स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

तनाव क्यों हैं ? तनाव से मुक्ति कैसे पायें? तनाव इसलिये है कि जीवन में सत्संग नहीं है !

जीवन में सत्संग नहीं है तो तनाव तो होगा ही

संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

सारा संसार तीन तनावों में तना जा रहा हैः शारीरिक तनाव, मानसिक तनाव और भावनात्मक तनाव।

इन तीनों तनावों की भीषण चक्की में देश विदेश के सभी मनुष्य पिसे जा रहे हैं। आत्महत्या के कारणों की जाँच करने वाले एक अध्ययन के अनुसार 98 प्रतिशत आत्महत्याएँ मानसिक एवं भावनात्मक तनावों के कारण ही होती हैं। लाख आत्महत्याओं में 98000 का कारण मानसिक एवं भावनात्मक तनाव है। सारे सुख-सुविधाएँ होते हुए भी इन तनावों के कारण बेचारे लोग आत्महत्या करके मर जाते हैं।

इसी प्रकार 95 % हृदयघात भी मानसिक तनाव के शिकार लोगों को ही होता है। कई लोगों को खानपान का उचित विवेक नहीं होता है इस कारण भी वे हृदयघात का शिकार बन जाते हैं।

‘सुख-दुःख में सम रहना, सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है।’ गीता का यह ज्ञान, इस प्रकार का सत्संग जिन्होंने पाया है ऐसे लोग इन तनावों से नहीं तनते। उन्होंने ही जीवन जीने का सही ढंग सीखा है।

ऐसा ज्ञान पाने वाला साधक इन तनावों का शिकार होने से काफी तक बच जाता है, क्योंकि वह न तो अति परिश्रम करेगा और न ही अति आराम करेगा। साधक परिश्रम भी करेगा तो उसे कठिन नहीं लगेगा, क्योंकि वह ऐसा नहीं मानेगा, ‘मैं परिश्रम कर रहा हूँ’ वरन् वह तो मानेगा, ‘परिश्रम शरीर कर रहा है।’ ऐसा समझकर वह शारीरिक तनाव से बचता चला जायेगा और मानसिक तथा भावनात्मक तनाव से बचने की विधि भी वह सत्संग के द्वारा जान लेता है।

मेरो चिंत्यो होत नाहीं हरि को चिंत्यो होय।

हरि को चिंत्यो हरि करे मैं रहूँ निश्चिंत।।

तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत होई सोय।

अनहोनी होती नहीं होनी होय सो होय।।

सब अपना-अपना प्रारब्ध लेकर आते हैं। फिर भी मनुष्य को अपना पुरुषार्थ करना चाहिए और पुरुषार्थ तो करे लेकिन उसका फल पाने की इच्छा न रखे बल्कि ‘भगवान ! तेरी मर्जी पूरण हो… मेरी इच्छा, वासना, कामना जल जाय और तेरी इच्छा पूरी ही जाय।’ इस भाव से प्रयत्न करे, सदगुरु के इस प्रकार के वचन सुनकर एवं उसका अभ्यास करके  विवेक, वैराग्यसम्पन्न सुदृढ़ सत्संगी मानसिक तनावों से इतने नहीं पीड़ित होते हैं जितने कि निगुरे पीड़ित हो जाते हैं।

क्योंकि निगुरे आदमी को तो गुरु के वचन सुनने को नहीं मिलते। कभी पुण्यवश संत-महापुरुष के वचन सुनने को मिल भी जायें तो वह उन्हें सुनता तो है लेकिन उस प विचार नहीं कर पाता है, उन वचनों को स्वीकार नहीं कर पाता है। उसे लगता है ‘यह तो करना चाहिए, वह तो करना चाहिए….’ तो करो और मरो, कर्त्ता हो कर पचते रहो तनावों में।

‘मैं कुछ बनकर दिखाऊँ, कुछ करके दिखाऊँ….’ का जो भूत है वह निगुरे लोगों को मानसिक और भावनात्मक तनाव में ताने रखता है। अरे, बनकर क्या देखना है ? तू मिट जा भैया ! बनेगा तो अहंकारी हो जायेगा। तू बनने की कोशिश न कर, मिटने का यत्न कर।

जो तिद् भावे सो भलिकार…..

फिर भी कुछ बनने का शौक है तो भगवान का बनकर देख, सदगुरु का बनकर देख।

संसार में थोड़े-बहुत सफल हो गये तो अहंकार मार गिराता है और विफल हो गये तो विषाद दबोच लेता है। इसलिए ‘मैं कुछ होकर दिखाऊँ, कुछ बनकर दिखाऊँ, कुछ प्रसिद्ध होकर दिखाऊँ….’ ऐसी कामना सत्शिष्य को नहीं होती।

कुछ बनकर नहीं दिखाना है वरन् यह जो कुछ बनकर दिखाने का भूत है उसको हटाओ। फिर देखो, वह घड़वैया तुम्हें कैसा घड़ता है ! हमने कभी नहीं सोचा, ‘मैं आसुमल हूँ, आसाराम बनकर दिखाऊँ… प्रसिद्ध होकर दिखाऊँ….’ नहीं नहीं।

मेरी हो सो जल जाय तेरी हो सो रह जाय….

कुम्हार के हाथ में मिट्टी को जाने दो फिर वह घड़ा बनाये, सुराही बनाये, कुल्हड़ बनाये उसकी मर्जी…. संसार का कुम्हार तो बनता है अपने स्वार्थ के लिए लेकिन परमात्मा और सदगुरुरूपी कुम्हार अपने स्वार्थ के लिए नहीं बनायेंगे वरन् तुम्हें ही परमेश्वरमय बना देंगे।

यदि तू अपनी अकड़-पकड़ छोड़ दे, अपनी वासना छोड़ दे और अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए चिंतन करना छोड़ दे तो बहुतों की भलाई के लिए ईश्वर तेरे द्वारा बहुत कुछ करवाने को तैयार है। अगर तू कुछ बनने की कोशिश करेगा तो मानसिक तनाव में, भावनात्मक तनाव में और अहंकार में ही तनता रहेगा। इसी प्रकार भावनात्मक तनाव भी लोगों को पीड़ित कर रहा है।

एक आदमी बीच सड़क से जा रहा था। उससे पूछ गयाः “भाई ! तू बीच सड़क पर क्यों रहे हो ?”

आदमी बोलाः “एक बार कोई आदमी सड़क के किनारे से जा रहा था और किनारे के किसी मकान की दीवार गिर गयी तो उससे वह आदमी दब गया था। अब मुझे भी डर लगता है कि कहीं किनारे वाली दीवार गिर जायेगी तो मैं भी दबकर मर जाऊँगा। इसीलिए बीच सड़क पर चलता हूँ।”

ऐसे ही किसी को आठ साल की एक बेटी है और दूसरी संतति भी बेटी ही हुई तो माँ को चिंता लग गयी कि इसके लिए दहेज देना पड़ेगा….। दहेज तो देना पड़ेगा 18-20 साल के बाद लेकिन तनाव अभी से घुस गया… और 18-20 साल के बाद परिस्थितियाँ बदल जायेंगी। अभी कन्याएँ कम हो रही हैं और लड़के ज्यादा। इन आँकड़ों के हिसाब से आने वाला समय इससे कुछ दूसरा ही होगा। अभी बेचारे कन्या वाले गिड़गिड़ाते हैं, तब लड़के वाले आजी-निजारी, मन्नतें करते, कन्या माँगते रहेंगे जो कि सन् 1947 के पूर्व की स्थिति थी। लड़कों की इतनी कीमत नहीं रहेगी, लड़की मिले तो कृपा हो गयी ऐसा होने वाला है।

लड़की दस साल की हो गयी… तब भी चिंता हो रही है कि इसकी शादी करनी पड़ेगी। लड़की 18 वर्ष की हो गयी…. 20 की हो गयी… सगाई नहीं हो रही है तब भी चिंता हो रही है, भावनात्मक तनाव की लकीरें दिन-प्रतिदिन खिंचती चली जाती हैं। अरे ! जो होना होगा सो होगा। तुम प्रयत्न करो, कार्य में ध्यान रखो लेकिन चिंता मत करो।

शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए खूब आविष्कार हो रहे हैं परन्तु व्यक्ति अगर तीन-चार घंटे भी नींद कर ले तो आराम से स्वस्थ रह सकता है, परन्तु खानपान और आहार-विहार की गड़बड़ी करता है तो 7-8 घंटे सोने पर भी अपने को थका हुआ महसूस करता है। फिर थोड़ा काम करता है तो ‘मैंने बहुत काम कर लिया और मैं बहुत थक गया हूँ… मैं बीमार हूँ और मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ….’ ऐसे बेकार के चिंतनों में पड़कर शारीरिक तनाव से पीड़ित हो जाता है।

शारीरिक और मानसिक तनाव बढ़ने से फिर उस आदमी को सिगरेट की, दारू की जरूरत पड़ने लगती है। पति अथवा पत्नी के साथ अपना सत्यानाश करने की इच्छा – यह शारीरिक और मानसिक तनाव का फल है। बिनजरूरी काम विकार, बिन जरूरी खाना, बिनजरूरी बोलना – ये भी शारीरिक और मानसिक तनाव के लक्षण हैं।

मनुष्य अगर इसी ढंग से जीवन जीता रहे तो उसके पास मौत की चार चिट्ठियाँ आ जाती हैं- शरीर पर झुर्रियाँ, बालों की सफेदी, आँखों की रोशनी में कमी और नसों की कमजोरी।

अगर कोई इन मुसीबतों से बचना चाहता है तो उसे चाहिए कि आसन प्राणायाम के द्वारा शरीर को स्वस्थ रखे, श्वासोच्छ्वास की गिनती करे और ‘मैं शरीर नहीं हूँ तो रोग मुझे कैसे छू सकता है ?’ ऐसा सोचे, संतों के सत्संग का लाभ ले तो वह शारीरिक और मानसिक तनाव से मुक्ति पा लेगा।

अपनी जीवन में तीन बातों का ध्यान रखोः

शरीर को अति थकाओ मत।

मैं थक गया हूँ – ऐसा सोचकर मन से भी मत थको। मन को तनाव में न डालो। जो होगा देखा जायेगा।

भावनाओं एवं कल्पनाओं में मत उलझो।

सारा संसार इन्हीं तीन तनावों से तप रहा है – शारीरिक तनाव, मानसिक तनाव और भावनात्मक तनाव। कोई भगत है, मंदिर में भी जाता है फिर भी यदि उसके जीवन में सत्संग नहीं है, संत पुरुषों का मार्गदर्शन नहीं है तो वह भी भावनात्मक तनाव से तन जाता है। कुछ अच्छा हो गया तो खुश हो जायेगा कि ‘भगवान की बड़ी कृपा है’ और कुछ बुरा हो गया तो कहेगाः “भगवान ने ऐसा नहीं किया, वैसा नहीं किया।’ लेकिन उसे क्या पता कि भगवान उसका कितना हित चाहते हैं ? इसलिए कभी भी अपने को दुःखद चिंतन में नहीं गिराना चाहिए, निराशा की खाई में नहीं गिराना चाहिए और न ही अहंकार के दलदल में फँसना चाहिए वरन् यह विचार करें कि संसार सपना है इसमें ऐसा तो होता रहता है।….

इन तीनों तनावों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, बाकी के सब उपाय तो तनावरूपी वृक्ष के पत्ते और टहनियों के तोड़ने  के समान हैं। तनावरूपी वृक्ष की जड़ में कुल्हाड़ी मारना हो तो एक ही कुल्हाड़ी है – वह है आत्मयोग की।

आत्मयोग क्या है ?

जो दिख रहा है वह सब स्वप्न है, स्फुरणमात्र है और जिससे दिख रहा है वह आत्मा ही सत्य है। उस सत्य में विश्रांति पाने का नाम ही है – आत्मयोग। इससे तीनों तनाव अपने आप दूर हो जाते हैं।

सब लोग इन तीन तनावों में से किसी न किसी तनाव से कम या अधिक अंशों में पीड़ित हैं। कोई एक से तो कोई दो से अथवा कोई-कोई तो तीनों तनावों से पीड़ित हैं। इन तीनों तनावों से पार हुआ अपने परमेश्वर स्वभाव में, अपने आत्मस्वभाव में जगा हुआ तो कोई विरला महापुरुष ही मिलता है।

ऐसे आत्मवेत्ता महापुरुष इन तीन तनावों से पार होने की कुंजी बताते हैं, प्रयोग बताते हैं और परमात्म-प्रसन्नता की प्राप्ति भी करा देते है। धनभागी है वे लोग जो उनके पदचिन्हों पर सच्चाई एवं श्रद्धापूर्वक चलाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2002, पृष्ठ संख्या 10-12, अंक 111

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