभाव शुरू हो जाता है। अंतरिक्ष प्रदुषण के समय को सूतक काल कहा जाता है। इसलिए सूतक काल और ग्रहण काल के समय में भोजन तथा पेय पदार्थों के सेवन की मनाही की गयी है। चॅंकि ग्रहण से हमारी जीवन शक्ति का ह्रास होता है और तुलसी दल (पत्र) में विद्युत शक्ति व प्राण शक्ति सबसे अधिक होती है, इसलिए सौर मंडलीय ग्रहण काल में ग्रहण प्रदूषण को समाप्‍त करने के लिए भोजन व पेय सामग्री में तुलसी के कुछ पत्‍ते डाल दिए जाते हैं। जिसके प्रभाव से न केवल भोज्‍य पदार्थ बल्कि अन्‍न, आटा आदि भी प्रदूषण से मुक्‍त बने रह सकते हैं।

       पुराणों की मान्‍यता के अनुसार राहू चन्‍द्रमा को तथा केतू सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों छाया की संतान है । चन्‍द्रमा और सूर्य की छाया के साथ साथ चलते हैं । चन्‍द्रग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है, और मन की शक्ति क्षीण होती है । जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि नेत्र तथा पित्‍त की शक्ति कमजोर पड़ती है ।
      
ग्रहण लगने से पूर्व नदी या घर में उपलब्‍ध जल से स्‍नान करके भगवान का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिए । भजन कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें । ग्रहण के दौरान कोई कार्य न करें । ग्रहण के समय में मंत्रों का जप करने से सिध्‍दि प्राप्‍त होती है ।
ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र् त्‍याग करना, केश विन्‍यास करना, रति क्रीडा करना, मंजन करना वर्जित किए गये हैं । कुछ लोग ग्रहण के दौरान भी स्‍नान करते हैं । ग्रहण समाप्‍त हो जाने पर स्‍नान करके ब्राम्‍हण को दान करने का विधान है । कहीं कहीं वस्‍त्र् धोने, बर्तन धोने का भी नियम है । पुराना पानी, अन्‍न नष्‍ट कर नया भोजन पकाया जाता है, और ताजा भरकर पीया जाता है, क्‍योंकि डोम को राहू केतु का स्‍वरूप माना गया है ।

सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्रग्रहण में तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए (1 प्रहर = 3 घंटे) । बूढ़े, बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व खा सकते हैं । ग्रहण के दिन पत्‍ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ना चाहिए । बाल और वस्‍त्र् नहीं निचोड़ने चाहिए एवं दंत धावन नहीं करना चाहिए । ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना मल मूत्र् का त्‍याग करना, मैथून करना और भोजन करना ये सब वर्जित कार्य हैं । ग्रहण के समय मन से सत्‍पात्र् को उद्देश्‍य करके जल में जल डाल देना चाहिए ऐसा करने से देने वाले को उसका फल प्राप्‍त होता है और लेने वाले को उसका दोष भी नहीं लगता है । ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्‍न, जरूरत मंदों को वस्‍त्र् दान देने से अनेक गुना पुण्‍य प्राप्‍त होता है।


चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। भगवान वेदव्यास जी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान,दान आदि) एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। यदि गंगा जल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।


देवी भागवत में आता हैः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन होता है। ग्रहण के अवसर पर पृथ्‍वी को नहीं खोदना चाहिए ।

सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर ( 9 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालकक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए।

ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए।

ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जररूतमंदों को वस्त्र और उनकी आवश्यक वस्तु दान करने से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है।
ग्रहण के समय कोई भी शुभ या नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।
ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए।


गर्भवती स्त्रियों के लिये सावधानी

गर्भवती स्त्री को सूर्य – चन्‍द्रग्रहण नहीं देखना चाहिए, क्‍योकि उसके दुष्‍प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन जाता है । गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है । इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्‍पर्श न करें ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने को मना किया जाता है , और किसी वस्‍त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है । क्‍योंकि ऐसी मान्‍यता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं  या फिर सिल (जुड़) जाते हैं ।

ग्रहण के समय
1 ग्रहण के सोने से रोग पकड़ता है किसी कीमत पर नहीं सोना चाहिए।
2 ग्रहण के समय मूत्र् – त्‍यागने से घर में दरिद्रता आती है ।
3 शौच करने से पेट में क्रीमी रोग पकड़ता है । ये शास्‍त्र् की बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता।
4 ग्रहण के समय संभोग करने से सूअर की योनी मिलती है ।
5 ग्रहण के समय किसी से धोखा या ठगी करने से सर्प की योनि मिलती है ।
6 जीव-जन्‍तु या किसी की हत्‍या करने से नारकीय योनी में भटकना पड़ता है ।
7 ग्रहण के समय भोजन अथवा मालिश किया तो कुष्‍ठ रोगी के शरीर में जाना पड़ेगा।
8 ग्रहण के समय बाथरूम में नहीं जाना पड्रे ऐसा खायें।
9 ग्रहण के दौरान मौन रहोगे, जप और ध्‍यान करोगे तो अनन्‍त गुना फल होगा।
॥ ग्रहण विधि निषेध ॥

 १. सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुध्द बिम्बदेख कर भोजन करना चाहिये । (१ प्रहर = ३ घंटे)
 २.  ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए । बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहियेव दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना, मैथुन करना औरभोजन करना - ये सब कार्य वर्जित  हैं ।
 ३. ग्रहण के समय मन से सत्पात्र को उद्दयेश्य करके जल मे जल डाल देना चाहिए ।  ऐसा करने से देनेवालेको उसका फल प्राप्त होता है और लेनेवाले को उसका दोष भी नहीं लगता।
४. कोइ भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये और नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिये ।
 ५. ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थो मे तिल या कुशा डाली होती है, वे पदार्थ दुषित नहीं होते । जबकि पके हुएअन्न का त्याग करके गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिये ।
 ६. ग्रहण वेध के प्रारंभ मे तिल या कुशा मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति  मे ही करना चाहिये और ग्रहण शुरु होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिये ।
 ७. ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना  पुण्य प्राप्तहोता है ।
 ८. तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किंतु  संतानयुक्त ग्रहस्थको ग्रहणऔर संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिये।
 ९. 'स्कंद पुराण' के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षो का एकत्र किया हुआसब पुण्यनष्ट हो जाता है ।
 १०. 'देवी भागवत' में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये ।


ग्रहण के समय मंत्र् सिध्दि
1.   ग्रहण के समय “ ॐ ह्रीं नमः “ मंत्र का 10 माला जप करें इससे ये मंत्र् सिध्‍द हो जाता है । फिर अगर किसी का स्‍वभाव बिगड़ा हुआ है .... बात नहीं मान रहा है .... इत्‍यादि ..... । तो उसके लिए हम संकल्‍प करके इस मंत्र् का उपयोग कर सकते हैं ।
2.  श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्ध होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणाशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाकसिद्धि प्राप्त कर लेता है।



चमत्कार का रहस्य


संत एकनाथ जी महाराज के पास एक बड़े अदभुत दण्डी संन्यासी आया करते थे। एकनाथ जी उन्हें बहुत प्यार करते थे। वे संन्यासी ये मंत्र जानते थेः

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्चयते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ॐ शांतिः ! शांतिः !! शांतिः !!!

और इसको ठीक से पचा चुके थे। वे पूर्ण का दर्शन करते थे सबमें। कोई भी मिल जाये तो मानसिक प्रणाम कर लेते थे। कभी बाहर से भी दण्डवत् कर लेते थे।
  
एक बार वे दण्डी संन्यासी बाजार से गुजर रहे थे। रास्ते में कोई गधा मरा हुआ पड़ा था। 'अरे, क्या हुआ ? कैसे मर गया ?' – इस प्रकार की कानाफूसी करते हुए लोग इकट्ठे हो गये। दण्डी संन्यासी की नजर भी मरे हुए गधे पर पड़ी। वे आ गये अपने संन्यासीपने में। 'हे चेतन ! तू सर्वव्यापक है। हे परमात्मा ! तू सबमें बस रहा है। - इस भाव में आकर संन्यासी ने उस गधे को दण्डवत् प्रणाम किये। गधा जिंदा हो गया ! अब इस चमत्कार की बात चारों ओर फैल गयी तो लोग दण्डी संन्यासी के दर्शन हेतु पीछे लग गये। दण्डी संन्यासी एकनाथ जी के पास पहुँचे। उनके दिल में एकनाथ जी के लिए बड़ा आदर था। उन्होंने एकनाथ जी को प्रार्थना कीः "....अब लोग मुझे तंग कर रहे हैं।"

एकनाथ जी बोलेः "फिर आपने गधे को जिन्दा क्यों किया ? करामात करके क्यों दिखायी ?"

संन्यासी ने कहाः "मैंने करामात दिखाने का सोचा भी नहीं था। मैंने तो सबमें एक और एक में सब – इस भाव से दण्डवत किया था। मैंने तो बस मंत्र दोहरा लिया कि 'हे सर्वव्यापक चैतन्य परमात्मा ! तुझे प्रणाम है।' मुझे भी पता नहीं कि गधा कैसे जिंदा हो गया !"

जब पता होता है तो कुछ नहीं होता, जब तुम खो जाते हो तभी कुछ होता है। किसी मरे हुए गधे को जिंदा करना, किसी के मृत बेटे को जिंदा करना – यह सब किया नहीं जाता, हो जाता है। जब अनजाने में चैतन्य तत्त्व के साथ एक हो जाते हैं तो वह कार्य फिर परमात्मा करते हैं। इसी प्रकार संन्यासी अपने चैतन्य के साथ एकाकार हो गये तो वह चमत्कार परमात्मा ने कर दिया, संन्यासी ने वह कार्य नहीं किया।

लोग कहते हैं- 'आसाराम बापूजी ने ऐसा-ऐसा चमत्कार कर दिया।' अरे, आसाराम बापू नहीं करते, जब हम इस वैदिक मंत्र के साथ एकाकार हो कर उसके अर्थ में खो जाते है तो परमात्मा हमारा कार्य कर देते हैं और तुमको लगता है कि बापू जी ने किया। यदि कोई व्यक्ति या साधु-संत ऐसा कहे कि यह मैंने किया है तो समझना कि या तो वह देहलोलुप है या अज्ञानी है। सच्चे संत कभी कुछ नहीं करते।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- 'ज्ञानी की दृष्टि उस तत्त्व पर है इसीलिए वे तत्त्व को सार और सत्य समझते हैं। तत्त्व की सत्ता से जो हो रहा है उसे वे खेल समझते हैं।'

हर मनुष्य अपनी-अपनी दृष्टि से जीता है। संन्यासी की दृष्टि ऐसी परिपक्व हो गयी थी कि गधे में चैतन्य आत्मा देखा तो वास्तव में उसके शरीर में चैतन्य आत्मा आ गया और वह जिन्दा हो गया। तुम अपनी दृष्टि को ऐसी ज्ञानमयी होने दो तो फिर सारा जगत तुम्हारे लिए आत्ममय हो जायेगा।

किसी का बेड़ा पार करना हो तो.......


हजारो-हजारों के जीवन में मैंने देखा कि जिन्होंने संतों का कुप्रचार किया, उन्हें सताया या संत के दैवी कार्य में बाधा डाली, उनको फिर खूब-खूब दुःख सहना पड़ा, मुसीबतें झेलनी पड़ीं। जो संत के दैवी कार्य में लगे उनको खूब सहयोग मिला और उन्होंने बिगड़ी बाजियाँ जीत लीं। उनके बुझे दीये जल गये, सूखे बाग लहराने लगे। ऐसे तो हजारों-लाखों लोग होंगे।
'गुरुवाणी' में जो आया है, बिल्कुल सच्ची बात हैः
संत का निंदकु महा हतिआरा।।
संत का निंदकु परमेसुरि मारा।।
संत का दोखी बिगड़ रूप हो जाइ।।
संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ।
संत के दोखी की पुजै न आसा।
संत के दोखी उठी चलै निरासा।।
संत के दोखी कउ अबरू न राखन हारू।
नानक संत भावै ता लए उवारि।
अगर वह सुधर जाता है और संत की शरण आता है तो फिर संत उसका अपनी कृपा से उद्धार भी कर देते हैं।
किसी का सत्यानाश करना हो तो उसे संत की निंदा सुना दो, अपने-आप सत्यानाश हो जायेगा और किसी का बेड़ा पार करना हो तो संत के सत्संग में तथा संत के दैवी कार्य में लगा दो, अपने आप उसका भविष्य उज्जवल हो जायेगा।
यह बात रामायणकार की दृष्टि से भी मिलती हैः
जहाँ सुमति तहँ संपत्ति नाना।
आप भगवन्नाम-सुमिरन करते हो, दुष्ट प्रवृत्ति से बचते हो तो आपकी मति सुमति हो जाती है, अनेक प्रकार की दैवी सम्पदा आपकी सुरक्षा करती है। आपके पास वालों को भी फायदा हो जाता है। इस प्रकार जहाँ सुमति है वहाँ उस परमात्मदेव की सम्पदा रक्षा करती है।
जहाँ कुमति तहँ बिपत्ति निदाना।।
जो कुकर्म करते हैं, दूसरों की श्रद्धा तोड़ते हैं अथवा और कुछ गहरा कुकर्म करते हैं उन्हें महादुःख भोगना पड़ता है और यह जरूरी नहीं है कि किसी ने आज श्रद्धा तोड़ी तो उसको आज ही फल मिले। आज मिले, महीने के बाद मिले, दस साल के बाद मिले... अरे ! कर्म के विधान में तो ऐसा है कि 50 साल के बाद  भी फल मिल सकता है या बाद के किसी जन्म में भी मिल सकता है।श्रद्धा से प्रेमरस बढ़ता है, श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। कोई हमारा हाथ तोड़ दे तो इतना पापी नहीं है, किसी ने हमारा पैर तोड़ दिया तो वह इतना पापी नहीं है, किसी ने हमारा सिर फोड़ दिया तो वह इतना पापी नहीं है जितना वह पापी है जो हमारी श्रद्धा को तोड़ता है।
कबीरा निंदक निंदक न मिलो पापी मिलो हजार।
एक निंदक के माथे पर लाख पापिन को भार।।
जो भगवान की, हमारी साधना की अथवा गुरु की निंदा करके हमारी श्रद्धा तोड़ता है वह भयंकर पातकी माना जाता है। उसकी बातों में नहीं आना चाहिए।
रविदासजी, दादू दीनदयालजी आदि संतों के लिए अफवाहें और कहानियाँ बनाकर निंदा करने वाले लोग थे। स्वामी रामसुखदासजी के लिए निंदा करने वाले लोग थे। 60 साल की उम्र में उस महासंत के बारे में कई प्रकार के हथकंडे अपनाकर ऐसा कुप्रचार किया गया, जिसको झेलने में हमारी वाणी अपवित्र होगी और सुनने से आपके कान अपवित्र होंगे। ऐसी गंदी-गंदी बातों का प्रचार किया कि उस महान संत को अन्न और जल छोड़ देना पड़ा।
निंदा करके लोगों की श्रद्धा तोड़नेवाले लोगों को तो जब कष्ट होगा तब होगा लेकिन जिसकी श्रद्धा टूटी उसका तो सर्वनाश हुआ। बेचारे की शांति गयी, प्रेमरस गया, सत्य का प्रकाश गया। गुरु से नाता जुड़ा और फिर पापी ने तोड़ दिया।
आजकल हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने का षडयंत्र हिन्दुस्तान में चल रहा है। हम क्यों अपने धर्म पर से श्रद्धा टूटने देंगे? जिस धर्म में भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुए, श्रीराम अवतरित हुए, शिवजी प्रगट हुए, जिस धर्म में मीराबाई, संत कबीरजी, गुरु नानकजी जैसे महापुरुष प्रकट होते रहे, जिस धर्म में गंगाजी को प्रकट करने वाले राजा भगीरथ हुए ऐसा धर्म हम क्यों छोड़ेंगे?
गुरु तेगबहादुर बोलिया।
सुनो सिखो बड़भागियाँ।।
धड़ दीजिये धर्म न छोड़िये।।

सिर दीज सदगुरु मिले
तो भी सस्ता जान।

हँसते-खेलते मुक्तिमार्ग की यात्रा


कामी का साध्य कामिनी होता है, मोही का साध्य परिवार होता है, लोभी का साध्य धन होता है लेकिन साधक का साध्य तो परमात्मा होते हैं। जीवभाव की जंजीरों में जकड़ा साधक जब संसार की असारता को कुछ-कुछ जानने लगता है तो उसके हृदय में विशुद्ध आत्मिक सुख की प्यास जगती है। उसे पाने के लिए वह भिन्न-भिन्न शास्त्रों व अनेक साधनाओं का सहारा लेता है परंतु जब उसे यह अनुभव होता है कि उसका भीतरी खालीपन किसी प्रकार दूर नहीं हो रहा है तो वह अपने बल का अभिमान छोड़कर सर्वव्यापक सत्ता परमात्मा को सहाय के लिए पुकारता है। तब उसके साध्य परमात्मा ब्रह्मज्ञानी सदगुरू के रूप में अवतरित होकर साकार रूप में अठखेलियाँ करते हैं।

इसी श्रृंखला में वर्तमान में ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु परम पूजनीय बापू जी साधक-भक्तों को दर्शन, सत्संग, ध्यान तथा कुंडलिनी योग व नादानुसंधान योग आदि यौगिक कुंजियाँ द्वारा हँसते, खेलते, खाते, पहनते सहज में ही मुक्तिमार्ग की यात्रा करा रहे हैं। 'गुरुग्रंथ साहिब' में आता हैः

नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी हौवै जुगति।
हसंदिआ खेलंदिआ पैनंदिआ खावंदिआ विचे हौवे मुकति।।

पूज्य श्री कहते हैं- "हे साधक ! ईश्वर न दूर है न दुर्लभ। आज दृढ़ संकल्प कर कि 'मैं परमात्मा का साक्षात्कार करके ही रहूँगा।' तू केवल एक कदम उठा, नौ सौ निन्यानवे कदम वह परमात्मा उठाने को तैयार है। कातरभाव से प्रार्थना करते-करते खो जा, जिसका है उसी का हो जा !"

जिज्ञासु अपनी जिज्ञासापूर्ति के लिए शास्त्र पढ़ते हैं लेकिन उनके गूढ़ रहस्य को न समझ पाने के कारण उनसे रसमय जीवन जीने की कला नहीं प्राप्त कर पाते। यह तो तभी सम्भव है जब शास्त्रों की उक्ति ( 'वासुदेवः सर्वम् आदि) की अंतर में अनुभूति किये हुए कोई 'सुदुर्लभ' सत्पुरुष सुलभ हो जायें।

आत्मरस का पान कराने वाले पूज्य श्री से जो सौभाग्यशाली भक्त मंत्रदीक्षा लेते हैं व ध्यानयोग शिविरों में आते हैं, उन्हें आपकी अहैतुकी की करुणा-कृपा से चित्शक्ति-उत्थान के दिव्य अनुभव होते हैं, जिससे चिंता-तनाव, हताशा-निराशा आदि पलायन कर जाते हैं और जीवन की उलझी गुत्थियाँ सुलझने लगती हैं। उनका काम राम में बदलने लगता है, ध्यान स्वाभाविक लगने लगता है और मन अंतरात्मा में आराम पाने लगता है। लोगों को बारह-बारह साल तपस्याएँ करने के बाद भी जो सच्चा सुख, भगवदीय शांति नहीं मिलती, वह बारह-दिनों में ही उन्हें महसूस होने लगती है। कृपासिन्धु बापू जी के चरणों में बैठकर सत्संग-श्रवण करने मात्र से साधना में उन्नत होने की कुंजियाँ मिल जाती हैं और शास्त्रों के रहस्य हृदय में प्रकट होने लगते हैं।

साधकों के लिए आपका संदेश हैः "अपने देवत्व में जागो। एक ही शरीर, मन, अंतःकरण को कब तक अपना मानते रहोगे ? अनंत-अनंत अंतःकरण, अनंत-अनंत शरीर जिस सच्चिदानंद में प्रतिबिम्बित हो रहे हैं, वह शिवस्वरूप तुम हो। फूलों में सुगंध तुम्हीं हो। वृक्षों में रस तुम्हीं हो। पक्षियों में गीत तुम्हीं हो। सूर्य और चाँद में चमक तुम्हारी है। अपने 'सर्वोऽहम्' स्वरूप को पहचानकर खुली आँख समाधिस्थ हो जाओ। देर न करो, काल कराल सिर पर है।"

भीष्म पंचक व्रत ( 06 से 10 नवंबर 2011 तक )



महाभारत युद्ध के बाद जब पांण्डवों की जीत हो गयी तब श्री कृष्ण भगवान पांण्डवों को भीष्म पितामह के पास ले गये और उनसे अनुरोध किया कि आप पांण्डवों को अमृत स्वरूप ज्ञान प्रदान करें. भीष्म भी उन दिनों शर सैय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा कर रहे थे. कृष्ण के अनुरोध पर परम वीर और परम ज्ञानी भीष्म ने कृष्ण सहित पाण्डवों को  राज धर्म, वर्ण धर्म एवं मोक्ष धर्म का ज्ञान दिया. भीष्म द्वारा ज्ञान देने का क्रम कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक पांच दिनों तक चलता रहा. भीष्म ने जब पूरा ज्ञान दे दिया तब श्री कृष्ण ने कहा कि आपने जो पांच दिनों में ज्ञान दिया है यह पांच दिन आज से अति मंगलकारी हो गया है. इन पांच दिनों को भविष्य में भीष्म पंचक व्रत के नाम से जाना जाएगा. यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यदायी होगा |


भीष्मजी को अर्ध्य देने से पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है ..... जिसको स्वप्नदोष या ब्रह्मचर्य सम्बन्धी गन्दी आदतें या तकलीफें हैं, वह इन पांच दिनों में भीष्मजी को अर्ध्य देने से ब्रह्मचर्य में सुदृढ़ बनता है | हम सभी साधकों को इन पांच दिनों में भीष्मजी को अर्ध्य जरुर देना चाहिए और ब्रह्मचर्य रक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए | 


सूर्योदय से पूर्व उठना और पवित्र नदियों का स्मरण करते हुए संभव हो तो तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए | स्नान के बाद निम्न प्रार्थना करते हुए चन्दन  और तिल मिश्रित जल से भीष्मजी को अर्ध्य देना चाहिए : 
"गंगाजी के सुपुत्र, आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करनेवाले पितामह भीष्म को यह अर्ध्य अर्पण है, हमें ब्रह्मचर्य में सहायता करना"


भीष्म पंचक व्रत का पूर्ण विवरण  जानने हेतु कृपया आश्रम से प्रकाशित एकादशी महात्म्य नाम की वीडियो सीडी देखें |  

वो कौन सा परम रहस्य है ? जो रामकृष्ण को काली से, नामदेव को विट्ठल से और पार्वती को भगवान शिव से मिला !


गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।
गुरु की कृपा ही शिष्य का परम मंगल कर सकती है, दूसरा कोई भी नहीं कर सकता है यह प्रमाण वचन है। प्रमाण वचन को जो पकड़ता है वह तरता है। जो मन के अनुसार, वासना के अनुसार ही गुरु को देखना चाहता है वह भटक जाता है। 'गुरु को नहीं करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए अथवा हमको ऐसा होना चाहिए, हमको यह मिलना चाहिए..... ऐसी सोच है तो समझो वह वासना अनुसारी है।
'शास्त्रानुसारी' प्रमाण के अनुरूप करेगा। 'वासना अनुसारी' मन के अनुरूप करेगा। नामदान तो ले लेते हैं लेकिन मन के अनुरूप वाले ही लोग अधिक होते हैं। कोई विरला ही होता है प्रमाण से चलने वाला – जो शास्त्र कहते हैं वह सत् जो गुरुजी कहे वह सत्, जो अपनी वासना कहती है वह असत्।
वासना अनुसारी कर्म बंधन है, संसार है, जन्म-मरण का कारण है और शास्त्रानुसारी कर्म उन्नति व ईश्वरप्राप्ति का साधन है। तो पुरुषार्थ क्या करना है? जैसा मन में आये ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिए कि जैसा शास्त्र और गुरु कहते हैं वैसा करना चाहिए? मान्यता अनुसारी कर्म कितने भी कर लो और उनका फल कितना भी दिख जाय लेकिन होगा वह संसारी।
जैसे सूर्य पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है – यह प्रमाणभूत बात है। आँखों को नहीं दिखता है फिर भी मानना पड़ेगा। आकाश में नीलिमा नहीं है तो मानना पड़ेगा नीलिमा नहीं है। जो प्रमाणित बात वह माननी पड़ती है। शास्त्र कहते हैं- गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्। यह प्रमाणित बात है। नानक जी कहते हैं- घर विच आनंद रहा भरपूर, मनमुख स्वाद न पाया। अपने घर में ही ब्रह्म परमात्मा का आनंद है लेकिन जो मन के अनुसार ही करना चाहते हैं, वे उसको नहीं पा सकते। यह प्रमाणित बात है।
हमारे घर में कोई कमी नहीं थी। हमारे परिचय में गुफा की, रहने की जगहों की कमी नहीं थी फिर भी हमको अच्छा न लगे, ऐसा सात साल गुरुजी ने डीसा की झोंपड़पट्टी में हमको रख दिया तो हमने स्वीकार कर लिया। हमारे मन की नहीं चली। हमारी वासना के अनुसार अथवा हमारे कुटुम्बी हमको कहते हैं और हम चले जाते तो हमारी यहा दशा होती है जैसी दूसरे कर्मलेढ़ियों की होती है। कर्मलेढ़ी उसे कहा जाता है जिसके हाथ में मक्खन का पिण्ड आया और सरक गया, अब लस्सी चाट रहा है। करा-कराया सब नष्ट कर रहा हो उसको बोलते हैं कर्मलेढ़ी। अगर हम कर्मलेढ़ी हो जाते तो डीसा और अमदावाद में कितना अंतर है? और हम तो शादीशुदा थे, 7 साल में सातों बार घर जाकर आ सकते थे बिना आज्ञा लिये.... 70 बार जाते तो भी गुरुजी कहाँ रोकते? लेकिन हमने देखा कि अपने मन में या कुटुम्बियों के मन में जो भी आयेगा वैसा करेंगे तो आखिर क्या मिलेगा? ये जन्म मरण से पार नहीं हुए हैं तो उनकी सलाह लेकर हम जन्म-मरण से पार हो जायेंगे? शास्त्र कहता हैः
तन सुखाय पिंजर कियो धरे रैनदिन ध्यान।
तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान।।
शास्त्रानुसारी कर्म किये बना ईश्वर नहीं मिलता तो यूँ सबको मिल जाय ईश्वर ! आस्तिक तो बहुत लोग हैं, श्रद्धालु तो बहुत लोग हैं, फिर उनको अल्लाह, गॉड या ईश्वर क्यों नहीं मिलता! मेरे गुरु जी के आश्रम में ऐसे कई लोग आये। जैसे आई.ए.एस होने के लिए ढाई लाख युवक परीक्षा देते हैं। विभिन्न परीक्षाएँ देते-देते कई छँट जाते हैं, कई पास होते हैं, अंत में उनमें से करीब 1000 ऑफिसरों की पोस्टिंग होती है ऐसा हमने सुना है। ऐसे ही गुरु के द्वार पर कई लोग आते हैं परंतु उनमें से जिनमें ईश्वरप्राप्ति की सच्ची लगन होती है वे गुरु के दैवी कार्यों में, शास्त्रुसारी कर्मों में तत्परता से लगे रहते हैं और परम लक्ष्य को पा लेते हैं।
अपने मन में जैसा आया वैसा निर्णय करके जीव संसार-सागर में बह जाता है। अतः वासना अनुसारी कर्म संसार में भटकाता है और प्रमाण अनुसारी कर्म मोक्ष का हेतु है। अच्छा तो वही लगेगा जो अपने अनुकूल मिल जाय। व्यक्ति अपने विचारों के अनुसार करने लग जाये तो गिरेगा, पतन होगा और गुरु के अनुरूप छलाँग मारी तो उत्थान होगा। अपनी मान्यता के अनुसार एक जन्म नहीं हजार जन्म जीयो, कर करके गिर जाते हैं इसीलिए बोलते हैं शास्त्र के अनुसार कर्म करो।
रामकृष्णदेव ने अपनी मान्यता के अनुसार काली माता को तो प्रकट कर लिया लेकिन काली माता ने कहाः 'ब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण जाओ।'
नामदेवजी ने अपनी मान्यतानुसार भगवान विट्ठल को प्रकट कर लिया लेकिन विट्ठल ने कहाः 'विसोबा खेचर के पास जाओ।' भगवान शिव को पार्वतीजी ने अपनी मान्यता के अनुसार पति के रूप में पा लिया लेकिन शिवजी ने कहाः 'गुरु वामदेव जी की शरण जाओ।' यह क्या रहस्य है?प्रमाणभूत है कि गुरुकृपा ही केवलं.... प्रमाणभूत बात मानने पड़ेगी।
मेरी हो सो जल जाय। तेरी हो सो रह जाय।
हमारी जो अहंता, ममता और वासना है वह जल जाये। गुरुजी ! आपकी जो करूणा और ज्ञान प्रसाद है वही रह जाय। तत्परता से सेवा करते हैं तो आदमी की वासनायें नियंत्रित हो जाती हैं और ईश्वरप्राप्ति की भूख लगती है।
प्रमाणभूत है कि जगत नष्ट हो रहा है। संसार का कितना भी कुछ मिल जाये लेकिन परमात्म-पद को पाये बिना इस जीवात्मा का जन्म-मरण का दुःख जायेगा नहीं।
बिनु रघुबीर पद जिय की जरनी न जाई।
जो प्रमाणभूत बात है उसको पकड़ लेना चाहिए और जीवन सफल बनाना चाहिए।

अमृतवर्षा की रात्रि : शरद पूर्णिमा 11 अक्टूबर 2011


कामदेव ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि "हे वासुदेव ! मैं बड़े-बड़े ऋषियों, मुनियों तपस्वियों और ब्रह्मचारियों को हरा चुका हूँ। मैंने ब्रह्माजी को भी आकर्षित कर दिया। शिवजी की भी समाधि विक्षिप्त कर दी। भगवान नारायण ! अब आपकी बारी है। आपके साथ भी मुझे खिलवाड़ करना है तो हो जाय दो-दो हाथ ?"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः "अच्छा बेटे ! मुझ पर तू अपनी शक्ति का जोर देखना चाहता है ! मेरे साथ युद्ध करना चाहता है !तो बता, मेरे साथ तू एकांत में आयेगा कि मैदान में आयेगा ?"
एकांत में काम की दाल नहीं गली तो भगवान ने कहाः "कोई बात नहीं। अब बता, तुझे किले में युद्ध करना है कि मैदान में? अर्थात् मैं अपनी घर-गृहस्थी में रहूँ, तब तुझे युद्ध करना है कि जब मैं मैदान में होऊँ तब युद्ध करना है ?"
बोलेः महाराज ! जब युद्ध होता है तो मैदान में होता है। किले में क्या करना !
भगवान बोलेः "ठीक है, मैं तुझे मैदान दूँगा। जब चन्द्रमा पूर्ण कलाओं से विकसित हो, शरद पूनम की रात हो, तब तुझे मौका मिलेगा। मैं ललनाएँ बुला लूँगा।"
शरद पूनम की रात आयी और श्रीकृष्ण ने बजायी बंसी। बंसी में श्रीकृष्ण ने 'क्लीं' बीजमंत्र फूँका। क्लीं बीजमंत्र फूँकने की कला तो भगवान श्रीकृष्ण ही जानते हैं। यह बीजमंत्र बड़ा प्रभावशाली होता है।
श्रीकृष्ण हैं तो सबके सार और अधिष्ठान लेकिन जब कुछ करना होता है न, तो राधा जी का सहारा ढूँढते हैं। राधा भगवान की आह्लादिनी शक्ति माया है।
भगवान बोलेः "राधे देवी ! तू आगे-आगे चल। कहीं तुझे ऐसा न लगे कि ये गोपिकाओं में उलझ गये, फँस गये। राधे ! तुम भी साथ में रहो। अब युद्ध करना है। काम बेटे को जरा अपनी विजय का अभिमान हो गया है। तो आज उसके साथ दो दो हाथ होने हैं। चल राधे तू भी।"
भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजायी, क्लीं बीजमंत्र फूँका। 32 राग, 64 रागिनियाँ... शरद पूनम की रात... मंद-मंद पवन बह रहा है। राधा रानी के साथ हजारों सुंदरियों के बीच भगवान बंसी बजा रहे हैं। कामदेव ने अपने सारे दाँव आजमा लिये। सब विफल हो गया।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः
"काम ! आखिर तो तू मेरा बेटा ही है !"
वही काम भगवान श्रीकृष्ण का बेटा प्रद्युम्न होकर आया।
कालों के काल, अधिष्ठानों के अधिष्ठान तथा काम-क्रोध, लोभ मोह सबको सत्ता-स्फूर्ति दने वाले और सबसे न्यारे रहने वाले भगवान श्रीकृष्ण को जो अपनी जितनी विशाल समझ और विशाल दृष्टि से देखता है, उतनी ही उसके जीवन में रस पैदा होता है।
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन के विध्वंसकारी, विकारी हिस्से को शांति, सर्जन और सत्कर्म में बदल के, सत्यस्वरूप का ध्यान् और ज्ञान पाकर परम पद पाने के रास्ते सजग होकर लग जाये तो उसके जीवन में भी भगवान श्रीकृष्ण की नाईं रासलीला होने लगेगी। रासलीला किसको कहते हैं ? नर्तक तो एक हो और नाचने वाली अनेक हों, उसे रासलीला कहते हैं। नर्तक एक परमात्मा है और नाचने वाली वृत्तियाँ बहुत हैं। आपके जीवन में भी रासलीला आ जाय लेकिन श्रीकृष्ण की नाईं नर्तक अपने स्वरूप में, अपनी महिमा में रहे और नाचने वाली नाचते-नाचते नर्तक में खो जायें और नर्तक को खोजने लग जायें और नर्तक उन्हीं के बीच में, उन्हीं के वेश में छुप जाय-यह बड़ा आध्यात्मिक रहस्य है।
ऐसा नहीं है कि दो हाथ-पैरवाले किसी बालक का नाम कृष्ण है। यहाँ कृष्ण अर्थात् कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। जो कर्षित कर दे, आकर्षित कर दे, आह्लादित कर दे, उस परमेश्वर ब्रह्म का नाम 'कृष्ण' है। ऐसा नहीं सोचना कि कोई दो हाथ-पैरवाला नंदबाबा का लाला आयेगा और बंसी बजायेगा तब हमारा कल्याण होगा, ऐसा नहीं है। उसकी तो नित्य बंसी बजती रहती है और नित्य गोपिकाएँ विचरण करती रहती हैं। वही कृष्ण आत्मा है, वृत्तियाँ गोपिकाएँ हैं। वही कृष्ण आत्मा है और जो सुरता है वह राधा है। 'राधा'..... उलटा दो तो 'धारा'। उसको संवित्, फुरना और चित्तकला भी बोलते हैं।
काम आता है तो आप काममय हो जाते हो, क्रोध आता है तो क्रोधमय हो जाते हो, चिंता आती है तो चिंतामय हो जाते हो, खिन्नता आती है तो खिन्नतामय हो जाते हो। नहीं,नहीं। आप चित्त को भगवदमय बनाने में कुशल हो जाइये। जब भी चिंता आये तुरंत भगवदमय। जब भी काम, क्रोध आये तुरंत भगवदमय। यही तो पुरुषार्थ है। पानी का रंग कैसा ? जैसा मिलाओ वैसा। चित्त जिसका चिंतन करता है, जैसा चिंतन करता है, चिदघन चैतन्य की वह लीला वैसा ही प्रतीत कराती है। दुश्मन की दुआ से डर लगता है और सज्जन की गालियाँ भी मीठी लगती हैं। चित्त का ही तो खेल है ! भगवदभाव से प्रतिकूलताएँ भी दुःख नहीं देतीं और विकारी दृष्टि से अनुकूलता भी तबाह कर देती है। विकारी दृष्टि विकार और विषाद में गिरा देती है।
शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है। इस रात को चन्द्रमा की किरणों से अमृत-तत्त्व बरसता है। चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषकशक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है।
आज की रात्रि चन्द्रमा पृथ्वी के बहुत नजदीक होता है और उसकी उज्जवल किरणें पेय एवं खाद्य पदार्थों में पड़ती हैं तो उसे खाने वाला व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता है। उसका शरीर पुष्ट होता है। भगवान ने भी कहा हैः
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।
'रसस्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।' (गीताः15.13)
आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो चन्द्र का मतलब है शीतलता। बाहर कितने भी परेशान करने वाले प्रसंग आयें लेकिन आपके दिल में कोई फरियाद न उठे। आप भीतर से ऐसे पुष्ट हों कि बाहर की छोटी मोटी मुसीबतें आपको परेशान न कर सकें।
शरद पूर्णिमा की शीतल रात्रि में (9 से 12 बजे के बीच) छत पर चन्द्रमा की किरणों में महीन कपड़े से ढँककर रखी हुई दूध-पोहे अथवा दूध-चावल की खीर अवश्य खानी चाहिए। देर रात होने के कारण कम खायें, भरपेट न खायें, सावधानी बरतें। रात को फ्रिज में रखें या ठंडे पानी में ढँक के रखें। सुबह गर्म करके उपयोग कर सकते हैं। ढाई तीन घंटे चन्द्रमा की किरणों से पुष्ट यह खीर पित्तशामक, शीतल, सात्त्विक होने के साथ वर्ष भर प्रसन्नता और आरोग्यता में सहायक सिद्ध होती है। इससे चित्त को शांति मिलती है और साथ ही पित्तजनित समस्त रोगों का प्रकोप भी शांत होता है।
इस रात को हजार काम छोड़कर 15 मिनट चन्द्रमा को एकटक निहारना। एक आध मिनट आँखें पटपटाना। कम से कम 15 मिनट चन्द्रमा की किरणों का फायदा लेना, ज्यादा करो तो हरकत नहीं। इससे 32 प्रकार की पित्त संबंधी बीमारियों में लाभ होगा, शांति होगी। और फिर ऐसा आसन बिछाना जो विद्युत का कुचालक हो, चाहे छत पर चाहे मैदान में। चन्द्रमा की तरफ देखते-देखते अगर मौज पड़े तो आप लेट भी हो सकते हैं। श्वासोच्छवास के साथ भगवन्नाम और शांति को भरते जायें, निःसंकल्प नारायण में विश्रान्ति पायें। ऐसा करते-करते आप विश्रान्ति योग में चले जाना। विश्रांति योग... भगवदयोग.... अंतरंग जप करते हुए अपने चित्त को शांत, मधुमय, आनंदमय, सुखमय बनाते जाना। हृदय से जपना प्रीतिपूर्वक। आपको बहुत लाभ होगा। कितना लाभ होगा, यह माप सकें ऐसा कोई तराजू नहीं है। वह तराजू आज तक बनी नहीं। ब्रह्माजी भी बनायें तो वह तराजू टूट जायेगा।
जिनको नेत्रज्योति बढ़ानी हो वे शरद पूनम की रात को सुई में धागा पिरोने की कोशिश करें। जिनको दमे की बीमारी हो वे नजदीक के किसी आश्रम या समिति से सम्पर्क के साथ लेना। दमा मिटाने वाली बूटी निःशुल्क मिलती है, उसे खीर में डाल देना। जिसको दमा है वह बूटी वाली खीर खाये और घूमे, सोये नहीं, इससे दमे में आराम होता है। दूसरा भी दमा मिटाने का प्रयोग है। अंग्रजी दवाओं से दमा नहीं मिटता लेकिन त्रिफला रसायन 10-10 ग्राम सुबह शाम खाने से एक महीने में दमे का दम निकल जाता है।
इस रात्रि में ध्यान-भजन, सत्संग, कीर्तन, चन्द्रदर्शन आदि शारीरिक व मानसिक आरोग्यता के लिए अत्यन्त लाभदायक है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010