तमोगुणी
मानव वर्ग
आलसी-प्रमादी
होकर, गंदे विषय-विकारों
का मन में
संग्रह करके
बैठे-बैठे या
सोते-सोते भी
इन्द्रियभोग
के स्वप्न
देखता रहता
है। यदि कभी
कर्मपरायण
हों तो भी यह
वर्ग हिंसा,
द्वेष, मोह
जैसे देहधर्म
के कर्म में
ही प्रवृत्त
रहकर बंधनों में
बँधता जाता
है। मलिन
आहार, अशुद्ध
विचार और
दुष्ट आचार का
सेवन
करते-करते
तमोगुणी मानव पुतले
को
आलसी-प्रमादी
रहते हुए ही
देहभोग की भूख
मिटाने की
जितनी
आवश्यकता
होती है उतना
ही कर्मपरायण
रहने का उसका
मन होता है।
रजोगुणी
मनुष्य
प्रमादी नहीं,
प्रवृत्तिपरायण
होता है। उसकी
कर्मपरंपरा
की पृष्ठभूमि में
आंतरिक हेतु
रूप से काम,
क्रोध, लोभ,
मोह, मद, मत्सर,
दंभ आदि सब
भरा हुआ होता
है। सत्ताधिकार
की तीव्र
लालसा और
देहरक्षा के
ही कर्म-विकर्मों
के कंटकवृक्ष
उसकी मनोभूमि
में उगकर
फूलते-फलते
हैं। उसके लोभ
की सीमा बढ़-बढ़कर
रक्त-संबंधियों
तक पहुँचती
हैं। कभी उससे
आगे बढ़कर
जहाँ मान
मिलता हो,
वाहवाही या धन्यवाद
की वर्षा होती
है, ऐसे
प्रसंगों में
वह थोड़ा खर्च
कर लेता है।
ऐसे रजोगुणी
मनुष्य का मन
भी बहिर्मुख
ही कहलाता है।
ऐसा मन बड़प्पन
के पीछे पागल
होता है। उसका
मन विषय-विलास
की वस्तुओं को
एकत्रित करने
में लिप्त
होकर अर्थ-संचय
एवं विषय-संचय
करने के खेल
ही खेलता रहता
है।
इन दोनों
ही वर्गों के
मनुष्यों का
मन स्वच्छंदी,
स्वार्थी,
सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय
और मान चाहने
वाला होता है
और कभी-कभार
छल-प्रपंच के
समक्ष उसके
अनुसार टक्कर
लेने में भी
सक्षम होने की
योग्यता रखता
है। ऐसे मन की
दिशा
इन्द्रियों
के प्रति,
इन्द्रियों के
विषयों के
प्रति और विषय
भोगों के प्रति
निवृत्त न
होने पर
भोगप्राप्ति
के नित्य नवीन
कर्मों को
करने की योजना
में प्रवृत्त हो
जाती है। ऐसा
मन विचार करके
बुद्धि को
शुद्ध नहीं
करता अपितु
बुद्धि को
रजोगुण से
रँगकर, अपनी
वासनानुसार
उसकी
स्वीकृति
लेकर - 'मैं जो
करता हूँ वह
ठीक ही करता
हूँ' ऐसी दंभयुक्त
मान्यता खड़ी
कर देता है।
ऐसे आसुरी
भाव से
आक्रान्त
लोगों का
अनुकरण आप मत
करना। राजसी
व्यक्तियों
के रजोगुण से
अनेक प्रकार
की वासनाएँ
उत्पन्न होती
हैं अतः हे
भाई !
सावधान रहना।
रजो-तमोगुण की
प्रधानता से
ही समस्त पाप
पनपते हैं।
जैसे हँसिया,
चाकू, छुरी, तलवार
आदि
भिन्न-भिन्न
होते हुए भी
उनकी धातु लोहा
एक ही है ऐसे
ही पाप के नाम
भिन्न-भिन्न होने
पर भी पाप की
जड़
रजो-तमोगुण ही
है।
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