स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

जीव-सेवा ही शिव-सेवा - पूज्य बापूजी

जीव-सेवा ही शिव-सेवा

      स्वामी श्रीकृष्णबोधाश्रमजी महाराज एक बड़े ही उच्चकोटि के वीतराग ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे । एक बार वे कुछ ब्रह्मचारियों को लेकर कुरुक्षेत्र गये । दैवयोग से उन दिनों कुरुक्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ गया था। जलाभाव के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था । पशु-पक्षी भी पानी न मिलने के कारण प्यास से मरने लगे थे । सर्वत्र चिंता व्याप्त थी। स्वामीजी एक देवमंदिर में ठहरे हुए थे । वहाँ उन्होंने एक अत्यंत करुणाजनक दृश्य देखा । मंदिर के पास एक बहुत बड़ा तालाब था । उस तालाब के एक छोटे-से गड्ढे में बहुत थोड़ा पानी रह गया था । पानी न होने के कारण तालाब की हजारों मछलियाँ मर चुकी थीं तथा शेष बची हजारों मछलियाँ उस गड्ढे के थोड़े-से पानी में एक जगह एकत्रित हो गयी थीं और पानी के अभाव में छटपटा रही थीं। ऊपर से बड़ी तेज गर्मी पड़ रही थी । गड्ढे का पानी भी एक-दो दिन में सूखनेवाला था । ऐसा होने पर बाकी बची वे हजारों मछलियाँ भी तड़प-तड़पकर मर जाती । स्वामीजी से यह करुणाजनक दृश्य नहीं देखा गया । वे व्याकुल हो उठे और किस प्रकार इन मछलियों के प्राण बचाये जायें, इस पर विचार करने लगे ।

       स्वामीजी के आने का शुभ समाचार सुनकर अनेक लोग उनके दर्शन के लिए आये और सबने करबद्ध होकर एक ही प्रार्थना की कि "महाराज ! बहुत दिनों से वर्षा न होने के कारण को बड़ा नुकसान पहुँच रहा है । तालाब और कुएँ आदि का जल भी सूख गया है । अब तो पशु-पक्षी सभी पानी के बिना मरने लगे हैं । आप ऐसा उपाय बताने की कृपा करें कि वर्षा हो जाय और सबको सुख-शांति प्राप्त हो ।"

      स्वामीजी बोले "भाई भगवान की कृपा चाहते हो तो उन्हें प्रसन्न करो । वे ही तुम्हारे ऊपर कृपा कर वर्षो करके तुम्हारा दुःख दूर करेंगे ।" "महाराजजी ! क्या किया जाय, जिससे भगवान प्रसन्न होकर हम पर कृपा करें ? आप इसका कोई उपाय बतायें ।

      "भगवान को प्रसन्न करने का तात्कालिक उपाय यही है कि तुम यहाँ के जीवों पर कृपा करो, तभी भगवान तुमसे प्रसन्न होकर तुम्हारे ऊपर कृपा करेंगे ।"

      "महाराज ! हममें इतना सामर्थ्य कहाँ है कि यहाँ के जीवों पर कृपा करें । हम तो सर्वथा असमर्थ हैं ।"

     "हम तुम्हें भगवान को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त करने का ऐसा ही साधन बतायेंगे, जो तुम कर सकोगे ।"
      "महाराज ! आप आज्ञा दीजिये, हम उसका अवश्य पालन करेंगे ।"

       स्वामीजी ने सामने के उस सूखे तालाब की ओर संकेत करके कहा: "देखो, उस तालाब का सारा पानी सूख गया है, जिसके कारण हजारों मछलियाँ मर चुकी हैं और बाकी जीवित बची मछलियाँ उस छोटे-से गड्ढे के जल में एक जगह इकट्ठी होकर पानी के बिना छटपटा रही हैं । यदि इन्हें जल देकर इनकी रक्षा नहीं की गयी तो एक-दो दिन में ही ये भी जल के बिना तड़प- तड़पकर प्राण दे देंगी ।"

       आतुरता एवं उत्सुकतावश गाँववालों ने एक स्वर में कहा : "महाराजजी ! हम क्या करें ?"

     "तुम इनके ऊपर कृपा करो तो भगवान स्वयं तुम्हारे ऊपर कृपा करेंगे । इन मछलियों के लिए जल लाकर इस तालाब में डालो।" 

       "महाराजजी ! जल तो है ही नहीं, फिर लायें कहाँ से ?"

      गाँववालों की यह बात सुनकर स्वामीजी स्वयं उठे और पास के कुएं पर पड़ी बाल्टी को लटकाकर जल खींचने को उद्यत हो गये । यह देख सभी गाँववाले स्तब्ध रह गये । फिर क्या था, तत्काल गाँववालों ने कुएं में से जल निकाल-निकालकर उस तालाब में डालना शुरू किया । अब तो जिसे देखो वह पानी लिये दौड़ रहा था । कोई बाल्टी में, कोई घड़े में तो कोई कनस्तर में जल ले जाकर तालाब में छोड़ने लगा । अब तालाब में जल-ही- जल दिख रहा था । मछलियों का छटपटाना बंद हो गया था, उनके प्राणों की रक्षा जो हो गयी थी।

     मछलियों के प्राण-रक्षारूपी इस यज्ञ से भगवान गाँववालों पर अत्यंत प्रसन्न हुए और तत्काल एक अद्भुत चमत्कार हुआ । कई दिनों से जो आकाश बिल्कुल साफ था और बादल नाम को भी नहीं थे, वह आकाश सबके देखते-देखते एकदम बादलों से भर उठा । मेघों का गरजना और विद्युत का चमकना शुरू हो गया तथा मूसलधार वर्षा होने लगी । देखते-ही-देखते चारों ओर जल- ही जल भर गया । चारों ओर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी । उस क्षेत्र के सूखा पीड़ित लोगों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा । सभी गाँववाले स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे :

       "महाराजजी ! आपका यह कहना कि 'तुम यहाँ के जीवों पर कृपा करो तो तुम्हारे ऊपर भगवान कृपा करेंगे ।' यह बात अक्षरशः सत्य निकली । आज हम लोगों ने यह प्रत्यक्ष अनुभव किया है कि 'जीव प्रसन्नता ही भगवत्प्रसन्नता है, जीव-सेवा ही शिव-सेवा है। अतः प्राणिमात्र को भगवान ही मानकर उनकी सेवा करनी चाहिए ।"

ऋषि प्रसाद नवंबर 2010