स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

गणेश चतुर्थी 19 सितंबर 2012 Ganesh Chaturthi



भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मंगलमय अपरान्ह में भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था ।
इस दिन जितना हो सके 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का शांतिपूर्वक जप करना चाहिये ।

 श्रीगणेशस्तोत्र
श्रीगणेशाय नमः .
 नारद उवाच .
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् .
भक्तावासं स्मरेनित्यं आयुःकामार्थसिद्धये .. 1 ..
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् .
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् .. 2 ..
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च .
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् .. 3 ..
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् .
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् .. 4 ..
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः .
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरः प्रभुः .. 5 ..
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् .
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् .. 6 ..
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् .
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः .. 7 ..
अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् .
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः .. 8 ..

(परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग से संग्रहित)
एक बार जब भगवान गणेश  अपनी हर्षमय लय में घूम रहे थे ।  यह शुक्ल पक्ष का चौथा दिन  (चतुर्थी) था।  चन्द्र देव ने उन्हे देखा। चन्द्र देव को अपने रूप का बड़ा ही घमंड था । चंद्र देव ने  भगवान गणेश से एक कड़वे व्यंग्य के साथ कहा-  "क्या सुंदर रूप  है तुम्हारा !  एक बड़ा पेट और एक हाथी का सिर ...".
भगवान गणेश ने सोचा कि चन्द्र देव को उनके घमंड के लिए समुचित दण्ड दिये बिना उनका घमंड नहीं जाएगा।  भगवान गणेश ने कहा, " तुम्हारा चेहरा किसी को दिखाने के लायक नहीं होगा. "
उसके बाद चंद्रोदय नहीं हुआ । देवता चिंतित हो गए कि पृथ्वी का पोषण  बंद हो गया है ! औषधीय जड़ी बूटियाँ  समृद्ध कैसे होगी? दुनिया कैसे चलेगी?
भगवान ब्रह्मा ने कहा, " चंद्रमा की धृष्टता से भगवान गणेश नाराज है. "
देवताओं ने भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा की । जब भगवान गणेश प्रसन्न हुए तब  चंद्रमा का चेहरा दूसरों को दिखाने के लायक बन गया ।  चंद्रमा ने स्तुतियों से  भगवान गणेश से प्रार्थना की ।
भगवान गणेश ने कहा, "साल के अन्य दिनों में तुम्हारा चेहरा दिखाने लायक  होगा, लेकिन भाद्रपद के शुक्ल पक्ष के चौथे  दिन (जब तुमने मेरा अपमान किया)  जो कोई भी तुम्हें देखेगा वह एक साल के भीतर एक गंभीर आरोप के साथ बदनाम हो जाएगा। लोगों को यह संदेश  देना जरूरी है कि किसी को भी अपनी  शारीरिक सुंदरता और आकर्षण पर घमण्ड नहीं करना चाहिये ।
तुम मेरे जैसे एक आत्मोपलब्ध व्यक्तित्व की खिल्ली उड़ा रहे हो  ? तुम मेरे भौतिक शरीर के दोष देख रहे हो और अपनी बाहरी सुंदरता पर गर्व कर रहे हो ? तुम मेरा, स्वयं का और समस्त सुंदरता के  स्रोत का अपमान कर रहे हो जिसने तुम्हे बाहरी सौंदर्य  दिया है।  वह सर्व व्यापक है।  वह स्वयं भगवान नारायण, भगवान गणेश , भगवान शिव और सभी प्राणियों के रूप में देखा जाता है.  हे चन्द्र देव !  अपने बाहरी सुंदरता पर गर्व मत करो. "

भगवान कृष्ण  पर भी स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लगा था  क्योंकि उन्होने उसी चतुर्थी को चंद्रमा के दर्शन कर लिए थे। यहाँ तक कि उनके भाई बलराम भी आरोप लगाने वालों में शामिल हो गए, हालांकि , वास्तव में, भगवान कृष्ण ने स्यमंतक मणि नहीं चुराई थी ।

जिन लोगों को इस घटना पर विश्वास नहीं है, जिन्हे धर्मग्रंथों पर संदेह है वे भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी ( गणेश चतुर्थी ) को चंद्रमा को देखकर इसकी सच्चाई के परीक्षण हेतु आमंत्रित हैं।   सत्संग में कही गई शास्त्र की इस बात में अविश्वास का खामियाजा संदेहवादी भुगतेगा । एक साल के भीतर , वह एक ऐसे महान दोष का शिकार होगा जो  पूरी तरह से उसकी गरिमा को दूषित करेगा।

महत्वपूर्ण टिप्पणी:
इस साल गणेश चतुर्थी -19 सितंबर 2012 को है । गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा को देखना अत्यंत हानिकारक है. . इसलिए बहुत सावधान रहे और रात को चांद नहीं देखें ।  यदि  गणेश चतुर्थी  की रात को चंद्रमा के दर्शन हो जाए तो भले ही कोई मासूम हो, निश्चित रूप से उसकी बदनामी होगा ।
गणेश चतुर्थी की रात को चंद्रमा के दर्शन करने के कारण भगवान कृष्ण पर भी स्यमंतक मणि चुराने का आरोप लगा था।    तीज    और पंचमी की रातों को चन्द्र दर्शन करने से   गणेश चतुर्थी की रात को चन्द्र दर्शन के हानिकारक प्रभाव समाप्त होते है।
इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर चन्द्र अस्त रात 9.10 बजे का है । सायंकालीन संध्या से लेकर चंद्र अस्त ( रात 9.10बजे)  तक  अपने पूजा कक्ष में जप ध्यान करें।
अगर गलती से इस रात को चंद्र दर्शन हो जाए तो श्रीमद भागवत के दसवें स्कंद के 56 वें और 57 वें अध्याय में वर्णित  स्यमंतक मणि की चोरी के प्रकरण (नीचे दिया गया है) को पढ़ें या सुने ।

छप्पनवाँ अध्याय

स्यमन्तक मणि कथा,जाम्बवती और सत्यभामा के साथ श्रीकृष्ण का विवाह

श्री शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित ! सत्राजित ने श्रीकृष्ण को झूठा कलंक लगाया था। फिर उस अपराध का मार्जन करने के लिए उसने स्वयं स्यमन्तक मणि सहित अपनी कन्या सत्याभामा भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दी।

राजा परीक्षित ने पूछाः भगवन् ! सत्राजित ने भगवान श्रीकृष्ण का क्या अपराध किया था ? उसे स्यमंतक मणि कहाँ से मिली ? और उसने अपनी कन्या उन्हें क्यों दी ?

श्रीशुकदेव जी ने कहाः परीक्षित ! सत्राजित भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था। वे उसकी भक्ती से प्रसन्न होकर उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान ने ही प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे स्यमंतक मणि दी थी। सत्राजित उस मणि को गले में धारण कर ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। परीक्षित ! जब सत्राजित द्वारका आया, तब अत्यन्त तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान न सके। दूर से ही उसे देखकर लोगों की आँखें उसके तेज से चौंधिया गईं। लोगों ने समझा कि कदाचित स्वयं भगवान सूर्य आ रहे हैं। उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हें इस बात की सूचना दी। उस समय भगवान चौसर खेल रहे थे। लोगों ने कहाः 'शंख-चक्र-गदाधारी नारायण ! कमलनयन दामोदर ! यदुवंशशिरोमणि गोविन्द ! आपको नमस्कार है। जगदीश्वर देखिये, अपनी चमकीली किरणों से लोगों के नेत्रों को चौंधियाते हुए प्रचण्डरश्मि भगवान सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं। प्रभो ! सभी श्रेष्ठ देवता त्रिलोकी में आपकी प्राप्ति का मार्ग ढूँढते रहते हैं, किन्तु उसे पाते नहीं। आज आपको यदुवंश में छिपा हुआ जानकर स्वयं सूर्यनारायण आपका दर्शन करने आ रहे हैं।

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित ! अनजान पुरूषों की यह बात सुनकर कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण हँसने लगे। उन्होंने कहा- 'अरे, ये सूर्यदेव नहीं है। यह तो सत्राजित है, जो मणि के कारण इतना चमक रहा है। इसके बाद सत्राजित अपने समृद्ध घर में चला आया। घर पर उसके शुभागमन के उपलक्ष्य में मंगल-उत्सव मनाया जा रहा था। उसने ब्राह्मणों द्वारा स्यमंतक मणि को एक देवमन्दिर में स्थापित करा दिया। परीक्षित ! वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी। और जहाँ वह पूजित होकर रहती थी, वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीड़ा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा मायावियों का उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा- 'सत्राजित ! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो।' परन्तु वह इतना अर्थलोलुप-लोभी था कि भगवान की आज्ञा का उल्लंघन होगा, इसका कुछ भी विचार न करके उसे अस्वीकार कर दिया।

एक दिन सत्राजित के भाई प्रसेन ने उस परम प्रकाशमयी मणि को अपने गले में धारण कर लिया और फिर वह घोड़े पर सवार होकर शिकार खेलने वन में चला गया। वहाँ एक सिंह ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया। वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि मणि के लिए ऋक्षराज जाम्बवान् ने उसे मार डाला। उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चे को खेलने के लिए दे दी। अपने भाई प्रसेन के न लौटने से उसके भाई सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। वह कहने लगा, 'बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो, क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।' सत्राजित की यह बात सुनकर लोग आपस में काना-फूँसी करने लगे। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुना कि यह कलंक का टीका मेरे सिर लगाया गया है, तब वे उसे धो-बहाने के उद्देश्य से नगर के कुछ सभ्य पुरूषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूँढने के लिए वन में गये। वहाँ खोजते-खोजते लोगों ने देखा कि घोर जंगल में सिंह ने प्रसेन और उसके घोड़े को मार डाला है। जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते हुए आगे बढ़े, तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर रीछ ने सिंह को भी मार डाला है।

भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों को बाहर ही बिठा दिया और अकेले ही घोर अन्धकार से भरी हुई ऋक्षराज की भयंकर गुफा में प्रवेश किया। भगवान ने वहाँ जाकर देखा कि श्रेष्ठ मणि स्यमन्तक को बच्चों का खिलौना बना दिया गया है। वे उसे हर लेने की इच्छा से बच्चे के पास जा खड़े हुए। उस गुफा में एक अपरिचित मनुष्य को देखकर बच्चे की धाय भयभीत की भाँति चिल्ला उठी। उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली ऋक्षराज जाम्बवान क्रोधित होकर वहाँ दौड़ आये। परीक्षित ! जाम्बवान उस समय कुपित हो रहे थे। उन्हें भगवान की महिमा, उनके प्रभाव का पता न चला। उन्होंने एक साधारण मनुष्य समझ लिया और वे अपने स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगे। जिस प्रकार मांस के लिये दो बाज आपस में लड़ते हैं, वैसे ही विजयाभिलाषी भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवान आपस में घमासान युद्ध करने लगे। पहले तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार किया, फिर शिलाओं का तत्पश्चात वे वृक्ष उखाड़कर एक दूसरे पर फेंकने लगे। अन्त में उनमें बाहुयुद्ध होने लगा। परीक्षित ! वज्र-प्रहार के समान कठोर घूँसों की चोट से जाम्बवान के शरीर की एक एक गाँठ टूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीने से लथपथ हो गया। तब उन्होंने अत्यंत विस्मित-चकित होकर भगवान श्रीकृष्ण से कहा- 'प्रभो ! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक, पुराणपुरूष भगवान विष्णु हैं। आप ही सबके प्राण, इन्द्रियबल, मनोबल और शरीर बल हैं। आप विश्व के रचयिता ब्रह्मा आदि को भी बनाने वाले हैं। बनाये हुए पदार्थों में भी सत्तारूप से आप ही विराजमान हैं। काल के कितने भी अवयव है, उनके नियामक परम काल आप ही हैं और शरीर भेद से भिन्न-भिन्न प्रतीयमान अन्तरात्माओं के परम आत्मा भी आप ही हैं। प्रभो ! मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रों में तनिक सा क्रोध का भाव लेकर तिरछी दृष्टि से समुद्र की ओर देखा था। उस समय समुद्र के अंदर रहने वाल बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्र ने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उस पर सेतु बाँधकर सुन्दर यश की स्थापना की तथा लंका का विध्वंस किया। आपके बाणों से कट-कटकर राक्षसों के सिर पृथ्वी पर लोट रहे थे। (अवश्य ही आप मेरे वे ही राम जी श्रीकृष्ण के रूप में आये हैं।) परीक्षित ! जब ऋक्षराज जाम्बवान ने भगवान को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमल को उनके शरीर पर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपा से भरकर प्रेम गम्भीर वाणी से अपने भक्त जाम्बवान जी से कहा- ऋक्षराज ! हम मणि के लिए ही तुम्हारी इस गुफा में आये हैं। इस मणि के द्वारा मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूँ। भगवान के ऐसा कहने पर जाम्बवान बड़े आनन्द से उनकी पूजा करने के लिए अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण जिन लोगों को गुफा के बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिन तक उनकी प्रतीक्षा की। परन्तु जब उन्होंने देखा कि अब तक वे गुफा से नहीं निकले, तब वे अत्यंत दुःखी होकर द्वारका लौट गये। वहाँ जब माता देवकी, रूक्मणि, वसुदेव जी तथा अन्य सम्बन्धियों और कुटुम्बियों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफा से नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा शोक हुआ। सभी द्वारकावासी अत्यंत दुःखित होकर सत्राजित को भला बुरा कहने लगे और भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए महामाया दुगदिवी की शरण गये, उनकी उपासना करने लगे। उनकी उपासना से दुगदिवी प्रसन्न हुई और उन्होंने आशीर्वाद दिया। उसी समय उनके बीच में मणि और अपनी नववधू जाम्बवती के साथ सफलमनोरथ होकर श्रीकृष्ण होकर श्रीकृष्ण सबको प्रसन्न करते हुए प्रकट हो गये। सभी द्वारकावासी भगवान श्रीकृष्ण को पत्नी के साथ और गले में मणि धारण किये हुए देखकर परमानन्द में मग्न हो गये, मानो कोई मरकर लौट आया हो।

तदनन्तर भगवान ने सत्राजित को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित को सौंप दी। सत्राजित अत्यंत लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचे की ओर लटक गया। अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चाताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा। उसके मन की आँखों के सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। बलवान के साथ विरोध करने के कारण वह भयभीत भी हो गया था। अब वह यही सोचता रहता कि 'मैं अपने अपराध का मार्जन कैसे करूँ ? मुझ पर भगवान श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्न हों ? मैं ऐसा कौन सा काम करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो और लोग मुझे कोसे नहीं। सचमुच मैं अदूरदर्शी, क्षुद्र हूँ। धन के लोभ से मैं बड़ी मूढ़ता का काम कर बैठा। अब मैं रमणियों में रत्न के समान अपनी कन्या सत्याभामा और वह स्यमंतक मणि दोनों ही श्रीकृष्ण को दे दूँ। यह उपाय बहुत अच्छा है। इसी से मेरे अपराध का मार्जन हो सकता है, और कोई उपाय नहीं है। सत्राजित ने अपनी विवेक बुद्धि से ऐसा निश्चय करके स्वयं ही इसके लिए उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तक मणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्ण को अर्पण कर दीं। सत्यभामा शील स्वभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सदगुणों से सम्पन्न थी। बहुत से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिले और उन लोगों ने उन्हें माँगा भी था। परन्तु अब भगवान श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया। परीक्षित ! भगवान श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा- 'हम स्यमन्तक मणि न लेंगे। आप सूर्य भगवान के भक्त हैं, इसलिए वह आपके ही पास रहे। हम तो केवल उसके फल के अर्थात उससे निकले हुए सोने के अधिकारी हैं। वही आप हमें दे दिया करें।

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सत्तावनवाँ अध्याय

स्यमन्तक-हरण, शतधन्वा उद्धार और अक्रूर जी को फिर से द्वारका बुलाना

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित ! यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण को इस बात का पता था कि लाक्षागृह की आग से पाण्डवों का बाल भी बाँका न हुआ है, तथापि जब उन्होंने सुना कि कुन्ती और पाण्डव जल मरे, तब उस समय का कुल परम्परोचित व्यवहार करने के लिए वे बलराम जी के साथ हस्तिनापुर गये। वहाँ जाकर भीष्मपितामह, कृपाचार्य, विदुर, गान्धारी और द्रोणाचार्य से मिलकर उनके साथ समवेदना-सहानुभूति प्रकट की और उन लोगों से कहने लगे- 'हाय-हाय ! यह तो बड़े दुःख की बात हुई।'

भगवान श्रीकृष्ण के हस्तिनापुर चले जाने से द्वारका में अक्रूर और कृतवर्मा को अवसर मिल गया। उन लोगों ने शतधन्वा से आकर कहा – ‘तुम सत्राजित से मणि क्यों नहीं छीन लेते ? सत्राजित ने अपनी श्रेष्ठ कन्या का विवाह हमसे करने का वचन दिया था और अब उसने हमलोगों का तिरस्कार करके उसे श्रीकृष्ण के साथ ब्याह दिया है। अब सत्राजित भी अपने भाई प्रसेन की तरह क्यों न यमपुरी में जाय ?' शतधन्वा पापी था और अब तो उसकी मृत्यु भी उसके सिर पर नाच रही थी। अक्रूर और कृतवर्मा इस प्रकार बहकाने पर शतधन्वा उनकी बातों में आ गया और उस महादुष्ट ने लोभवश सोये हुए सत्राजित को मार डाला। इस समय स्त्रियाँ अनाथ के समान रोने चिल्लाने लगीं, परन्तु शतधन्वा ने उनकी ओर तनिक भी ध्यान न दिया, जैसे कसाई पशुओं की हत्या कर डालता है, वैसे ही वह सत्राजित को मारकर और मणि लेकर वहाँ से चम्पत हो गया।

सत्यभामा जी को यह देखकर कि मेरे पिता मार डाले गये हैं, बड़ा शोक हुआ और वे हाय पिता जी ! हाय पिता जी ! मैं मारी गयी – इस प्रकार पुकार पुकार कर विलाप करने लगीं। बीच बीच में बेहोश हो जातीं और होश में आने पर फिर विलाप करने लगतीं। इसके बाद उन्होंने अपने पिता के शव को तेल के कड़ाहे में रखवा दिया और आप हस्तिनापुर गयीं। उन्होंने बड़े दुःख से भगवान श्रीकृष्ण को अपने पिता की हत्या का वृत्तान्त सुनाया – यद्यपि इन बातों को भगवान श्रीकृष्ण पहले से ही जानते थे। परीक्षित ! सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने सब सुनकर मनुष्यों की सी लीला करते हुए अपनी आँखों में आँसू भर लिये और विलाप करने लगे कि 'अहो ! हम लोगों पर तो बहुत बड़ी विपत्ती आ पड़ी !' इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामाजी और बलरामजी के साथ हस्तिनापुर से द्वारका लौट आये और शतधन्वा मारने तथा उससे मणि छीनने का उद्योग करने लगे।

जब शतधन्वा को यह मालूम हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण मुझे मारने का उद्योग कर रहे हैं, तब वह बहुत डर गया और अपने प्राण बचाने के लिए उसने कृतवर्मा से सहायता माँगी। तब कृतवर्मा ने कहा - 'भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं। मैं उनका सामना नहीं कर सकता। भला, ऐसा कौन है, जो उनके साथ वैर बाँधकर इस लोक और परलोक में सकुशल रह सके ? तुम जानते हो कि कंस उन्हीं से द्वेष करने के कारण राज्यलक्ष्मी को खो बैठा और अपने अनुयायियों के साथ मारा गया। जरासन्ध जैसे शूरवीर को भी उनके सामने सत्रह बार मैदान में हारकर बिना रथ के ही अपनी राजधानी लौट जाना पड़ा था।' जब कृतवर्मा ने उसे इस प्रकार टका सा जवाब दे दिया, तब शतधन्वा ने सहायता के लिए अक्रूर जी से प्रार्थना की। उन्होंने कहा - 'भाई ! ऐसा कौन है, जो सर्वशक्तिमान भगवान का बल पौरूष जानकर भी उनसे वैर विरोध ठाने। जो भगवान खेल-खेल में ही इस विश्व की रचना, रक्षा और संहार करते हैं तथा जो कब क्या करना चाहते है – इस बात को माया से मोहित ब्रह्मा आदि विश्व विधाता भी नहीं समझ पाते, जिन्होंने सात वर्ष की अवस्था में – जब वे निरे बालक थे, एक हाथ से ही गिरिराज गोवर्द्धन को उखाड़ लिया और जैसे नन्हें-नन्हें बच्चे बरसाती छत्ते को उखाड़ हाथ में रख लेते हैं, वैसे ही खेल-खेल में सात दिनों तक उसे उठाय रखा, मैं तो उन भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार करता हूँ। उनके कर्म अदभुत हैं। वे अनन्त अनादि, एकरस और आत्मस्वरूप हैं। मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ। जब इस प्रकार अक्रूर जी ने भी उसे कोरा जवाब दे दिया, तब शतधन्वा ने स्यमन्तक मणि उन्हीं के पास रख दी और आप चार सौ कोस लगातार चलने वाले घोड़े पर सवार होकर वहाँ से बड़ी फुर्ती से भागा।

परीक्षित ! भगवान श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई अपने उस रथ पर सवार हुए, जिस पर गरूड़चिन्ह से चिन्हित ध्वजा फहरा रही थी और बड़े वेगवाले घोड़े जुते हुए थे। अब उन्होंने अपने श्वसुर सत्राजित को मारने वाले शतधन्वा का पीछा किया। मिथिलापुरी के निकट एक उपवन में शतधन्वा का घोड़ा गिर पड़ा, अब वह उसे छोड़कर पैदल ही भागा। वह अत्यन्त भयभीत हो गया था। भगवान श्रीकृष्ण भी क्रोध करके उसके पीछे दौड़े। शतधन्वा पैदल ही भाग रहा था, इसलिए भगवान ने पैदल ही दौड़कर अपने तीक्ष्ण धार वाले चक्र से उसका सिर उतार लिया और उसके वस्त्रों में स्यमंतक मणि को ढूँढा। परन्तु जब मणि नहीं मिली तब भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े भाई बलराम जी के पास आकर कहा - 'हमने शतधन्वा को व्यर्थ ही मारा। क्योंकि उसके पास स्यमंतक मणि तो है ही नहीं। बलराम जी ने कहा - 'इसमे सन्देह नहीं कि शतधन्वा ने स्यमंतक मणि को किसी न किसी के पास रख दिया है। अब तुम द्वारका जाओ और उसका पता लगाओ। मैं विदेहराज से मिलना चाहता हूँ, क्योंकि वे मेरे बहुत ही प्रिय मित्र हैं।' परीक्षित ! यह कहकर यदुवंश शिरोमणि बलराम जी मिथिला नगरी में चले गये। जब मिथिला नरेश ने देखा कि पूजनीय बलरामजी महाराज पधारे हैं, तब उनका हृदय आनन्द से भर गया। उन्होंने झटपट अपने आसन से उठकर अनेक सामग्रियों से उनकी पूजा की। इसके बाद भगवान बलराम जी कई वर्षों तक मिथिला पुरी में ही रहे। महात्मा जनक ने बड़े प्रेम और सम्मान से उन्हें रखा। इसके बाद समय पर धृतराष्ट के पुत्र दुर्योधन ने बलराम जी से गदायुद्ध की शिक्षा ग्रहण की। अपनी प्रिय सत्यभामा का प्रिय कार्य करके भगवानश्रीकृष्ण द्वारका लौट आये और उनको यह समाचार सुना दिया कि शतधन्वा को मार डाला गया, परन्तु स्यमंतकमणि उसके पास न मिली। इसके बाद उन्होंने भाई बन्धुओं के साथ अपने श्वसुर सत्राजित की वे सब और्ध्वदेहिक क्रियाएँ करवायीं, जिनसे मृतक प्राणी का परलोक सुधरता है।

अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को सत्राजित के वध के लिए उत्तेजित किया था। इसलिए जब उन्होंने सुना कि भगवान श्रीकृष्ण ने शतधन्वा को मार डाला है, तब वे अत्यंत भयभीत होकर द्वारका से भाग खड़े हुए। परिक्षित ! कुछ लोग ऐसा मानते है कि अक्रूर के द्वारका से चले जाने पर द्वारकावासियों को बहुत प्रकार के अनिष्टों और अरिष्टों का सामना करना पड़ा। परन्तु जो लोग ऐसा कहते हैं, वे पहले कही हुई बातों को भूल जाते हैं। भला, यह भी कभी सम्भव है कि जिन भगवान श्रीकृष्ण में समस्त ऋषि-मुनि निवास करते हैं, उनके निवासस्थान द्वारका में उनके रहते कोई उपद्रव खड़ा हो जाय। उस समय नगर के बड़े-बूढ़े लोगों ने कहा - 'एक बार काशी नरेश के राज्य में वर्षा नहीं हो रही थी, सूखा पड़ गया था। तब उन्होंने अपने राज्य में आये हुए अक्रूर के पिता श्वफल्क को अपनी पुत्री गान्दिनी ब्याह दी। तब उस प्रदेश में वर्षा हुई। अक्रूर भी श्वफल्क के ही पुत्र हैं और इनका प्रभाव भी वैसा ही है। इसलिए जहाँ-जहाँ अक्रूर रहते हैं, वहाँ-वहाँ खूब वर्षा होती है तथा किसी प्रकार का कष्ट और महामारी आदि उपद्रव नहीं होते।' परीक्षित ! उन लोगों की बात सुनकर भगवान ने सोचा कि 'इस उपद्रव का यही कारण नहीं है' यह जानकर भी भगवान ने दूत भेजकर अक्रूर को ढुँढवाया और आने पर उनसे बातचीत की। भगवान ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया और मीठी-मीठी प्रेम की बातें कहकर उनसे सम्भाषण किया। परीक्षित ! भगवान सबके चित्त का एक-एक संकल्प देखते रहते हैं। इसलिए उन्होंने मुस्कराते हुए अक्रूर से कहा - 'चाचा जी ! आप दान धर्म के पालक हैं। हमें यह बात पहले से ही मालूम है कि शतधन्वा आपके पास वह स्यमन्तक मणि छोड़ गया है, जो बड़ी ही प्रकाशमान और धन देने वाली है। आप जानते ही हैं कि सत्राजित के कोई पुत्र नहीं है। इसलिए उनकी लड़की के लड़के – उनके नाती ही उन्हें तिलाँजली और पिण्डदान करेंगे, उनका ऋण चुकायेंगे और जो कुछ बच रहेगा उसके उत्तराधिकारी होंगे। इस प्रकार शास्त्रीय दृष्टि से यद्यपि स्यमन्तक मणि हमारे पुत्रों को ही मिलनी चाहिए, तथापि वह मणि आपके ही पास रहे। क्योंकि आप बड़े व्रतनिष्ठ और पवित्रात्मा हैं तथा दूसरों के लिए उस मणि को रखना अत्यन्त कठिन भी है। परन्तु हमारे सामने एक बहुत बड़ी कठिनाई यह आ गयी है कि हमारे बड़े भाई बलराम जी मणि के सम्बन्ध में मेरी बात का पूरा विश्वास नहीं करते। इसलिए महाभाग्यवान अक्रूर जी ! आप वह मणि दिखाकर हमारे इष्टमित्र – बलराम जी, सत्यभामा और जाम्बती का सन्देह दूर कर दीजिए और उनके हृदय में शान्ति का संचार कीजिए। हमें पता है कि उसी मणि के प्रताप से आजकल आप लगातार ही ऐसे यज्ञ करते रहते हैं, जिसमें सोने की वेदियाँ बनती हैं। परीक्षित ! जब भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार सान्तवना देकर उन्हें समझाया-बुझाया, तब अक्रूर जी ने वस्त्र में लपेटी हुई सूर्य के समान प्रकाशमान वह मणि निकाली और भगवान श्रीकृष्ण को दे दी। भगवान श्रीकृष्ण ने वह स्यमंतक मणि अपने जाति-भाईयों को दिखाकर अपना कलंक दूर कर दिया और उसे अपने पास रखने में समर्थ होने पर भी पुनः अक्रूर जी को लौटा दिया।

सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण के पराक्रम से परिपूर्ण यह आख्यान समस्त पापों, अपराधों और कलंकों का मार्जन करने वाला तथा परम मंगलमय है। जो इसे पढ़ता, सुनता अथवा स्मरण करता है, वह हर प्रकार की अपकीर्ति और पापों से छूटकर शान्ति का अनुभव करता है।

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यदि कोई मनुष्य अनिच्छा से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी के चन्द्रमा को देख ले तो उसे निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए । ऐसा करने से वह तत्काल शुद्ध हो भूतल पर निष्कलंक बना रहता है । जल को पवित्र करने का मंत्र इस प्रकार है:

सिहः प्रसेनमवधीत सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥

’सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत । अब इस स्यमन्तक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है ।’

ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्याय ७८

ऐसी निष्ठा कि मंत्र हुआ साकार.....

सन् 1501 में विजय नगर राज्य के बाड़ ग्राम(वर्तमान में कर्नाटक के हवेरी जिले का एक गाँव) में जागीरदार वीरप्पा व उनकी पत्नी बच्चम्मा के यहाँ एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया कनक। इनकी जाति कुरुब (भेड़-बकरी चराने वाले) थी। बचपन में ही इनके पिता का स्वर्गवास हो गया। बड़े होने पर पिता की जागीरदार इन्होंने सँभाल ली। एक बार भूमि शोधन करते समय कनक को भूमिगत अपार धनराशि मिली। उसके बाद इनका नाम कनकनायक पड़ा। इन्होंने उस धन से कागीनेले गाँव में भगवान केशव का भव्य देवालय बनवाया।
एक रात स्वप्न में कनकनायक को भगवान ने कहाः "कनका ! तू मेरी शरण में आ जा !"
स्वप्न में ही वे बोलेः "शरण ? भीख माँग कर जीने के लिए मैं क्यों दास बनूँ ? मैं तो राजा बनना चाहता हूँ।"
कुछ समय बाद उनकी पत्न और माँ की मृत्यु हो गयी। एक दिन पुनः भगवान स्वप्न में आकर बोलेः "कनका ! मेरी बात भूल गया ?"
"जागीरदारी छोड़कर भिक्षा माँगकर क्यों खाऊँ ?"
"जागीरदारी गयी तो ?"
"बकरी चराऊँगा।"
"बकरी चराने को तैयार है, मेरा बनने को नहीं ?"
"अઽઽઽ.....ʹ कनक की नींद टूट गयी। सोचा, ʹयह क्या मुसीबत है ! भगवान क्यों मेरे पीछे पड़े हैं ! पिता मर गये, पत्नी मर गयी, माँ मर गयी, अब हरि का दास बनकर भीख माँगना बाकी रहा क्या !"
कुछ समय बाद उस क्षेत्र में घमासान युद्ध हुआ। उसमें कनक का पूरा शरीर बाणों से छलनी हो गया। ऐसी विषम परिस्थिति में उऩ्हें अब एक ही सहारा जान पड़ा। वे ʹकेशव.... केशव....ʹ पुकारते हुए बेहोश हो गये। शत्रु उन्हें मरा हुआ समझ छोड़ के चले गये।
भगवान मनुष्यरूप में आये और कनक को जगाया। कनक ने पूछाः "आप कौन हैं ?"
भगवान बोलेः "क्या कनका ! इतनी जल्दी मुझे भूल गया ? इस तरह युद्ध करके लाशों के बीच गिरने में सुख है या मेरा बनने में सुख है, बताओ ?"
"अभी मेरे पूरे शरीर में बहुत दर्द हो रहा है, ठीक होने पर आपको बता दूँगा।"
"मैं अभी ठीक कर देता हूँ।"
भगवान का स्पर्श होते ही कनक का सारा दर्द दूर होकर शरीर पुलकित हो गया। वे बोलेः "प्रभु ! आप इतनी परीक्षा क्यों ले रहे हैं  ? मैं आपका बना तो जैसा बोलूँगा वैसा आप करोगे ?"
"हाँ करूँगा।"
"तो ठीक है, मैं जब भी स्मरण करूँ आप दर्शन देना और अभी अपना असली रूप दिखाइये।"
भगवान ने अपना मनोहर चतुर्भुज रूप का दर्शन कराया, जिसे देखकर कनक की भाव समाधि लग गयी और वे वहीं मौन, शांत अवस्था में बैठे रहे। अब तन तो वही था किंतु मन परिवर्तित हो गया, जीवन ने करवट ली। कनक नामक शरीर में स्थित वैराग्यरूपी असली कनक अपनी पूर्ण कांति के साथ देदीप्यमान हो रहा था। जब उन्होंने होश सँभाला तो घर आये और अपना सारा काम काज दूसरों को सौंप दिया। ʹकेशव.. केशव.....ʹ की पुकार गाँव की गलियों में गूँज उठी औऱ थोड़े समय में लोगों ने देखा कि भगवान केशव के मंदिर में कनक अपने आँसुओं से प्रभु का चरणाभिषेक कर रहे हैं।
कनक के कल्याण का जिम्मा अब उनके प्रभु ने उठा लिया था। जब भगवान अपने भक्त का परम कल्याण करना चाहते हैं तो सदगुरुरूप में उसके जीवन में प्रवेश करते हैं, साथ ही भक्त को अपना पता भी बता देते हैं।
मध्यरात्रि हुई। कनक ने स्वप्न देखा। भगवान स्नेहभरी दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए कह रहे थेः "कनका ! तू मुझे हमेशा अपने पास देखना चाहता है न ! तो मैं तुम्हारे जीवन में ब्रह्मज्ञान सदगुरु के रूप में प्रवेश करूँगा। अब तू देर न कर, श्रीव्यासराय जी से दीक्षा ले ले। जब गुरु उपदेश से तू मुझे तत्त्वरूप से जान लेगा तो मैं तुझसे बिछुड़ ही नहीं सकता। फिर तू अत्यन्त प्यारा हो जायेगा।"
कनक गुरु व्यासराय जी को ढूँढने के लिए निकल पड़े। उस समय व्यासराय जी मदनपल्ली प्रांत (आन्ध्र प्रदेश) में एक बड़ा तालाब बनवा रहे थे। तालाब के सामन स्थित बड़े पत्थरों को कैसे हटायें, ऐसा सोच रहे थे कि इतने में कनक वहाँ पहुँच गये और उन्हें प्रणाम किया।
व्यासराय जी ने पूछाः "तुम कौन हो ?"
"जी कनक, बकरी चराने वाला।"
"क्यों आये हो ?"
"गुरुदेव ! आपसे मंत्र-उपदेश लेने आया हूँ।"
"बकरी चराने वाले को क्या मंत्र देना ? ʹभैंसाʹ मंत्र !"
मरुभूमि में प्यास के मारे भटकते पथिक को जल का स्रोत मिल गया। सूखते तालाब में छटपटाती मछली को महासागर मिल गया। कनक का मन मयूर झूम उठाः ʹमिल गया गुरुमंत्र !ʹ उन्होंने बड़े प्रेमभाव से गुरु जी को प्रणाम किया और आज्ञा लेकर निर्जन स्थान में एक पेड़ के नीचे बैठ के ʹभैंसा-भैंसाʹ जपने लगे। उनकी गुरु निष्ठा और निर्दोष, सात्त्विक श्रद्धा से भगवान यमराज का वाहन भैंसा सामने प्रकट होकर गम्भीर आवाज में बोलाः "क्या चाहिए ?"
कनक ने उसे ले जाकर व्यासराय जी के सामने खड़ा कर दिया। निवेदन कियाः "गुरुदेव ! आपका मंत्र प्रकट रूप धारण कर चुका है। इसका क्या करूँ ?"
व्यासराय जीः साधो ! साधो !! निष्ठा इसी का नाम है। तुममे शिष्य बनने के लक्षण हैं। अब इस विशालकाय भैंसे से तालाब के सामने में जो बड़े बड़े पत्थर हैं, उनको हटवा दो !"
कनक ने गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर उस भैंसे से कार्य पूर्ण कराया। कनक की निष्ठा देखकर व्यासरायजी का हृदय छलक उठा और उन्हें विधिवत् मंत्रदीक्षा दे के अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।
उस दिन से कनक का नाम कनकदास। कनकदासजी कर्नाटक के सुविख्यात संतों में से एक हैं। इनके कीर्तन कर्नाटक में अत्यन्त लोकप्रिय हैं। ये कीर्तन हरिभक्ति से ओतप्रोत होने के साथ ही इनमें आध्यात्मिक गहराई भी झलकती है। आप  लिखते हैं-

साधु संग कोट्टु, निन्न पादभजनेयित्तु।
एन्न भेदमाडि नोडदिरू, अधोक्षज।।
ʹहे अधोक्षज (विष्णु जी) ! साधु का संग और अपने चरणों का स्मरण देना। आप मुझे भेदबुद्धि से मत देखना (मुझे नजरअंदाज न करना)।ʹ
ज्ञान भक्ति कोट्टु, निन्न ध्यानदिल्ल इट्टु।
सदा हीन बुद्धी बिडिसु मुन्न, जनार्दन।।
ʹहे जनार्दन ! मुझे ज्ञान, भक्ति दीजिये। मुझे आपके ध्यान में तल्लीन रखिये। हमेशा के लिए मेरी हीन बुद्धि दूर कीजिये।ʹ
पुट्टिसलु बेड मुन्दे पुट्टिसिदके पालिसिन्नु।
इष्टु मात्र बेडिकोम्बे, श्री कृष्णने।।
ʹहे श्रीकृष्ण ! अब आगे जन्म नहीं देना। मुझे पैदा किया है तो मेरा पालन कीजिये, केवल इतनी ही प्रार्थना करता हूँ।ʹ

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2012, अंक 234, पृष्ठ संख्या 14,15

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वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि और उसका महत्व





प्रतिवर्ष श्रावणी-पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार होता है, इस दिन बहनें अपने भाई को रक्षा-सूत्र बांधती हैं । यह रक्षा सूत्र यदि वैदिक रीति से बनाईजाए तो शास्त्रों में उसका बड़ा महत्व है ।

वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि:
 सके लिए ५ वस्तुओं की आवश्यकता होती है

(१) दूर्वा (घास) (२) अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने ।
इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे
कलावा में पिरो दें, इस प्रकार वैदिक राखी तैयार हो जाएगी ।
इन पांच वस्तुओं का महत्त्व
(१) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और
हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों
का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बदता जाए । दूर्वा
गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों
का नाश हो जाए ।
(२) अक्षत - हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत
रहे ।
(३) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह
तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो ।
(४) चन्दन - चन्दन की प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार
उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार,  सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे ।
(५) सरसों के दाने - सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत
मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें
इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम गुरुदेव के
श्री-चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी
अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे ।
महाभारत में यह रक्षा सूत्र माता कुंती ने अपने पोते अभिमन्यु को बाँधी थी । जब
तक यह धागा अभिमन्यु के हाथ में था तब तक उसकी रक्षा हुई, धागा टूटने पर
अभिमन्यु की मृत्यु हुई ।
इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार
बांधते हैं हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सूखी रहते हैं ।
रक्षा सूत्र बांधते समय ये श्लोक बोलें
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वाम रक्ष बध्नामि, रक्षे माचल माचल: ||

कैसा करूणावान हृदय......


पूज्य बापू जी पावन अमृतवाणी
ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ऋभु मुनि जन्मजात ज्ञातज्ञेय थे, फिर भी वैदिक मर्यादा का पालन करने के लिए अपने बड़े भाई सनत्सुजात से दीक्षित हो गये एवं अपने आत्मानंद में परितृप्त रहने लगे। ऋभु मुनि ऐसे विलक्षण परमहंस कोटि के साधु हुए कि उनके शरीर पर कौपीनमात्र था। उऩकी देह ही उनका आश्रम थी, अन्य कोई आश्रम उन्होंने नहीं बनाया, इतने विरक्त महात्मा थे। पूरा विश्व अपने आत्मा का ही विलास है, ऐसा समझकर वे सर्वत्र विचरते रहते थे।
एक बार विचरण करते-करते वे पुलस्त्य ऋषि के आश्रम में पहुँचे। पुलस्त्य जी का पुत्र निदाघ वेदाध्ययन कर रहा था। उसकी बुद्धि कुछ गुणग्राही थी। उसने देखा कि अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित कोई आत्मारामी संत पधारे हैं। उठकर उसने ऋभु मुनि का अभिवादन किया। ऋभु मुनि ने उसका आतिथ्य स्वीकार किया।
जैसे रहूगण राजा पहचान गय़े थे कि जड़भरत आत्मारामी संत हैं, परीक्षित और अन्य ऋषि पहचान गये थे कि शुकदेव जी आत्मवेत्ता महापुरुष हैं, ऐसे ही आश्रम में रहते-रहते निदाघ इतना पवित्र हो गया था कि उसने भी पहचान लिया कि ऋभु मुनि आत्मज्ञानी महापुरुष हैं। आत्मवेत्ता ऋभु मुनि को पहचानते ही उसका हृदय ब्रह्मभाव से पावन होने लगा। उसे हुआ कि ʹमैं अपने पिता के आश्रम में रहता हूँ इसलिए पिता-पुत्र का संबंध होने के कारण कहीं मेरी आध्यात्मिक यात्रा अधूरी न रह जाय।ʹ उसने ऋभु मुनि के श्रीचरणों में दंडवत प्रणाम किया। ऋभु मुनि को भी पता चल गया कि यह अधिकारी है।
जब ऋभु मुनि चलने को उद्यत हुए तो निदाघ साथ में चल पड़ा। एकांत अरण्य से गुजरते हुए दोनों किसी सरिता के किनारे कुछ दिन रहे। गुरु-शिष्य कंदमूल, फल का भोजन करते, आत्मा-परमात्मा की चर्चा करते। सेवा में निदाघ की तत्परता एवं त्याग देखकर ऋभु मुनि ने उसे तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया।
कुछ समय के पश्चात ऋभु मुनि को पता चला कि निदाघ ब्रह्मज्ञान का श्रवण एवं साधना तो करता है किंतु इसकी वासना अभी पूर्ण रूप से मिटी नहीं है। अतः उन्होंने निदाघ को आज्ञा दीः "बेटा ! अब गृहस्थ-धर्म का पालन करो और गृहस्थी में रहते हुए मेरे दिये ज्ञान का खूब मनन निदिध्यासन करके अपने मूल स्वभाव में जाग जाओ।"
गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर निदाघ अपने पिता के पास आया। पिता ने उसका विवाह कर दिया। इसके पश्चात निदाघ देविका नदी के तट पर वीरनगर के पास अपना आश्रम बनाकर निवास करने लगा। वर्ष पर वर्ष बीतने लगे।
ब्रह्मवेत्ता महापुरुष जिसका हाथ पकड़ते हैं, वह अगर उनमें श्रद्धा रखता है तो वे कृपालु महापुरुष उस पर निगरानी रखते हैं कि साधक कही भटक न जाय.... कैसे भी करके संसार से पार हो जाये।
एक दिन ऋभु मुनि के मन में हुआ कि ʹमेरे शिष्य निदाघ की क्या स्थिति हुई होगी ? चलो, देख आयें।ʹ परमहंस के वेश में वे निदाघ की कुटिया पर पहुँच गये। निदाघ उन्हें पहचान न पाया लेकिन साधु-संत मानकर उनका सत्कार किया, उन्हें भोजन कराया। फिर विश्राम के लिए ऋभु मुनि लेटे तो निदाघ पास में बैठकर पंखा झलने लगा। निदाघ ने पूछाः "महात्माजी ! भोजन तो ठीक था न ? आप तृप्त तो हुए न ? अब आपकी थकान मिट रही है न ?"
ऋभु मुनि समझ गये कि शिष्य ने मुझे पहचाना नहीं है। जो अपने-आपको ही नहीं पहचानता, वह गुरु को कैसे पहचानेगा ? गुरु को पहचानेगा भी तो उनके बाहर के रूप आकार को। बाहर के रंग-रूप, वेश बदल गये तो पहचान भी बदल जायेगी। जितने अंश में आदमी अपने को जानता है, उतने ही अंश में वह  ब्रह्मवेत्ता गुरुओं की महानता का एहसास करता है। सदगुरु को जान ले, अपने को पहचान ले, अपने को पहचान ले तो सदगुरु को जान ले।
जिनकी बुद्धि सदा ब्रह्म में रमण करती थी, ऐसे कृपालु भगवान ऋभु ने निदाघ का कल्याण करने के लिए कहाः "भूख मिटी या नहीं मिटी, यह मुझसे क्यों पूछता है ? मैंने भोजन किया ही नहीं है। भूख मुझे कभी लगती ही नहीं है। भूख और प्यास प्राणों को लगती है लेकिन अज्ञानी समझता है कि ʹमुझे भूख प्यास लगी...ʹ मानो, दो चार घंटों के लिए भूख-प्यास मिटेगी भी तो फिर लगेगी।
थकान शरीर को लगती है। बहुत बहुत तो मन उससे तादात्म्य (देहभाव) करेगा तो मन को लगेगी। मुझ चैतन्य को, असंग द्रष्टा को कभी भूख-प्यास, थकान नहीं लगती। तू प्राणों से ही पूछ कि भूख-प्यास मिटी कि नहीं। शरीर से ही पूछ कि थकान मिटी की नहीं। जिसको कभी थकान छू तक नही सकती, उसको तू न पूछता है कि थकान मिटी कि नहीं ?
थकान की नहीं पहुँच है मुझ तक....
भूख प्यास  तो है प्राणों का स्वभाव।
मैं हूँ असंग, निर्लेपी, निर्भाव।।
निदाघ ने कहाः "आप जैसा बोलते हैं, मेरे गुरुदेव भी ऐसा ही बोलते थे। आप जिस प्रकार का ज्ञान दे रहे हैं, ऐसा ही ज्ञान मेरे गुरुदेव देते थे.... आप तो मेरे गुरुदेव लगत हैं।"
ऋभु मुनिः "लगते क्या हैं ? हैं ही नादान ! मैं ऋभु मुनि ही हूँ। तूने गृहस्थी के जटिल व्यवहार में आत्मविद्या को ही भुला दिया!"
निदाघ ने पैर  पकड़ता हुए कहाः "गुरुदेव ! आप ?"
निदाघ ने गुरुदेव से क्षमा याचना की। ऋभु मुनि उसे आत्मज्ञान का थोड़ा सा उपदेश देकर चल दिये। कुछ वर्ष और बीत गये। विचरण करते-करते ऋभु मुनि एक बार फिर वहीं पधारे, अपने शिष्य निदाघ की खबर लेने।
उस वक्त वीरपुरनरेश की सवारी जा रही थी और निदाघ सवारी देखने के लिए खड़ा था। ऋभु मुनि उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने सोचा, ʹनिदाघ तन्मय हो गया है सवारी देखने में। आँखों को ऐसा भोजन करा रहा है कि शायद उसके मन में आ जाय कि ʹमैं राजा बन जाऊँ।ʹ राजेश्वर से भोगेश्वर.... पुण्यों के बल से राजा बन जायेगा तो फिर पुण्यनाश हो जायेगा और नरक में जा गिरेगा। एक बार हाथ पकड़ा है तो उसको किनारे लगाना ही है।ʹ
कैसा करूणाभर हृदय होता है सदगुरु का ! कहीं साधक फिसल न जाय, भटक न जाय...
ऋभु मुनि ने पूछाः "यह सब क्या है ?"
निदाघः "यह राजा की शोभायात्रा है।"
"इसमें राजा कौन और प्रजा कौन?"
"जो हाथी पर बैठा है वह राजा है और जो पैदल चल रहे हैं वे प्रजा हैं।"
"हाथी कौन है ?"
"राजा जिस पर बैठा है वह चार पैर वाला पर्वतकाय प्राणी हाथी है। महाराज ! इतना भी नहीं समझते ?"
निदाघ प्रश्न सुनकर चिढ़ने लगा था लेकिन ऋभु मुनि स्वस्थ चित्त से पूछते ही जा रहे थेः "हाँ.... राजा जिस पर बैठा है वह हाथी है और हाथी पर जो बैठा है वह राजा है। अच्छा.... तो राजा और हाथी में क्या फर्क है ?"
अब निदाघ को गुस्सा आ गया। छलाँग मारकर वह ऋभु मुनि के कंधों पर चढ़ गया और बोलाः "देखो, मैं तुम पर चढ़ गया हूँ तो मैं राजा हूँ और तुम हाथी हो। यह हाथी और राजा में फर्क है।"
फिर भी शांतात्मा, क्षमा की मूर्ति ब्रह्मवेत्ता ऋभु मुनि निदाघ से कहने लगेः "इसमें ʹमैंʹ और ʹतुमʹ किसको बोलते हैं ?"
निदाघ सोच में पड़ गया। प्रश्न अटपटा था। फिर भी बोलाः "जो ऊपर है वह ʹमैंʹ हूँ और जो नीचे है वह ʹतुमʹ है।"
ʹकिंतु ʹमैंʹ और ʹतुमʹ में क्या फर्क है ? हाथी भी पाँच भूतों का है और राजा भी पाँच भूतों का है। मेरा शरीर भी पाँच भूतों का है और तुम्हारा शरीर भी पाँच भूतों का है। एक ही वृक्ष की दो डालियाँ आपस में टकराती हैं अथवा विपरीत दिशा में जाती हैं पर दोनों में रस एक ही मूल से आता है। इसी प्रकार ʹमैंʹ और ʹतुमʹ एक ही सत्ता से स्फुरित होते हैं तो दोनों में फर्क क्या रहा         ?"
निदाघ चौंकाः ʹअरे ! बात बात में आत्मज्ञान का ऐसा अमृत परोसने वाले मेरे गुरुदेव ही हो सकते हैं, दूसरे का यह काम नहीं ! ऐसी बातें तो मेरे गुरुदेव ही कहा करते थे।
वह झट से नीचे उतरा और गौर से निहारा तो वे ही गुरुदेव ! निदाघ उनके चरणों में लिपट गयाः "गुरुदेव.... ! गुरुदेव...! क्षमा करो। घोर अपराध हो गया। कैसा भी हूँ, आपका बालक हूँ। क्षमा करो प्रभु !"
ऋभु मुनि वही तत्त्वचर्चा आगे बढ़ाते हुए बोलेः "क्षमा माँगने वाले में और क्षमा देने वाले में मूल धातु कौन सी है ?"
"हे भगवन् ! क्षमा माँगने वाले में और क्षमा देने वाले में मूल धातु वही आत्मदेव है, जिसमें मुझे जगाने के लिए आप करूणावान तत्पर हुए हैं। हे गुरुदेव ! मैं संसार के मायाजाल में कहीं उलझ न जाऊँ, इसलिए आप मुझे जगाने के लिए कैसे कैसे रूप धारण करके आते हैं ! हे प्रभु ! आपकी बड़ी कृपा है।"
"बेटा ! तुझे जो ज्ञान मिला था, उसमें तेरी तत्परता न होने के कारण इतने वर्ष व्यर्थ बीत गये, उसे तू भूल गया। संसार की मोहनिशा में सोता रह गया। संसार के इस मिथ्या दृश्य को सत्य मानता रह गया। जब-जब जिसकी जैसी-जैसी दृष्टि होती है, तब-तब उसे संसार वैसा वैसा ही भासता है। इस संसार का आधार जो परमात्मा है, उसको जब तक नहीं जाना तब तक ऐसी गलतियाँ होती ही रहेंगी। अतः हे निदाघ ! अब तू जाग। परमात्म तत्त्व का विचार कर अपने निज आत्मदेव को जान ले, फिर संसार में रहकर भी तू संसार से अलिप्त रह सकेगा।"
निदाघ ने उनकी बड़ी स्तुति की। ऋभु मुनि की कृपा से निदाघ आत्मनिष्ठ हो गया।
ऋभु मुनि की इस क्षमाशीलता को सुनकर सनकादि मुनियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उऩ्होंने ब्रह्माजी के सामने उनकी महिमा गायी और ʹक्षमाʹ का एक अक्षर ʹक्षʹ लेकर उनका नाम ʹऋभुक्षʹ रख दिया। तब से लोग उन्हें ऋभुक्षानंद के नाम से स्मरण करते हैं।
कैसा करुणावान हृदय होता है सदगुरु का !
हे सदगुरुदेव ! तुम्हारी महिमा है बड़ी निराली।
किन-किन युक्तियों से करते शिष्यों की उन्नति।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2012, अंक 234, पृष्ठ संख्या 6,7,8
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बारह प्रकार के गुरु

पूज्य बापू जी की अमृतवाणी


ʹनामचिंतामणिʹ ग्रन्थ में गुरुओं के बारह प्रकार बताये हैं।

एक होते हैं धातुवादी गुरु। ʹबच्चा! मंत्र ले लिया, अब जाओ तीर्थाटन करो। भिक्षा माँग के खाओ अथवा घर का खाओ तो ऐसा खाओ, वैसा न खाओ। लहसुन न खाना, प्याज न खाना, यह करना, वह न करना। इस बर्तन में भोजन करना, ऐसे सोना।ʹ - ऐसी  विभिन्न बातें बताकर अंत में ज्ञानोपदेश देने वाले धातुवादी गुरु होते हैं।
दूसरे होते हैं चंदन गुरु। जिस प्रकार चंदन वृक्ष अपने निकट के वृक्षों को भी सुगन्धित बना देता है, ऐसे ही अपने सान्निध्य द्वारा शिष्य को तारने वाले गुरु चन्दन गुरु होते हैं। चंदन गुरु वाणी से नहीं, आचरण से हममें संस्कार भर देते हैं। उनकी सुवास का चिंतन करके हम भी अपने समाज में सुवासित होने के काबिल होते हैं।
तीसरे होते हैं विचारप्रधान गुरु। जो सार है वह ब्रह्म-परमात्मा है, असार है अष्टधा प्रकृति का शरीर। प्रकृति का शरीर प्रकृति के नियम से रहे लेकिन आप अपने ब्रह्म-स्वभाव में रहें – इस प्रकार का विवेक जगाने वाले आत्म-विचारप्रधान गुरु होते हैं।
चौथे होते हैं अनुग्रह-कृपाप्रधान गुरु। अपनी अऩुग्रह-कृपा द्वारा अपने शिष्यों का पोषण कर दें, दीदार दें दें, मार्गदर्शन दे दें, अच्छा काम करें तो प्रोत्साहित कर दें, गड़बड़ करें तो गुरू की मूर्ति मानो नाराज हो रही है ऐसे गुरु भी होते हैं।
पाँचवें होते हैं पारस गुरु। जैसे पारस अपने स्पर्श से लोहे को सोना कर देता है, ऐसे ही ये गुरु अपने हाथ का स्पर्श अथवा अपनी स्पर्श की हुई वस्तु का स्पर्श कराके हमारे चित्त के दोषों को हरकर  चित्त में आनंद, शान्ति, माधुर्य एवं योग्यता का दान करते हैं।
छठे होते हैं कूर्म अर्थात् कच्छपरूप गुरु। जैसे मादा कछुआ दृष्टिमात्र से अपने बच्चों को पोषित करती है, ऐसे ही गुरुदेव कहीं भी हों अपनी दृष्टिमात्र से, नूरानी निगाहमात्र से शिष्य को दिव्य अनुभूतियाँ कराते रहते हैं। ऐसी गुरुदेव की कृपा का अनुभव मैंने कई बार किया।
सातवें होते हैं चन्द्र गुरु। जैसे चन्द्रमा के उगते ही चन्द्रकान्त मणि से रस टपकने लगता है, ऐसे ही गुरु को देखते ही हमारे अंतःकरण में उनके ज्ञान का, उनकी दया का, आनंद, माधुर्य का रस उभरने, छलकने लगता है। गुरु का चिंतन करते ही, उनकी लीलाओं, घटनाओं अथवा भजन आदि का चिंतन करके किसी को बताते हैं तो भी हमें रस आने लगता है।
आठवें होते हैं दर्पण गुरु। जैसे दर्पण में अपना रूप दिखता है ऐसे ही गुरु के नजदीक जाते ही हमें अपने गुण-दोष दिखते हैं और अपनी महानता का, शांति, आनंद, माधुर्य आदि का रस भी आने लगता है, मानो गुरु एक दर्पण हैं। गुरु के पास गये तो हमें गुरू का स्वरूप और अपना स्वरूप मिलता जुलता, प्यारा-प्यारा सा लगता है। वहाँ वाणी नहीं जाती, मैं बयान नहीं कर सकूँग। मुझे जो अऩुभूतियाँ हुई उनका मैं वर्णऩ नहीं कर सकता। बहुत समय लगेगा फिर भी पूरा वर्णन नहीं कर पाऊँगा।
नौवें होते हैं छायानिधि गुरू। जैसे एक अजगैबी देवपक्षी आकाश में उड़ता है और जिस व्यक्ति पर उसकी ठीक से छाया पड़ जाती है वह राजा बन जाता है ऐसी कथा प्रचलित है। यह छायानिधि पक्षी आकाश में उड़ता रहता है किंतु हमें आँखों से दिखाई नहीं देता। ऐसे ही साधक को अपनी कृपाछाया में रखकर उसे स्वानंद प्रदान करने वाले गुरु छायानिधि गुरु होते हैं। जिस पर गुरु की दृष्टि, छाया आदि कुछ पड़ गयी वह अपने अपने विषय में, अपनी अपनी दुनिया में राजा हो जाता है। राजे महाराज भी उसके आगे घुटने टेकते हैं। यह सामर्थ्य मेरे गुरुदेव में था और मुझे लाभ मिला।
दसवें होते हैं नादनिधि गुरु। नादनिधि मणि ऐसी होती है कि वह जिस धातु को स्पर्श करे वह सोना बन जाती है। पारस तो केवल लोहे को सोना करता है।
एक संत थे गरीबदासजी। वे दादू दयाल जी के शिष्य थे। उनको किसी वैष्णव साधु ने मणि दी उन्होंने वह मणि फेंक दी।

वैष्णव साधु ने कहाः "मैं तो तुम्हारी गरीबी मिटाने के लिए लाया था। इतनी तपस्या के बाद मणि मिली थी, तुमने फेंक दिया ! कितनी कीमती थी !! अब क्या होगा ?"
गरीबदासजी ने कहाः "बाबा ! यह आपके हाथ का चिमटा दिखायें।" उसे अपने ललाट को छुआया तो चिमटा सोने का बन गया। वैष्णव साधु गरीबदास जी के चरणों में पड़ गये।
अब पारसमणि तो नहीं होता है ललाट, नादनिधि भी नहीं होता। क्या वर्णन करें ! मनुष्य के चित्त की कितनी महानता है ! ऐसे भी गुरु होते हैं हैं, जिनका ललाट या वाणी नादनिधि बन जाती है। ऐसी-ऐसी वार्ताएँ सुनकर हृदय आनंदित हो जाता है, अहोभाव से भर जाता है कि ʹहम कितने भाग्यशाली हैं कि भारतीय संस्कृति के ग्रंथ पढ़ने और सुनने का अवसर मिलता है।ʹ
नादनिधि मणि तो ठीक लेकिन गरीबदास जी का मस्तक नादनिधि कैसे बन गया ? वहाँ विज्ञान घुटने टेकने लग जाता है। ऐसे गुरू मुमुक्षु की करूण पुकार सुन के उस पर करुणा करके उसे तत्क्षण ज्ञान दे देते हैं। मुमुक्षु के आगे स्वर्ण तो क्या है, हीरे क्या है, राज्य क्या है ? वह तो राज्य और स्वर्ण का दाता बन जाता है। नादनिधि मणि से भी उन्नत, गुरु की कृपा और गुरु का ज्ञान काम करता है। नादनिधि को तो मैं चमत्कारी मानता हूँ लेकिन उससे भी कई गुना चमत्कारी मेरे गुरुदेव की वाणी और कृपा है। मैं उनके चरणों में अब भी नमस्कार करता हूँ। मेरे गुरुदेव की पूजा के आगे नादनिधि मणि, चिंतामणि, पारसमणि कुछ भी नहीं है। पारसमणिवालों के पास इतने लोग नहीं होते हैं।

ग्यारहवें गुरु होते हैं क्रौंच गुरु। जैसे मादा क्रौंच पक्षी अपने बच्चों को समुद्र-किनारे छोड़कर उनके लिए दूर स्थानों से भोजन लेने जाती है तो इस दौरान वह बार-बार आकाश की ओर देखकर अपने बच्चों को स्मरण करती है। आकाश की ओर देख के अपने बालकों के प्रति सदभाव करती है तो वे पुष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही गुरु अपने चिदाकाश में होते हुए अपने शिष्यों के लिए सदभाव करते हैं तो अपने स्थान पर ही शिष्यों को गुदगुदियाँ होने लगती हैं, आत्मानंद मिलने लगता है और वे समझ जाते हैं कि बापू ने याद किया, गुरु ने याद किया। ऐसी गुरुकृपा का अनुभव मुझे कई बार हुआ था। मैंने अनुभव किया कि ʹगुरुजी कहीं दूर हैं और मेरे हृदय में कुछ दिव्य अनुभव हो रहे हैं।ʹ मन में हुआ कि ʹकैसे हो रहा है ʹ तो तुरंत पता चला कि वहाँ से उनका सदभाव मेरी तरफ यहाँ पहुँच गया है।
बारहवें गुरु होते हैं सूर्यकांत गुरु। सूर्यकान्त मणि में ऐसी योग्यता होती है कि सूर्य को देखते ही अग्नि से भर जाती है, ऐसे ही अपनी दृष्टि जहाँ पड़े वहाँ के साधकों को विदेहमुक्ति देने वाले गुरु सूर्यकान्त गुरु होते हैं। शिष्य को देखकर गुरु के हृदय में उदारता, आनंद उभर जाय और शिष्य का मंगल ही मंगल होने लगे, शिष्य को उठकर जाने की इच्छा ही न हो। गुरु का अपना स्वभाव ही बरसने लगे। तीरथ नहाये एक फल....अपनी भावना का ही फल मिलेगा। संत मिले फल चार.....धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मिलेगा लेकिन आत्मसाक्षात्कारी पुरुष में तो मुझे लगता है कि बारह के बारह लक्षण चमचम चमकते हैं। किसी गुरु में एक लक्षण, किसी में दो, किसी में तीन लेकिन ब्राह्मी स्थितिवाला तो ओ हो ! जय लीलाशाह भगवान ! जय जय व्यास भगवान !! ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के चरणों में वंदन ! उऩका बड़ा भारी उपकार है, उनका धरती पर रहना ही मनुष्यों के लिए मंगलकारी है। वे बोलें तो भी मंगल है, ऐसे ही कहीं चुप बैठें और केवल दृष्टि डाल दें तो भी उनके संकल्प और उनको छूकर आने वाली हवाओं से मंगल होता है।
एक गुरु में ऐसे बारह के बारह दिव्य गुण भी हो सकते हैं, दो भी हो सकते हैं, चार भी हो सकते हैं। अब आपको कितने प्रकार के गुरु मिले हैं, आप ही सोच लो। मेरे को तो मिल गये मेरे गुरुदेव। यह सब उन्हीं का विस्तार है और जो दिखता है उससे भी ज्यादा विस्तार है उनका। जहाँ-जहाँ आपकी और मेरी दृष्टि जाती है उससे भी ज्यादा विस्तार है। अनंत ब्रह्मांड भी उनके एक कोने में पड़े हैं। ऐसे हैं मेरे गुरुदेव !
ऐसे गुरुओं पर कीचड़ उछालने वाले हर युग में रहे, फिर भी गुरु परम्परा अभी तक बरकरार है। नानक जी को जेल में डाल दिया। कबीर जी पर लांछन लगाया। बुद्ध पर दोषारोपण किया, कुप्रचार किया। संत नामदेव, ज्ञानेश्वर महाराज का भी खूब कुप्रचार हुआ। संत तुकारामजी महाराज का भी खूब कुप्रचार हुआ। फिर भी वे संत लाखों-करोड़ों के हृदय में अभी भी आदर से विराजमान हैं। लाखों करोड़ों हृदय उन्हें आदर से मानते हैं। निंदक और कुप्रचारक अपना ही घाटा करते हैं।


स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2012, अंक 234, पृष्ठ संख्या 20,21,22
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गुरू आज्ञा सम पथ्य नहीं......


(पूज्य बापूजी के सत्संग प्रवचन से)
उज्जयिनी (वर्तमान में उज्जैन) के राजा भर्तृहरि से पास 360 पाकशास्त्री थे भोजन बनाने के लिए। वर्ष में केवल एक एक की बारी आती थी। 359 दिन वे ताकते रहते थे कि कब हमारी बारे आये और हम राजासाहब के लिए भोजन बनायें, इनाम पायें लेकिन भर्तृहरि जब गुरू गोरखनाथजी के चरणों में गये तो भिक्षा माँगकर खाते थे।
एक बार गुरू गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहाः "देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।" शिष्यों ने कहाः "गुरूजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहाँ 360 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आये हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभरहित हो गये !"
गुरू गोरखनाथ जी ने राजा भर्तृहरि से कहाः "भर्तृहरि ! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियाँ ले आओ।" राजा भर्तृहरि नंगे पैर गये, जंगल से लकड़ियाँ एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे।
गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहाः "जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझा गिर जाय।" चेले गये और ऐसा धक्का मारा कि बोझा गिर गया और भर्तृहरि भी गिर गये। भर्तृहरि ने बोझा उठाया लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आँखों में आग के गोले, न होंठ फड़के।
गुरू जी ने चेलों से कहाः "देखा ! भर्तृहरि ने क्रोध को जीत लिया है।"
शिष्य बोलेः "गुरुजी ! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।"
थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भर्तृहरि को महल दिखा रहे थे। ललनाएँ नाना प्रकार के व्यंजन आदि लेकर आदर सत्कार करने लगीं। भर्तृहरि ललनाओं को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गये।
गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहाः "अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भर्तृहरि ने काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है।"
शिष्यों ने कहाः "गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिये।"
गोरखनाथजी ने कहाः "अच्छा भर्तृहरि ! हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरूभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।"
भर्तृहरिः "जो आज्ञा गुरूदेव !"
भर्तृहरि चल पड़े। पहाड़ी इलाका लाँघते-लाँघते मरूभूमि में पहुँचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप... मरुभूमि में पैर रखो तो बस सेंक जाय। एक दिन, दो दिन..... यात्रा करते-करते छः दिन बीत गये। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से चेलों को भी साथ लेकर वहाँ पहुँचे।
गोरखनाथ जी बोलेः "देखो, यह भर्तृहरि जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूँ। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।"
अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भर्तृहरि का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो !
'मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया ? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया ? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।' – कूदकर दूर हट गये।
गुरु जी प्रसन्न हो गये कि देखो ! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।' गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए लेकिन और शिष्यों की मान्यता ईर्ष्यावाली थी।
शिष्य बोलेः "गुरुजी ! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।"
गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) आगे मिले, बोलेः "जरा छाया का उपयोग कर लो।"
भर्तृहरिः "नहीं, गुरु जी की आज्ञा है नंगे पैर मरुभूमि में चलने की।"
गोरखनाथ जी ने सोचा, 'अच्छा ! कितना चलते हो देखते हैं।' थोड़ा आगे गये तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कंटक-कंटक पैदा कर दिये। ऐसी कँटीली झाड़ी कि कंथा (फटे पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भर्तृहरि ने 'आह' तक नहीं की।
तैसा अंम्रित1 तैसी बिखु2 खाटी।
तैसा मानु तैसा अभिमानु।
हरख सोग3 जा कैं नहीं बैरी मीत समान।
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जान।।
1.अमृत 2. विष 3 हर्ष-शोक
भर्तृहरि तो और अंतर्मुख हो गये, 'यह सब सपना है और गुरुतत्त्व अपना है। गुरु जी ने जो आज्ञा  की है वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है'
गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।
अंतिम परीक्षा के लिए गुरुगोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भर्तृहरि के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरुआज्ञा का भंग तो नहीं हो रहा है ?
उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिये। भर्तृहरि ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोलेः "शाबाश भर्तृहरि ! वर माँग लो। अष्टसिद्धि दे दूँ, नवनिधि दे दूँ। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिये, ललनाएँ चरण-चम्पी करने को, चँवर डुलाने को तैयार थी, उनके चक्कर में भी नहीं आये। तुम्हें जो माँगना हो माँग लो।"
भर्तृहरिः "गुरूजी ! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है।"
भगवान शिव पार्वतीजी से कहते हैं-
आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः।
ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः।।
'हे देवी ! कल्पपर्यन्त के, करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ – ये सब गुरुदेव के संतोषमात्र से सफल हो जाते हैं।'
"गुरुजी ! आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गये।"
"नहीं भर्तृहरि ! अनादर मत करो। तुमने कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ माँगना ही पड़ेगा।"
इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सुई दिखाई दी। उसे उठाकर भर्तृहरि बोलेः "गुरूजी ! कंथा फट गया है, सुई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंथा सी लूँ।"
गोरखनाथजी और खुश हुए कि 'हद हो गयी ! कितना निरपेज्ञ है, अष्टसिद्धि-नवनिधियाँ कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ तो माँगो तो बोलता है कि सुई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया।'
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद् भक्तः स मे प्रियः।।
'जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर भीतर से शुद्ध, दक्ष, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है – वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।'
(गीताः 12.16)
'कोई अपेक्षा नहीं ! भर्तृहरि तुम धन्य हो गये ! कहाँ तो उज्जयिनी का सम्राट और कहाँ नंगे पैर मरुभूमि में ! एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गये।'
अभी भर्तृहरि की गुफा और गोपीचंद की गुफा प्रसिद्ध है।
कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य-जीवन में बहुत सारी ऊँचाइयों को छू सकते हैं।
एक बार नैनीताल में मेरे गुरुदेव ने मुझसे कहाः "जाओ, इन लोगों को 'चाइना पीक' (वर्तमान नाम – नैना पीक, यह हिमालय पर्वत का एक प्रसिद्ध शिखर है) दिखा के आओ।"
चलने वाले आनाकानी कर रहे थे, बार-बार इनकार कर रहे थे। हम हाथा-जोड़ी करके उनको 'चाइना पीक' ले गये। वहाँ मौसम साफ हो गया। सूर्य उदय नहीं हुआ था हम लोग तब चले थे पैदल और शाम को सूर्य ढल गया तब आश्रम में पहुँचे।
गुरुजी ने पूछाः "ऐसा खराब मौसम था, ओले पड़ रहे थे, कैसे पहुँचे ?"
हमारे साथ जो लोग गये थे, वे बोलेः "आसाराम ने कहा कि 'बापूजी ने आज्ञा दी है तो मैं आज्ञा का पालन करूँगा, आप चलो।' हम नहीं जाना चाहते थे तो हमको हाथा-जोड़ी करे, कभी हमको समझाये, कभी सत्संग सुनाये। कैसे भी करके दो बजे हमको 'चाइना पीक' पहुँचा दिया, जहाँ कोई सैलानी नहीं थे, सब वापस भाग गये थे।"
गुरुजी खुश हुए, बोलेः "पीऊऽऽऽ ! जो गुरु की आज्ञा मानता है, प्रकृति उसकी आज्ञा मानेगी।" हमको तो वरदान मिल गया !
सर्प विषैले प्यार से वश में बाबा तेरे आगे।
बादल भी बरसात से पहले तेरी ही आज्ञा माँगें।।
हमने गुरु की आज्ञा मानी तो हमारी तो हजारों लोग आज्ञा मानते हैं। गुरु की आज्ञा मानने से मुझे तो बहुत फायदा हुआ। गुरु की आज्ञा मानने में जो दृढ़ रहता है, बस उसने तो काम कर लिया अपना।

स्रोतः ऋषि प्रसाद जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 11, 12, 13 अंक 211
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