स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

होली हुई तब जानिये....


होली जली तो क्या जली पापिन अविद्या नहीं जली।
आशा जली नहीं राक्षसी, तृष्णा पिशाची नहीं जली।
 झुलसा न मुख आसक्ति का, नहीं भस्म ईर्ष्या की हुई
ममता न झोंकी अग्नि में, नहीं वासना फूँकी गई।
न ही धूल डाली दम्भ पर, न ही दर्प में जूते दीये।
दुर्गति न की अभिमान की, न ही क्रोध में घूँसे पीये।।

भारतीय संस्कृति वर्ष भर के त्यौहारों एवं पर्वों की अनवरत श्रृंखला की वैज्ञानिक व्यवस्था करती है। वसंत ऋतु में आनेवाला होली का त्यौहार कूदने-फाँदने एवं प्राकृतिक रंगों से होली खेलने का उत्सव है। इसका स्वास्थ्य पर उत्तम प्रभाव पड़ता है। इन दिनों पलाश के फूलों के रंगों से होली खेलने से शरीर में गर्मी सहन करने की शक्ति बढ़ती है तथा मानसिक संतुलन बना रहता है, साथ ही मौसम-परिवर्तन से प्रकुपित होने वाले रोगों से रक्षा होती है। परंतु वर्तमान में रासायनिक रंगों के अंधाधुंध प्रयोग से विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो रही हैं, जिसकी पुष्टि चिकित्सकों ने भी की है।रंगों में प्रयुक्त रसायनों का स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव होते है ? यह जानने के लिये और  संत सम्मत होली, अद्वैत होली क्या है? जानने के लिये..

शिवरात्रि का तात्विक सत्संग

              जिस परम शांति में भगवान साम्ब सदाशिव, चंद्रशेखर, त्रयम्बकेश्वर समाधिस्थ रहते है, उस आत्मशांति में आज महापर्व के दिन, शिवरात्रि के पावन पर्व के दिन, हम उसी शिवशांति में, शिव माधुर्य में, शिव प्रसाद में, पावन होते जायेंगे |शम्भुप्रसाद .... शंभुप्रसाद से सबकुछ संभव |
               वह भर्ता, भोक्ता, महेश्वर, ईश्वरों के ईश्वर, सब कुछ लुटाने वाले, और फिर अलख निरंजन करके भिक्षा मांगने में संकोच नहीं...... पल भर में सबकुछ दे डालना, फिर भी कभी कुछ न खुटे...... |
इस देव का बाह्य स्वरुप भी बड़ा प्रेरणादायी है |


शिवजी को मुंडो की माला, भस्मलेप, भभूत रमाते हुए , त्रिशूल धारण करते हुए चित्रों में देखा है शिवजी के सर्पों को आपने देखा होगा चित्रों में | इस देव का बाह्य स्वरुप भी बड़ा प्रेरणादायी है |
                                            देव देव महादेव |
                 अपने महान स्वरुप में सदा विराजमान ये महादेव | भगवान महादेव, साम्ब सदाशिव के विषय में शास्त्रों ने कहा है
                                                               "भुवन भंग व्यसनम् "
                  भुवनों को भंग करने का व्यसन है इस देव को | जैसे माली बाग बगीचे की कटाई-छंटाई न करे तो बगीचा जंगल में बदल जायेगा | ऐसे ही सृष्टि में साफ़-सफाई करने और फिर सृष्टि को सुहावना बनानेवाले ये देव ! साम्ब सदाशिव !
                  शिवजी कैलाश पर कहे गए अर्थात ज्ञान, प्रकाश, माधुर्य, अंतःकरण की शीतलता, ऊँचे केन्द्रों में होती है | कैलाश सबसे ऊँचा कहा गया है | मूलाधार में काम रहता है, लेकिन सहस्त्रसार में ब्रह्मसुख होता है | स्वाधिष्ठान में कल्पनायें रहती है | सहस्त्रसार में ....... कल्पनातीत समाधि का सुख | शिवजी धवल शिखर पर रहते है, ज्ञान- प्रकाशमय है, देह को मै माननेवाला अज्ञान कतई नहीं |
                  शिव कैलाश पर रहते है, उनके पास त्रिशूल है | तीनों पापों से, तीनों शूलों से पार करने वाला त्रिशूल | त्रिगुणातीत सुख में पहुंचानेवाले और त्रिगुणातीत सुख में रहने वाले शिवजी की याद त्रिशूल दे देता है | सारा संसार इन तीन गुणों में उलझा है और शिवजी का त्रिशूल बताता है कि तीन गुण माया में है |
कभी तमस आता है आप आलसी, अशांत, प्रमादी, दीर्घसूत्री हो जाते है | कभी रजोगुण आता है, आप प्रवृत्ति में, कामी में, लोभी में, मोहीपने में अपने को पाते है | कभी सत्वगुण आता है, आप सत्संग में, सेवा में, दान में, पुण्य में अपने को पाते है लेकिन ये त्रिशूल आपके हाथ में होना चाहिए |
ये तीन गुण आपके हाथ में होने चाहिए | इन तीन गुणों का आप उपयोग कर सकते है, शत्रु-संहार में भी और भक्तों को आनंद देने में भी | त्रिशूलधारी जैसे त्रिशूल का उपयोग करते है, ऐसे ही तीनों गुणों का उपयोग करता है, वह शिव-तत्व को पाता है |
                  शिवजी की जटाओं पर दूज का चाँद दिखाई देता है अर्थात जो ज्ञान संपन्न है वो किसी का थोडा सा प्रकाश भी, थोडा सा ज्ञान भी अपने सिर पर चढ़ाता है | हठी और जिद्दी आदमी, "मै सब जानता हूँ", करके अपना ज्ञान का द्वार बंद रखता है लेकिन शिवजी ज्ञानप्रकाश का आदर करते है | दूज के चाँद को अपने सिर पर धारण करके प्रेरणा देते है कि जहाँ भी प्रकाश मिले, शिरोधार्य करो |
                 शिवजी के गले में मुंडों की माला है, विद्वानों ने इस पर विचार विमर्श किया | ये मुंड, ये खोपडियां कोई साधारण व्यक्ति की नहीं, जिनके जीवन में आत्मज्ञान है, जिनके जीवन में सत्वप्रकाश है, जिनके जीवन में दिव्यता है, ऐसे दिव्य जीवन जीनेवालों की | शरीर तो चला जाता है लेकिन उनका मस्तक, जो खोपड़ी है वो भी मेरे ह्रदय का हार है दूसरा अर्थ लगाया कि धनियों को, सत्ताधीशों को और अहंकारियों को ये खबर दे कि जिस खोपड़ी में "मै धनी हूँ" "मैं सेठ हूँ" "मैं सत्ताधीश हूँ" "मैं राजा हूँ" आखिर ये खोपड़ी ऐसी हो जायेगी एक दिन |

पड़ा रहेगा माल खजाना, छोड़ त्रिया सुत जाना है
कर सत्संग अभी से प्यारे, नहीं तो फिर पछताना है
खिला- पिला के देह बढ़ाई, वो भी अग्नि में जलाना है

                  खोपड़ी चाहे अमीर की हो, चाहे गरीब की हो, लेकिन खोपड़ी, खोपड़ी हो जाती है | शिवजी ने मानो अहंकारियों को, अमीरों को प्रेरणा दी | मानों शिवजी ने ज्ञानियों का आदर किया, इसलिए मुंडों की माला भी सुशोभित, ! शिवजी के अंतःकरण को उल्लसित कर रही है |
                    शिवजी के गले में भुजंग है, सांप है | विष उगलने वाले सांप, लेकिन शिवजी ने आत्मरस के प्रभाव से विष को अमृतमय कर दिया | विषैले सर्प भी उनके लिए, भुजा और कंठ के और कौपीन की जगह पर भी, जरुरत पड़े तो लगाकर, वे गहनों का काम ले लेते है |
                    मानव ! तुम्हारे जीवन में भी कई विषधर आत्माएं आएँगी, कई विष के घूंट आयेंगे लेकिन तुम उन विष के घूंटों के सामने अपना विष मत उगलो | विष के घूंटों के सामने तुम अपनी शिवमयी दृष्टि, अमृतमयी दृष्टि कर दो ताकि विषधर भी तुम्हारे लिए गहनों-गांठों का काम कर ले |
                     शिवजी का एक नाम है नीलकंठ | समुद्रमंथन के समय लक्ष्मीजी, अमृत और रत्न, बहुत कुछ संपदाएं निकली उस सम्पदा के लिए तो सभी लालायित थे, लेकिन हलाहल निकला, त्रिलोकी में हाहाकार मच गया | अमृत के लिए तो देव भी भागे, दैत्य भी भागे लेकिन विष को देखकर कौन आगे आये | शिवजी ने कहा अमृत तुम्हारे हिस्से, मणियाँ-मालाएं तुम्हारे हिस्से, ऐहिक सम्पदा तुम्हारे हिस्से ! लाओ हलाहल निकला है तो हम ही पी लेते है |
                       जिसके ह्रदय में आत्म-अमृत है वो संसार के हलाहल को पीने में सक्षम होता है | पीकर भी शिवजी ने कमाल कर दिया | पीकर पेट में न उतारा और वमन भी न किया | कंठ में धारण किया | नीलकंठ भगवान की जय ! नीलकंठ कहलाये | ऐसे ही कुटुंब के, समाज के अगवों को, शिवजी के इस नीलकंठ स्वरुप से सीख लेनी चाहिए कि आगेवान हो तो सुख सुविधा सम्पदा समाज की सेवा में लगाओ और कभी कार्य में कहीं ऐसे विष के घूंट आ जाये तो तुम पीकर मरो मत, वमन करके वातावरण बिगाड़ो मत, अपने कंठ में दबोच के रख दो तो तुम्हारी शोभा बनेगी |

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 दो  
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                 शिवरात्रि का उत्सव वस्त्र अलंकार से इस देह को सजाने का उत्सव नहीं है | शिवरात्रि का उत्सव मेवा-मिठाई खाकर इस देह को मजा दिलाने का उत्सव नहीं है | शिवरात्रि का उत्सव देह से परे देहातीत आत्मा में आराम पाने का उत्सव है | शिवरात्रि का उत्सव संयम और तप बढ़ाने का उत्सव है |
                   शिव शब्द ही कल्याण स्वरुप है | सत्यम शिवम सुन्दरम | सत्य वह है जो त्रिकाल अबाधित हो ! सत्य वह है जो सदा रहे, जिसको प्रलय भी प्रभावित न कर सके, उसको सत्य कहते है और वह सत्य तुम्हारे हृदय में है, वह सत्य तुम्हारे साथ है, उस सत्य को प्रकट करने के लिए ही मनुष्य जन्म की बुद्धि है |
                      दूसरों की जेब खाली करने के लिए बुद्धि नहीं है लेकिन दूसरों के ह्रदय में अशांति और दुःख है, वो दूर करके दूसरों के ह्रदय में भी दिलबर का गीत गुंजाने के लिए बुद्धि है | अगर बुद्धि का उपयोग किसी का शोषण करने में आदमी लगाता है तो दूसरे जन्म में उसकी हालत कुछ दयनीय हो जाती है | बुद्धि का उपयोग अपने और दूसरे के जीवन में छुपे हुए शिवत्व को जगाने में किया जाय तो वह बुद्धि ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाती है |
                    शिवजी हिमशिखर पर रहते है, ऊँचे शिखर पर | जीवन को उन्नत करना हो तो ऊंचाई पर जाना पड़ता है कुंडलिनी योग के ज्ञाता योगियों का कहना है कि मानव जब नीचे केन्द्रों में होता है तो उसे काम, क्रोध, भय, शोक चिंता, स्पर्धा, घृणा सताती है | जैसे सामान्यतः आदमी मूलाधार केंद्र में होता है तो काम विकार का शिकार होता रहता है वह केंद्र जब रूपांतरित हो तो काम का केंद्र बदल कर राम रस प्रकट कर देता है | स्वाधिष्ठान केंद्र में भय, घृणा, इर्ष्या और स्पर्धा रहती है | उस केंद्र को अगर आदमी संयम से साधन से बदल दे तो भय की जगह पर निर्भयता, स्पर्धा की जगह पर समता आने लगेगी, घृणा की जगह पर स्नेह का जन्म होगा | अशांति की जगह पर शांति का साम्राज्य प्राप्त होगा | तुम्हारे भीतर के गीत गूंजेंगे |
                  शिवरात्रि माने भीतर के छुपे हुए शिवत्व को जगाना और दिल के ताल के साथ जीवन को मधुर बनाना | आदमी अगर सीखना चाहे तो कभी फूलों से भी सीख सकता है तो कभी पशुओं से भी सीख सकता है | पक्षी आज खाते है कल का कोई पता नहीं और एक डाल पर बैठते है फिर कौन सी डाल पर बैठेंगे ये कोई प्लानिंग नहीं, फिर भी पक्षी गीत गाकर मुस्कराकर जीवनयापन करते है | पक्षी जब तृप्त होता है तब जो बोलता है वो गीत हो जाता है | आदमी..... आज का है.... कल का है..... साल भर का है..... फिर भी इतना लोभ का शिकार बना जा रहा है कि आदमी ने अपना अंदर का संगीत नाश कर दिया है |
                    मुझे ये बात फिर से कहनी होगी कि एक पुराना घर, बाप दादों से पुरखों से चला आया, वही पुराना मजबूत घर | उस घर में एक साज पड़ा था दिवाली आती, उस साज को इधर से उधर करना पड़ता | घर के सभी लोगों ने देखा क्या चीज है ? हमें कोई पता भी नहीं है, चलो हटाओ उस गडबड को | घर के लोगो ने सफाई करते समय उस साज को बाहर फेंक दिया | कोई फकीर निकला, संत निकला उसने देखा और साज परख गया | संत ने उस वीणा पर अपनी उंगलियां घुमाई और साज से मधुर गीत निकला | लोग इकट्ठे हो गए, पथिक तो इकट्ठे हो गए, घर के लोग भी आ गए और साज सुनकर चकित हो गए | उन्होंने कहा कि बाबाजी ये साज हमारा है | बाबाजी ने कहा, तुम्हारा होता तो घर में रहता ! तुमने तो बेकार समझकर इसको फेंक दिया है |
साज उसी का है, जो बजाना जानता है |
गीत उसी का है जो गाना जानता है
आश्रम उसी का है जो रहना जानता है
और परमात्मा उसी का है जो पाना जानता है |

                    है तो प्राणिमात्र में ! लेकिन उसको पाने की विधि, पाने की कला अगर नहीं है तो परमात्मा साथ में होते हुए भी जीव दीनहीन और दुखी- लाचार होकर संसार भवाटी में विकारों के डंक सहता हुआ जीवन यापन करता है | ऐसे जीवों को अपनी महिमा समझाने के लिए ऐसे पर्वों की व्यवस्था है |
शिवरात्रि का पर्व तुम्हे ये सन्देश देता है कि शिवजी हिमशिखर पर, ऊँचे शिखर पर विराजते है | ऐसे ही जीवन को ऊँचे शिखर पर ले जाने का संकल्प करो |
                   शिवजी के पास मंदिर में तुम जाते हो, नंदी मिलता है, बैल ! समाज में जो बुद्धू होते है, उसको बोलते है- "तू तो बैल है" | अनादर होता है, लेकिन शिवजी के मंदिर में जो बैल है, उसका आदर होता है | पहले उसको नमस्कार करते है, बाद में शिवजी के दर्शन होते है | बैल जैसा आदमी भी अगर भगवद कार्य समझे, निष्काम भाव से सेवा करे, शिवतत्व की सेवा करता है तो वो बैल जैसे आदमी को भी समाज नमस्कार करता है, पूजन करता है|
                    शिवजी के गले में सर्प है | ज्ञानी में ये योग्यता होती है, जो ऊँचे शिखरों पर पहुँचते है उनमे ये क्षमता होती है कि सर्प जैसे विषैले स्वाभाव बाले व्यक्तियों से भी काम लेकर उनको समाज का सिंगार, समाज का गहना बनाने की कला उन ज्ञानियों में होती है |
                   तुम्हारी बुद्धि के ज्ञान का फल रोटी कमाना ही नहीं है | रोटी तो भैया एक मच्छर भी कमा लेता है | मच्छर को भी इतनी अक्ल है कि कहाँ खुराक मिलेगा? कैसे मिलेगा? मच्छर मेरी दाढ़ी पर कभी नहीं बैठता जब बैठता है गाल पर बैठता है | इतनी अक्ल तो मच्छर को भी है कि कहाँ रोटी मिलती है? कैसे भोजन मिले ? बच्चा पैदा करने कि अक्ल तो मच्छर को, खटमल को भी है | भोजन और अपना आहार और अपना घर बनाने की अक्ल तो चिड़िया और कौवे को भी है | इतनी बड़ी अक्ल भगवान ने दी तो केवल पेट पालू कुत्तों की नाई जिंदगी बर्बाद करने के लिए अक्ल नहीं दी | ये जो अक्ल दी है वो अक्ल जहाँ से प्रकाशित होती है, उस कल्याण स्वरुप शिव का साक्षात्कार करने के लिए हमारी बुद्धि है | शिवरात्रि का उत्सव हमें कहता है, जितना जितना हमारे जीवन में निष्कामता आती है, जितना जितना तुम्हारे जीवन में परदुखकातरता आती है, जितना जितना तुम्हारे जीवन में परदोष-दर्शन की निगाह कम होती जाती है | जितना जितना तुम्हारे जीवन में परम पुरुष का ध्यान, धारणा होती है उतना उतना तुम्हारा वो शिवतत्व निखरता है और तुम्हारा हृदय आनंद स्नेह साहस और मधुरता से छलकता है |


संत मिलन को जाइये


संत मिलन को जाइये

Sant Milan Ko Jaaiiye


दुर्लभ मानुषो देहो देहीनां क्षणभंगुरः।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्।।1।।
मनुष्य-देह मिलना दुर्लभ है। वह मिल जाय फिर भी क्षणभंगुर है। ऐसी क्षणभंगुर मनुष्य-देह में भी भगवान के प्रिय संतजनों का दर्शन तो उससे भी अधिक दुर्लभ है।(1)
नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न वै।
मदभक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।2।।
हे नारद ! कभी मैं वैकुण्ठ में भी नहीं रहता, योगियों के हृदय का भी उल्लंघन कर जाता हूँ, परंतु जहाँ मेरे प्रेमी भक्त मेरे गुणों का गान करते हैं वहाँ मैं अवश्य रहता हूँ। (2)
Gurukripa hi Kevlam ! : Followers of Param Pujya Sant Shri Asaram Ji Bapu

कबीर सोई दिन भला जो दिन साधु मिलाय।
अंक भरै भरि भेंटिये पाप शरीरां जाय।।1।।
कबीर दरशन साधु के बड़े भाग दरशाय।
जो होवै सूली सजा काटै ई टरी जाय।।2।।
दरशन कीजै साधु का दिन में कई कई बार।
आसोजा का मेह ज्यों बहुत करै उपकार।।3।।
कई बार नहीं कर सकै दोय बखत करि लेय।
कबीर साधू दरस ते काल दगा नहीं देय।।4।।
दोय बखत नहीं करि सकै दिन में करु इक बार।
कबीर साधु दरस ते उतरे भौ जल पार।।5।।
दूजै दिन नहीं कर सकै तीजै दिन करू जाय।
कबीर साधू दरस ते मोक्ष मुक्ति फल जाय।।6।।
तीजै चौथे नहीं करै सातैं दिन करु जाय।
या में विलंब न कीजिये कहै कबीर समुझाय।।7।।
सातैं दिन नहीं करि सकै पाख पाख करि लेय।
कहै कबीर सो भक्तजन जनम सुफल करि लेय।।8।।
पाख पाख नहीं करि सकै मास मास करु जाय।
ता में देर न लाइये कहै कबीर समुझाय।।9।।
मात पिता सुत इस्तरी आलस बंधु कानि।
साधु  दरस को जब चलै ये अटकावै खानि।।10।।
इन अटकाया ना रहै साधू दरस को जाय।
कबीर सोई संतजन मोक्ष मुक्ति फल पाय।।11।।
साधु चलत रो दीजिये कीजै अति सनमान।
कहै कबीर कछु भेंट धरूँ अपने बित अनुमान।।12।।
तरुवर सरोवर संतजन चौथा बरसे मेह।
परमारथ के कारणे चारों धरिया देह।।13।।
संत मिलन को जाइये तजी मोह माया अभिमान।
ज्यों ज्यों पग आगे धरे कोटि यज्ञ समान।।14।।
तुलसी इस संसार में भाँति भाँति के लोग।
हिलिये मिलिये प्रेम सों नदी नाव संयोग।।15।।
चल स्वरूप जोबन सुचल चल वैभव चल देह।
चलाचली के वक्त में भलाभली कर लेह।।16।।
सुखी सुखी हम सब कहें सुखमय जानत नाँही।
सुख स्वरूप आतम अमर जो जाने सुख पाँहि।।17।।
सुमिरन ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट।
मन ईश्वर में लीन हो हले न जिह्वा होठ।।18।।
दुनिया कहे मैं दुरंगी पल में पलटी जाऊँ।
सुख में जो सोये रहे वा को दुःखी बनाऊँ।।19।।
माला श्वासोच्छ्वास की भगत जगत के बीच।
जो फेरे सो गुरुमुखी न फेरे सो नीच।।20।।
अरब खऱब लों धन मिले उदय अस्त लों राज।
तुलसी हरि के भजन बिन सबे नरक को साज।।21।।
साधु सेव जा घर नहीं सतगुरु पूजा नाँही।
सो घर मरघट जानिये भूत बसै तेहि माँहि।।22।।
निराकार निज रूप है प्रेम प्रीति सों सेव।
जो चाहे आकार को साधू परतछ देव।।23।।
साधू आवत देखि के चरणौ लागौ धाय।
क्या जानौ इस भेष में हरि आपै मिल जाय।।24।।
साधू आवत देख करि हसि हमारी देह।
माथा का ग्रह उतरा नैनन बढ़ा सनेह।।25।।
ॐ गुरु ॐ गुरु
ॐॐॐॐॐॐ

संत पीपाजी

राजस्थान के गंग्नौरगढ़ का सम्राट राजा  पीपा विकारी सुखो में डूबा था.. 12 पत्नियां थी… पट्ट -रानी सीता दुर्गा की पूजा करती…राजा  रानी को  सत्संग मंडली से सत्संग मिल गया… गंग्नौर गढ़ के राजा  पीपा संत पीपाजी बन गए! दुर्गा की पूजा करने वाले राजा  की चित्त शक्ति आत्म देवी दुर्गा की पूजा करने लगी….

सत्संग से पीपा को समझ बढ़ी कि इतना वैभव पाने के बाद भी आत्म सुख का धन नहीं पाया तो कुछ नहीं पाया ये समझ आ गयी..धन का विकार, लोभ विकार, काम विकार आने जानेवाले है..मरने के बाद नीच योनियों में जाना पडेगा और जीते जी भी दुःख बिमारी की खायी में गिर कर रोते रोते मरना पडेगा ….

सत्संग में संत मंडली ने कहा की , रामानंद स्वामी के शरण जाओ…
काशी में श्री रामानंद स्वामी जी के आश्रम में पहुंचा …. महान संत रामानंद स्वामी ने देखा की पीपा हाथी  घोड़ो पर सवार हो कर आ रहे… राजा  की संत से मुलाक़ात नहीं होती… सेवको ने बोला कि हाथी  घोड़ो  पर सवार हो कर आये ऐसों की यहाँ दीक्षा नहीं होगी… हमारे यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं… स्वामीजी ने कहा है कि हमारा राजाधिराज आत्म राज है… कोई भी परिस्थिति आये, ऐसे राजाओं के लिए यहाँ प्रवेश वर्जित है…

पीपा ने सुन रखा था कि संतो के चरणों में जीव के कल्मष दूर होते…ह्रदय आनंद और प्रभु रस से खिल जाता है… प्राणी मात्र आनंद सुख और रस चाहता है, सुबह से शाम तक इसी सुख रस के लिए तो भटकता फिर भी सरप्लस  दुःख ही रहता… सुख सदा प्रगट करना है और दुःख को सदा के लिए मिटाना है तो ब्रम्हज्ञानी संत के सत्संग से ही होता है ..ये सम्राट पीपा ने सुन रखा था..

पीपा ने कहा, मैं  तो गुरुद्वार पे ही पडा रहूंगा…मुझे दीक्षा लेनी तो इस गुरू  से ही लेनी है… 2 दिन हो गए…सम्राट संत के आश्रम के द्वार पर बैठा है…भूखा है… प्यासा है… 
आश्रम-वासी बोले , ‘क्यों यहाँ बैठे हो?’

राजा पीपा बोले, ‘मुझे भगवत दर्शन की,भगवत प्राप्ति की बहुत जल्दी है…’

स्वामीजी ने कहा, ‘उसको बोलो कि कुएं में जम्प  मार दो…डूब मरो..’

तो राजा  पीपा सचमुच चल दिया… ‘कुआं कहाँ  है?’ पूछता काशी में… रामानंद स्वामी के संकल्प से पीपा को कुआं मिले नहीं, काशी में ऐसी जगह पहुँच गया कि जहां  बस्ती नहीं तो कुआं कहाँ  से होगा…भटक भटक के थक गया तो देवी दुर्गा माँ का सुमिरन किया…बोला,  ‘हे माँ तेरी मूर्ति का सच्चे दिल से पूजन किया हो, मेरे हाथ से कुछ भी अच्छा हुआ हो तो ये  गुरू मुझे स्वीकार करे…’

मोबाइल से फ़ोन लगाओ तो कनेक्शन मिलेगा , रिंग बजेगी फिर बात होगी…मोबाइल में 2-4 सेकण्ड  लगते किसी से बात सुनने को …लेकिन सच्ची प्रार्थना को भगवान तक पहुंचने में उतनी भी देर की जरुरत नहीं..उसी क्षण आप की प्रार्थना  सुन लेते भगवान !….
पीपा ने ह्रदय पूर्वक प्रार्थना की तो उसी क्षण उस के सामने सेवक खड़ा था और बोला, “गुरू जी बुला रहे हैं”


पीपा उठा और भागा … दूर से ही गुरू के चरणों में दंडवत  प्रणाम कर के जमीन  पर पड़  गया …..


गुरूजी रामानंद स्वामी जी ने देखा की पीपा की तड़प सच्ची है… गुरू चरणों में बैठ कर सत्संग सुना.. गुरू जी ने देखा कि राजा  की समझ बढ़ी है..संसारी मजा ये मजा नहीं सजा है… नीच  योनियों में जाने की तैयारी है, ये समझ आ गयी है….. हरि  नाम का अधिकारी है…आत्मा परमात्मा को पाने का अधिकारी है…
गुरूजी ने ज़रा सी नूरानी निगाह डाली…. पीपा गुरू की तरफ ‘हे प्रभु, हे हरि….’ करके एकटक  देख रहा है…. पीपा की साधना  ऐसी हुई कि ध्यान मूलं गुरु मूर्ति पूजा मूलं गुरू पदम्… मन्त्र मूलं गुरूर्वाक्‍यं, मोक्ष मूलं गुरूकृपा …

नजरो से वे निहाल हो जाते, जो संत की नजरो में आ जाते!
गुरूजी ने देखा कि ये सुपात्र है… विलासी भोगी राजा  पात्र तो है, लेकिन ऐश-आराम और खूब सुन्दर रानी का थोडा पिठ्ठू  भी है …इसकी और परीक्षा लेनी चाहिए..

गुरूजी बोले,  ‘राजा  अब तुम अपने राज्य वापस लौट जाओ’

पीपा बोला, ‘गुरूजी मैं  आप की चरण-धूलि बनना चाहता हूँ…’
गुरूजी बोले, ‘तुम राजा  हो, भोग विलास के आदी  हो’


राजा पीपा सत्संग से ऐसा ऊँची मति का धनि बना कि  महाराजा पद  को तुरंत त्याग दिया, जो गुरू चरण  से दूर रखे ऐसा कुछ नहीं चाहिए ….आश्रम के बाहर गया…सभी मंत्री अधिकारियों को बोल दिया कि जो भी ये राज वैभव ले जाना चाहते है, ले जाएं….राज-वस्त्र, जो भी सामान है सब गरीबो में बांट दिया..रानी सीता को कहा कि आप भी वापस राज महल चली जाएं….रानी सीता ने कहा , ‘मैं  तो आप के चरणों की दासी हूं’ …राजा  रानी ने सादे कपडे पहने..आश्रम वासी जैसा वेश धारण किया…

गुरूजी ने देखा कि राजा  इस परीक्षा में तो पास हो गया… सारा राज्य छोड़ने के लिया तैयार  है…जिस को पाने के लिए मनुष्य जन्म मिला है  उस को पा लेना कितनी बड़ी बहादुरी है ! … जो छूटने वाला है, वो ही छोड़ा है…


महाराज पीपा की ईश्वर प्राप्ति की प्यास देख कर गुरूजी मन ही मन प्रसन्न हुए …. 
पीपा बोले , ‘अब तो दीक्षा दीजिये गुरूजी…’

गुरूजी बोले, दीक्षा  की क्या बात करता है…आत्म साक्षात्कार करा दूँ ….लेकिन अभी तू ये बात छोड़ और अपने राज्य में जा कर अपना राजपाट संभाल… लेकिन पहेले जैसे भोग विलास के लिए नहीं..प्रजा को सुखी करने के लिए, दूसरों के दुःख हरने के लिए राज पाट संभाल, सुख की वासना और दुःख का भय मिटा..ऐसा राज्य कर… जब तुम   ऐसा राज-पाट  चलाने में सफल हो जाओगे तो हम स्वयं तुम्हारे राजस्थान में आयेंगे…और तुम को दीक्षा देंगे..’
राजा पीपा गदगद हो गया! ‘गुरू महाराज आप मेरे राजस्थान में आयेंगे!! मेरा राज्य पवित्र होगा….’
राजा पीपा  गदगद हो गए…गुरू महाराज को दंडवत प्रणाम करके अपने राज्य में वापस आये…लेकिन अब राजा  पीपा का तन, मन, खयालात बदला है…गुरू महाराज की आज्ञानुसार राज पाट चलाया, अपने को गुरूमुखी बनाया तो गुरू महाराज ने भी पीपा को ह्रदय पूर्वक स्वीकार कर लिया..भोगी विलासी राजा  पीपा संत पीपाजी बनकर महान हो गए!


ऐसे शक्कर बेचनेवाला एक लड़का था, उसको गुरू ने ह्रदय पूर्वक स्वीकार किया तो तुम्हारे सामने खड़ा है बापूजी बन के !..
ब्रम्हज्ञानी की गत-मत ब्रम्हज्ञानी जाने..

लीलाशाह भगवान की कृपा से आसुमल को वो  पद मिल गया…सारे  कहते …बापू क्या जादू है तेरे प्यार में… 


सत्संग की कैसी महिमा है…ईश्वर प्राप्ति का रास्ता सत्संग में सहज में सुलभ हो जाता है  बाकि साधन से कर्ता  मौजूद रहेता है…पूजा, यग्य -याग से नश्वर रिध्दी सिध्दी  मिल जाएगी , लेकिन उस का अहम् नहीं छूटेगा…भगवान कहेते जो मुझ में अहंकार का विसर्जन  कर के  मद-रूप हो जाता है, वो मुझे पा लेता है.. …सत्संग मेरे मिलने का सहज सुन्दर साधन है… वे लोग बहोत भाग्यशाली है जिन को हयात  महापुरुष का सत्संग मिल जाता है …

चान्द्रायण व्रत किया तो भी  कर्ता मौजूद रहता  है । सत्संग ज्ञान से कर्ता अपने को भगवान का जान लेता  है, आत्मा-परमात्मा  की प्रीति  हो जाती तो ईश्वर प्राप्ति सहज सुलभ हो जाती है । महाराज पीपा की चिंतन धारा  बदल गयी  । हाड़ मांस  के शरीर में, कमर तोड़ में शक्ति का ह्रास नहीं किया । ऐश आराम में मन नहीं रुका, इन्द्रियों की बेवकूफी से बुद्धि ऊपर उठती गयी । 

गुरू के बिना विद्वान् भी अनाथ है… गुरू मिल गये, दीक्षा मिल गयी तो मनुष्य जीवन सफलता  की ओर चल पडा समझो । जिन को दीक्षा नहीं मिली वो ‘राम राम’ जपना..  ‘राम राम रटते रहना… नियम पालना…
''संत मिलन को जाईये'' ये पाठ  करना रोज ।  

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय


सत्संग की ऐसी महानता है कि विलासी भोगी राजा  पीपा को महान गुरू  भक्त संत पीपाजी बना देता है ।  गुरूजी की प्रसन्नता पा कर राज्य में  लौटता है तो उसके पुण्य प्रताप से राज्य के बाग़ बगीचे, खेती, वृक्ष लहराने लगते है.. सुमति का दान करना भारी  पुण्य है..
हरिभक्त पीपा के स्वप्न में देवी दुर्गा आती है, बोलती कि ठीक रास्ता पकड़ा है । ऐसे ये विलासी पीपा गंगनौर गढ़ के सम्राट गुरूकृपा से भक्ति सम्राट हो गए ! अब राज्य के लोगों का जीवन बदलने की घडियां  आई ।रामानंद स्वामी ने जाहिर किया कि हम पीपा के राज्य में जायेंगे , संदेशा भेजो । गुरू महाराज ने आज्ञा की । पीपा के साथ सीता और अन्य  पत्नियां जो पहले काम की कीडि़यां थी, अब उन में भी राम के प्रेमा भक्ति के सखा बनेंगे ऐसा भाव आया । 

गुरू जी  शिष्यों के साथ पधार रहे, सन्देश मिला तो राजा  पीपा चल दिए पैदल जहां  गुरूजी पधारेंगे । भक्त मंडलियां  तैयारी में लग गयी । यथा राजा  तथा प्रजा… सारी  प्रजा भी भक्तिमय हो गयी  थी । खबर मिली तो पीपा नंगे पैर चलते चलते महाराजजी जहां  विश्राम करने वाले थे वहाँ  5 माईल  (8 कि. मी. ) दूर गुरू के चरणों में जा पहुंचे । वहाँ  गुरू महाराज का स्वागत करके उन के साथ पैदल यात्रा करते करते अपने राजमहल की तरफ आये । उत्सव हुआ…. दंडवत  प्रणाम करता, आरती करता, पूजन करता… गुरू महाराज के  सत्संग से लाभान्वित होते यथा राजा  तथा प्रजा, गंगनौर की प्रजा धनभागी हुई । 
‘वैष्णव  सम्प्रदाय की वैष्णवी प्रीति  का सदभाव  रखो.. किसी में बुराई नहीं है, दिखती है तो वो  आगंतुक  है… वास्तविक में जीवात्मा अमर है ..भगवान का शाश्वत सखा है’  । आत्मा परमात्मा का धीरे धीरे ज्ञान होने लगा । प्रजा का मधुमय ईश्वर से भक्तिभाव बढ़ा । प्रजा का हर्ष-शोक ईश्वर की भक्ति-प्रीति-पूजा में बदलता गया । 

वृक्षो में फल आये, खेती सुन्दरता से लहराने लगी । 
राज्य में संत की उपस्थिति से धन, सुख, संपत्ति, संपदा समृध्दी  बढ़ी । 
विदाई का अवसर हुआ । पीपाजी बोले, ‘अब नश्वर शरीर को मैं  मानने की गलती से ऊपर उठा हूँ, ‘राज्य मेरा’ ये भरम से पार हुआ हूँ, पहले मैं-मेरा में उलझा था, महाराज अब अपने चरणों में स्वीकार कर लो, संन्यास की दीक्षा दे दो, मैंने आपके चरणों में सुन्दर शिक्षा पायी है लेकिन ये संसार तो काजल की कोठरी है, घर में कितनी भी कोशिश करो तो भी क्रोध, मोह, आकर्षण, विकर्षण में गिरता-फिसलता रहता है । हाड-मांस के शरीर में फिसले गिरे तो मेरा भी सत्यानाश हुआ । गुरू जी आप हम को  अपना नहीं मानते, आप अपना मानते तो जैसा आपका हाथ, आपके  चरण आपके  साथ रखते, ऐसा ये सेवक भी शुद्ध रखने के लिए अपने चरणों में रखिये ।’
गुरू महाराज ने समझाया कि सन्यासी का जीवन आसान  नहीं, भिक्षा मांगकर खानी पड़ेगी, फरियाद छोड़ देनी पड़ेगी, मान-अपमान होगा उस वक्‍त सम रहना है, कठिन मार्ग है, तुम्हारी पत्नी को साथ नहीं रख सकते । 

वैष्णव  पतिव्रता वृत्ति की रानी सीता बोली, महाराज मैं  आपकी शरण हूँ । उसने भी रानी का अलंकार  उतार दिया और संन्यासी  के वस्र पहन  लिए । पीपा और सीता संन्यासी  बन कर काशी को चल पड़े सदा के लिए ।  राजलक्ष्मी को राम राम  कर दिया । एक दिन मरने पर तो छोड़ना ही था, त्याग से जीते जी राज लक्ष्मी  को राम राम कर डाला । गंगनौर का सम्राट पीपा महान संत पीपाजी बन गए । सत्संग की पुस्तकें लिखी । एक भोगी विलासी सत्संग से महान  संत बन गया..!!

ऐसे पीपाजी और सीता देवी गुरूजी का ज्ञान का प्रचार प्रसार करने निकले । सीता देवी इतनी सुन्दर थी की किसी की बुरी नजर पड़ गयी । 4 बदमाश इकठ्ठे हो गए कि बाबा को ऐसी रानी की क्या जरुरत है । बाबा के झूठ-मुठ के चेले बन गए, सेवादार बन गए, यात्रा करते करते कहीं रात हो गयी तो रुके, दूसरे दिन सुबह पीपाजी प्रभात में जल्दी स्नानादि करके चल दिए और सोचे कि  सीताजी भगतों  के साथ आएगी । पीपाजी आगे चले गए तो ये 4 बदमाश  कुकर्म करने के लिए सीतादेवी को जबरदस्ती जंगल में ले गए । सीतादेवी तो राम राम करे, इतने में कहीं से एक शेर आया । बदमाशों को चीरफाड़ के भगा दिय और शेर अंतर्धान हो गया ।  साधू के रूप में आया, सीतादेवी को बोले,  ‘पीपा जी आगे निकल गए बेटी अब तुम कैसे जाओगी?’

सीता को लगा की कोई है जो मदद करेंगे ।  शेरो के शेर! मेरे इश्वर! साधू महाराज को बोली, ‘मैं यहाँ जंगल में भूली पड़ी हूँ, बदमाशो ने ऐसा किया ।’ साधू महाराज बोले चल अब जल्दी जल्दी । साधू ने सीता देवी को पीपाजी से मिलवा दिया ! ऐसे ईश्वर कब  शेर बनकर प्रगट हो, साधू बन कर प्रगट हो और कब अंतर्धान होंगे .. भक्तो की रक्षा करते…  ईश्वर सर्व समर्थ है ..

हे प्रभु ! आनन्ददाता


हे प्रभु ! आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये।।
लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें।।
हे प्रभु….
निंदा किसी की हम किसी से भूलकर भी ना करें।
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूलकर भी ना करें।।
हे प्रभु….
सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें।
दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें।।
हे प्रभु….
जाये हमारी आयु हे प्रभु ! लोक के उपकार में।
हाथ डालें हम कभी न भूलकर अपकार में।।
हे प्रभु….
मातृभूमि मातृसेवा हो अधिक प्यारी हमें।
देश की सेवा करें निज देश हितकारी बनें।।
हे प्रभु….
कीजिए हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा !
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा।।
हे प्रभु….
प्रेम से हम गुरुजनों  की नित्य ही सेवा करें।
प्रेम से हम दुःखीजनों की नित्य ही सेवा करें।।
हे प्रभु

दुख का तो उपकार माने बेटे


एक बड़ा प्रसिध्द राज नेता था बंगाल में ….बड़ा जाना-माना था..धर्म परायण व्यक्ति था..अश्विनी दत्त बंगाल के प्रसिध्द राज नेता थे..उन के गुरु राज नारायण थे.
उस के गुरु को लकवा मार गया..3 महीने के बाद अश्विनी को पता चला…3 महीने से गुरु को लकवा मार गया, मुझे पता नही चला सोच कर विव्हल हो कर भागता भागता आया गुरु के पास…ज्यो ही गुरु के पास पहुँचा..प्रणाम करने जाता है तो गुरु का एक हाथ तो लकवे से निकम्मा  हो चुका था..गुरु ने दूसरे हाथ से पकड़ के उठाया..
बोले, ‘बेटा, कैसे भागे भागे आए हो…देखो भागा तो शरीर..और दुख हुआ मन में..लेकिन इन दोनो को तुम जानने वाले हो..ऐसा कर के गुरु ने सत्य स्वरूप ईश्वर आत्मा की सार बातें बताई..सुनते सुनते वो तो दुखी आया था, चिंतित हो के आया था…लेकिन गुरु की वाणी सुनते सुनते उस का दुख चिंता गायब हो गया..3 घंटे कैसे बीत  गये पता ही नही चला…
हसने लगा,”गुरु जी 3 घंटे बीत  गये!मुझे तो पता ही नही चला..मैं तो बहोत विव्हल  हो के आया था आप का स्वास्थ्य पुछने के लिए..लेकिन आप को ये लकवा मार गया इस की पीड़ा नही?..दुख नही? हम तो बहोत  दुखी थे और आप ने तो मेरे को 3 घंटे तक सत्संग का अमृतपान  कराया…”
गुरु ने अश्विनी दत्त(बंगाल के प्रसिध्द नेता) के पीठ पे थपथपाया..बोले, “पगले पीड़ा हुई है तो शरीर को..लकवा मारा है तो शरीर को..इस हाथ को..लेकिन दूसरा हाथ मौजूद है, पैर भी मौजूद है, जिव्हा भी मौजूद है..ये उस प्रभु की कितनी कृपा है!..पूरे शरीर को भी तो लकवा हो सकता था..हार्ट एटैक हो सकता था.और 60 साल तक शरीर स्वस्थ रहा..अभी थोड़े दिन..3 महीने से ही तो लकवा है …ये उस की कितनी कृपा है की दुख भेज कर वो हम को शरीर की आसक्ति मिटाने का संदेश देता है..सुख भेज कर हमें उदार बनाने का और परोपकार करने का संदेश देता है..हम को तो दुख का आदर करना चाहिए..दुख का उपकार मानना चाहिए..बचपन में हम दुखी होते थे जब माँ-बाप ज़बरदस्ती स्कूल ले जाते थे..लेकिन वो दुख नही होता तो आज हम विद्वान भी नही हो सकते थे..ऐसा कोई मनुष्य धरती पर नही है जिस का दुख के बिना विकास हुआ हो…दुख का तो खूब खूब धन्यवाद करना चाहिए…और दिखता दुख है, लेकिन अंदर से सुख, सावधानी और विवेक से भरा है.. और मुझे हरिचर्चा में विश्रान्ति दिलाया.. सत्संग करने के भागा दौड़ी से आराम करना चाहिए था, लेकिन मैं नही कर पा रहा था…तुम लोग नही करने देते थे..तो भगवान ने लकवा कर के आराम दिया..देखो ये उस की कितनी कृपा है..भगवान की और दुख की बड़ी कृपा है..माँ-बाप की कृपा है तो माँ बाप का हम श्राध्द  करते, तर्पण करते..लेकिन इस दुख देवता का तो हम श्राध्द तर्पण भी नही करते..क्यूँ की वो बेचारा आता है, मर जाता है..रहेता नही है…अभी ठीक भी हो जाएगा, अथवा शरीर के साथ चला जाएगा..माँ बाप तो मरने के बाद भी रहेते है..ये बेचारा तो एक बार मर जाता है तो फिर रहेता ही नही..तो इस का तो श्राद्ध  भी नही करते, तो इस का तो उपकार माने बेटे अश्विनी…”
अश्विनी देखता रहे गया !
गुरु ने कहा, “बेटा ये तेरी मेरी वार्ता जो सुनेगा वो भी स्वस्थ हो जाएगा.. बीमारी शरीर में आती है लाला!..दुख  तो मान में आता है …चिंता चित्त में आती है..तुम तो निर्लेप  नारायण के अमर आत्मा हो!”
हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम प्रभुजी ओम.. माधुर्य ओम..मेरे जी ओम ओम..प्यारे जी ओम…हा हा हा हा

मनुष्य को भगवान ने कितने कितने  अनुदान दिए है..ज़रा सोचते है तो मौन हो जाता है! मन विश्रान्ति में चला जाता है…जब तेरा गुरु है, और तू बोले की मैं परेशान हूँ, मैं दुखी हूँ तो तू गुरु का अपमान करता है..मानवता का अपमान करता है..जो बोलते है ना मैं दुखी हूँ, परेशान हूँ  तो समझ लेना की उन के भाग्य के वे शत्रु है…अभागे लोग सोचते है मैं दुखी, परेशान हूँ..समझदार लोग ऐसा कभी नही सोचते है…जो बोलते मैं दुखी परेशान हूँ उस के मान में  दुख परेशानी  ऐसा गहेरा उतरता जाएगा की जैसे हाथी दलदल में फँसे और ज्यों निकलना चाहे तो और गहेरा उतरे ..ऐसे ही दुखी और परेशान हूँ बोलते तो समझो वो दुख और परेशानी में हाथी के नाई  गहेरा जा रहा है..अभागा है..अपने भाग्य को कोस रहा है..
‘मैं दुखी नही हूँ, मैं परेशान नही हूँ..दुख है तो मन को है, परेशानी है तो मन को है..’ ये पक्का करे..वास्तव में मन की कल्पना है परेशानी..दुख परेशानी  तो मेरे विकास करने के लिए है  ..वाह मेरे प्रभु !
सुखम वा यदि वा दुखम स योगी परमो मतः ll

जिस वस्तु को हम प्यार करते वो प्यारी हो जाती है, जिस वस्तु को हम महत्व देते वो महत्व पूर्ण हो जाती है..जिस वस्तु को मानव ठुकरा दे वो वस्तु बेकार हो जाती है..नोइडा में जहा सत्संग हुआ था तो वहाँ खेत थे..और वहाँ अब पौने चार लाख रुपये में 1 मीटर जगह मिलती है..हे मानव तू जिस जगह को महत्व देता वो जगह कीमती हो जाती..तू जिस फॅशन को महत्व देता वो कीमती हो जाती..तू इतना सब को महत्व देनेवाला अपने आप को कोस कर अपना सत्यानाश क्यूँ करता है?

असलियत बताऊं


दीर्घ तपा  ऋषी और उन की पत्नी साध्वी थी…दोनों ज्ञान ध्यान में आगे बढ़ने के लिए प्रयत्न करते…दीर्घ तपा को पावक नामक  एक बेटा हुआ..कुछ समय के बाद उस दम्पति को पुण्यक नाम का दूसरा बेटा  हुआ…वो दम्पति  इच्छा निवृत्त कर के, कंद मूल फल से व्यवहार चलाते….  प्रसन चित्त रहेते… काल चक्र चलता रहा… आत्मज्ञान पाने के बाद भी शरीर के धर्म तो होते ही है….शरीर को  बुढापा तो आता ही है…. देह धारणा कर के दीर्घतपा ने ऐसे शरीर को छोड़ा की जैसे कोई  आमिर आदमी पुराने कपडे छोड़ते ऐसे शरीर को छोड़कर ब्रम्हस्वरूप परमात्म से एकाकारता कर के ब्रम्ह में विलय हो गए….
उन की  पत्नी ने भी पति ने शरीर छोड़ा देख के अपना शरीर छोड़ा…
पुण्यात्माओं के लिए  उत्तरायण मार्ग है…. भीष्म पितामह ने उत्तरायण होने तक प्राण रोक के रखे…लेकिन पापियों के लिए क्या उत्तरायण और क्या दक्षिणायन..उन को कोई फरक नही पङता..
धर्मात्मा के लिए शरीर छोड़ते तो सूर्य लोक चन्द्र लोक को प्राप्त होते…लेकिन पापी लोग मरते तो  वासनाओ के अनुसार गिद्ध बन जाते…कबूतर बन गए ….शरीर मिला तो ठीक नही तो नाली में बह गए… ऐसे पापी के दुखो की गिनती नही…
जिन की वासनाओ की पूर्ण तृप्ति नही हुयी ऐसे धर्मात्मा  लोग दक्षिणायन में प्राण छोड़ते तो भी  चंद्रलोक में जाते… चन्द्र लोक से फिर वापस आते और अपनी वासनाओ के अनुसार जनमते…
तीसरे प्रकार के लोग होते , जिन की वासना निवृत्त हो गई है ऐसे जीव  जहां भगवान शिव,  वासुकी नाग आदि मुक्त पुरूष हो गए उन में जाते है …
(जिन्हों ने जीते जी ब्रम्ह को पा लिया उन को ब्रम्ह लोक जाना  नही होता).. … ब्रम्ह लोक में ब्रम्ह ये बड़ा  पद है..लेकिन  ब्रम्हज्ञानी के लिए क्या ब्रम्ह लोक और क्या ब्रम्ह पद…. ब्रम्ह लोक और ब्रम्ह भी उन के मन  में एक कोने में है …..असलियत बताऊ ना तो जैसे मंसूर के साथ हुआ…जीसस  से जो व्यवहार  किया ऐसा ब्रम्हज्ञानियों से ये दुनिया व्यवहार करेगी….
घाटवाले बाबा बोलते, अपना अनुभव ज्ञानवालो  को दूसरो को नही बताना चाहिए… उचित नही है….कभी कोई  उच्च कोटि का आत्मा मिले तो  जरा सा संकेत करते…!
भगवान के नाम से मन की चंचलता से अपने को बचाए…. मन ,बुध्दि, वासना दुखदायी है… छल , छिद्र,  कपट दुखदायी है …
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना l
एक हरी भजे , बाकि सब स्वप्ना ll

उत्तरायण (14 जन॰) : देवताओं का प्रभात

छः महीने सूर्य का रथ दक्षिणायन को और छः महीने उत्तरायण को चलता है । मनुष्यों के छः महीने बीतते हैं तब देवताओं की एक रात होती है एवं मनुष्यों के छः महीने बीतते हैं तो देवताओं का एक दिन होता है । उत्तरायण के दिन देवता लोग भी जागते हैं । हम पर उन देवताओं की कृपा बरसे, इस भाव से भी यह पर्व मनाया जाता है । कहते हैं कि इस दिन यज्ञ में दिये गये द्रव्य को ग्रहण करने के लिए वसुंधरा पर देवता अवतरित होते हैं । इसी प्रकाशमय मार्ग से पुण्यात्मा पुरुष शरीर छोड़कर स्वर्गादिक लोकों में प्रवेश करते हैं । इसलिए यह आलोक का अवसर माना गया है । इस उत्तरायण पर्व का इंतजार करनेवाले भीष्म पितामह ने उत्तरायण शुरू होने के बाद ही अपनी देह त्यागना पसंद किया था । विश्व का कोई योध्दा शर-शय्या पर अट्ठावन दिन तो क्या अट्ठावन घंटे भी संकल्प के बल से जी के नहीं दिखा पाया। वह काम भारत के भीष्म पितामह ने करके दिखाया । 
धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन दान-पुण्य, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अत्यंत महत्त्व है। इस अवसर पर दिया हुआ दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना होकर प्राप्त होता है । यह प्राकृतिक उत्सव है, प्रकृति से तालमेल करानेवाला उत्सव है । दक्षिण भारत में तमिल वर्ष की शुरुआत इसी दिन से होती है । वहाँ यह पर्व 'थई पोंगल' के नाम से जाना जाता है । सिंधी लोग इस पर्व को 'तिरमौरी' कहते हैं, हिन्दी लोग 'मकर संक्रांति' कहते हैं एवं गुजरात में यह पर्व 'उत्तरायण' के नाम से जाना जाता है । यह दिवस विशेष पुण्य अर्जित करने का दिवस है । 
इस दिन शिवजी ने अपने साधकों पर, ऋषियों पर विशेष कृपा की थी । इस दिन भगवान सूर्यनारायण का ध्यान करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हमें क्रोध से, काम-विकार से, चिंताओं से मुक्त करके आत्मशांति पाने में, गुरु की कृपा पचाने में मदद करें।'
 इस दिन सूर्यनारायण के नामों का जप, उन्हें अर्घ्य-अर्पण और विशिष्ट मंत्र के द्वारा उनका स्तवन किया जाय तो सारे अनिष्ट नष्ट हो जायेंगे और वर्ष भर के पुण्यलाभ प्राप्त होंगे। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः । इस मंत्र से सूर्यनारायण की वंदना कर लेना, उनका चिंतन करके प्रणाम कर लेना । इससे सूर्यनारायण प्रसन्न होंगे, निरोगता देंगे और अनिष्ट से भी रक्षा करेंगे। 
 उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण के इन नामों का जप विशेष हितकारी है ः ॐ मित्राय नमः। ॐ रवये नमः । ॐ सूर्याय नमः । ॐ भानवे नमः। ॐ खगाय नमः । ॐ पूष्णे नमः । ॐ हिरण्यगर्भाय नमः । ॐ मरीचये नमः । ॐ आदित्याय नमः । ॐ सवित्रे नमः । ॐ अर्काय नमः । ॐ भास्कराय नमः। ॐ सवितृ सूर्यनारायणाय नमः । 
ब्रह्मचर्य से बुध्दिबल बहुत बढ़ता है । जिनको ब्रह्मचर्य रखना हो, संयमी जीवन जीना हो, वे उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण का सुमिरन करें, प्रार्थना करें जिससे ब्रह्मचर्य-व्रत में सफल हों और बुध्दि में बल बढ़े । ॐ सूर्याय नमः... ॐ शंकराय नमः... ॐ गं गणपतये नमः... ॐ हनुमते नमः... ॐ भीष्माय नमः... ॐ अर्यमायै नमः...
 इस दिन किये गये सत्कर्म विशेष फल देते हैं। इस दिन भगवान शिव को तिल-चावल अर्पण करने का अथवा तिल-चावल से अर्घ्य देने का भी विधान है । इस पर्व पर तिल का विशेष महत्त्व माना गया है । तिल का उबटन, तिलमिश्रित जल से स्नान, तिलमिश्रित जल का पान, तिल-हवन, तिलमिश्रित भोजन व तिल-दान, ये सभी पापनाशक प्रयोग हैं । इसलिए इस दिन तिल, गुड़ तथा चीनी मिले लड्डू खाने तथा दान देने का अपार महत्त्व है । तिल के लड्डू खाने से मधुरता एवं स्निग्धता प्राप्त होती है एवं शरीर पुष्ट होता है । शीतकाल में इसका सेवन लाभप्रद है । यह तो हुआ लौकिक रूप से उत्तरायण अथवा संक्रांति मनाना किंतु मकर संक्रांति का आध्यात्मिक तात्पर्य है - जीवन में सम्यक् क्रांति। अपने चित्त को विषय-विकारों से हटाकर निर्विकारी नारायण में लगाने का, सम्यक् क्रांति का संकल्प करने का यह दिन है । अपने जीवन को परमात्म-ध्यान, परमात्म-ज्ञान एवं परमात्मप्राप्ति की ओर ले जाने का संकल्प करने का बढ़िया-से-बढ़िया जो दिन है वह मकर संक्रांति का दिन है । मानव सदा सुख का प्यासा रहा है । उसे सम्यक् सुख नहीं मिलता तो अपने को असम्यक् सुख में खपा-खपाकर चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है । अतः अपने जीवन में सम्यक् सुख, वास्तविक सुख पाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए । आत्मसुखात् न परं विद्यते । आत्मज्ञानात् न परं विद्यते । आत्मलाभात् न परं विद्यते । वास्तविक सुख क्या है ? आत्मसुख । अतः आत्मसुख पाने के लिए कटिबध्द होने का दिवस ही है मकर संक्रांति । यह पर्व सिखाता है कि हमारे जीवन में भी सम्यक् क्रांति आये । हमारा जीवन निर्भयता व प्रेम से परिपूर्ण हो । तिल-गुड़ का आदान-प्रदान परस्पर प्रेमवृध्दि का ही द्योतक है । संक्रांति के दिन दान का विशेष महत्त्व है । अतः जितना सम्भव हो सके उतना किसी गरीब को अन्नदान करें । तिल के लड्डू भी दान किये जाते हैं । आज के दिन लोगों में सत्साहित्य के दान का भी सुअवसर प्राप्त किया जा सकता है । तुम यह न कर सको तो भी कोई हर्ज नहीं किंतु हरिनाम का रस तो जरूर पीना-पिलाना । अच्छे-में-अच्छा तो परमात्मा है, उसका नाम लेते-लेते यदि अपने अहं को सद्गुरु के चरणों में, संतों के चरणों में अर्पित कर दो तो फायदा-ही-फायदा है और अहंदान से बढ़कर तो कोई दान नहीं । लौकिक दान के साथ अगर अपना-आपा ही संतों के चरणों में, सद्गुरु के चरणों में दान कर दिया जाय तो फिर चौरासी का चक्कर सदा के लिए मिट जाय । संक्रांति के दिन सूर्य का रथ उत्तर की ओर प्रयाण करता है । वैसे ही तुम भी इस मकर संक्रांति के पर्व पर संकल्प कर लो कि अब हम अपने जीवन को उत्तर की ओर अर्थात् उत्थान की ओर ले जायेंगे । अपने विचारों को उत्थान की तरफ मोड़ेंगे । यदि ऐसा कर सको तो यह दिन तुम्हारे लिए परम मांगलिक दिन हो जायेगा । पहले के जमाने में लोग इस दिन अपने तुच्छ जीवन को बदलकर महान बनने का संकल्प करते थे । हे साधक ! तू भी संकल्प कर कि 'अपने जीवन में सम्यक् क्रांति - संक्रांति लाऊँगा । अपनी तुच्छ, गंदी आदतों को कुचल दूँगा और दिव्य जीवन बिताऊँगा । प्रतिदिन जप-ध्यान करूँगा, स्वाध्याय करूँगा और अपने जीवन को महान बनाकर ही रहूँगा। त्रिबंधसहित ॐकार का गुंजन करते हुए किये हुए दृढ़ संकल्प और प्रार्थना फलित होती है। प्राणिमात्र के जो परम हितैषी हैं उन परमात्मा की लीला में प्रसन्न रहूँगा । चाहे मान हो चाहे अपमान, चाहे सुख मिले चाहे दुःख किंतु सबके पीछे देनेवाले करुणामय हाथों को ही देखूँगा । प्रत्येक परिस्थिति में सम रहकर अपने जीवन को तेजस्वी-ओजस्वी एवं दिव्य बनाने का प्रयास अवश्य करूँगा।'

अपने आत्मा परमात्मा में शान्त होते जाओ। चैतन्य स्वरूप परमात्मा में तल्लीन होते जाओ। चिन्तन करो कि 'मैं सम्पूर्ण स्वस्थ हूँ.... मैं सम्पूर्ण निर्दोष हूँ.... मैं सम्पूर्णतया परमात्मा का हूँ... मैं सम्पूर्ण आनन्दस्वरूप हूँ... हरि ॐ... ॐ...ॐ.... मधुर आनन्द... अनुपम शान्ति.... चिदानन्दस्वरूप परमेश्वरीय शान्ति.... ईश्वरीय आनन्द... आत्मानन्द.... निजानन्द... विकारों का सुखाभास नहीं अपितु निजस्वरूप का आनन्द....निज सुख बिन मन होवईं कि थिरा ?

निज के सुख को जगाओ... मन स्थिर होने लगेगा। निज सुख नारायण का प्रसाद माना जाता है।