स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

आरुणि की गुरुनिष्ठा


प्राचीन काल में आयोद धौम्य नाम के एक ऋषि थे। उनके सुरम्य पवित्र आश्रम में बहुत शिष्य रहते थे। उनमें आरूणि नाम का शिष्य बड़ा ही नम्र, सेवाभावी और आज्ञापालक था। एक बार खूब वर्षा हुई। गुरु ने आरूणी को आश्रम के खेतों की देखभाल के लिए भेजा। आरूणी ने खेत जाकर देखा कि खेत का सारा पानी तो सीमा तोड़कर बाहर निकला जा रहा है। थोड़ी देर में तो पानी का वेग सारी पाल तोड़ देगा और मिट्टी बह जायेगी।

आरूणी ने कमर कसी। जहाँ से पानी निकल रहा था वहाँ उसने मिट्टी डालना शुरु किया, परंतु पानी का वेग सब मिट्टी बहा ले जाता। आखिर आरूणी पानी रोकने के लिए स्वयं ही उस टूटी हुई सीमा में लेट गया। उसके शरीर के अवरोध के कारण बहता पानी तो रुक गया, परंतु इस तरह उसे सारी रात ठंडे पानी में लेटे रहना पड़ा। इस प्रकार उसने खेत की रक्षा की।

प्रातःकाल हुआ। आश्रम के सब शिष्य जब गुरुदेव को प्रणाम करने गये तब उनमें आरूणी दिखा नहीं। गुरु शिष्यों को साथ लेकर आरूणी को ढूँढने खेत की ओर गये और आवाज लगायीः

"आरूणी...! आरूणी...!!"

आरूणी ने गुरु की आवाज सुनी। उसका शरीर तो ठंड से ठिठुर गया था, आवाज दब गयी थी, फिर भी वह उठा और गुरुदेव को प्रणाण करके बोलाः "क्या आज्ञा है गुरुदेव?"

गुरु आयोद धौम्य का हृदय भर आया। शिष्य की सेवा देखकर उनका गुरुत्व छलक उठा। आरूणी के अंतर में शास्त्रों का ज्ञान अपने-आप प्रकट होने लगा। गुरु ने उसका नाम उद्दालक रखा। धन्य है गुरुभक्त आरूणी !

तू मुझे उर आँगन दे दे, मैं अमृत की वर्षा कर दूँ।

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उपमन्यु की गुरुभक्ति


आयोद धौम्य का दूसरा एक शिष्य था – उपमन्यु। गुरु ने उसे गायें चराने की सेवा दी। उपमन्यु सारा दिन गायें चराता और शाम को गायों के साथ आश्रम पहुँच जाता। उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट देखकर गुरु ने एक दिन पूछाः

"बेटा ! तू रोज क्या खाता है?"

उपमन्युः "गुरुदेव ! भिक्षा में मुझे जो मिलता है वह खाता हूँ।"

गुरुः "यह तो अधर्म है। भिक्षा गुरु को अर्पण किये बिना नहीं खानी चाहिए।"

गुरु से कपट मित्र से चोरी। या होई निर्धन या होई कोढ़ी।।

दूसरे दिन से उपमन्यु गायों को जंगल में छोड़कर, गाँव से भिक्षा माँगकर ले आता और गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर देता। गुरुदेव सारी भिक्षा रख लेते और उसे कुछ नहीं देते। कुछ दिन बाद उपमन्यु को वैसा ही तन्दुरुस्त देखकर गुरु ने पूछा तो उसने बतायाः "गुरुदेव ! एक बार भिक्षा माँगकर आपके चरणों में अर्पित कर देता हूँ, फिर दूसरी बार माँगकर स्वयं खा लेता हूँ।"

गुरुः "तुम ऐसा करके दूसरे भिक्षाजीवी लोगों की जीविका में बाधा डालते हो,  अतः लोभी हो। तुम्हें दुबारा भिक्षा नहीं लानी चाहिए।"

गुरुदेव की यह आज्ञा भी उपमन्यु ने आदरपूर्वक स्वीकार की। कुछ दिन बाद फिर उपमन्यु को उसके निर्वाह के बारे में पूछा तो वह बोलाः "प्रभु ! मैं गायों का दूध पीकर निर्वाह कर लेता हूँ।"

गुरुः "यह तो अधर्म है। गुरु की गायों का दूध गुरु की आज्ञा के बिना पी लेना तो चोरी हो गयी। ऐसा मत करो।"

दूध पीना बंद होने के बाद भी उपमन्यु को वैसा ही तन्दुरुस्त देखा तो फिर गुरु ने उसे बुलाया। पूछने पर उपमन्यु बोलाः "गाय का दूध जब बछड़े पीते हैं तब थोड़ा फेन बाहर आता है। मैं उसे ही चाटकर संतोष कर लेता हूँ।"

गुरुः "बेटा ! तुमको ऐसा करते देखकर तो बछड़े ज्यादा फेन बाहर छोड़ते होंगे और स्वयं भूखे रह जाते होंगे। ऐसा करना तुम्हारे लिय योग्य नहीं है।"

अब उपमन्यु के लिए भोजन के सब रास्ते बन्द हो गये। परंतु गुरु के प्रति उसके अहोभाव और श्रद्धा में लेशमात्र भी फर्क नहीं पड़ा। गुरु द्वारा सौंपी गयी सेवा चालू रही। बहुत भूख लगती तो वह कभी किसी वृक्ष या वनस्पति के पत्ते चबा लेता।

एक बार क्षुधापीड़ित उपमन्यु भूल से आक के पत्ते खा गया और अपनी आँखें खो बैठा। रास्ता न दिखने के कारण वह एक कुएँ में गिर पड़ा।

वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि।

शिष्य के कल्याण के लिए, उसके जीवन को गढ़ने के लिए बाहर से तो वज्र से भी कठोर दिखने वाले परंतु भीतर से फूल से भी कोमल कृपालु गुरुदेव ने जब गायों के पीछे उपमन्यु को लौटता हुआ नहीं देखा तो उसे ढूँढने के लिए स्वयं जंगल की ओर चल पड़े। 'उपमन्यु...! बेटा उपमन्यु..... !' की पुकार जंगल में गूँज उठी।

(हे उपमन्यु ! तू धन्य है ! हजारों भक्त पूजा के समय जिन्हें पुकारते हों वे गुरु तुझे पुकार रहे हैं। धन्य है तेरी सेवा !)

गुरु के मुख द्वारा अपने नाम का उच्चार सुनकर कुएँ में से उपमन्यु ने उत्तर दिया। कुएँ के पास आकर गुरु ने सारी हकीकत जानी और आँखों के उपचार के लिए अभिमन्यु को देवों के वैद्य अश्विनी कुमारों की स्तुति से अश्विनीकुमार वहाँ तुरंत प्रकट हुए और उसे आँखों की दवा के रूप में पूआ खाने को दिया। उपमन्यु बोलाः

"अब मुझसे गुरु की आज्ञा के बिना कुछ भी नहीं खाने जायेगा।"

अश्विनीकुमारः "यह तो दवाई है। इसे लेने में कोई हर्ज नहीं है। तुम्हारे गुरु की भी ऐसी ही अवस्था हुई थी, तब उन्होंने भी खा लिया था।"

उपमन्यु ने नम्र भाव से कहाः "मेरे गुरुदेव क्या करते हैं यह मुझे नहीं देखना है। मुझे तो वे जैसा कहते हैं तदनुसार मानना है।"

अश्विनीकुमार प्रसन्न हुए। उन्होंने उपमन्यु की आँखें ठीक कर दीं। उपमन्यु कुएँ से बाहर आया और सब वृत्तांत कहकर गुरुदेव के चरणों में गिर पड़ा। गुरुदेव का हृदय भर आया और उनके मुखारविन्द से अमृत-वचनों के रूप में आशीर्वाद निकल पड़ेः "बेटा ! तू वेद-वेदांग का ज्ञाता, धर्मावलंबी और महान पंडित बनेगा।"

हुआ भी ऐसा ही। लाख-लाख वंदन हों, बाहर से कठोर दिखते हुए भी अन्दर से शिष्य का कल्याण करने वाला ब्रह्मवेत्ता सदगुरुओं को ! धन्य है ऐसी कठोर कसौटी में भी अडिग रहकर प्रतिकार न करने वाले एवं गुरु द्वारा मिलने वाले आध्यात्मिक अमृत को पचाकर पार ही जाने वाले उपमन्यु जैसे सतशिष्य !

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कृष्ण-सुदामा की गुरुनिष्ठा


कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण तथा बलराम गुरुकुल में निवास करने की इच्छा से काश्यपगोत्री सान्दीपनि मुनि के पास गये, जो चेष्टाओं को सर्वथा नियंत्रित रखे हुए थे। गुरुजी तो उन्हें अत्यंत स्नेह करते ही थे, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम भी गुरुदेव की उत्तम सेवा कैसे करनी चाहिए, इसका आदर्श लोगों के सामने रखते हुए बड़ी भक्तिपूर्वक, इष्टदेव के समान उनकी सेवा करने लगे।

गुरुवर सान्दीपनि उनकी शुद्धभाव से युक्त सेवा से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने दोनों भाइयों को छहों अंगों र उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों की शिक्षा दी। इनके अतिरिक्त मंत्र और देवताओं के ज्ञान के साथ धनुर्वेद, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र, मीमांसा आदि वेदों का तात्पर्य बतलाने वाले शास्त्र, तर्कविद्या (न्यायशास्त्र) आदि की भी शिक्षा दी। साथ ही सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध (दुरंगी नीति) और आश्रय – इन छः भेदों से युक्त राजनीति का भी अध्ययन कराया। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम सारी विद्याओं के प्रवर्तक (आरम्भ करने वाले) हैं। उस समय वे केवल श्रेष्ठ मनुष्य का-सा व्यवहार करते हुए अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने गुरुजी द्वारा सभी विद्याएँ केवल एक बार सिखाने मात्र से ही सीख लीं। केवल चौंसठ दिन-रात में ही संयमशिरोमणि दोनों भाइयों ने चौंसठों कलाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया।

'श्रीमदभागवत' के दसवें स्कन्ध के 80 वें अध्याय में अपने सहपाठी सुदामा से गुरु-महिमा का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-"ब्राह्मणशिरोमणे ! क्या आपको उस समय की बात याद है, जब हम दोनों एक साथ गुरुकुल में निवास करते थे। सचमुच, गुरुकुल में ही द्विजातियों को अपने ज्ञातव्य वस्तु का ज्ञान होता है, जिसके द्वारा अज्ञानान्धकार से पार हो जाते हैं।

मित्र ! इस संसार में शरीर का कारण जन्मदाता पिता, प्रथम गुरु है। इसके बाद उपनयन संस्कार करके सत्कर्मों की शिक्षा देने वाला दूसरा गुरु है, वह मेरे ही समान पूज्य है। तदनन्तर ज्ञानोपदेश देकर परमात्मा को प्राप्त करानेवाला गुरु तो मेरा स्वरूप ही है। वर्णाश्रमियों में जो लोग अपने गुरुदेव के उपदेशानुसार अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थ के सच्चे जानकार हैं।

प्रिय मित्र ! मैं सबका आत्मा हूँ, सबके हृदय में अन्तर्यामीरूप से विराजमान हूँ। मैं गृहस्थ के धर्म पंचमहायज्ञ आदि से, ब्रह्मचारी के धर्म उपनयन-वेदाध्ययन आदि से, वानप्रस्थी के धर्म तपस्या से और सब ओर से उपरत हो जाना – इस संन्यासी के धर्म से भी उतना संतुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेव की सेवा-शुश्रूषा से सन्तुष्ट होता हूँ।

ब्रह्मन् ! जिस समय हम लोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे उस समय की वह बात आपको याद है क्या, जब एक दिन हम दोनों के हमारी गुरुमाता ने ईंधन (लकड़ियाँ) लाने के लिए जंगल में भेजा था। उस समय हम लोग एक घोर जंगल मे गये थे और बिना ऋतु के ही बड़ा भयंकर आँधी-पानी आ गया था। आकाश में बिजली कड़कने लगी थी। जब सूर्यास्त हो गया, तब चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा फैल गया था। धरती पर इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि कहाँ गड्डा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही नहीं चलता था ! वह वर्षा क्या थी, एक छोटा-मोटा प्रलय ही था। आँधी के झटकों और वर्षा की बौछारों से हम लोगों को बड़ी पीड़ा हुई, दिशा का ज्ञान न  रहा। हम लोग अत्यन्त आतुर हो गये और एक दूसरे का हाथ पकड़कर जंगल में इधर उधर भटकते रहे।

सूर्योदय होते ही हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनि हम लोगों को ढूँढते हुए जंगल में पहुँचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं। वे कहने लगेः "आश्चर्य है, आश्चर्य है ! पुत्रो ! तुम लोगों ने हमारे लिए अत्यन्त कष्ट उठाया। सभी प्राणियों को अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है, परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवाह किए बिना हमारी सेवा में ही संलग्न रहे। गुरु के ऋण से मुक्त होने के लिए सतशिष्यों का इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध-भाव से अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेव की सेवा में समर्पित कर दें। द्विज-शिरोमणियो ! मैं तुम दोनों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हों और तुम लोगों ने मुझसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे तथा इस लोक और पर लोक में कहीं भी निष्फल न हो।'

प्रिय मित्र ! जिस समय हम लोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे, हमारे जीवन में ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुई थीं। इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेव की कृपा से ही मनुष्य शांति का अधिकारी होता है और पूर्णता को प्राप्त करता है।"

भगवान शिवजी ने भी कहा हैः

धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद् भवः।
धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।

'जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।'

गुरुसेवा : श्री राम की विनम्रता की पराकाष्ठा


मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अपने शिक्षागुरु विश्वामित्रजी के पास बहुत संयम, विनय और विवेक से रहते थे। गुरु की सेवा में वे सदैव तत्पर रहते थे। उनकी सेवा के विषय में भक्त कवि तुलसीदासजी ने लिखा हैः

मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई।।
जिन्ह के चरन सरोरूह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी।।
बार बार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही।।
(श्रीरामचरितमानस, बालकांडः 225.2.3)

गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान।।
(श्रीरामचरितमानस, बालकांडः 226)

सीता स्वयंवर में जब सब राजा एक-एक करके धनुष उठाने का प्रयत्न कर रहे थे, तब श्रीराम संयम से बैठे ही रहे। जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा हुई तभी वे खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके धनुष उठाया।

सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।।
(श्रीरामचरितमानस, बालकांडः 253.4)

गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लावघवँ उठाइ धनु लीन्हा।।
(श्रीरामचरितमानस, बालकांडः 260.3)

श्री सदगुरुदेव के आदर और सत्कार में श्रीराम कितने विवेकी और सचेत थे इसका उदाहरण तब देखने को मिलता है, जब उनको राज्योचित शिक्षण देने के लिए उनके गुरु वसिष्ठजी महाराज महल में आते हैं। सदगुरु के आगमन का समाचार मिलते ही श्रीराम सीता जी सहित दरवाजे पर आकर गुरुदेव का सम्मान करते हैं-

गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।
गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।

(श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकांडः 8.1.2)

इसके उपरांत श्रीरामजी भक्तिभावपूर्वक कहते हैं- "नाथ ! आप भले पधारे। आपके आगमन से घर पवित्र हुआ। परंतु होना तो यह चाहिए था कि आप समाचार भेज देते तो यह दास स्वयं सेवा में उपस्थित हो जाता।"

इस प्रकार ऐसी विनम्र भक्ति से श्रीराम अपने गुरुदेव को संतुष्ट रखते थे।

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समर्थ की लीला : शिवाजी की गुरुनिष्ठा


"भाई ! तुझे नहीं लगता कि गुरुदेव हम सबसे ज्यादा शिवाजी को चाहते हैं? शिवाजी के कारण हमारे प्रति उनका यह पक्षपात मेरे अंतर में शूल की नाई चुभ रहा है।"

समर्थ रामदास स्वामी का एक शिष्य दूसरे शिष्य से इस तरह की गुफ्तगू कर रहा था। "हाँ, बंधु ! तेरी बात शत-प्रतिशत सही है। शिवाजी राजा है, छत्रपति हैं इसीलिए समर्थ हम सबसे ज्यादा उन पर प्रेम बरसाते हैं। इसमें हमको कुछ गलत नहीं लगना चाहिए।"

शिष्य तो इस तरह की बातें करके अपने-अपने काम में लग गये, लेकिन इन दोनों का यह वार्तालाप अनायास ही समर्थ रामदास स्वामी के कानों में पड़ गया था। समर्थ ने सोचा कि 'उपदेश से काम नहीं चलेगा, इनको प्रयोगसहित समझाना पड़ेगा।'

एक दिन समर्थ ने लीला की। वे शिष्यों को साथ लेकर जंगल में घूमने गये। चलते-चलते समर्थ पूर्वनियोजन के अनुसार राह भूलकर घोर जंगल में इधर-उधर भटकने लगे। सब जंगल से बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहे थे, तभी अचानक समर्थ को उदर-शूल उठा। पीड़ा असह्य होने से उन्होंने शिष्यों को आस-पास में कोई आश्रय-स्थान ढूँढने को कहा। ढूँढने पर थोड़ी दूरी पर एक गुफा मिला गयी। शिष्यों के कन्धों के सहारे चलते हुए किसी तरह समर्थ उस गुफा तक पहुँच गये। गुफा में प्रवेश करते ही वे जमीन पर लेट गये एवं पीड़ा से कराहने लगे। शिष्य उनकी पीड़ा मिटाने का उपाय खोजने की उलझन में खोयी-सी स्थिति में उनकी सेवा-शुश्रूषा करने लगे। सभी ने मिलकर गुरुदेव से इस पीड़ा का इलाज पूछा।

समर्थ ने कहाः "इस रोग की एक ही औषधि है – बाघनी का दूध ! लेकिन उसे लाना माने मौत को निमंत्रण देना !" अब उदर शूल मिटाने के लिए बाघनी का दूध कहाँ से लायें और लाये कौन? सब एक दूसरे का मुँह ताकते हुए सिर पकड़कर बैठ गये।

उसी समय शिवाजी को अपने गुरुदेव के दर्शन करने की इच्छा हुई। आश्रम पहुँचने पर उन्हें पता चला कि गुरुदेव तो शिष्यों को साथ लेकर बहुत देर से जंगल में गये हैं। गुरुदर्शन के लिए शिवाजी का तड़प तीव्र हो उठी। अंततः शिवाजी ने समर्थ के दर्शन होने तक बिना अन्न-जल के रहने का निश्चय किया और उनकी तलाश में सैनिकों की एक टोली के साथ जंगल की ओर चल पड़े।

खोजते-खोजते शाम हो गयी किंतु उन्हें समर्थ के दर्शन नहीं हुए। देखते-ही-देखते अँधेरा छा गया। जंगली जानवरों की डरावनी आवाजें सुनायी पड़ने लगीं, फिर भी शिवाजी 'गुरुदेव! गुरुदेव!!' ऐसा पुकारते हुए आगे बढ़ते गये। अब तो सैनिक भी मन-ही-मन खिन्न हो गये परंतु शिवाजी की गुरु-मिलन की व्याकुलता के आगे वे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर सके। आखिर सैनिक भी पीछे रह गये परंतु शिवा को इस बात की चिंता नहीं थी, उन्हें तो गुरुदर्शन की तड़प थी। घोड़े पर सवार शिवा में हाथ में मशाल लिये आगे बढ़ते ही रहे।

मध्यरात्रि हो गयी। कृष्णपक्ष की अँधेरी रात्रि में जंगली जानवरों के चलने फिरने की आवाज सुनायी पड़ने लगी। इतने में शिवाजी ने बाघ की दहाड़ सुनी। वे रुक गये। कुछ समय तक जंगल में दहाड़ की प्रतिध्वनि गूँजती रही और फिर सन्नाटा छा गया। इतने में एक करुण स्वर वन में गूँजाः 'अरे भगवान ! हे रामरायाऽऽऽ.... मुझे इस पीड़ा से बचाओ।'

'यह क्या ! यह तो गुरु समर्थ की वाणी है ! शिवाजी आवाज तो पहचान गये, परंतु सोच में पड़ गये कि 'समर्थ जैसे महापुरुष ऐसा करुण क्रंदन कैसे कर सकते हैं? वे तो शरीर के सम्बन्ध से पार पहुँचे हुए समर्थ योगी हैं।'

शिवाजी को संशय ने घेर लिया। इतने में फिर उसी ध्वनि का पुनरावर्तन हुआ। शिवाजी ने ध्यानपूर्वक सुना तो पता चला कि वे जिस पहाड़ी के नीचे हैं, उसी के शिखर से यह करुण ध्वनि आ रही है। पहाड़ी पर चढ़ने के लिए कहीं से भी कोई रास्ता न दिखा। शिवाजी घोड़े से उतरे और अपनी तलवार से कँटीली झाड़ियों को काटकर रास्ता बनाते हुए आखिर गुफा तक पहुँच ही गये। शिवाजी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, जब उन्होंने समर्थ की पीड़ा से कराहते और लोट-पोट होते देखा। शिवा की आँखें आँसुओं से छलक उठीं। वे मशाल को एक तरफ रखकर समर्थ के चरणों में गिर पड़े। समर्थ के शरीर को सहलाते हुए शिवाजी ने पूछाः "गुरुदेव ! आपको यह कैसी पीड़ा हो रही है? आप इस घने जंगल में कैसे? गुरुदेव ! कृपा करके बताइये।"

समर्थ कराहते हुए बोलेः "शिवा ! तू आ गया? मेरे पेट में जैसे शूल चुभ रहे हों ऐसी असह्य वेदना हो रही है रे..."

"गुरुदेव ! आपको तो धन्वंतरि महाराज भी हाजरा-हजूर हैं। अतः आप इस उदर शूल की औषधि तो जानते ही होंगे। मुझे औषधि का नाम कहिये। शिवा आकाश-पाताल एक करके भी वह औषधि ले आयेगा।"

"शिवा ! यह तो असाध्य रोग है। इसकी कोई औषधि नहीं है। हाँ, एक औषधि से राहत जरूर मिल सकती है लेकिन जाने दे। इस बीमारी का एक ही इलाज है और वह भी अति दुर्लभ है। मैं उस दवा के लिए ही यहाँ आया था, लेकिन अब तो चला भी नहीं जाता.... दर्द बढ़ता ही जा रहा है..."

शिवा को अपने-आपसे ग्लानि होने लगी कि 'गुरुदेव लम्बे समय से ऐसी पीड़ा सहन कर रहे हैं और मैं राजमहल में बैठा था। धिक्कार है मुझे ! धिक्कार है !!' अब शिवा से रहा न गया। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहाः "नहीं गुरुदेव ! शिवा आपकी यातना नहीं देख सकता। आपको स्वस्थ किये बिना मेरी अंतरात्मा शांति से नहीं बैठेगी। मन में जरा भी संकोच रखे बिना मुझे इस रोग की औषधि के बारे में बतायें। गुरुदेव ! मैं लेकर आता हूँ वह दवा।"

समर्थ ने कहाः "शिवा ! इस रोग की एक ही औषधि है – बाघनी का दूध ! लेकिन उसे लाना माने मौत का निमंत्रण देना है। शिवा ! हम तो ठहरे अरण्यवासी। आज यहाँ कल वहाँ होंगे, कुछ पता नहीं। परंतु तुम तो राजा हो। लाख गये तो चलेगा, परंतु लाखों का रक्षक जिन्दा रहना चाहिए।"

"गुरुदेव ! जिनकी कृपादृष्टि मात्र से हजारों शिवा तैयार हो सकते हैं, ऐसे समर्थ सदगुरु की सेवा में एक शिवा की कुर्बानी हो भी जाये तो कोई बात नहीं। मुगलों के साथ लड़ते-लड़ते मौत के साथ सदैव जूझता आया हूँ, गुरुसेवा करते-करते मौत आ जायेगी तो मृत्यु भी महोत्सव बन जायेगी। गुरुदेव आपने ही तो सिखाया है कि आत्मा कभी मरती नहीं और नश्वर देह को एक दिन जला ही देना है। ऐसी देह का मोह कैसा? गुरुदेव ! मैं अभी बाघनी का दूध लेकर आता हूँ।"

'क्या होगा? कैसे मिलेगा?' अथवा 'ला सकूँगा या नहीं?' – ऐसा  सोचे बिना शिवाजी गुरु को प्रणाम करके पास में पड़ा हुआ कमंडलु लेकर चल पड़े। सतशिष्य की कसौटी करने के लिए प्रकृति ने भी मानों, कमर कसी और आँधी-तुफान के साथ जोरदार बारिश शुरु हुई। बरसते पानी में शिवाजी दृढ़ विश्वास के साथ चल पड़े बाघनी को ढूँढने। लेकिन क्या यह इतना आसान था? मौत के पंजे में प्रवेश कर वहाँ से वापस आना कैसे संभव हो सकता है? परंतु शिवाजी को तो गुरुसेवा की धुन लगी थी। उन्हें इन सब बातों से क्या लेना-देना? प्रतिकूल संयोगों का सामना करते हुए नरवीर शिवाजी आगे बढ़ रहे थे। जंगल में बहुत दूर जाने पर शिवा को अँधेरे में चमकती हुई चार आँखें दिखीं। शिवा उनकी ओर आगे बढ़ने लगे। उनको अपना लक्ष्य दिख गया। वे समझ गये कि ये बाघनी के बच्चे हैं, अतः बाघनी भी कहीं पास में ही होगी। शिवाजी प्रसन्न थे। मौत के पास जाने में प्रसन्न ! एक सतशिष्य के लिए उसके सदगुरु की प्रसन्नता से बड़ी चीज संसार में और क्या हो सकती है? इसलिए शिवाजी प्रसन्न थे।

शिवाजी के कदमों की आवाज सुनकर बाघनी के बच्चों ने समझा कि उनकी माँ है, परंतु शिवाजी को अपने बच्चों के पास चुपके-चुपके जाते देखकर पास में बैठी बाघनी क्रोधित हो उठी। उसने शिवाजी पर छलाँग लगायी परंतु कुशल योद्धा शिवाजी ने अपने को बाघनी के पंजे से बचा लिया। फिर भी उनकी गर्दन पर बाघनी के दाँत अपना निशान छोड़ चुके थे। परिस्थितियाँ विपरीत थीं। बाघनी क्रोध से जल रही थी। उसका रोम-रोम शिवा के रक्त का प्यासा बना हुआ था, परंतु शिवा का निश्चय अटल था। वे अब भी हार मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि समर्थ सदगुरु के सतशिष्य जो ठहरे !

शिवाजी बाघनी से प्रार्थना करने लगे कि 'हे माता ! मैं तेरे बच्चों का अथवा तेरा कुछ बिगाड़ने नहीं आया हूँ। मेरे गुरुदेव को रहे उदर-शूल में तेरा दूध ही एकमात्र इलाज है। मेरे लिए गुरुसेवा से बढ़कर इस संसार में दूसरी कोई वस्तु नहीं। हे माता ! मुझे मेरे सदगुरु की सेवा करने दे। तेरा दूध दुहने दे।' पशु भी प्रेम की भाषा समझते हैं। शिवाजी की प्रार्थना से एक महान आश्चर्य घटित हुआ – शिवाजी के रक्त की प्यासी बाघनी उनके आगे गौमाता बन गयी ! शिवाजी ने बाघनी के शरीर पर प्रेमपूर्वक हाथ फेरा और अवसर पाकर वे उसका दूध निकालने लगे। शिवाजी की प्रेमपूर्वक प्रार्थना का कितना प्रभाव ! दूध लेकर शिवा गुफा में आये।

समर्थ ने कहाः "आखिर तू बाघनी का दूध भी ले आया, शिवा ! जिसका शिष्य गुरुसेवा में अपने जीवन की बाजी लगा दे, प्राणों को हथेली पर रखकर मौत से जूझे, उसके गुरु को उदर-शूल कैसे रह सकता है? मेरा उदर-शूल तो जब तू बाघनी का दूध लेने गया, तभी अपने-आप शांत हो गया था। शिवा तू धन्य है ! धन्य है तेरी गुरुभक्ति ! तेरे जैसा एकनिष्ठ शिष्य पाकर मैं गौरव का अनुभव करता हूँ।" ऐसा कहकर समर्थ ने शिवाजी के प्रति ईर्ष्या रखनेवाले उन दो शिष्यों के सामने अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा। 'गुरुदेव शिवाजी को अधिक क्यों चाहते हैं?' – इसका रहस्य उनको समझ में आ गया। उनको इस बात की प्रतीति कराने के लिए ही गुरुदेव ने उदर-शूल की लीला की थी, इसका उन्हें ज्ञान हो गया।

अपने सदगुरु की प्रसन्नता के लिए अपने प्राणों तक बलिदान करने का सामर्थ्य रखनेवाले शिवाजी धन्य हैं ! धन्य हैं ऐसे सतशिष्य ! जो सदगुरु के हृदय में अपना स्थान बनाकर अमर पद प्राप्त कर लेते हैं.... धन्य है भारतमाता ! जहाँ ऐसे सदगुरु और सतशिष्य पाये जाते हैं।

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