स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।
Do Japa of any God's Name, 1st 4 minutes in lips, then 2 minutes in throat, then 2 minutes in heart, then do nothing for 2 minutes, be silent. If done 3-4 times daily this 10 minutes course, one will fly in spiritual journey. -Pujya Bapuji

जब तक और तब तक


जब तक तुम्हें अपना लाभ और दूसरे का नुकसान सुखदायक प्रतीत होता है,
तब तक तुम नुकसान ही उठाते रहोगे।

जब तक तुम्हें अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा प्यारी लगती है,
तब तक तुम निन्दनीय ही रहोगे।

जब तक तुम्हें अपना सम्मान और दूसरे का अपमान सुख देता है,
तब तक तुम अपमानित ही होते रहोगे।

जब तक तुम्हें अपने लिए सुख की और दूसरे के लिए दुःख की चाह है,
तब तक तुम सदा दुःखी रहोगे।

जब तक तुम्हें अपने को न ठगाना और दूसरों को ठगना अच्छा लगता है,
तब तक तुम ठगाते ही रहोगे।

जब तक तुम्हें अपने दोष नहीं दीखते और दूसरे में खूब दोष दीखते हैं,
तब तक तुम दोषयुक्त ही रहोगे।

जब तक तुम्हें अपने हित की और दूसरे के अहित की चाह है,

तब तक तुम्हारा अहित ही होता रहेगा।

जब तक तुम्हें सेवा कराने में सुख और सेवा करने में दुःख होता है,
तब तक तुम्हारी सच्ची सेवा कोई नहीं करेगा।

जब तक तुम्हें लेने में सुख और देने में दुःख का अनुभव होता है,
तब तक तुम्हें उत्तम वस्तु कभी नहीं मिलेगी।

जब तक तुम्हें भोग में सुख और त्याग में दुःख होता है
तब तक तुम असली सुख से वंचित ही रहोगे।

जब तक तुम्हें विषयों में प्रीति और भगवान में अप्रीति है,
तब तक तुम सच्ची शान्ति से शून्य ही रहोगे।

जब तक तुम शास्त्रों में अश्रद्धा और मनमाने आचरणों में रति है,
तब तक तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।

जब तक तुम्हें साधुओं से द्वेष और असाधुओं से प्रेम है,
तब तक तुम्हें सच्चा सुपथ नहीं मिलेगा।

जब तक तुम्हे सत्संग से अरूचि और कुसंग में प्रीति है,
तब तक तुम्हारे आचरण अशुद्ध ही रहेंगे।

जब तक तुम्हें जगत में ममता और भगवान से लापरवाही है,
तब तक तुम्हारे बन्धन नहीं कटेंगे।

जब तक तुम्हें अभिमान से मित्रता और विनय से शत्रुता है,
तब तक तुम्हें तुम्हारा स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा।

जब तक तुम्हें बाहरी रोगों से डर है और काम-क्रोधादि भीतरी रोगों से प्रीति है,
तब तक तुम निरोगी नहीं हो सकोगे।

जब तक तुम्हें धर्म से उदासीनता और अधर्म से प्रीति है,
तब तक तुम सदा असहाय ही रहोगे।

जब तक तुम्हें मृत्यु का डर है और मुक्ति की चाह नहीं है,
तब तक तुम बार-बार मरते ही रहोगे।

जब तक तुम्हें घर-परिवार की चिन्ता है और भगवान की कृपा पर भरोसा नहीं है,
तब तक तुम्हें चिन्तायुक्त ही रहना पड़ेगा।

जब तक तुम्हें प्रतिशोध से प्रेम है और क्षमा से अरूचि है,
तब तक तुम शत्रुओं से घिरे ही रहोगे।

जब तक तुम्हें विपत्ति से भय है और प्रभु में अविश्वास है,
तब तक तुम पर विपत्ति बनी ही रहेगी।