आत्म-साक्षात्कार जब तक नहीं होता तब तक धोखा ही धोखा है
ब्रह्मज्ञान सुनने
से जो पुण्य
होता है वह चान्द्रायण
व्रत करने से
नहीं होता । ब्रह्मज्ञानी
के दर्शन करने
से जो शांति
और आनंद मिलता
है, पुण्य
होता है वह
गंगा स्नान
से, तीर्थ,
व्रत, उपवास
से नहीं होता । इसलिए
जब तक ब्रह्मज्ञानी
महापुरुष
नहीं मिलते तब
तक तीर्थ करो,
व्रत करो,
उपवास करो,
परंतु जब ब्रह्मज्ञानी
महापुरुष
मिल गये तो व्यवहार
में से और
तीर्थ-व्रतों
में से भी समय
निकाल कर उन
महापुरुषों
के दैवी कार्य
में लग जाओ
क्योंकि वह
हजार गुना
ज़्यादा
फलदायी होता
है ।
कबीरजी ने कहा
हैः
तीर्थ
नहाये एक
फल संत मिले
फल चार ।
तीर्थ नहायेंगे
तो धर्म होगा । एक पुरुषार्थ
सिद्ध होगा । संत के सान्निध्य
से, सत्संग
से साधक धर्म,
अर्थ, काम और
मोक्ष चारों
के द्वार पर
पहुँच जायेगा । सत्गुरु
मिलेंगे तो वे
द्वार खुल
जायेंगे,
उनमें प्रवेश
हो जायेगा ।
लेबल: जो जागत है सो पावत है

