स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

हे प्रभु ! आनन्ददाता


हे प्रभु ! आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये।।
लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें।।
हे प्रभु….
निंदा किसी की हम किसी से भूलकर भी ना करें।
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूलकर भी ना करें।।
हे प्रभु….
सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें।
दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें।।
हे प्रभु….
जाये हमारी आयु हे प्रभु ! लोक के उपकार में।
हाथ डालें हम कभी न भूलकर अपकार में।।
हे प्रभु….
मातृभूमि मातृसेवा हो अधिक प्यारी हमें।
देश की सेवा करें निज देश हितकारी बनें।।
हे प्रभु….
कीजिए हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा !
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा।।
हे प्रभु….
प्रेम से हम गुरुजनों  की नित्य ही सेवा करें।
प्रेम से हम दुःखीजनों की नित्य ही सेवा करें।।
हे प्रभु

दुख का तो उपकार माने बेटे


एक बड़ा प्रसिध्द राज नेता था बंगाल में ….बड़ा जाना-माना था..धर्म परायण व्यक्ति था..अश्विनी दत्त बंगाल के प्रसिध्द राज नेता थे..उन के गुरु राज नारायण थे.
उस के गुरु को लकवा मार गया..3 महीने के बाद अश्विनी को पता चला…3 महीने से गुरु को लकवा मार गया, मुझे पता नही चला सोच कर विव्हल हो कर भागता भागता आया गुरु के पास…ज्यो ही गुरु के पास पहुँचा..प्रणाम करने जाता है तो गुरु का एक हाथ तो लकवे से निकम्मा  हो चुका था..गुरु ने दूसरे हाथ से पकड़ के उठाया..
बोले, ‘बेटा, कैसे भागे भागे आए हो…देखो भागा तो शरीर..और दुख हुआ मन में..लेकिन इन दोनो को तुम जानने वाले हो..ऐसा कर के गुरु ने सत्य स्वरूप ईश्वर आत्मा की सार बातें बताई..सुनते सुनते वो तो दुखी आया था, चिंतित हो के आया था…लेकिन गुरु की वाणी सुनते सुनते उस का दुख चिंता गायब हो गया..3 घंटे कैसे बीत  गये पता ही नही चला…
हसने लगा,”गुरु जी 3 घंटे बीत  गये!मुझे तो पता ही नही चला..मैं तो बहोत विव्हल  हो के आया था आप का स्वास्थ्य पुछने के लिए..लेकिन आप को ये लकवा मार गया इस की पीड़ा नही?..दुख नही? हम तो बहोत  दुखी थे और आप ने तो मेरे को 3 घंटे तक सत्संग का अमृतपान  कराया…”
गुरु ने अश्विनी दत्त(बंगाल के प्रसिध्द नेता) के पीठ पे थपथपाया..बोले, “पगले पीड़ा हुई है तो शरीर को..लकवा मारा है तो शरीर को..इस हाथ को..लेकिन दूसरा हाथ मौजूद है, पैर भी मौजूद है, जिव्हा भी मौजूद है..ये उस प्रभु की कितनी कृपा है!..पूरे शरीर को भी तो लकवा हो सकता था..हार्ट एटैक हो सकता था.और 60 साल तक शरीर स्वस्थ रहा..अभी थोड़े दिन..3 महीने से ही तो लकवा है …ये उस की कितनी कृपा है की दुख भेज कर वो हम को शरीर की आसक्ति मिटाने का संदेश देता है..सुख भेज कर हमें उदार बनाने का और परोपकार करने का संदेश देता है..हम को तो दुख का आदर करना चाहिए..दुख का उपकार मानना चाहिए..बचपन में हम दुखी होते थे जब माँ-बाप ज़बरदस्ती स्कूल ले जाते थे..लेकिन वो दुख नही होता तो आज हम विद्वान भी नही हो सकते थे..ऐसा कोई मनुष्य धरती पर नही है जिस का दुख के बिना विकास हुआ हो…दुख का तो खूब खूब धन्यवाद करना चाहिए…और दिखता दुख है, लेकिन अंदर से सुख, सावधानी और विवेक से भरा है.. और मुझे हरिचर्चा में विश्रान्ति दिलाया.. सत्संग करने के भागा दौड़ी से आराम करना चाहिए था, लेकिन मैं नही कर पा रहा था…तुम लोग नही करने देते थे..तो भगवान ने लकवा कर के आराम दिया..देखो ये उस की कितनी कृपा है..भगवान की और दुख की बड़ी कृपा है..माँ-बाप की कृपा है तो माँ बाप का हम श्राध्द  करते, तर्पण करते..लेकिन इस दुख देवता का तो हम श्राध्द तर्पण भी नही करते..क्यूँ की वो बेचारा आता है, मर जाता है..रहेता नही है…अभी ठीक भी हो जाएगा, अथवा शरीर के साथ चला जाएगा..माँ बाप तो मरने के बाद भी रहेते है..ये बेचारा तो एक बार मर जाता है तो फिर रहेता ही नही..तो इस का तो श्राद्ध  भी नही करते, तो इस का तो उपकार माने बेटे अश्विनी…”
अश्विनी देखता रहे गया !
गुरु ने कहा, “बेटा ये तेरी मेरी वार्ता जो सुनेगा वो भी स्वस्थ हो जाएगा.. बीमारी शरीर में आती है लाला!..दुख  तो मान में आता है …चिंता चित्त में आती है..तुम तो निर्लेप  नारायण के अमर आत्मा हो!”
हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम प्रभुजी ओम.. माधुर्य ओम..मेरे जी ओम ओम..प्यारे जी ओम…हा हा हा हा

मनुष्य को भगवान ने कितने कितने  अनुदान दिए है..ज़रा सोचते है तो मौन हो जाता है! मन विश्रान्ति में चला जाता है…जब तेरा गुरु है, और तू बोले की मैं परेशान हूँ, मैं दुखी हूँ तो तू गुरु का अपमान करता है..मानवता का अपमान करता है..जो बोलते है ना मैं दुखी हूँ, परेशान हूँ  तो समझ लेना की उन के भाग्य के वे शत्रु है…अभागे लोग सोचते है मैं दुखी, परेशान हूँ..समझदार लोग ऐसा कभी नही सोचते है…जो बोलते मैं दुखी परेशान हूँ उस के मान में  दुख परेशानी  ऐसा गहेरा उतरता जाएगा की जैसे हाथी दलदल में फँसे और ज्यों निकलना चाहे तो और गहेरा उतरे ..ऐसे ही दुखी और परेशान हूँ बोलते तो समझो वो दुख और परेशानी में हाथी के नाई  गहेरा जा रहा है..अभागा है..अपने भाग्य को कोस रहा है..
‘मैं दुखी नही हूँ, मैं परेशान नही हूँ..दुख है तो मन को है, परेशानी है तो मन को है..’ ये पक्का करे..वास्तव में मन की कल्पना है परेशानी..दुख परेशानी  तो मेरे विकास करने के लिए है  ..वाह मेरे प्रभु !
सुखम वा यदि वा दुखम स योगी परमो मतः ll

जिस वस्तु को हम प्यार करते वो प्यारी हो जाती है, जिस वस्तु को हम महत्व देते वो महत्व पूर्ण हो जाती है..जिस वस्तु को मानव ठुकरा दे वो वस्तु बेकार हो जाती है..नोइडा में जहा सत्संग हुआ था तो वहाँ खेत थे..और वहाँ अब पौने चार लाख रुपये में 1 मीटर जगह मिलती है..हे मानव तू जिस जगह को महत्व देता वो जगह कीमती हो जाती..तू जिस फॅशन को महत्व देता वो कीमती हो जाती..तू इतना सब को महत्व देनेवाला अपने आप को कोस कर अपना सत्यानाश क्यूँ करता है?

असलियत बताऊं


दीर्घ तपा  ऋषी और उन की पत्नी साध्वी थी…दोनों ज्ञान ध्यान में आगे बढ़ने के लिए प्रयत्न करते…दीर्घ तपा को पावक नामक  एक बेटा हुआ..कुछ समय के बाद उस दम्पति को पुण्यक नाम का दूसरा बेटा  हुआ…वो दम्पति  इच्छा निवृत्त कर के, कंद मूल फल से व्यवहार चलाते….  प्रसन चित्त रहेते… काल चक्र चलता रहा… आत्मज्ञान पाने के बाद भी शरीर के धर्म तो होते ही है….शरीर को  बुढापा तो आता ही है…. देह धारणा कर के दीर्घतपा ने ऐसे शरीर को छोड़ा की जैसे कोई  आमिर आदमी पुराने कपडे छोड़ते ऐसे शरीर को छोड़कर ब्रम्हस्वरूप परमात्म से एकाकारता कर के ब्रम्ह में विलय हो गए….
उन की  पत्नी ने भी पति ने शरीर छोड़ा देख के अपना शरीर छोड़ा…
पुण्यात्माओं के लिए  उत्तरायण मार्ग है…. भीष्म पितामह ने उत्तरायण होने तक प्राण रोक के रखे…लेकिन पापियों के लिए क्या उत्तरायण और क्या दक्षिणायन..उन को कोई फरक नही पङता..
धर्मात्मा के लिए शरीर छोड़ते तो सूर्य लोक चन्द्र लोक को प्राप्त होते…लेकिन पापी लोग मरते तो  वासनाओ के अनुसार गिद्ध बन जाते…कबूतर बन गए ….शरीर मिला तो ठीक नही तो नाली में बह गए… ऐसे पापी के दुखो की गिनती नही…
जिन की वासनाओ की पूर्ण तृप्ति नही हुयी ऐसे धर्मात्मा  लोग दक्षिणायन में प्राण छोड़ते तो भी  चंद्रलोक में जाते… चन्द्र लोक से फिर वापस आते और अपनी वासनाओ के अनुसार जनमते…
तीसरे प्रकार के लोग होते , जिन की वासना निवृत्त हो गई है ऐसे जीव  जहां भगवान शिव,  वासुकी नाग आदि मुक्त पुरूष हो गए उन में जाते है …
(जिन्हों ने जीते जी ब्रम्ह को पा लिया उन को ब्रम्ह लोक जाना  नही होता).. … ब्रम्ह लोक में ब्रम्ह ये बड़ा  पद है..लेकिन  ब्रम्हज्ञानी के लिए क्या ब्रम्ह लोक और क्या ब्रम्ह पद…. ब्रम्ह लोक और ब्रम्ह भी उन के मन  में एक कोने में है …..असलियत बताऊ ना तो जैसे मंसूर के साथ हुआ…जीसस  से जो व्यवहार  किया ऐसा ब्रम्हज्ञानियों से ये दुनिया व्यवहार करेगी….
घाटवाले बाबा बोलते, अपना अनुभव ज्ञानवालो  को दूसरो को नही बताना चाहिए… उचित नही है….कभी कोई  उच्च कोटि का आत्मा मिले तो  जरा सा संकेत करते…!
भगवान के नाम से मन की चंचलता से अपने को बचाए…. मन ,बुध्दि, वासना दुखदायी है… छल , छिद्र,  कपट दुखदायी है …
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना l
एक हरी भजे , बाकि सब स्वप्ना ll

उत्तरायण (14 जन॰) : देवताओं का प्रभात

छः महीने सूर्य का रथ दक्षिणायन को और छः महीने उत्तरायण को चलता है । मनुष्यों के छः महीने बीतते हैं तब देवताओं की एक रात होती है एवं मनुष्यों के छः महीने बीतते हैं तो देवताओं का एक दिन होता है । उत्तरायण के दिन देवता लोग भी जागते हैं । हम पर उन देवताओं की कृपा बरसे, इस भाव से भी यह पर्व मनाया जाता है । कहते हैं कि इस दिन यज्ञ में दिये गये द्रव्य को ग्रहण करने के लिए वसुंधरा पर देवता अवतरित होते हैं । इसी प्रकाशमय मार्ग से पुण्यात्मा पुरुष शरीर छोड़कर स्वर्गादिक लोकों में प्रवेश करते हैं । इसलिए यह आलोक का अवसर माना गया है । इस उत्तरायण पर्व का इंतजार करनेवाले भीष्म पितामह ने उत्तरायण शुरू होने के बाद ही अपनी देह त्यागना पसंद किया था । विश्व का कोई योध्दा शर-शय्या पर अट्ठावन दिन तो क्या अट्ठावन घंटे भी संकल्प के बल से जी के नहीं दिखा पाया। वह काम भारत के भीष्म पितामह ने करके दिखाया । 
धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन दान-पुण्य, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अत्यंत महत्त्व है। इस अवसर पर दिया हुआ दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना होकर प्राप्त होता है । यह प्राकृतिक उत्सव है, प्रकृति से तालमेल करानेवाला उत्सव है । दक्षिण भारत में तमिल वर्ष की शुरुआत इसी दिन से होती है । वहाँ यह पर्व 'थई पोंगल' के नाम से जाना जाता है । सिंधी लोग इस पर्व को 'तिरमौरी' कहते हैं, हिन्दी लोग 'मकर संक्रांति' कहते हैं एवं गुजरात में यह पर्व 'उत्तरायण' के नाम से जाना जाता है । यह दिवस विशेष पुण्य अर्जित करने का दिवस है । 
इस दिन शिवजी ने अपने साधकों पर, ऋषियों पर विशेष कृपा की थी । इस दिन भगवान सूर्यनारायण का ध्यान करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हमें क्रोध से, काम-विकार से, चिंताओं से मुक्त करके आत्मशांति पाने में, गुरु की कृपा पचाने में मदद करें।'
 इस दिन सूर्यनारायण के नामों का जप, उन्हें अर्घ्य-अर्पण और विशिष्ट मंत्र के द्वारा उनका स्तवन किया जाय तो सारे अनिष्ट नष्ट हो जायेंगे और वर्ष भर के पुण्यलाभ प्राप्त होंगे। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः । इस मंत्र से सूर्यनारायण की वंदना कर लेना, उनका चिंतन करके प्रणाम कर लेना । इससे सूर्यनारायण प्रसन्न होंगे, निरोगता देंगे और अनिष्ट से भी रक्षा करेंगे। 
 उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण के इन नामों का जप विशेष हितकारी है ः ॐ मित्राय नमः। ॐ रवये नमः । ॐ सूर्याय नमः । ॐ भानवे नमः। ॐ खगाय नमः । ॐ पूष्णे नमः । ॐ हिरण्यगर्भाय नमः । ॐ मरीचये नमः । ॐ आदित्याय नमः । ॐ सवित्रे नमः । ॐ अर्काय नमः । ॐ भास्कराय नमः। ॐ सवितृ सूर्यनारायणाय नमः । 
ब्रह्मचर्य से बुध्दिबल बहुत बढ़ता है । जिनको ब्रह्मचर्य रखना हो, संयमी जीवन जीना हो, वे उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण का सुमिरन करें, प्रार्थना करें जिससे ब्रह्मचर्य-व्रत में सफल हों और बुध्दि में बल बढ़े । ॐ सूर्याय नमः... ॐ शंकराय नमः... ॐ गं गणपतये नमः... ॐ हनुमते नमः... ॐ भीष्माय नमः... ॐ अर्यमायै नमः...
 इस दिन किये गये सत्कर्म विशेष फल देते हैं। इस दिन भगवान शिव को तिल-चावल अर्पण करने का अथवा तिल-चावल से अर्घ्य देने का भी विधान है । इस पर्व पर तिल का विशेष महत्त्व माना गया है । तिल का उबटन, तिलमिश्रित जल से स्नान, तिलमिश्रित जल का पान, तिल-हवन, तिलमिश्रित भोजन व तिल-दान, ये सभी पापनाशक प्रयोग हैं । इसलिए इस दिन तिल, गुड़ तथा चीनी मिले लड्डू खाने तथा दान देने का अपार महत्त्व है । तिल के लड्डू खाने से मधुरता एवं स्निग्धता प्राप्त होती है एवं शरीर पुष्ट होता है । शीतकाल में इसका सेवन लाभप्रद है । यह तो हुआ लौकिक रूप से उत्तरायण अथवा संक्रांति मनाना किंतु मकर संक्रांति का आध्यात्मिक तात्पर्य है - जीवन में सम्यक् क्रांति। अपने चित्त को विषय-विकारों से हटाकर निर्विकारी नारायण में लगाने का, सम्यक् क्रांति का संकल्प करने का यह दिन है । अपने जीवन को परमात्म-ध्यान, परमात्म-ज्ञान एवं परमात्मप्राप्ति की ओर ले जाने का संकल्प करने का बढ़िया-से-बढ़िया जो दिन है वह मकर संक्रांति का दिन है । मानव सदा सुख का प्यासा रहा है । उसे सम्यक् सुख नहीं मिलता तो अपने को असम्यक् सुख में खपा-खपाकर चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है । अतः अपने जीवन में सम्यक् सुख, वास्तविक सुख पाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए । आत्मसुखात् न परं विद्यते । आत्मज्ञानात् न परं विद्यते । आत्मलाभात् न परं विद्यते । वास्तविक सुख क्या है ? आत्मसुख । अतः आत्मसुख पाने के लिए कटिबध्द होने का दिवस ही है मकर संक्रांति । यह पर्व सिखाता है कि हमारे जीवन में भी सम्यक् क्रांति आये । हमारा जीवन निर्भयता व प्रेम से परिपूर्ण हो । तिल-गुड़ का आदान-प्रदान परस्पर प्रेमवृध्दि का ही द्योतक है । संक्रांति के दिन दान का विशेष महत्त्व है । अतः जितना सम्भव हो सके उतना किसी गरीब को अन्नदान करें । तिल के लड्डू भी दान किये जाते हैं । आज के दिन लोगों में सत्साहित्य के दान का भी सुअवसर प्राप्त किया जा सकता है । तुम यह न कर सको तो भी कोई हर्ज नहीं किंतु हरिनाम का रस तो जरूर पीना-पिलाना । अच्छे-में-अच्छा तो परमात्मा है, उसका नाम लेते-लेते यदि अपने अहं को सद्गुरु के चरणों में, संतों के चरणों में अर्पित कर दो तो फायदा-ही-फायदा है और अहंदान से बढ़कर तो कोई दान नहीं । लौकिक दान के साथ अगर अपना-आपा ही संतों के चरणों में, सद्गुरु के चरणों में दान कर दिया जाय तो फिर चौरासी का चक्कर सदा के लिए मिट जाय । संक्रांति के दिन सूर्य का रथ उत्तर की ओर प्रयाण करता है । वैसे ही तुम भी इस मकर संक्रांति के पर्व पर संकल्प कर लो कि अब हम अपने जीवन को उत्तर की ओर अर्थात् उत्थान की ओर ले जायेंगे । अपने विचारों को उत्थान की तरफ मोड़ेंगे । यदि ऐसा कर सको तो यह दिन तुम्हारे लिए परम मांगलिक दिन हो जायेगा । पहले के जमाने में लोग इस दिन अपने तुच्छ जीवन को बदलकर महान बनने का संकल्प करते थे । हे साधक ! तू भी संकल्प कर कि 'अपने जीवन में सम्यक् क्रांति - संक्रांति लाऊँगा । अपनी तुच्छ, गंदी आदतों को कुचल दूँगा और दिव्य जीवन बिताऊँगा । प्रतिदिन जप-ध्यान करूँगा, स्वाध्याय करूँगा और अपने जीवन को महान बनाकर ही रहूँगा। त्रिबंधसहित ॐकार का गुंजन करते हुए किये हुए दृढ़ संकल्प और प्रार्थना फलित होती है। प्राणिमात्र के जो परम हितैषी हैं उन परमात्मा की लीला में प्रसन्न रहूँगा । चाहे मान हो चाहे अपमान, चाहे सुख मिले चाहे दुःख किंतु सबके पीछे देनेवाले करुणामय हाथों को ही देखूँगा । प्रत्येक परिस्थिति में सम रहकर अपने जीवन को तेजस्वी-ओजस्वी एवं दिव्य बनाने का प्रयास अवश्य करूँगा।'

अपने आत्मा परमात्मा में शान्त होते जाओ। चैतन्य स्वरूप परमात्मा में तल्लीन होते जाओ। चिन्तन करो कि 'मैं सम्पूर्ण स्वस्थ हूँ.... मैं सम्पूर्ण निर्दोष हूँ.... मैं सम्पूर्णतया परमात्मा का हूँ... मैं सम्पूर्ण आनन्दस्वरूप हूँ... हरि ॐ... ॐ...ॐ.... मधुर आनन्द... अनुपम शान्ति.... चिदानन्दस्वरूप परमेश्वरीय शान्ति.... ईश्वरीय आनन्द... आत्मानन्द.... निजानन्द... विकारों का सुखाभास नहीं अपितु निजस्वरूप का आनन्द....निज सुख बिन मन होवईं कि थिरा ?

निज के सुख को जगाओ... मन स्थिर होने लगेगा। निज सुख नारायण का प्रसाद माना जाता है।

हँसे तो तुरंत एफ़आरआई दर्ज


देल्ही पूनम सत्संग अमृत;
10 दिसंबर 2011  ( सुबह का सत्र)

हरि हरि बोल!
भगवान राम ने बैन लगा दी थी …अयोध्या के पुलिस  के नाक में दम कर  दिया था इस बैन ने की जो भी हँसे तो तुरंत एफ़आरआई दर्ज कर दो…कोई भी हसता हुआ  दिखे तो उस पर एफ़आरआई कर दो..पुलिस के नाक में दम कर दी..सब पर ये  क़ानून लागू था. आईजी,  डीआईजी , मंत्री , महा मंत्री कोई भी हो..हसेगा तो  तुरंत एफ़आरआई दर्ज !
क्यों की राम रावण का युध्द हुआ था तो रावण को शिव जी का वरदान  था..रावण ने वरदान माँगा था की मेरा सीर कटे , हाथ कटे  तो फिर  से लग जाए..शिव जी ने “तथास्तु” बोला था…तो जब राम जी बाण मारते तो रावण के सीर कटे, हाथ कटे…लेकिन कटे हुए सीर आकाश में जाते..हसते हाः  हाः हाः… और फिर से नए सीर नए हाथ लग जाते..राम जी फिर  बाण से रावण के सीर काटते…लेकिन फिर वो कटे हुए सीर आकाश में जा कर ज़ोर ज़ोर से हसते ..राम जी की मस्करी  करते…हाः हाः हाः कर के हसते….
अयोध्या में राज सिंहासन पर राम जी आते ही उत्सव मनाया..खुशी खुशी में कोई हसता तो राम जी को रावण के कटे सीरों की याद दिलाता…तो राम राज्य आते ही राम जी ने पहेला क़ानून पारित कर दिया की अयोध्या में हँसी पर बंदिश लगाई जाती है!..इस का कोई भी उल्लंघन करेगा वो चाहे मंत्री हो, महा मंत्री हो ..चाहे लखन हो,चाहे  राम खुद हो (राम जी अपने को राम बोलते) उन पर  वो ही क़ानून लगेगा जो प्रजा पर लगेगा…
हँसी पर बैन लगा दी..
1 दिन गुजरा…  5 -25 दिन बीते….  कुछ महीने की कतारे गुज़री…लेकिन हँसी पर बैन  लगाई तो प्रजा उदास रहेने लगी..अनुशासन तगड़ा था…उन दिनों ऐसे देस परदेस में पैसे जमा करनेवाले मंत्री तो थे नही राम राज्य में..फिर भी लोग उदास रहेने लगे..परिणाम बहोत  विचित्र आया…लोगो की हँसी चली गयी तो लोग मायूस रहेने लगे..अस्वस्थ रहेने लगे..तो लोग अपने ईष्ट देव को पूजने लगे..उस समय प्रजा तो राम जी को  भगवान राम नहीं ; राजा राम मानते थे..वर्तमान में भगवान आए तो उस समय लोग उन को 
इतना नही मानते जितना जाने के बाद मानते….
शिर्डी वाले साई बाबा भिक्षा माँगने जाते तो लोग हुड दूत करते…दिवाली का दिया जलाने के लिए ज़रा सा तेल भी नही देते..और अभी उन के लिए 10 करोड़ का सिंहासन बनता है !
हम भी जब साधना करते थे तब कहीं भूक लगी तो अहंकार मिटाने के  लिए सोचा की अब भिक्षा माँगेंगे…भिक्षा माँगने गये तो माई ने कहा, “शरम नही आती..इतना लाल टमाटर जैसा जवान भिक्षा माँगता है!”
तब हम साडे 22 साल के थे..परसनालिटी थी! अभी भी है! :) तो तभी  कैसे होगी?  :)   ..तो माई ने सुना दिया की , “पहेली रोटी पर खड़ा हो गया,  जा  आगे  जा !…” तो फिर मेरे मन को बोला की दुख होता है तो अहम को होता  है, शरीर को तो पता नही और आत्मा को  दुख सुख होता नही..अभी अहम  है..तू अहम छोड़ेगा तभी ईश्वर मिलेगा..मन को सिखाने के लिए भिक्षा मांगी..वरना हमारे पिता तो नगर सेठ थे..
तो महाराज राम जी ने आदेश दे दिया की इस क़ानून का पालन हो…तो लोग देवी देवताओं को, संतों को प्रार्थना करने लगे…आख़िर  बात पहुँची  देवताओ के पास ..और देवताओं के शिरोमणि  ब्रम्‍हा जी तक बात पहुँच  गयी..
ब्रम्हाज़ी ने देखा की भगवान राम तो मेरे उदगम स्थान है..अब मैं कैसे चैलेंज  करूँ?..थानेदार की बात हो तो एसएसपी चैलेंज  कर देगा…
लेकिन सीएम का ऑर्डर आया तो कैसे चैलेंज  करेगा…
ब्रम्‍हा जी ने देखा की भगवान का क़ानून है क्या करे? ..ब्रम्‍हा जी को एक  युक्ति सूझी..
3 प्रकार की दुनिया होती..ये जो दुनिया दिखती उस को आधिभौतिक जगत बोलते..लेकिन ये आँखो से या हाथ पैर से संचालित नही होती..अंदर के आधिदैविक  सत्ता से संचालित होती..जैसे कार दिखती लेकिन पहिए अपनी सत्ता से नही घूमते,हॉर्न अपनी सत्ता से नही बजता…अंदर की  मशीनरी से संचालित होता है..तो उस को आधिदैविक  सत्ता बोलते.. आधिभौतिक पर जिस का प्रभाव चलता है उस को आधिदैविक  सत्ता बोलते…व्यक्ति व्यक्ति में आधिदैविक  सत्ता है और समष्टी में भी आधिदैविक सत्ता है…व्यक्ति व्यक्ति का आधिभौतिक शरीर है..समष्टी  में  भी आधिभौतिक है पृथ्वी,जल, तेज, वायु, आकाश आदि सब आधिभौतिक है…तो जो इंद्रियों से दिख जाए, उस को आधिभौतिक कहेते है..लेकिन इंद्रियों से  ना दिखे फिर भी आधिभौतिक पर जिस की सत्ता  है उस को आधिदैविक बोलते…लेकिन ये सत्ता बदलती रहेती फिर भी जो  ना बदले उस को अध्यात्मिक कहेते..
जैसे आप का शरीर बदल गया..बीमारियाँ बदल गयी..दुख सुख बदला…ये आधिभौतिक बदला…लेकिन मन बदला, बुध्दी बदली ये आधिदैविक बदला है… बचपन की बुध्दी  अभी नन्ही लगती है..उस समय जो बढ़िया  लगता था कोई समझाए फिर भी नही मानते थे..लेकिन अब समझते..तो  वो मन बुध्दी  बदल गया फिर भी जो नही बदले वो अध्यात्मिक हमारा आत्मा है…
 बचपन की बेवकूफी अभी हम मानते है..बचपन के शरीर का  बदलाहट (आधिभौतिक) , मन बुध्दी का बदलाहट , सोच विचार का बदलाहट (आधिदैविक) इन  को जो  जानता है (साक्षी –आत्मा ), जो नही बदला है वो है अध्यात्म …
उस को कही लेने नही जाना पड़ता, उस के पास जाना नही पड़ता..उस को  भगाना नही पड़ता…
और वो दूर नही, दुर्लभ नही..लेकिन वो आधिभौतिक और आधिदैविक दोनो का आधार है..
जैसे सभी गहेनों का आधार सोना है..
जैसे तरंग, झाग, बुलबुले सभी का आधार पानी है..
.. ऐसे ही आधिभौतिक और आधिदैविक का जो आधार है वो  आत्मा  है..इस आत्मा से ही ‘मैं‘ ‘मैं‘..निकलता है..
भगवान है की नही इस में संदेह हो सकता है लेकिन ‘मैं‘ हूँ की नही  इस मे संदेह नही  हो सकता…तो ये ‘मैं‘पना जहा से स्फुरित  होता वो है अध्यात्म!
तो इस अध्यात्म ज्ञान  के सिवाय भगवान साथ में है , अर्जुन की घोड़ा गाड़ी चला रहे फिर भी अर्जुन का दुख नही मिटा..
लेकिन भगवान ने जब अध्यात्म ज्ञान दिया तो अर्जुन का सुख मिटा नही और  दुख टीका नही…
दुनिया की सारी पढ़ाई कर लो , सारी भौतिकता की उँची शिखरो को सर  कर लो..और आधिदैविक जगत की सारी शक्तियां पा लो फिर भी  दुख  मिटेगा नही.. दुख दबेगा..दुख भूल जाओगे ..लेकिन दुख  फिर आएगा..
तो मनुष्य जीवन केवल दुख मिटाने के लिए नही..
सुबह से शाम से आप क्या  करते की जो भी करते सुख पाने के लिए और दुख मिटाने के लिए  करते…शादी करते तो सुख पाने के लिए, तलाक़ भी देते तो सुख पाने  के लिए..जॉब करते तो सुख पाने के लिए और रिटायरमेंट लेते तो भी सुख के लिए.. रिश्वत लेते सुख के लिए और ईमानदारी करते तो भी सुख के लिए..तो जो भी करते सुख पाने  के लिए और दुख मिटाने के लिए..
एक डॉक्टर थी..एमडी स्री रोग विशेषग्य थी  …एबोरशन करना, खूब पैसा लेना, खाना पीना, मौज करना ऐसा जीवन ..लेकिन सत्संग सुना तो ये छोड़ दिया… तो सब डॉक्टर उस का मज़ाक उड़ाते , उस पर हसते की अब क्या कमाएगी..लेकिन अब उस की 2-2 अस्पताले चलती है..बापू के आशीर्वाद से ये हो गया बोलती ..लेकिन ये तो कुछ  भी नही…ये बहोट छोटी चीज़ है.. अध्यात्म तत्व सब का सार है..सब का आधार है..शिव जी इस में ज़्यादा समय टिकते तो शिव जी , ‘महादेव’ है..
अध्यात्म नित्या
विनिवृत्त कामा
द्वंद मुक्ता
सुख दुख संगे ll
अध्यात्म तत्व सब से उँचा है..
मेरे पास कई प्रधानमंत्री आए..कई मुख्या मंत्री आए… बड़े बड़े  धनाढ्य लोग आए.. अमेरिका के धनाढ्य भक्त बोले 22 मिलियन डॉलर  अर्पण 
करेंगे बोले तो मैं अभी तक नही गया..भगवान और सच्चे संतों को  पैसो से नही खरीद सकते…तुम्हारी दुनिया कुछ  भी महत्व नही  रखती..
आप यहा बैठे है ना तो सूरज आप को इतना थाल जैसा दिखता  है…लेकिन सूरज थाल जितना नही है..सूरज पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है..लेकिन दूरी के कारण वो छोटा दिखता है…आकाशगंगा मे 400 करोड़ सूरज है.. उस में ये सब से छोटा सूरज अपनी सृष्टि का है जो  हम को दिखता है.. वो भी पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है लेकिन हमे दिखता कितना छोटा दिखता है…बहोत  दूर है इसलिए हमे छोटा  दिखते … 1 सूर्य नीचे आ जाता – है ऐसे 12 सूरज आ जाते तो पृथ्वी सारी  बाष्पीभूत हो जाती है …प्रलय हो जाता है ..
तो 4 अरब सूर्य जिस आकाशगंगा में है वो आकाशगंगा  आधिदैविक  सत्ता से चलती है और उस को सत्ता मिलती है  अध्यात्म से…उसी अध्यात्म की सत्ता से तुम्हारे अन्न में से खून बनता है…वो ही अध्यात्म सत्ता से  तुम्हारी हमारी सब की नाभि माँ की जेर से जुड़ती है.. ..और माँ की गोद  में आते तो माँ के शरीर में उसी अध्यात्म सत्ता से दूध बन जाता  है..हम खाने पीने के काबिल होते तो माँ  के शरीर में दूध बंद हो जाता  है…
तो वो आध्यात्मिक शक्ति बिजली की नाई जड़ नही है..उस में चेतना है..उस में ज्ञान  है..और वो प्राणी मात्र की सुहुर्द है….उस में 12 दिव्य शक्तियाँ है…सारी शक्तियों का मूल वो ही है..जितना भी कोई जाने अंजाने आध्यात्मिक शक्ति के करीब आता है उतना उस के जीवन में  दिव्यतायेँ आती है..
अब ये चंद्र ग्रहण है..सूर्य और चंद्र तब नही दिखते जब बादलों से  ढके होते है…हक़ीकत ये है की बादल सूरज और चाँद को नही  ढकते..हमारे आँखो की एरिया में चाँद और सूरज ढका दिखता  है..और दूसरी जगह में दिखते है..ऐसे ही वो अध्यात्म सत्ता को कोई ढक नही सकता…वो नित्य हमारे साथ है परमेश्वर सत्ता…लेकिन राग और  द्वेष,वासना और बेवकूफी की चदरिया से वो ढकी सी मालूम होती  है…फिर भी उस की सत्ता सतत काम कर रही है..

लेकिन अयोध्या में तो अभी भी हँसी की बंदिश चालू है.. :)
राम जी और ब्रम्हाज़ी के बीच का खेल शुरू है..आनंद रामायण में ये कथा आती है…राम जी के राज्य में  हँसी पर बंदिश थी वो ब्रम्हाज़ी  ने कैसे हटाई ये सुनोगे तो सचमुच आप को हँसी आएगी..
हसने पर बंदिश होने से लोगों की बोझिली जीवनी शैली हो गयी…हाजमा खराब होने लगा..चिड़चिड़ा पन बढ़ गया..लोग भगवान से  प्रार्थना  करने लगे की हमारे बच्चे,हम अस्वस्थ हो गये ..देवताओं को मानुषी जगत का पता चलता है..देवता के अग्रणी ब्रम्‍हा जी को भी पता  चला…ब्रम्‍हा जी ने देखा की राम जी का बनाया क़ानून को हटाना है  तो क्या करे ?
…ब्रम्‍हा जी अध्यात्म में चले गये..आधिभौतिक सृष्टि के तो ब्रम्हाज़ी रचेयेता है.आधिदैविक सत्ता के धनी है ही है.. लेकिन इन को जहा से वो सत्ता आती वहा जाना ब्रम्हाज़ी जानते है..जैसे  ब्रम्हज्ञानी  संत जानते है ऐसे ब्रम्‍हाजी भी जानते है..तो थोड़ी देर में ब्रम्‍हा जी के चेहरे पर मुस्कान आई..बोले , “देवता तुम्हारा मंगल होगा..ये समस्या का समाधान मिल गया है..”
तो जहा अयोध्या का जो प्रवेश द्वार था वहा पर एक विशाल पीपल  वृक्ष था..आता जाता सभी को दिखाई देता जो भी नगर में प्रवेश करे…ब्रम्‍हाजी पीपल में प्रविष्ट हो गये…भूत पिशाच प्रविष्ट होते तो ब्रम्हाज़ी के शक्ति के आगे पीपल में प्रविष्ट होना क्या कठिन ?
उस जमाने मे लकड़ियों से गुज़ारा होता था..एक लकड़हारा लकड़ी का बोज़ा उठा के चला..तो ब्रम्हाज़ी पीपल में से हंस पड़े..लकड़हारा चौका..और उस की  दबी हुई मानवी हँसी छूट पड़ी…..84 लाख योनियों में केवल मनुष्य के पास हसने की कला है … दूसरे प्राणी नही हस सकते 
…और उसी पर राम जी ने बैन लगा दी….
ब्रम्हाज़ी का संकल्प था तो लकड़हारा भी हस पड़ा…हस पड़ा लेकिन कौन हसा रहा है दिखता नही..अरे भाई कौन हो?.. कौन हो कौन हो, करते हुए हसते जाए.. हसते जाए..सामने से कोई दिखे नही तो ताज्जुब  लगे…ताज्जुब करते हसते हसते आगे गया तो गाव का कोतवाल मिला…कोतवाल को हसते हसते बोला की पीपल के पास हँसी की आवाज़ आ रही..  
कोई हस रहा था दिखाई नही दे रहा..
कोतवाल बोला,  ‘लेकिन हसना  मना है..‘
लकड़हारा बोला,    हाँ पता है ..लेकिन क्या करू? 
क्या करू..क्या करू..करते करते कोतवाल भी हसने लगा.. संक्रामक बीमारी जैसे फैलती ऐसे ये हँसी फैलते गयी… कोतवाल हासे तो उस का ऑफीसर 
हासे..ऐसे करते करते थाने वाले आए.. एसपी  , आईजी  , डीआईजी  सब हसने लगे..मंत्री, महा मंत्री तक ये हँसी पहुँच गयी…
अब एफ़आईआर किस पर लगाओगे? लकड़हारे पर लगाओगे तो फिर  सब पर लगाने पड़ेगी ..राम जी का आदेश है..पूरे प्रजा में हँसी हँसी हँसी फैल 
गयी..
आख़िर वो हँसी महा मंत्री से राम जी तक पहुँची…
महा मंत्री बोले, 
‘प्रभु अयोध्या में ना जाने कौन सी हवा आई की आप की आज्ञा  क़ानून पैरो तले कुचल के सभी हंस रहे..
राम जी बोले, ‘सिपाही क्या कर रहे?’
बोले ,  ‘वो खुद ही हस रहे‘…
सिपाहियों पर क़ानूनी कारवाही होनी चाहिए…3 स्टार  वाले कहाँ  गये?…
बोले वो भी हस रहे …सारे के सारे हसने लग गये..
राम जी बोले, ‘सुमंत जाओ… किस ने अवग्या की है?..राज अवग्या राज द्रोह माना जाता है ..‘
सुमंत भी हस रहे थे..बोले, ‘प्रभुजी  राज द्रोह सभी ने किया है … लेकिन मैं  भी अद्रोही नही हूँ‘
‘ज़्यादा बात मत करो… लखन और भरत युध्द  की तैयारी से जाओ…जहां  से हँसी आई उस को ख़तम करो..‘
लखन भरत गए ….  जाँच करते करते पता चला की सब से पहेले लकड़हारा हंसा था..लकड़हारा से इंक्वाइरी की….उस ने बोला पीपल से हँसी निकली  थी…पीपल के पास गये..इस पीपल से हँसी निकली थी?.. बोले ‘हाँ‘..
‘हाँ‘ बोलते ही पीपल से फिर हँसी निकली..लक्ष्मण और भरत भी हसने  लगे..
भरत बोले, अरे लक्ष्मण तुम क्यो हसते?
बोले, ‘भरत तुम क्यो हसा रहे?’
सभी हसने लगे..अब क्या करे?…
सेनापति, मंत्री जो भी आए  सभी हसने लग जाए…
अब करे तो क्या करे?क्या उपाय है?
आख़िर राम जी के पास एक ही उपाय बचा..राम जी ने कहा, ‘पवन सूत जाओ … अपनी गंभीरता का परिचय दो!..अयोध्या नरेश की आज्ञा है..कोई हासेगा नही..जो ऐसे वैसे है उन को अलग कर दो‘
हनुमान जी गये…हनुमान जी ने  देखा की हँसी वहा से आ रही है..हनुमान जी को भी हँसी आ रही थी..लेकिन हँसी को रोका…अपना बल लगाया… हसीं दबा के जैसे ही आगे बढ़े  हनुमानजी मूर्छित  हो गये..
क्यो? की वायु देवता तो ब्रम्‍हाजी के बेटे लगते है..वायु देवता का  पुत्र हनुमानजी  के तो ब्रम्‍हाजी दादा लगते..दादा के सामने आँख  दिखाता है? ब्रम्‍हाजी अंदर से थोड़ा आँख दिखाते ही हनुमान जी  मूर्छित हो गये..
‘प्रभुजी प्रभुजी हनुमान जी भी  मूर्छित हो गये…‘
राम जी बोले, ‘तो आख़िर वो हसने वाला कौन पुरुष है?..’
राम जी बोले , ‘रथ तैयार  करो..हम स्वयं जाएँगे‘
राम जी स्वयं पीपल के पास गये…ब्रम्हाजी  हाथ जोड़ कर प्रगट हुए और  राम जी की स्तुति गाने लगे..हसने लगे..
तो राम जी भी हसने लगे ..अब सज़ा दे तो किस को दे कौन दे?
ब्रम्‍हाजी प्रगट हो कर राम जी की स्तुति किए..हाथ जोड़ कर बताए की आप  के राज्य की प्रजा के  स्वास्थ्य के लिए हसी जैसी दूसरी औषधि नहीं  थी..
राम जी ने हसी पर की बंदिश हटा दी…
हरि ओम ओम ओम ओम ओम प्रभुजी ओम..प्यारे जी ओम आनंद ओम हा हा हा :)
पूज्यश्री बापूजी के पावन कर कमलो द्वारा आनंद सुख शांति की ज्योतियों का प्रागट्य हुआ… पूज्यश्री बापूजी ने धारण की हुई किशमिश की माला जमनापार समिति को देते हुए पूज्यश्री बापूजी बोले, “अब ये ज्योत आप के घरों में भक्ति, ज्ञान , आरोग्य,प्रीति और सुख शांति का उजाला करेगी..जहां पाठ होगा वहां  ये प्रसाद  बटेगा..”
लोग बोलते है की जमानापार का वातावरण ऐसा है की,
नानक दुखिया सब संसार
ताते अधिक दुखिया जमुनापार!
लेकिन अभी उस सूत्र को हटाना पड़ेगा…
दुखिया सब संसार..
ज्योत के द्वारा
हुआ सुखिया जमुनापार !

धोबी का धमाल, हरि बोल हरि बोल


चैतन्य महाप्रभु गौरांग भक्तों के साथ कीर्तन करते करते नदी किनारे जा निकले..
नदी किनारे एक धोबी हुश हुश करते हुए कपडे धो रहा था
गौरांग को क्या सूझी कि धोबी को बोले हुश हुश क्या करता है?..हरि   बोल हरि बोल

धोबी बोलाबाबा तुम्हारे साथ मैं  नाचूँगा तो मेरे कपडे कौन धोएगा?..
रोजी रोटी कौन करेगा ?
आप तो बाबा लोगों का ठीक है हरि बोल हरि बोल
मैं  हरि बोल करूंगा तो मेरा धंधा कौन करेगा..

गौरांग बोलेतेरा धंधा तो मैं  कर लूं .तू हरि बोल..लाओ कपड़ा

गौरांग महा प्रभु कपड़ा धोते-हुश करते ..
और धोबी बोलता हरि बोल..हुश!–हरिबोल..हुश!–हरि बोलहुश!—-हरि बोल.. 
हुश हुश करते करते धोबी के सारे पाप हुश हो गएधोबी को तो हरि बोल का रंग लग गया!..बोला अब तो बाबा आप के साथ ही रहूंगा 
हरि बोल हरि बोल करूंगा मैं  तो..हरि बोल.. हरि बोल

गाँव में खबर फैली कि धोबी तो बावरा हो गया..
बाबा लोगों के साथ हरि बोल हरि बोलकर रहा..धोबी की पत्नी भी  गयी..

बोली..  रसूल के अब्बा..
धोबी बोले  ‘हरि बोल!’
धोबी की पत्नी बोली.. ‘ऐ जुनेद के अब्बा ……’
धोबी बोले  ‘हरि बोल!’

पत्नी बोली,
ये क्या करते हो?’.. धोबी ने ज़रा हाथ लगाया तो पत्नी भी बोल पड़ी : हरिबोल!हरि बोल!हरि बोल!…

गाँव के लोग बोले बाई वो तो दीवाना हो गया तुम क्यों ऐसा करती हो..
दूसरी बाई ने धोबी की पत्नी के हाथ पकड़ के समझाया..
तो  वो बाई भी लग गयी हरि बोल हरि बोल करने….
तीसरे भाई ने रोका तो वो भी हरि बोल हरि बोल करने लग गया..

गाँव के जो भी उन को रोकने आते वो हरि बोल हरि बोल के कीर्तन में रंग जाते..
जैसे संक्रामक रोग छूने वाले को लग जाता ऐसे इस हितकारी और 
पवित्र भगवान के नाम की मस्ती ने  गाँव वालों को झूमा झूमा कर 
ऐसे पवित्र कर दिया कि इतिहास बोलता है कि वो धोबी धन्य रहा होगा 
जिसने संत के दर्शन से हरि बोल करते हुए सारे गाँव को पवित्र करदिया!


हरि किस को बोलते पता है
जो हर जगहहर देश में हर काल मेंहर वस्तु मेंहर परिस्थिति में  जो परमेश्वर मौजूद है 
उसी का नाम हरि है और उस का स्मरण करने से पाप ताप शोक दुःख हर लिए जाते है.. कैसा भी बीमार आदमी होउस को हरि  की साधना दे दो.. चंगा होने लगेगा बिलकुल पक्की बात है..