शनिवार, मई 26, 2018

संत गोंदवलेकर महाराज की गुरुनिष्ठा

संत गोंदवलेकर महाराज की गुरुनिष्ठा
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महाराष्ट्र में औरंगाबाद से आगे येहले गाँव में संत तुकाराम चैतन्य रहते थे, जिनके लोग प्रेम से 'तुकामाई' कहते थे। वे ईश्वरीय सत्ता से जुड़े हुए बड़े उच्चकोटि के संत थे। 19 फरवरी 1854 को बुधवार के दिन गोंदवाले गाँव में गणपति नामक एक बालक का जन्म हुआ जब वह 12 वर्ष का हुआ तब तुकामाई के श्रीचरणों में आकर बोलाः 'बाबाजी ! मुझे अपने पास रख लीजिये।'

तुकामाई ने क्षणभर के लिए आँखे मूँदकर उसका भूतकाल देख लिया कि यह कोई साधारण आत्मा नहीं है और बालक गणपति को अपने पास रख लिया। तुकामाई उसे 'गणु' कहते थे।  वह उनकी रसोई की सेवा करता, पैरचंपी करता, झाड़ू बुहारी करता। बाबा की सारी सेवा-चाकरी बड़ी निपुणता से करता था। बाबा उसे स्नेह भी करते किंतु कहीं थोड़ी-सी गलती हो जाती तो धड़ाक से मार भी देते।

महापुरुष बाहर से कठोर दिखते हुए भी भीतर से हमारे हितैषी होते हैं, वे ही जानते हैं। 12 साल के उस बच्चे से जब गलती होती तो उसकी ऐसी घुटाई-पिटाई होती कि देखने वाले बड़े-बड़े लोग भी तौबा पुकार जाते, लेकिन गणु ने कभी गुरुद्वार छोड़ने का सोचा तक नहीं। उस पर गुरु का स्नेह भीतर से बढ़ता गया। एक बार तुकामाई गणु को लेकर नदी में स्नान के लिए गये। वहाँ नदी पर तीन माइयाँ कपड़े धो रही थीं। उन माइयों के तीन छोटे-छोटे बच्चे आपस में खेल रहे थे। तुकामाई ने कहाः "गणु ! गड्डा खोद।"

एक अच्छा-खासा गड्ढा खुदवा लिया। फिर कहाः "ये जो बच्चे खेल रहे हैं न, उन्हें वहाँ ले जा और गड्ढे में डाल दे। फिर ऊपर से जल्दी-जल्दी मिट्टी डाल के आसन जमाकर ध्यान करने लग।"

इस प्रकार तुकामाई ने गणु के द्वारा तीन मासूम बच्चों को गड्ढे में गड़वा दिया और खुद दूर बैठ गये। गणु बालू का टीला बनाकर ध्यान करने बैठ गया। कपड़े धोकर जब माइयों ने अपने बच्चों को खोजा तो उन्हें वे न मिले। तीनों माइयाँ अपने बच्चों को खोजते-खोजते परेशान हो गयीं। गणु को बैठे देखकर वे माइयाँ उससे पूछने लगीं कि 'ए लड़के ! क्या तूने हमारे बच्चों को देखा है?'

माइयाँ पूछ-पूछ कर थक गयीं। लेकिन गुरु-आज्ञापालन की महिमा जानने वाला गणु कैसे बोलता? इतने में माइयों ने देखा कि थोड़ी दूरी पर परमहंस संत तुकामाई बैठे हैं। वे सब उनके पास गयीं और बोलीं- "बाबा ! हमारे तीनों बच्चे नहीं दिख रहे हैं। आपने कहीं देखे हैं?"

बाबाः "वह जो लड़का आँखें मूँदकर बैठा है न, उसको खूब मारो-पीटो। तुम्हारे बेटे उसी के पास हैं। उसको बराबर मारो तब बोलेगा।"

यह कौन कह रहा है? गुरु कह रहे हैं। किसके लिए? आज्ञाकारी शिष्य के लिए। हद हो गयी ! गुरु कुम्हार की तरह अंदर हाथ रखते हैं और बाहर से घुटाई-पिटाई करते हैं।

गुरु कुंभार शिष्य कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।

अंतर हाथ सहारि दे, बाहर मारे चोट।।

माइयों ने गणु को खूब मारा पीटा, किंतु उसने कुछ न कहा। ऐसा नहीं बोला कि, 'मुझको तो गुरु ने कहा है।' मार-मारकर उसको अधमरा कर दिया किंतु गणु कुछ नहीं बोला। आखिर तुकामाई आये और बोलेः "अभी तक नहीं बोलता है? और मारो इसको। इसी बदमाश ने तुम्हारे बच्चों को पकड़कर गड्ढे में डाल दिया है। ऊपर मिट्टी डालकर साधु बनने का ढोंग करता है।"

माइयों ने टीला खोदा तो तीनों बच्चों की लाश मिली। फिर तो माइयों का क्रोध.... अपने मासूम बच्चों तो मारकर ऊपर से मिट्टी डालकर कोई बैठ जाय, उस व्यक्ति को कौन-सी माई माफ करेगी? माइयाँ पत्थर ढूँढने लगीं कि इसको तो टुकड़े-टुकड़े कर देंगे।

तुकामाईः "तुम्हारे बच्चे मार दिये न?"

"हाँ, अब इसको हम जिंदा न छोड़ेंगी।"

"अरे, देखो अच्छी तरह से। मर गये हैं कि बेहोश  हो गये हैं? जरा हिलाओ तो सही।"

गाड़े हुए बच्चे जिंदा कैसे मिल सकते थे? किंतु महात्मा ने अपना संकल्प चलाया।

यदि व संकल्प चलाये, मुर्दा भी जीवित हो जाये।।

तीनों बच्चे हँसते-खेलते खड़े हो गये। अब वे माइयाँ अपने बच्चों से मिलतीं कि गणु को मारने जातीं? माइयों ने अपने बच्चों को गले लगाया और उन पर वारी-वारी जाने लगीं। मेले जैसा माहौल बन गया। तुकामाई महाराज माइयों की नजर बचाकर अपने गणु को लेकर आश्रम में पहुँच गये, फिर पूछाः "गणु ! कैसा रहा?"

"गुरुकृपा है !"

गणु के मन में यह नहीं आया कि 'गुरुजी  ने मेरे हाथ से तो बच्चे गड़वा दिये और फिर माइयों से कहा कि इस बदमाश छोरे ने तुम्हारे बच्चों को मार डाला है। इसको बराबर मारो तो बोलेगा। फिर भी मैं नहीं बोला....'

कैसी-कैसी आत्माएँ इस देश में हो गयीं ! आगे चलकर वही गणु बड़े उच्चकोटि के प्रसिद्ध महात्मा गोंदवलेकर महाराज हो गये। उनका देहावसान 22 दिसम्बर 1913 के दिन हुआ। अभी भी लोग उन महापुरुष के लीलास्थान पर आदर से जाते हैं।

गुरुकृपा हि केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।

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