स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

विषयों की कामना उनके उपभोग से कभी शांत नहीं होती ! (Yayati’s experience)


शुक्राचार्य के शाप से राजा ययाति युवावस्था में ही वृद्ध हो गये थे | परन्तु बाद में ययाति के प्रार्थना करने पर शुक्राचार्य ने दयावश उनको यह शक्ति दे दी कि वे चाहें तो अपने पुत्रों से युवावस्था लेकर अपना वार्धक्य उन्हें दे सकते थे | तब ययाति ने अपने पुत्र यदु, तर्वसु, द्रुह्यु और अनु से उनकी जवानी माँगी, मगर वे राजी न हुए | अंत में छोटे पुत्र पुरु ने अपने पिता को अपना यौवन देकर उनका बुढ़ापा ले लिया |

      पुनः युवा होकर ययाति ने फिर से भोग भोगना शुरु किया | वे नन्दनवन में विश्वाची नामक अप्सरा के साथ रमण करने लगे | इस प्रकार एक हजार वर्ष तक  भोग भोगने के बाद भी भोगों से जब वे संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने अपना बचा हुआ यौवन अपने पुत्र पुरु को लौटाते हुए कहा :

                न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति |
                हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ||

पुत्र ! मैंने तुम्हारी जवानी लेकर अपनी रुचि, उत्साह और समय के अनुसार विष्यों का सेवन किया लेकिन विषयों की कामना उनके उपभोग से कभी शांत नहीं होती, अपितु घी की आहुति पड़ने पर अग्नि की भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती  ही  जाती है |

      रत्नों से जड़ी हुई सारी पृथ्वी, संसार का सारा सुवर्ण, पशु और सुन्दर स्त्रियाँ, वे सब एक पुरुष को मिल जायें तो भी वे सबके सब उसके लिये पर्याप्त नहीं होंगे | अतः तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए |

      छोटी बुद्धिवाले लोगों के लिए जिसका त्याग करना अत्यंत कठिन है, जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो एक प्राणान्तक रोग है उस तृष्णा को त्याग देनेवाले पुरुष को ही सुख मिलता है |  (महाभारत : आदिपर्वाणि संभवपर्व : 12)

      ययाति का अनुभव वस्तुतः बड़ा मार्मिक और मनुष्य जाति ले लिये हितकारी है | ययाति आगे कहते हैं :

      पुत्र ! देखो, मेरे एक हजार वर्ष विषयों को भोगने में बीत गये तो भी तृष्णा शांत नहीं होती और आज भी प्रतिदिन उन विषयों के लिये ही तृष्णा पैदा होती है |

                पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः |
                तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते ||

      इसलिए पुत्र ! अब मैं विषयों को छोड़कर ब्रह्माभ्यास में मन लगाऊँगा | निर्द्वन्द्व तथा ममतारहित होकर वन में मृगों के साथ विचरूँगा | हे पुत्र ! तुम्हारा भला हो | तुम पर मैं प्रसन्न हूँ | अब तुम अपनी जवानी पुनः प्राप्त करो और मैं यह राज्य भी तुम्हें ही  अर्पण करता हूँ |

      इस प्रकार अपने पुत्र पुरु को राज्य देकर ययाति ने तपस्या हेतु वनगमन किया | उसी राजा पुरु से पौरव वंश चला | उसी वंश में परीक्षित का पुत्र राजा जन्मेजय पैदा हुआ था |

Cursed by Shukracharya, King Yayati became aged in the very prime of his youth. On being begged for forgiveness, Shukracharya took pity on him and modified his curse so that Yayati could regain his youth if any of his sons consented to exchange his youth with his father’s old age. One by one, Yayati asked each of his sons Yadu, Turvasu, Druhyu and Anu, to take his old age and give his own youth in exchange. But all of them refused. Finally Yayati’s youngest son, Puru, exchanged his youth for his father’s old age. Yayati, gained his youth anew and began to indulge himself in sensual pleasures again. But even after enjoying all these pleasures for one thousand years, he was not satisfied. Then, returning his remaining youth to his son Puru, Yayati said: “Dear Son, with your youth I enjoyed all the pleasures I craved and longed for.
Z OmVw H$m_… H$m_mZm_wn^moJoZ emå`{V & h{dfm H¥$îUdË_}d ^y` Edm{^dY©Vo &&...
“But desires never die. They are never satiated by indulgence. Through indulgence they only flare up, just like the sacrificial fire when ghee is poured into it. If one becomes the sole Lord of the earth with all its jewels, gold, cows and beautiful women in his possession, he will still not consider it enough. Therefore, the thirst for enjoyment itself should be abandoned. This thirst is, however, very difficult to give up for people with a depraved intellect. Desire, that does not diminish even with the waning, life is a veritable fatal disease in man. Only he who abandons all his desires attains real happiness.” (The Mahabharata - Adiparvani Sambhavaparva: 85:12-14)
Yayati’s experience is very poignant and teaches a great lesson to mankind. He continued, ''nyUª  df©ghò§  _o  {df`mgŠVMoVg… &  VWmß`Zw{XZ§  V¥îUm __¡Voîd{^Om`Vo &&... Dear son! I have been indulging in worldly pleasures for the last thousand years, yet my thirst for them only goes on increasing day by day. Therefore, I shall abandon these pleasures and fix my mind on Brahman. Then with a completely detached and tranquil mind I shall pass the rest of my days with the innocent deer in the forest.”
Yayati crowned Puru as the king and retired to the forest to lead the life of an ascetic.
         Those who do not realize the importance and value of preserving this vital essence of life (semen), should remember that they are merely the followers of Yayati, and hence, are only heading towards utter ruin. They must learn a lesson from the experience of Yayati. They should cultivate dynamic will-power, a discriminative intellect, and have pity on their own selves. Forget the past. Make a fresh start in life. It is better late than never. Practice brahmacharya by means of yogÍsanasprÍnÍyÍma, etc., and adopt herbal therapy to maintain good health and regain the lost vitality. Be heroic and brave. ›... ›... ›...


बीजमंत्र से भागे सब रोग ! स्वस्थ रहे दुनिया के लोग !!


भारतीय संस्कृति ने आध्यात्मिक विकास के साथ शारीरिक स्वास्थ्य को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
आजकल सुविधाओं से संपन्न मनुष्य कई प्रकार की चिकित्सा-पद्धतियों को आजमाने पर भी शारीरिक रोगों व मानसिक समस्याओं से मुक्त नहीं हो सका। एलोपैथी की जहरीली दवाइयों से ऊबकर अब पाश्चात्य जगत के लोग Alternative Medicine के नाम पर प्रार्थना, मंत्र, योगासन, प्राणायाम आदि से हार्ट अटेक और कैंसर जैसी असाध्य व्याधियों से मुक्त होने में सफल हो रहे हैं। अमेरिका में एलोपेथी के विशेषज्ञ डॉ. हर्बट बेन्सन और डॉ. दीपक चोपड़ा ने एलोपेथी को छोड़कर निर्दोष चिकित्सा-पद्धति की ओर विदेशियों का ध्यान आकर्षित किया है जिसका मूल आधार भारतीय मंत्रविज्ञान है। ऐसे वक्त हम लोग एलोपेथी की दवाइयों की शरण लेते हैं जो प्रायः मरे पशुओं के यकृत (कलेजा), मीट एक्सट्रेक्ट, मांस, मछली के तेल जैसे अपवित्र पदार्थों से बनायी जाती हैं। आयुर्वैदिक औषधियाँ, होमियोपैथी की दवाइयाँ और अन्य चिकित्सा-पद्धतियाँ भी मंत्रविज्ञान जितनी निर्दोष नहीं है।
हर रोग के मूल में पाँच तत्त्व यानी पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की ही विकृति होती है। मंत्रों के द्वारा इन विकृतियों को आसानी से दूर करके रोग मिटा सकते हैं
डॉ. हर्बट बेन्सन ने बरसों के शोध के बाद कहा हैः Om a day, keeps doctors away. अतः ॐ का जप करो और डॉक्टर को दूर ही रखो।
विभिन्न बीजमंत्रों की विशद जानकारी प्राप्त करके हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर का लाभ उठाना चाहिए।
पृथ्वी तत्त्व
इस तत्त्व का स्थान मूलाधार चक्र में है। शरीर में पीलिया, कमलवायु आदि रोग इसी तत्त्व की विकृति से होते हैं। भय आदि मानसिक विकारों में इसकी प्रधानता होती है।
विधिः पृथ्वी तत्त्व के विकारों को शांत करने के लिए 'लं' बीजमंत्र का उच्चारण करते हुए किसी पीले रंग की चौकोर वस्तु का ध्यान करें।
लाभः इससे थकान मिटती है। शरीर में हल्कापन आता है। उपरोक्त रोग, पीलिया आदि शारीरिक व्याधि एवं भय, शोक, चिन्ता आदि मानसिक विकार ठीक होते हैं।
जल तत्त्व
स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्त्व का स्थान है। कटु, अम्ल, तिक्त, मधुर आदि सभी रसों का स्वाद इसी तत्त्व के कारण आता है। असहनशीलता, मोहादि विकार इसी तत्त्व की विकृति से होते हैं।
विधिः 'वं' बीजमंत्र का उच्चारण करने से भूख-प्यास मिटती है व सहनशक्ति उत्पन्न होती है। कुछ दिन यह अभ्यास करने से जल में डूबने का भय भी समाप्त हो जाता है। कई बार 'झूठी' नामक रोग हो जाता है जिसके कारण पेट भरा रहने पर भी भूख सताती रहती है। ऐसा होने पर भी यह प्रयोग लाभदायक हैं। साधक यह प्रयोग करे जिससे कि साधना काल में भूख-प्यास साधना से विचलित न करे।

बिना विवेक और वैराग्य के तुम्हें ब्रह्माजी का उपदेश भी काम न आयेगा !


  
    जो मौत की यात्रा के साक्षी बन जाते हैं उनके लिये यात्रा यात्रा रह जाती हैसाक्षी उससे परे हो जाता है ।

   मौत के बाद अपने सब पराये हो गये । तुम्हारा शरीर भी पराया हो गया । लेकिन तुम्हारी आत्मा आज तक परायी नहीं हुई ।

    हजारों मित्रों ने तुमको छोड़ दियालाखों कुटुम्बियों ने तुमको छोड़ दियाकरोड़ों-करोड़ों शरीरों ने तुमको छोड़ दियाअरबों-अरबों कर्मों ने तुमको छोड़ दिया लेकिन तुम्हारा आत्मदेव तुमको कभी नहीं छोड़ता ।

    शरीर की स्मशानयात्रा हो गयी लेकिन तुम उससे अलग साक्षी चैतन्य हो । तुमने अब जान लिया कि:मैं इस शरीर की अंतिम यात्रा के बाद भी बचता हूँअर्थी के बाद भी बचता हूँजन्म से पहले भी बचता हूँ और मौत के बाद भी बचता हूँ । मैं चिदाकाश … ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ । मैंने छोड़ दिया मोह ममता को । तोड़ दिया सब प्रपंच ।

    इस अभ्यास को बढ़ाते रहना । शरीर की अहंता और ममताजो आखिरी विघ्न हैउसे इस प्रकार तोड़ते रहना । मौका मिले तो स्मशान में जाना । दिखाना अपने को वह दृश्य ।

    मैं भी जब घर में थातब स्मशान में जाया करता था । कभी-कभी दिखाता था अपने मन को किदेख ! तेरी हालत भी ऐसी होगी ।

    स्मशान में विवेक और वैराग्य होता है । बिना विवेक और वैराग्य के तुम्हें ब्रह्माजी का उपदेश भी काम न आयेगा । बिना विवेक और वैराग्य के तुम्हें साक्षात्कारी पूर्ण सदगुरु मिल जायँ फिर भी तुम्हें इतनी गति न करवा पायेंगे । तुम्हारा विवेक और वैराग्य न जगा हो तो गुरु भी क्या करें ?

    विवेक और वैराग्य जगाने के लिए कभी कभी स्मशान में जाते रहना । कभी घर में बैठे ही मन को स्मशान की यात्रा करवा लेना ।

मरो मरो सब कोई कहे मरना न जाने कोय ।
एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होय ॥

    ज्ञान की ज्योति जगने दो । इस शरीर की ममता को टूटने दो । शरीर की ममता टूटेगी तो अन्य नाते रिश्ते सब भीतर से ढीले हो जायेंगे । अहंता ममता टूटने पर तुम्हारा व्यवहार प्रभु का व्यवहार हो जाएगा । तुम्हारा बोलना प्रभु का बोलना हो जाएगा । तुम्हारा देखना प्रभु का देखना हो जाएगा । तुम्हारा जीना प्रभु का जीना हो जाएगा ।

रामायण का तात्विक अर्थ



पाप का फल ही दुख नहीं है । पुण्यमिश्रित फल भी विघ्न है । ऐसा कौन सा इंसान है जिसको  संसार में विघ्न नहीं है।  तो भगवान महा पापी होंगे इसलिए उनको दुख आया होगा,  14 साल वन में गए।  यदि पाप का फल ही दुख होता तो राज्यगद्दी की तैयारिया हो रही है और तुरिया बज रही है नगाड़े गुनगुना रहे है और राज्याभिषेक की जगह पर अब कैकेयी का मंथरा  की चाबी  चली और रामजी को बोलते है वनवास । एक तरफ तो राज्याभिषेक की तैयारी और दूसरी तरफ वनवास का सुनकर जिनके चेहरे पर जरा करचली नहीं पड़ती,  जिनके चित्त में जरा क्षोभ नहीं होता, राज्याभिषेक को सुनकर जिनके चित्त में हर्ष नहीं होता और वनवास सुनकर जिनके चित्त में शोक नहीं होता,  ऐसे जो अपने आप मे  ठहरे है वे ही तो रामस्वरूप है ।  ऐसे राम को हजार हजार प्रणाम । ॐ...  ॐ....  ॐ...  ॐ...  ॐ...  । दस इन्द्रियों के बीच रमण  करने वाला दशरथ (जीव) कहता है कि अब इस हृदय गादी पर जीव का राज्य नहीं, राम का राज्य होना चाहिए और गुरु बोलते है कि हाँ ! करो । गुरु जब राम राज्य का हुंकारा भरता है तो दशरथ को खुशी होती है लेकिन राम राज्य होने के पहले दशरथ, कैकेयी की मुलाक़ात मे आ जाता है । दशरथ की तीन  रानिया बताई, कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी । सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण । जब  सत्वगुण में से,  रजो गुण मे से हटकर दशरथ (जीव),  तमोगुण में, जाता है, रजोगुण में, तमोगुण में, फँसता है, तमस मिश्रित रजस में फँसता है, कैकेयी अर्थात कीर्ति में, वासना में फँसता है तो रामराज्य होने के बदले में  राम वनवास हो जाता है।  राम का राज्य नहीं,  राम वनवास ! ओर सब है राम ही जा रहे है । फिर रामायण के आध्यात्मिक कथा का अर्थ लगाने वाले महापुरुष लोग, आध्यात्मिक रामायण का अर्थ बताने वाले संत लोग कहते है, दशरथ छटपटाता है । राम वनवास होता है तो दशरथ भी चैन से नहीं जी सकता है और समाज में देखो !  कोई दशरथ चैन से नहीं है, सब बेचैन है । ज्यादा धन वाला-कम धन वाला, ज्यादा पढ़ा- कम पढ़ा,  अधिक मित्रों वाला- कम मित्रोंवाला, मोटा अथवा पतला, नेता अथवा जनता,  देखो !  सब बेचैन है ।  क्यों ? कि  राम वनवास है । कथा का दूसरा पॉइंट यह बता रहा है कि रामजी के साथ सीताजी थी । लक्ष्मण जी थे । राम माने ब्रह्म, सीता माने वृत्ति । राधा माने धारा, श्याम माने ब्रह्म । राधेश्याम....  सीताराम..... ।  सीता माने वृत्ति, राम के करीब है लेकिन सीता की नजर स्वर्ण के मृग पर जाती है और राम को बोलती है ला दो । जब सोने के मृग पर तुम्हारी सीता जाती है तो उसे राम का वियोग हो जाता है । सोने के मृग पर, धन दौलत पर जब हमारा चित्त जाता है तो अंदर आत्माराम से हम विमुख हो जाते है, फिर लंका मिलती है, स्वर्ण मिलता है, लेकिन शांति नहीं मिलती । उसी वृत्ति को यदि राम की मुलाक़ात करानी हो तो बीच मे हनुमानजी चाहिए । सौ  वर्ष आयुष वाला जीवन, उस जीवन को परमात्मा के लिए छलांग मार दे,  उस जीवन के भोग विलास से छ्लांग मार दे ।  जामवंत को बुलाया, उसको बुलाया, उसको बुलाया । कोई बोलता है एक  योजन कूदूंगा, कोई बोलता है दो योजन । हनुमानजी सौ योजन समुद्र कूद गए । माप करेंगे तो भारत के किनारे से लंका सौ योजन नहीं है लेकिन शास्त्र की कुछ गूढ़ बाते है । जीवन जो सौ वर्ष वाला है उस जीवन के रहस्य को पाने के लिए, छलांग मारने का अभ्यास और वैराग्य हो । हनुमानजी को अभ्यास और वैराग्य का प्रतीक कहा , जो  सीताजी को रामजी से मिला देगा । रामजी उत्तर भारत मे हुए और रावण दक्षिण  की तरफ । उत्तर ऊँचाई है और दक्षिण नीचाई है । ऐसे ही हमारी वृत्तियाँ शरीर के नीचे हिस्से मे रहती है । और जब हम काम से घिर  जाते  है तो हमारी आँख की पुतली नीचे आ जाती है । जब हम क्रोध से भर जाते है तो हमारी सीता नीचे आ जाती है और सीता जब रावण के करीब  होती है तो बेचैन होती है, ज्यादा समय  रावण के वहाँ ठहर नहीं सकती । काम के करीब हमारी सीता ज्यादा समय ठहर नहीं सकती । चित्त मे काम आ जाता है, बेचैनी आ जाती है और लेकिन  चित्त में राम आ जाता है तो आनंद आनंद आ जाता है । रावण की अशोक वाटिका मे सीताजी नजर कैद है लेकिन सीता में यदि निष्ठा है तो रावण अपना मनमाना कुछ कर नहीं सकता है। ऐसे ही हमारी वृत्ति मे यदि दृढ़ता है राम के प्रति पूर्ण आदर है तो काम हमे नचा नहीं सकता । उस दृढ़ता के लिए साधन और भजन है।  चित्तवृति को दृढ़ बनाने के लिए, सीता के संकल्प को मजबूत बनाने के लिए तप चाहिए ,जप चाहिए, स्वाध्याय चाहिए, सुमिरन चाहिए ।  जब कामनाएँ सताने लगे, नरसिंह भगवान ने जैसे कामना के पुतले को फाड़ दिया ऐसे ही काम को चीर दे, नरसिंह अवतार का चिंतन करने से फायदा होता है । इस कथा की आध्यात्मिक शैली को जानने वाले संतों का ये भी मानना है कि रावण मर नहीं रहा था और विभीषण से पूछा कि कैसे मरेगा ? बोले डुंटी  (नाभि ) में आपका बाण जब तक नहीं लगेगा तब तक वो रावण नहीं मरेगा अर्थात कामनाए नाभि केंद्र मे रहती है । योगी जब कुण्डलिनि योग करते है तो मूलाधार चक्र मे जंपिंग होता है और फिर स्वाधीस्थान चक्र मे खिंचाव होता है, पेट अंदर आता है बाहर जाता है, साधक लोग, तुम लोगो को भी अनुभव है । वो जन्म जन्मांतरों को कामनाए है, वासनाए है, उनको धकेलने के लिए हमारी चित्तवृत्ति हमारी जो सीता माता है, उस काम को धकेलने के लिए डांटती फटकरती है और जब डांट फटकार चालू होती है तो साधक के  शरीर मे क्रियाए होने लगती है। देखो समन्वय हो रहा है कथा का और कुण्डलिनि योग का । कभी कभी तो रावण का प्रभाव दिखता है और कभी कभी सीताजी का प्रभाव दिखता है । दोनों की लड़ाई चल रही है है । कभी कभी तो साधक के जीवन मे कामनाओं का प्रभाव दिखता है और कभी कभी तो सद्विचारों का प्रभाव दिखता है। अयोध्या को कहा कि नौ द्वार थे  । ऐसे ही तुम्हारा शरीर रूपी अयोध्या है, इसमे भी नौ द्वार है और नौ द्वार में जीने वाला ये जीव जो दशरथ है, राम को वनवास कर दिया कैकेयी के कारण, छटपटा के प्राण त्याग कर देता है । राम राम कही राम  हाय राम .... तव विरह में तन तजी राज=हू गयो सुरधाम । जब सीताजी को राम के करीब लाना है तो बंदर भी साथ देते है । रीछ भी साथ देते है । और तो क्या भी खिचकुलिया भी साथ देने लगी कण कण उठा कर रेती का और समुद्र मे डालने लगी तुम यदि रामजी और सीता की मुलाक़ात के रास्ते चलते हो, तुम्हारी वृत्ति को परमात्मा की ओर लगाते हो तो पृकृति और वातावरण तुम्हें अनुकूलता भी देता है, सहयोग भी देता है और तुम  यदि भोग कि तरफ होते हो तो वातावरण तुम्हें नोच भी लेता है । अयोध्या सुनी सुनी थी तब तक, जब तक राम नहीं आए जब राम आ रहे है, ऐसे खबर सुनी अयोध्या वासियो ने तो नगर को सजाया और नगरवासियों ने साफ सफाई की । राम आने को है, राम आने को होते है तो साफ सफाई पहले हो जाती है ऐसे ही तुम्हारा चित्त रूपी नगर अथवा देह रूपी नगर, जब परमात्म साक्षात्कार होता हो तो कल्मष तुम्हारे पहले कट जाते है। तुम्हारे पाप तुम्हारा मल, विक्षेप हट जाता है। तुम स्वच्छ पवित्र हो जाते हो  और राम जब नगर मे प्रवेश करते है वो दिन दीवाली का दिन माना जाता है। लौकिक दीवाली व्यापारी पूजते है लेकिन साधक की दिवाली तब है जब हृदया मे छुपे हुए राम जो है न,  काम के करीब गए है सीता को छुड़ाने के लिए,  वो राम जब अपने सिंहासन पर आ जाए और अपने स्वरूप मे जाग्रत हो जाए उस दिन साधक की दिवाली। बड़ा दिन तो वह है कि बड़े मे बड़ा जब परमात्वतत्व का ज्ञान हो  उससे बड़ा दिन कोई नहीं । लब पर किसी का नाम लूँ तो तेरा नाम आए । ॐ .... ॐ  

 इस सत्संग को सुनने के लिए कृपया यहाँ जाएँ : 

संयम की शक्ति : पांच सौ अप्सरा और आयुष्मान नन्द ....


बुद्ध के मौसेरे भाई आयुष्यमान नंद ने बुद्ध से संन्यास दीक्षा ग्रहण करने के बाद प्रव्रज्या लेने की ठान ली। जब वह घर छोड़कर जाने लगा तो अपनी पत्नी से कहाः "मैं अपने भोगी जीवन का त्याग करके चिंता और द्वेष, मोह और ममता को सदा के लिए छोड़कर प्रव्रज्या लेने जा रहा हूँ।"
आयुष्यमान नंद को इस प्रकार वैराग्यवान देखकर पत्नी ने उसे विदाई देते समय कहाः "जाते हो तो भले जाओ अपने जीवन का उद्धार करने। प्रव्रज्या ले लो। कोई बात नहीं। लेकिन कर्मभाव से इस कर्मपतिता को कभी-कभी जरा याद तो कर लेना।"
पत्नी ने इतना ही कह दियाः 'कर्मपतिता को कभी-कभी जरा याद कर लेना।' बस यही शब्द। प्रव्रज्या लेने के बाद ये शब्द आयुष्यमान नंद के मन में कभी-कभी गूँजते थे। जब तक एक भी बात मन में गूँजती हो तब तक चित्त की विश्रांति का मार्ग नहीं मिल सकता है। अतः आयुष्यमान ने अपनी पत्नी के अंतिम शब्द को भूलने का बहुत प्रयास किया, अनेक उपाय किया, संयम साधा। लेकिन मन कहाँ मानता है ? पत्नी के वही शब्द अभी भी मन में गूँज रहे हैं- 'कर्मपतिता को कभी-कभी जरा याद कर लेना !'
उसके सारे उपाय व्यर्थ हो गये। अंततः उसने अपने एक गुरुभाई भिक्षुक को कह दियाः "मुझे घर जाना होगा। मैं इस संन्यस्त जीवन का परित्याग कर गृहस्थी जीवन जिऊँगा।" उस बुद्धिमान गुरुभाई ने, सत्शिष्य ने बुद्ध को कहाः "आयुष्यमान नंद ऊँचाई का रास्ता छोड़कर पतित प्रवाह की तरफ जा रहा है, सरकने वाले संसार-सुख की ओर जा रहा है जिसने हजारों-हजारों जन्मों तक भोग भोगे थे। भन्ते ! उसे बचाने की करूणा हो।"
करूणावान हृदय ने स्वीकृति दी। बुद्ध ने आयुष्यमान नंद को बुलाकर पूछाः "तुम घर जाना चाहते हो ? क्या करना है ?"
आयुष्यमान नंदः "प्रव्रज्या करते समय मेरी पत्नी ने विदाई तो दी लेकिन जाते-जाते उसने कहा किः "कर्मपतिता को कभी-कभी जरा याद कर लेना।" ये करूणापूर्वक शब्द यदा-कदा मेरे कानों में गूँजते रहते हैं। भन्ते ! मुझे उसकी याद आती है। याद उसकी और वेश भिक्षुक का ! मुझे अच्छा नहीं लगता है। घर में रहकर भजन करूँगा।"
बुद्ध ने कहाः "अगर घर में रहकर कोई भजन करके सफल हो जाता तो कई लोग ऊँचे अनुभव के धनी होते। कोई-कोई अवतारी पुरुष घर में रहते हुए दिखते हैं लेकिन वे घर में नहीं, ईश्वर में रहते हैं। ऐसा कोई महापुरुष ही संसार में रहते हुए संसारी वातावरण से अप्रभावित रह सकता है। बाकी साधक को तो साधना के लिए विषय-विकारों में गिराने वाला वातावरण नहीं बल्कि विषय विकारों से बचाने वाला साधु-संतों का संग, एकांत एवं ध्यान-भजन का वातावरण ही चाहिए।"
आयुष्यामान नंद ने खुले हृदय से कहाः "मैं प्रव्रज्या के नियम नहीं निभा सकता। मुझे उसकी याद आती है।"
"त्यागकर आये विषयभोग, पत्नी और घर, फिर उधर जाते हो ? तुम वमन किया हुआ विषय अब चाटने हेतु जाना चाहते हो ?" कैसी चोट मार दी !
आयुष्यमानः "भन्ते ! मैं दगाखोर जीवन जीना नहीं चाहता। उसकी याद आती है।"
बुद्धः "ठीक है। आओ, मेरे साथ चलो।"
बुद्ध ले गये आयुष्यमान नंद को एकांत में और उन्होंने उसे ध्यान करने को कहाः। ध्यान के दरम्यान बुद्ध ने अपनी योगशक्ति का उपयोग करके तावतिंस लोक में उसकी यात्रा करा दी। तावतिंस लोक में वह क्या देखता है कि वहाँ गजब की सुंदरियाँ हैं। अप्सराओं का सौंदर्य तो वह देखता ही रह गया।

अभी भी पंढरपुर में पुण्डलिक की दी हुई ईंट पर भगवान विष्णु खड़े हैं


शास्त्रों में आता है कि जिसने माता-पिता तथा गुरू का आदर कर लिया उसके द्वारा संपूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया उसके संपूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो गये। वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने माता-पिता और गुरू की सेवा के महत्त्व को समझा तथा उनकी सेवा में अपना जीवन सफल किया। ऐसा ही एक भाग्यशाली सपूत था - पुण्डलिक।
पुण्डलिक अपनी युवावस्था में तीर्थयात्रा करने के लिए निकला। यात्रा करते-करते काशी पहुँचा। काशी में भगवान विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद उसने लोगों से पूछाः क्या यहाँ कोई पहुँचे हुए महात्मा हैं, जिनके दर्शन करने से हृदय को शांति मिले और ज्ञान प्राप्त हो?
लोगों ने कहाः हाँ हैं। गंगापर कुक्कुर मुनि का आश्रम है। वे पहुँचे हुए आत्मज्ञान संत हैं। वे सदा परोपकार में लगे रहते हैं। वे इतनी उँची कमाई के धनी हैं कि साक्षात माँ गंगा, माँ यमुना और माँ सरस्वती उनके आश्रम में रसोईघर की सेवा के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं। पुण्डलिक के मन में कुक्कुर मुनि से मिलने की जिज्ञासा तीव्र हो उठी। पता पूछते-पूछते वह पहुँच गया कुक्कुर मुनि के आश्रम में। मुनि के देखकर पुण्डलिक ने मन ही मन प्रणाम किया और सत्संग वचन सुने। इसके पश्चात पुण्डलिक मौका पाकर एकांत में मुनि से मिलने गया। मुनि ने पूछाः वत्स! तुम कहाँ से आ रहे हो?
पुण्डलिकः मैं पंढरपुर (महाराष्ट्र) से आया हूँ।
तुम्हारे माता-पिता जीवित हैं?
हाँ हैं।
तुम्हारे गुरू हैं?
हाँ, हमारे गुरू ब्रह्मज्ञानी हैं।
कुक्कुर मुनि रूष्ट होकर बोलेः पुण्डलिक! तू बड़ा मूर्ख है। माता-पिता विद्यमान हैं, ब्रह्मज्ञानी गुरू हैं फिर भी तीर्थ करने के लिए भटक रहा है?अरे पुण्डलिक! मैंने जो कथा सुनी थी उससे तो मेरा जीवन बदल गया। मैं तुझे वही कथा सुनाता हूँ। तू ध्यान से सुन।
एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा?
निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा।
कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने। गणपति जी चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया। जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं। अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा।
फिर गणपति जी आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे। एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया.... दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया.... इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।
शिव-पार्वती ने पूछाः वत्स! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की?

नूतन वर्ष का नूतन सन्देश : 4 अप्रेल : गुडी पड़वा


ॐ मधुमन्मे निक्रमणं मधुमन्मे परायणम्।
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसंदृशः।।
'हे मधुमय प्रभो ! आपकी प्रेरणा से सामने उपस्थित योगक्षेम संबंधी कर्तव्यों में मेरी प्रवृत्ति मधुमय हो अर्थात् उससे अपने को और दूसरों को सुख, शांति, आनंद और मधुरता मिले। मेरे दूरगामी कर्तव्य भी मधुमय हों। मैं वाणी से मधुमय ही बोलूँ। सभी लोग मुझे मधुमयी दृष्टि से प्रेमपूर्वक देखें। (अथर्ववेदः 1.34.3)
हे मधुमय प्रभु ! हे मेरे प्यारे ! मेरे चित्त में तुम्हारे मधुर स्वभाव, मधुर ज्ञान का प्राकटय हो। मधुमय, दूरगामी मेरे निर्णय हों। क्योंकि आप मधुमय हो, सुखमय हो, आनंदमय हो, ज्ञानमय हो, सबके परम सुहृद हो और मैं आपका बालक हूँ। मैंने अपनी युक्ति, चालाकी से सुखी रहने का ज्यों-ज्यों यत्न किया, त्यों-त्यों विकारों ने, कपट ने, चालाकियों ने मुझे कई जन्मों तक भटकाया। अब सत्यं शरणं गच्छामि। मैं सत्यस्वरूप ईश्वर की शरण जा रहा हूँ। मधु शरणं गच्छामि। मधुमय ईश्वर ! मैं तुम्हारी शरण आ रहा हूँ। हम युक्ति चालाकी से सुखी रहें, यह भ्रम हमारा टूटा है। आनंद और माधुर्य, परम सुख और परम सम्पदा युक्ति से, चालाकी से नहीं मिलती, अपितु तुम्हारा बनने से ये चीजें सहज में मिलती हैं। जैसे पुत्र पिता का होकर रहता है तो पिता का उत्तराधिकार पुत्र के हिस्से में आता है, ऐसे ही जीव ईश्वर का होकर कुछ करता है तो ईश्वर का ज्ञान, ईश्वर की मधुमयता, ईश्वर का सदभाव, सत्प्रेरणा और साथ उसे मिलता रहता है। सामान्य व्यक्ति और महापुरुषों में यही फर्क है। सामान्य व्यक्ति अपनी पढ़ाई-लिखाई से, चतुराई-चालाकी से दुःख मिटाकर सुखी रहने का व्यर्थ प्रयास करता है। फिर व्यसनों में और कपटपूर्ण कामों में, न जाने किस-किसमें बेचारा फँस जाता है ! लेकिन महापुरुष जानते हैं कि
पुरुषस्य अर्थ इति पुरुषार्थः।
परमात्मा ही पुरूष है। उस परमात्मा (पुरूष के अर्थ जो प्रयत्न करते हैं, वे वास्तविक पुरुषार्थ करते हैं। जिनका वास्तविक पुरूषार्थ है, उन्हें वह वास्तविक ज्ञान मिलता है, जिस सुख से बड़ा कोई सुख नहीं, जिस ज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान नहीं, जिस लाभ से बड़ा कोई लाभ नहीं। 'गीता' में भगवान ने कहा
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। (6.22)
जिस लाभ से बड़ा कोई लाभ उसके मानने में नहीं आता, जिसके आगे इन्द्रपद का लाभ भी बहुत बौना हो जाता है, छोटा हो जाता है उस लाभ को पाने के लिए मनुष्य जीवन की यह मति-गति है।
अंदर की चतुराई, चालाकी से आनंद को, प्रभु को पाया नहीं जा सकता। इनसे जो मिलेगा वह समय पाकर चला जायेगा। क्रिया से जो मिलेगा, प्रयत्न से जो मिलेगा, चालाकी से जो मिलेगा, वह माया के अन्तर्गत होगा और परमात्मा के साथ-सहयोग सेक जो मिलेगा वह माया के पार का होगा-यह कभी न भूलें। कोई भी लोग कितनी भी चालाकी करें सब दुःखों से पार नहीं हुए हैं, नहीं हो सकते हैं। लेकिन शबरी की नाईं, संत तुकाराम, संत रविदास की नाईं, नानकजी, कबीरजी और तैलंग स्वामी की नाईं अपना प्रयत्न करें और उसमें ईश्वर का सत्ता-सामर्थ्य मिला दें तो सरलता से सब दुःखों से पार हो सकते हैं।
आलसी न हो जायें, भगवान के भरोसे पुरुषार्थ न छोड़ दें। पुरुषार्थ तो करें लेकिन पुरूषार्थ करने की सत्ता जहाँ से आती है और पुरूषार्थ उचित है कि अनुचित है उसकी शुद्ध प्रेरणा भी जहाँ से मिलती है, उस परमात्मा की शरण जायें। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय अर्जुन को कहाः
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शांति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।क
'हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा शाश्वत परम धाम को प्राप्त होगा।' (भगवदगीताः 18.62)
अपनी चालाकी, युक्ति, मेहनत से नश्वर स्थान मिलेंगे। आप शाश्वत हैं और आपको जो मिला वह नश्वर है तो आपकी मेहनत-मजदूरी बन-बन के खेल बिगाड़ने में ही लगती रहती है। आप नित्य हैं, शरीर अनित्य है और शरीर-संबंधी सुविधाएँ भी अनित्य हैं। नित्य को अनित्य कितना भी दो-
बिन रघुवीर पद जिय की जरनि न जाई।
जीवात्मा की जलन, तपन भगवत्प्रसाद के बिना नहीं जायेगी। वास्तव में 'भगवत्प्रसाद' मतलब भगवान का अनुभव जीवात्मा का अनुभव होना चाहिए। पिता की समझ, पिता का सामर्थ्य बेटे में आना चाहिए, यह प्रसाद है। लोगों ने क्या किया कि प्रसाद बनाया, व्यंजन बनाये, यह किया, वह किया.... चलो, इसके लिए हम इन्कार नहीं करते लेकिन इन बाह्य प्रसादों में रुको नहीं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसाद वह जिससे सारे दुःख मिट जायें। मनमुख थोड़ी देर जीभ का रसास्वाद लेते हैं, उनकी अपेक्षा भक्त भगवान को भोग लगाकर लेते हैं। यह अच्छा है, ठीक है लेकिन वह प्रसाद, तुम्हारी जिह्वा का प्रसाद वास्तविक प्रसाद नहीं है। भगवान और संत चाहते हैं कि तुम्हें वास्तविक प्रसाद मिल जाये।
कई जिह्वाएँ तुमको मिलीं और चली गयीं, जल गयीं, तुम ज्यों-के-त्यों ! तुम शाश्वत हो, परमात्मा शाश्वत हैं।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
'इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है।' (गीताः 15.7)
भगवान जो कह रहे हैं, वह तुम मान लो।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
'हे अर्जुन ! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ।' (गीताः10.20)
सब भूत-प्राणियों में मैं आत्मा चैतन्य ब्रह्म हूँ। जो सब भूत-प्राणियों में है.... मच्छर में भी अक्ल कैसी कि बड़े-बड़े डी.जी.पी. को, ब्रिगेडियरों को, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को, तुमको-हमको चकमा दे देता है ! यह कला उसमें कहाँ से आती है ? मकड़ा जाला कैसे बुनता है ? उसमें कहाँ से अक्ल आती है ? वह अक्ल जड़ से नहीं आती, चेतन से आती है।
तो मानना पड़ेगा कि उनमें चेतना भी है और ज्ञान भी है। भगवान चैतन्यस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, प्राणिमात्र के सुहृद हैं, उनकी बात मान लो बस ! नूतन वर्ष का यह संदेश है। भगवान कहते हैं-
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
मैं ही आत्मा ब्रह्म हूँ। सब भूत-प्राणियों में हूँ। जल में रस-स्वाद मेरा है। पृथ्वी में गंध गुण मेरा है। चन्द्रमा और सूर्य में जीवन देने की शक्ति मेरी है।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदुषु शब्दः खे पौरूषं नृषु।।
'हे अर्जुन ! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।' (गीताः 7.8)
आप भगवान की यह बात मान लो न ! भगवान की बात मान लेने से क्या होगा ? भगवत्प्राप्ति हो जायेगी। मन की बात मान लेने से क्या होगा कि मन भटका-भटका के न जाने कितनी बार चौरासी लाख योनियों के चक्कर में ले जायेगा। जन्मों-जन्मों से हम-आप अपने को सताते-सताते आये हैं। यह नूतन वर्ष आपको नूतन संदेश देता है कि अब अपने को सताने से बचाना हो, नश्वर आकर्षणों से बचाना हो तो आप शाश्वत रस ले लीजिये। शाश्वत रस, सामर्थ्य की ओर देखिये।
'भगवान सर्वत्र हैं।' यह कहते हैं तो आपके हृदय में हैं न ! स्वीकार कर लो।
काहे रे बन खोजन जाई !
अपने हृदयेश्वर की उपासना में लगो। हृदय मधुमय रहेगा। कम-से-कम व्यक्तिगत खर्च, कम-से-कम व्यक्तिगत श्रृंगार, बाहरी सुख के गुलाम बनिये नहीं और दूसरों को बनाइये मत। कम-से-कम आवश्यकताओं से गुजारा कर लीजिये और अधिक-से-अधिक अंतर रस पीजिये। जिनको हृदयेश्वर की उपासना से वह (परमात्मा) मिला है, ऐसे महापुरुषों के वचनों को स्वीकार करके आप तुरंत शोकरहित हो जाओ, द्वंद्वरहित हो जाओ, भयरहित हो जाओ, वैर व राग-द्वेष रहित हो जाओ। नित्य सुख में आप तुरंत जग जाओगे, आप महान हो जाओगे। उस हृदयेश्वर के मिलने में देर नहीं, वह दुर्लभ नहीं, परे नहीं, पराया नहीं....
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2011, पृष्ठ संख्या 12,13,14 अंक 219

ब्राह्मी स्थिति क्या है ?


आपकी श्रद्धा जिस इष्टदेव में हो, भगवान में हो, देवी-देवता में हो या सदगुरुदेव में हो, जिसे आप खूब स्नेह करते हो, आदर करते हो, पूजन करते हो उनकी मूर्ति, चित्र या फोटो अपने साधना-कक्ष में उचित जगह पर रखो। उनके सामने आसनस्थ होकर बैठ जाओ। उनके चरणों से लेकर मस्तक तक.... मस्तक से लेकर चरणों तक के अंगों को खूब प्रेमपूर्ण दृष्टि से निहारते रहो। फिर किसी भी एक अंग पर दृष्टि जमाकर त्राटक का अभ्यास करो। पलकें गिराये बिना निहारते रहो। निहारते-निहारते ठीक एकाग्रता हो जाय तो आँखें बन्द करके दृष्टि को भ्रूमध्य में, आज्ञाचक्र में एकाग्र करो। बाहर जिस मूर्ति या फोटो पर त्राटक किया  था वह भीतर दिखने लगेगा। वृत्ति को एकाग्र करने में यह प्रयोग बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।

और इटावा का डिप्टी कलेक्टर खटखटा बाबा बन गया !

ब्रिटिश शासन के जमाने की बात है।
इटावा में सप्रू साहब डिप्टी कलेक्टर थे। उनका चाकर था मनहर नायी। एक रात भोजन करके सप्रू साहब पलंग पर आराम कर रहे थे। मनहर पैर दबा रहा था। साहब बोलेः
"अरे मनहर ! कोई कहानी सुना।"
"साहब ! आपने तो बहुत किताबें पढ़ी हैं और कहानियाँ सुनी हैं। आप ही सुनाओ।"
"नहीं.....। तू कहानी सुना। मैं सोते सोते सुनुँगा।"
"वाह जी....! मैं कहानी सुनाऊँ और आप सोते रहें। मैं क्या ऐसे ही बकता रहूँ ?"
"नहीं... नहीं....। मैं चाव से सुनुँगा।"
"अच्छा, तो सुनो। लेकिन 'हूँ.... हूँ...'. करते रहना। मुझे पता रहे कि आप सुन रहे हैं। नहीं तो आप सो जायें और मैं सुनाता रहूँ तो मेरी शक्ति ऐसे ही व्यर्थ चली जायगी।"